झूलते हुए झूलता हूॅं झूला
झूलते हुए झूलता हूॅं झूला
कुछ देर इधर,कुछ देर उधर हूॅं मैं
कुछ देर बीच में किन्तु ठहरता नहीं हूॅं
बीच में रहते हैं जो भी,अभी या कभी भी
ज़रा-ज़रा भी पाते नहीं हैं ठौर-ठिकाना
ठीक नहीं,दोनों तरफ़ वफ़ादारी ठीक नहीं
इस तरफ़ या उस तरफ़ हो जाना ही ठीक
युद्ध का वक़्त है यही और सही-सही
बदलना औज़ार और उपस्थिति ठीक नहीं
अपनों में रहने से ही होता हूॅं मुक्त
अपनों में मरने से ही मिलती है मुक्ति
मुक्तिबोध मुक्तिमार्ग संभावना है अब भी
जॅंगल-जॅंगल झरते हैं झरने झर-झर
खिलते हैं फूल भी ख़ुशबूदार
- राजकुमार कुम्भज
*****
आज हिज्र की सर्द शाम है
दो गिलास और एक जाम है
थी तलब मुलाक़ात की मुझे
पर जनाब को और काम है
भूल कर भी भूली नहीं मुझे
हाथ की महंदी पे नाम है
हो अगर भरी बज़्म तो मुझे
चश्म उसकी करती सलाम है
मैं मुरीद सूरत का ना हुआ
हुस्न सिर्फ इक ताम झाम है
- अंकुश
*****
अनकहा इश्क़
मैं जानती हूं
तुम सब जानते हो
फिर ये भ्रम की माया
क्यों नहीं पहचानते हो ?
जानते हो तुम मेरी
मुस्कुराहट की वजह
फिर मुस्कुरा औरो से
मेरे सीने को क्यों छली करते हो।
मैं जानती हूं
तुम मेरी फिक्र बहुत करते हो
छू न जाए हवा भी मुझे
इस बात से भी डरते हो।
सुना है तुम जीत लेते हो
सब का हृदय
फिर मेरी एक मुस्कुराहट के आगे
क्यों ख़ुद को हारे हुए बैठे हो ?
लिखते हो तुम
अपनी गजलों में मेरे बारे में
फिर मेरा नाम
सरेआम लेने से क्यों डरते हो।
- डॉ. राजीव डोगरा
*****
मेरे अपने कुछ पल
मेरे जीवन के कुछ क्षण,
हो जाती हूँ तुझमें मगन,
खो जाती हूँ इस कदर
कि तू ही बन जाता है
मेरा अभिन्न अंग।
पँछियों का यूँ चहचहाना,
मेरी देहरी तक आ जाना,
जैसे मेरे मन की थकन
पहचान कर
चले आते हों।
मन की अनकही अवस्थाएँ,
मौन में सिमटी भावनाएँ,
वे जैसे सब समझ लेते हों
बिना प्रश्न किए
सिर्फ़ बोलते हों।
उनकी मीठी वाणी सुन
मन का बोझ
किसी अनदेखे स्पर्श सा
हल्का हो जाता है।
कुछ पल के लिए
मैं स्वयं से दूर,
उनकी ध्वनि में
पूरी तरह खो जाती हूँ।
तब लगता है कि
वे जीने का संदेश लेकर आए हैं,
कहते हैं धीमे स्वर में
“मत होना कभी उदास,
हम हैं न,
यहीं कहीं आसपास।”
सुन चिरैया,
तू यूँ ही चहचहाती रहना,
ताकि जीवित रहे संवेदना।
शायद तू
किसी अदृश्य शक्ति की
सशक्त चेतना हो।
- सविता सिंह मीरा
*****
तेरे भरोसे
ऐ खुदा तू,
इंतहान क्यों लेता है,
दुख देकर पराया,
मान क्यों लेता है।
बच्चे तुम्हारे हम हैं,
फिर क्यों खुशी कम,
ज़ख्म बहुत है जीवन में,
रहती ये आंखे नम है।
किस्मत के मारो को,
क्यों मारता है,
मेरी नैया तू ही, डुबोए फिर
कौन तैरता है।
तेरे ही भरोसे हम हैं,
तू ही सब कुछ,
तेरे ही हम पे करम है,
बाकी सब वहम है।
मालिक तू साथ नहीं,
तो सब कुछ कम है
जो मिलती है खुशी,
वो तेरा ही रहम है।
हमने सिर्फ तुमको,
ही जाना,
सब से पहले तुमको,
ही पहचाना।
तू दिखता नहीं ,फिर भी
देखता हूं तुझे हर रूप में।
तू ही बनता सहारा,
मेरे डगर की हर धूप में।
मेरे जीवन की नैया,
लगाओगे पार।
नहीं छोड़ोगे बीच,
मुझे इस मझधार।
अपनी लाज बनाए रखना,
चाह नहीं सरताज बनने की,
इतनी कृपा कर,
किसी का मोहताज नहीं,
बनाए रखना।
- रोशन कुमार झा
*****
संतुलन का झुकाव
मध्य में बने रहने के लिए
कभी दाएँ झुकना पड़ता है,
कभी बाएँ
जैसे वृक्ष आँधी में झुककर भी
जड़ें नहीं छोड़ता।
जो सदा सीधा रहने की ज़िद करे,
वह टूट जाता है;
और जो हर ओर बह जाए,
वह अपना केंद्र खो देता है।
मध्य मार्ग कोई जड़ता नहीं,
वह जीवंत लय है!
समय, परिस्थिति और करुणा के साथ
हल्का-सा झुक जाना।
और नदी भी तो
मोड़ लेकर ही सागर तक पहुँचती है।
झुकना हार नहीं,
झुकना बुद्धि है।
बस ध्यान रहे
झुकते हुए भी
आत्मा का केंद्र अडिग रहे।
- नरेंद्र मंघनानी
*****
जितनी अधिक सुविधाएं ,
उतना ही अवसादग्रस्त
जितना धन दौलत ,
उतना ही अधिक बेचैनी।
जितना बुद्धि विवेक,
उतना ही अधिक खड़यंत्र।
जितना प्यार मोहब्बत ,
उससे अधिक धोखा।
जितना अधिक लगाव ,
उससे अधिक तनाव।
जितना अधिक आविष्कार,
उतना अधिक खूनी अत्याचार।
जितना अधिक जनसंख्या,
उससे अधिक है भुखमरी।
जितना अधिक ईमानदारी ,
उससे अधिक बेइमानी,ठगी।
जितना कम ज्ञान,
उससे अधिक घमंड ।
जितना कम आमदनी
उससे अधिक दिखावा।
जितना अधिक सुंदरता,
उतना ही अंदर से खोखला।
जितना अधिक शांत स्वभाव ,
उतना ही अधिक शातिर अंदाज।
जितना अधिक मीठी जबान,
उतना ही अधिक जहरीला।
- सदानंद गाजीपुरी
*****
दिव्य स्वप्न होगा साकार
कहते हो जिस
तन को तुम अपना
वह तन तुम्हारा नहीं है
जिस सम्पति के लिए तुम
सबसे करते हो लड़ाई
वह सम्पति तो
यहीं रह जाती है
जिस धन के लिए सब
अनैतिक कार्य कर जाते हो
क्या वह धन
किसी के साथ जाता है ?
जिन परिजनों को तुम
अपना बताते हो
वास्तव में वो भी
तुम्हारे अपने नहीं हैं
क्या कोई किसी के साथ गया ?
ये जग झूठा है, यहाँ कोई
किसी का अपना नहीं है
अगर जीवन में तुम्हें
आगे बढ़ना है तो
खुद को जानो
अपने कर्तव्य का
करो सम्यक निर्वहन
सेवा, परोपकार में
सदैव रहो संलग्न
नित्य करो भजन- कीर्तन
एक दिन अवश्य होगा
आत्म साक्षात्कार रूपी
दिव्य स्वप्न साकार
- प्रवीण कुमार
*****
बस का सफ़र
आज बस में सफ़र करते हुए,
यह अहसास हुआ कि ये जिंदगी,
ना जाने किधर भाग रही है?
उस भीड़ से भरी गतिमान बस में,
माँ की गोद में सोए शिशु से लेकर,
वृद्धावस्था के अंतिम पड़ाव पर
पहुँच चुके हर जन के जीवनदर्शन
को समझने का अवसर मिला!
जहाँ सभी मूक दर्शक बनकर,
भूत से भविष्य की ओर सक्रिय थे!
एक बालक खिड़की से बाहर
अपने बचपन को निहार रहा था,
तो एक युवा सपनों की ख़ातिर
ढ़ेर सारी उम्मीदें लेकर निकला,
वहीं एक प्रौढ़ जिम्मेदारियों में
उलझा गहन चिंतित सा बैठा था,
तो एक वृद्ध शायद इसी आस में
सफर कर रहा था कि उसे अभी,
मंज़िल के और निकट जाना है!
कुछ महिलाएँ ढेरों ख्वाब लिये,
अपनों से मिलने की चाहत में,
जीवन सफर पर निकली होंगी!
उस कमरे जैसी बस में लगभग,
हर आयु वर्ग के यात्री मौजूद थे,
किसी को समय से नौकरी पर
जाने की चिंता तो कोई विभिन्न
मुद्दों पर चर्चा करते चल रहे थे,
सभी अपनी ही दुनिया में लीन,
आपस में एक झलक देखते
फिर खो जाते सोच के सागर में,
तो कुछ नींद की झपकी लेते हुए
कल्पनाओं की सड़क के पंथी थे!
किसी के चेहरे पर चिंता के भाव,
तो किसी पर खुशियों की चमक,
ये जिंदगी भी बस के जैसी है,
जिसमें सुख दुख चढ़ते उतरते हैं,
चलते चलते अब बस का अंतिम
ठहराव आ गया जहाँ से सब लोग
अपनी मंज़िल की ओर निकल गए,
वहाँ अकेली रह गई थी तो वो बस,
जिसे नए मुसाफिरों को लाने हेतु,
एक बार फिर से तैयार होना था।
- आनन्द कुमार
*****
चिट्टणु
दुर-फिटेम मुया चिट्टणुआ
ओ..ओ ओ ओ.. ओ
कैंह म्हाचले डेरे लाए
कैंह भोले लोक फसाए
कैंह बलदे दिउए बुझाए
नास-पिटणुआ..हाय
फिटेम चिट्टणुआ!
नित्या खड्डा जो..
ओओओ..
तू ल्वाया खड्डा जो।
किती तू जम्या किती तू जाया
कम्म तेरे काले नांव चिट्टा पाया
कुड़िएं मुंडुएं मुंह लगाया
नास-पिटणुआ...हाय
फिटेम चिट्टणुआ
तू नित्या खड्डा जो
ओओ ओ..
तू ल्वाया खड्डा जो।
कुण-कुण तेरे दुषट बप्वारी
तिन्हें जे पाई ये बुरी बमारी
टोल रही हुण पुलस सारी
नास-पिटणुआ..हाय फिटेम चिट्टणुआ
तू नित्या खड्डा जो ओओओ...
तू ल्वाया खड्डा जो !
मुंडु-कुड़ियो बहिनों-भाईयो
दिला ने अज कसम खाईयो
चिट्टे ने कदि हत्थ ना लाईयो
लाये कोई तां पुलस सदाईयो
तब फसेगा चिट्टणुआ
हाय...
नास-पिटणुआ
तू नित्या खड्डा जो
ओओ..
तू ल्वाया खड्डा जो।
परीक्षा काल
विद्यार्थी की नज़र में परीक्षा
चिंता भी है, भय भी,
सुकून भी, सीख भी,
और साल भर किए गए
हर परिश्रम का एहसास भी।
विषयों की समझ के साथ
याद आते हैं वे अध्यापक,
जिनकी बातों ने शब्दों को अर्थ दिया,
और किताबों को जीने का साहस।
कभी मन कहता है
“सब आता है, पढ़ ही लेंगे ना यार,”
तो कभी खुद से किए वादे
और अपनों की उम्मीदें
आँखों में उतर आती हैं।
परिणाम की आहट सुनते ही
चेहरे पर अनायास ही
मुस्कान बिखर जाती है,
या फिर एक मौन प्रश्न खड़ा हो जाता है।
सच तो यह है
कि परीक्षा केवल काल नहीं,
जीवन का वह पल है
जहाँ विद्यार्थी खुद से मिलता है,
और वहीं एक गहरा सा सबक
हमेशा के लिए सीख लिया जाता है।
- डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’
*****
सर्दी की पहली बारिश
सर्दी की पहली बारिश जो हुई
एक बार फिर सर्दी में जवानी आई।
खेतों में फसलें लहलहाने लगी
अब तक समझ रही थी जो खुद को ठगी ठगी।
पौधों में भी नई कोपलें आने लगी
उनमें भी नव जीवन की धारा बहने लगी।
नदी नाले सूखने को थे आए
उनमें भी जलधारा बहती जाए।
पहाड़ थे उदास बड़े
खुश हैं आज बर्फ के फाहे जो पड़े।
किसान को भी खुशी बहुत होती
यही वर्षा अनाज के भंडार है भरती ।
सुखे जलस्त्रोत चैन की सांस भरते
वो भी अब जल प्रदान करते।
बच्चे,बूढ़े, जवान सब खुशी मनाते
संदाल में मन भावन पकवान है खाते।
चारों ओर हरियाली नजर लगी आने
दृश्य देख हर कोई आनन्द लगा जताने।
- विनोद वर्मा
*****
यादों में तुम्हारी
यादों में तुम्हारी रहने लगी हूं,
ज़िन्दगी से समझौता करने लगी हूं।
हर लम्हा याद है मुझे जिंदगी का
हर आहट को महसूस करने लगी हूं।
न चांद को खबर न तारों को खबर है,
तुम्हारे प्यार में वफा अब दिखने लगी है।
झील और झरनों के किनारे कभी तो आनंद लिया है,
ख्बाव आंखों में सजाकर संवरने लगी है।
कब दिन ढला बता ना चला है, मुझे,
हर श्याम तुम्हारा इंतज़ार करने लगी है।
बाजार में हलचल मुझे भी बहुत दिखी है,
भीड़ में सिर्फ मुझे तुम नज़र आते दिखे हैं।
- रामदेवी करौठिया
*****
जीवन की शर्ते
वो ज्ञान ही क्या जो समय से न हो,
वो नर ही क्या जो कर्म से न हो।
वो ईश्वर ही क्या जो दया से न हो,
वो पक्षी ही क्या जो उड़ान से न हो।
वो जवाब ही क्या जो सत्य से न हो,
वो जीवन ही क्या जो प्रेम से न हो।
वो देश ही क्या जो जन से न हो,
वो जीत ही क्या जो प्रयास से न हो।
वो पथ ही क्या जो पग से न हो,
वो जल ही क्या जो प्यास से न हो।
वो प्रेम ही क्या जो दिल से न हो,
वो गुलाब ही क्या जो काँटों से न हो।
वो कल ही क्या जो आज से न हो,
वो दिन ही क्या जो रात से न हो।
वो हीरा ही क्या जो कोयले से न हो,
वो अलंकार ही क्या जो तन से न हो।
वो वन ही क्या जो वृक्ष से न हो,
वो कमल ही क्या जो पंक से न हो।
वो ताल ही क्या जो पय से न हो,
वो सिंह ही क्या जो नृप से न हो।
वो ज्ञान ही क्या जो समय से न हो,
वो नर ही क्या जो कर्म से न हो।
वो ईश्वर ही क्या जो दया से न हो,
वो पक्षी ही क्या जो उड़ान से न हो।
वो जवाब ही क्या जो सत्य से न हो,
वो जीवन ही क्या जो प्रेम से न हो।
वो देश ही क्या जो जन से न हो,
वो जीत ही क्या जो प्रयास से न हो।
वो पथ ही क्या जो पग से न हो,
वो जल ही क्या जो प्यास से न हो।
वो प्रेम ही क्या जो दिल से न हो,
वो गुलाब ही क्या जो काँटों से न हो।
वो कल ही क्या जो आज से न हो,
वो दिन ही क्या जो रात से न हो।
वो हीरा ही क्या जो कोयले से न हो,
वो अलंकार ही क्या जो तन से न हो।
वो वन ही क्या जो वृक्ष से न हो,
वो कमल ही क्या जो पंक से न हो।
वो ताल ही क्या जो पय से न हो,
वो सिंह ही क्या जो नृप से न हो।
- साक्षी यादव
*****














No comments:
Post a Comment