साहित्य चक्र

11 July 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 11 जुलाई 2026





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अमीरी-गरीबी

अमीरी

ब्याव शादी
उछब रै माथे
नूवा रूतबा
गाड्या रो काफिलों
अमीरी रा
लखण कम
मांगत रा खाडा
घणा गिणिज्ये!

ग़रीबी

ॳक पग
चुल्हा माथे टांग
भींत लफ
चानों पकड़
छात री मुडेर
चढ़णों
ग़रीबी नीं गिणिज्ये।


- डॉ जितेन्द्र कुमार बोयल


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जीतेंगे हम ये वादा करो।
कोशिश हमेशा ज्यादा करो

उड़ान इतनी ऊंची रखो।
कि आसमान भी छोटा लगे

इरादा इतना बड़ा रखो।
कि हर सपना अपना लगे

परिस्थिति चाहे कितनी भी खराब क्यों ना हो,
एक न एक दिन बदल ही जाएगी,

जो तुझे गिराना चाहे,
उनसे ऊंची उड़ान भरो,

मुश्किल चाहे,कितनी भी आ जाए
हर परिस्थितियों से लड़ना सीखो।

जीतेंगे हम ये वादे करो।
कोशिश हमेशा ज्यादा करो।


- सृष्टि कौशल


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टूटते रिश्ते और बदलती प्राथमिकताएं

आज प्राथमिकताओं के आगे रिश्ते कहाँ हैं टिकते
अनमोल जो होते थे कभी आज कौड़ियों के भाव हैं बिकते
कभी रिश्तों में हुआ करती थी शहद से भी ज़्यादा मिठास
घाव ऐसे मिल रहे हैं रिश्तों में जो ताउम्र धीरे धीरे हैं रिसते

आज प्राथमिकता नहीं है रिश्तों को बचाना
आज आदमी का लक्ष्य है केवल पैसा कमाना
हंसते हुए किसी को देख नहीं सकते
काम रह गया है केवल दूसरों को रुलाना

एक बच्चा है परिवार में उसे रिश्तों की क्या पहचान
भाई बहन बुआ मासी चाचा चाची का नहीं है ज्ञान
नारी का सम्मान कैसे करेगा दिल से कोई
जब उसके मन में ही नहीं है नारी का सम्मान

बूढ़े माता पिता को नहीं रखना चाहता कोई साथ
संवेदनहीन हम हो गए बिगड़ रहे हालात
सिर्फ पैसे की एहमियत है सबके लिए
ज़िंदा नहीं किसी के मन में अब जज़्बात


- रवींद्र कुमार शर्मा


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हमारी दुआ

तुझे हमारी दुआ लग जाए, 
खुश रहे सदा तू,
तुझे सारी खुशियांँ मिल जाए। 
बेचैन है आज दिल मेरा , 
 तेरे बिन कटे न ये दिन-रात
दुआ करती हूंँ रब से, 
तेरी  मांगी मुराद पूरी हो जाए। 
तू सदा खुश रहे, 
तुझे हमारी दुआ लग जाए। 

फिक्र न करो मेरी बिटिया, 
अभी काउंसलिंग हो रही है,  
जैसे-जैसे बीटेक में ,
सीटें क्लोज होती जा रहीं हैं, 
वैसे - वैसे  तेरी चिंताएं बढ़ रही हैं
मनचाहा कोर्स न मिलने पर , 
दु:खी ना हो, 
कदम-कदम पर जिंदगी में चुनौतियांँ हैं, 
लड़ना सीख लें तू इनसे, 
तू मेरी प्यारी बिटिया है,
पढ़ोगी भी ! आगे बढ़ोगी भी
उम्मीद पर  ही दुनिया कायम है।
मांँ की दुआओं का असर हो इतना, 
तेरी सारी मुश्किलें दूर हो जाए। 

तेरे चेहरे पर मुस्कान देखने को, 
आतुर हैं मेरे नयन , 
तू सदा खुश रहे, 
तुझे हमारी दुआ लग जाए। 


- चेतना सिंह 'चितेरी'
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश


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ग़म की तलब

पटक के सर हर तरीकों से,
अब मैं हार चुका हूं।
मान अपनी हार मैं,
अब कहीं जाकर झुका हूं।
जरूरत हो तुम, समझा न सका तुझे,
अब तो ग़म की तलब है मुझे...

छोड़ दी सारी बदमाशियां अब,
लौटूंगा नहीं अब उस ओर कभी फिर।
मजबूरियां हैं कि सांसें चलाए जा रहा हूं,
जीता नहीं हूं अब ख़ुद की खातिर।
हैं ख़्वाहिशों के हर शमां दिल के बुझे,
अब तो ग़म की तलब है मुझे...

न जीतने की ज़िद बची है,
न हार जाने का कोई डर।
लंबी उड़ान का परिंदा था कभी,
अब ख़ुद ही पंख लिए अपने कतर।
न दिन की खबर अब न रात सूझे,
अब तो ग़म की तलब है मुझे...

डूबा रहता हूं नशे में हरदम,
कि तेरी यादें छू न पाए।
दर्द तेरे खालीपन का कभी,
मुझे अब ना रुलाए।
होगा नहीं पर कोशिश है भुलाने की तुझे,
अब तो बस ग़म की तलब है मुझे...


- कुणाल


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भीतर का वृक्ष

मन की धरती पर
एक वृक्ष उग आता है,
जब पीड़ाएँ
शब्दों का साथ छोड़ देती हैं।
उसकी हर शाख पर
अनकहे दिनों का इतिहास टंगा होता है।

भीतर सिकुड़ा हुआ मन
जब स्वयं को बाँहों में भर लेता है,
तब समझ आता है
सबसे कठिन यात्रा
दुनिया से नहीं,
अपने ही भीतर से होकर गुज़रती है।

जड़ों की तरह
कुछ स्मृतियाँ बहुत गहरी होती हैं,
वे दिखाई नहीं देतीं,
पर जीवन का हर कंपन
उन्हीं से जन्म लेता है।
उन्हें काटना नहीं,
समझना पड़ता है।

सूखी डालियाँ भी
हर बार मृत्यु का संकेत नहीं होतीं,
कभी-कभी वे
नई हरियाली के लिए
पुराने दर्दों का त्याग होती हैं।

इसलिए
जब भी मन उजाड़ लगे,
अपने भीतर उगे उस वृक्ष से मिलना
वही सिखाएगा कि
सबसे गहरे अँधेरों में भी
जीवन, जड़ों से फिर जन्म लेना जानता है।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'
ग्वालियर, मध्य प्रदेश


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थोड़ा थक गया हूं काम करते-करते,
तुम थोड़ी मुस्कुरा दोगी क्या ?

यह शीशा बहुत उदास लग रहा है,
कुछ देर तुम इसके सामने आ जाओगी क्या ?

आसमान के सारे तारे, हमारे घर को क्यों घूर रहे हैं,
कही तुम फिर वही ड्रेस पहन कर छत पर आ गयी क्या ?

आज मेरा मन बार-बार तुझे ही क्यों देखना चाह रहा हैं,
कही तुमने फिर से वही बिंदी लगा ली क्या ?

मेरी किताबों से आज इतनी महक क्यों आ रही हैं,
कही तुमनें इन्हें फिर से छू लिया क्या ?


- दीपक बारुपाल


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अंतहीन सफर

इतनी डोर से बंधा हूँ,
कुछ पता नहीं।
सजा उसमें भी मिली,
जिसमें मेरी खता नही।

अंतहीन सफर पर चला हूं,
मंज़िल का कुछ पता नहीं।
नागफणी सा हो गया हूं,
गले लगाने को कोई लता नहीं।

एक तरफ कायनात सारी,
दूसरी ओर मैं अकेला।
फिर भी देखता हूं,
नियति का खेल,
कब तक चलता है।

ना उम्मीदी का मौसम ठहरा,
या किस्मत का मिजाज़ बदलता है।


- रोशन कुमार झा


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सबर

लक्ष्य हासिल करना है तो सबर रखो
फिर तू परिणाम देखो।
जिसने भी संघर्ष किया, मेहनत किया
सबर रखे तो परिणाम अनुकूल पाया।
समझना हो सबर के परिणाम तो
अपने आस-पास के लोगों को अनुकरण देखो।
माली बगीचे में, किसान खेते में,
पल नहीं दिन नहीं, महीनों है बिताते,
सबर है रखते, फिर उसे उचित परिणाम है मिलते।
अतः कुल मिलाकर चुन्नू कवि यही है समझाते,
कि जीवन में लक्ष्य प्राप्ति वास्ते,
सबर रखना जरूरी है होते।
हालांकि सबर करना थोड़ी कठिन है भले,
लेकिन शनै-शनै वक्त कट ही जाता है
अंत समय में सबर का परिणाम मिलने पर
मन प्रफुल्लित हो ही जाते है।


- चुन्नू साहा


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फिर जग में न आऊंगी

हवस के भूखे दरिंदो,
हवस की ये तुम्हारी भूख,
कब और कैसे शांत होगी ?

जिसका जीवन किया बर्बाद,
उसकी सांसों की डोर तोड़कर,
क्या तुम्हारे मन में रही होगी ?

उसकी आत्मा को कचोटते वक्त
शरीर को बेरहमी से रौंदते वक्त,
तुम्हे अपनों की याद नहीं आई होगी ?

इक जीवन की ही नहीं,
इक पीढी की ही नहीं,
वो कितने जनों की आस रही होगी ?

मन आतंकित आशंकित जुबां दबी होगी,
डरी सहमी जब गिरफ्त में आई क्रूर पंजों की,
छटपटाती बेबस लड़की होने को कोसती होगी ?

दर्द के आगोश में डूबती निगाह,
अनंत दर्द से भरी टूटती सांस,
फिर जग में न आऊंगी ये सोचती होगी ?


- राज कुमार कौंडल


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कहो ना

क्यों प्रतीत होता है ऐसा,
कि वह अशरीरी
होकर भी सर्वत्र है।

प्रातः की उन
अर्द्ध-उन्मीलित पलकों में,
धूमिल सुगन्धित समीर के
उन झोंकों में,
जो देह को नहीं,
अंतर्मन को स्पर्श कर जाते हैं।

अकारण ही...
जब कोई
स्वयं को रिक्तता में पाता है,
तब एक अदृश्य स्पर्श
मौन भाव से उसे
आवेष्टित कर लेता है,
जैसे कोई परम आत्मीय
समीप होकर भी,
दृश्यमान नहीं होना चाहता।

विस्मयकारी है न ?
मौन की पराकाष्ठा में भी,
स्पंदन उस अनिवर्चनीय की
ओर मुड़ जाते हैं।

जब शब्द निद्रामग्न हो जाते हैं,
तब अंतस की गहराइयों से
कोई मृदु स्वर में उसे पुकारता है,
और चित्त व्याकुल हो उठता है
इस संशय में कि
वह 'अन्य' नहीं,
अपितु निज के ही भीतर
अधिष्ठित है।

कहो ना...
यह आसक्ति है,
वंदना है,
या पूर्वजन्म की
कोई अपूर्ण स्मृति ?

या फिर... समस्त
चराचर जगत,
इसी प्रकार किसी
गुढ़ रहस्य केअदृश्य
पाश में आबद्ध है ?

क्या तुम्हारा अपना
हृदय भी स्वयं से
यही प्रश्न करता है ?
क्या तुम भी उसी
व्याकुलता से निज के भीतर,
किसी क़ो खोजते हो ?

कहो ना! कहो ना...


- सविता सिंह मीरा
जमशेदपुर, झारखंड



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इनके झूठ के आगे दुनियां कुर्बान हो गई

राजनीति आजकल बदनाम हो गई
फ्री की आदत अब आम हो गई
दस बार मुकर जाते हैं सुबह से शाम तक
झूठ बोलना तो अब इनकी शान हो गई

बाणी पर नहीं रही इनके लगाम
कुछ भी बोल देना इनकी पहचान हो गई
अपने गिरेबान में झाँक कर देखते नहीं
सत्ता की कुर्सी इनकी जान हो गई

जीतते ही बन जाते हैं बादशाह
खुद बन गए स्याने जनता नादान हो गई
कहते हैं लोकतंत्र में जनता होती है सर्वोपरि
यहां तो जनता कमज़ोर और सत्ता बलवान हो गई

सत्ता के लिए कोई दीन ईमान नहीं इनका
कुर्सी तो इनके लिए भगवान हो गई
जनता को बना देते हैं हमेशा प्रश्न चिन्ह
खुद की बात आये तो पूर्ण विराम हो गई

कोई नहीं ऐसा जो सिद्धान्तों पर चले
सिद्धान्तों की बातें इनके लिए अपमान हो गई
कपड़े इनके सफेद हैं मन इनके काले
इनके झूठ के आगे दुनियां कुर्बान हो गई


- रवींद्र कुमार शर्मा


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ईश्वर और कविता

एक दुनिया थी ईश्वर की
ईश्वर की दुनिया में सभी सुखी थे
फिर भी कुछ दु:ख थे ईश्वर के
कुछ छोटे थे,कुछ बड़े थे दु:ख
कुछ छोटे थे,कुछ बड़े थे ईश्वर भी
एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े थे ईश्वर
और अपने-अपने हठ लिए जीते थे
वे आपस में ही लड़ते-झगड़ते थे
ईश्वर की दुनिया में मनुष्य नहीं थे
ईश्वर कविता नहीं पढ़ते थे।

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असीमित है सहना

असीमित है ब्रह्माॅंड
असीमित है आकाश और क्षितिज
जल असीमित,जल में लहरें असीमित
काल असीमित,काल के हिस्से असीमित
असीमित दु:ख का आर्तनाद असीमित
प्रार्थनाऍं असीमित और असीमित ही है
सूने संंसार में प्रार्थनाओं की गूॅंजती गूॅंज
असीमित गूॅंजती गूॅंज में शताब्दियों से
कितना कुछ सहता रहता हूॅं मैं
असीमित है सहना।


- राजकुमार कुम्भज


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बारिश की बूँदें

बारिश की बूँदें जब धरती पर गिरती हैं,
लगता है मानो खुशियाँ ही बिखरती हैं।

ऐसा प्रतीत होता है हर पल जैसे,
आकाश और धरती का मिलन हो रहा हो वैसे।

बारिश की बूँदों में जब मैं भीग जाती हूँ,
प्रिय की यादों में खोकर मुस्कुराती हूँ।

हर बूँद मुझे उनका एहसास दिलाती है,
दिल की धड़कनों को और बढ़ाती है।

बरसती फुहारें जैसे मुझसे कहती हैं,
जीवन की हर पीड़ा अब यहीं बहती है।

आज अपने सारे ग़म इस बारिश में धो लो,
दिल के हर दर्द को खुलकर संजो लो।

अपने प्रिय की बाँहों में सिमट जाओ,
प्रेम की बारिश में स्वयं को भिगो जाओ।

यह सावन हर दिल को यही संदेश सुनाए,
प्रेम से भरा जीवन हर पल मुस्काए।


- गरिमा लखनवी


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रात दिन थरथराती रही सरहदें।
नींद सबकी उड़ाती रही सरहदें।

आदमी-आदमी को लड़ा सामने,
ख़ूब हँसती- हँसाती रही सरहदें।

धर्म, जाति, ज़ुबाँ ,रंग के नाम पर,ये
रोज़ बंटती - बंटाती रही सरहदें।

तार, कांँटे,सलाखों से बनकर कहीं,
रास्ते सब मिटाती रही सरहदें।

पूछकर हाल दोनों तरफ के जुदा,
दर्द दिल में दबाती रही सरहदें।

रोज़ ऊँची हुई और गहरी हुई,
ख़ून जितना बहाती रही सरहदें।

गन गरजती रही,बम उगलती रही,
इस तरह ज़ुल्म ढाती रही सरहदें।


- नवीन माथुर पंचोली


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जीवन दीप

जीवन तेरा माटी के दीपक समान,
फिर क्यों करता है, हे मानव, अभिमान?
कच्ची मिट्टी से ही बना है तन-प्राण,
सत्य यह जान, हे इंसान।

उम्र है दीपक के तेल समान,
समय के साथ पल-पल घटता जाता,
होता नहीं तनिक भी आभास,
तले तक, जब तक पहुँच नहीं जाता।

संघर्षों की आँधी जब चलती प्रचंड,
मंद पड़ जाती जीवन-बाती, यह अखंड।
खुशियों की बयार जब देती झोंका,
भभक उठती लौ, फिर हो तरो-ताज़ा।

बनकर झकोरे बीमारियाँ-परेशानियाँ आएँ,
दीपक की लौ को बुझाने धाएँ।
पर प्रभु-कृपा का जब तक हो आवरण,
हो नहीं सकता जीवन-दीप का क्षरण।

माटी का है यह जीवन-दीप,
पर विधाता का अनुपम, अतीव उपहार।
सद्कर्मों से इसे सजा, सँवार
यही जीवन का सच्चा श्रृंगार।

हो भले कच्ची माटी के समान,
पर हो यदि प्रभु-कृपा का वरदान,
मुसीबतों की आँधियाँ लाख आएँ-
जीवन-दीप को बुझा न पाएँ।


- देवेंद्र भण्डारी


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सुंगला रा पाणी

पाणिये रिया सुबला ऐथी, सुंगल एथा रा नाँव,
बिच पर अ ई सड़क, ऊपर थल्ले एथी गाँव
बड्डे-बड्डे दरख्त एथी, घणी-घणी इन्हा री छाँव
शोखी लैंदी जिऊये री गर्मी, ठण्डड़ी तांजे बगदी हवा,
फेरी कदी नि बिसरदा भाईयों, एथीं रा नाँव,
शान्त हुई जांदा जिऊ म्हारा
तांजे तसल्ली कन्ने पींदे सुंगला रा पाणी

पहाड़ा ते औंदा, नालुए रिये बगदा
सुंगला रे पाणिये री, अपणी ई कहाणी,
पुख़र, सुआ कोई नी एथी,
नालुए रिये बगदा नीला पाणी,
पाणी पीणे जो रूकदियां गड्डियाँ,
सबणी अपणी प्यास भुजाणी,
तौन्दिया रे त्याड़े तांजे धुप्पा भखदी
याद आऊँदा फेरी सुंगला रा पाणी ,

पीणे जो बड़ा भारी स्वाद आ,
छैल बांका एथि रा मिट्टणु पाणी,
मिट्टणु पाणिये रिया कोई रिसा नी भाईयों,
घीयु साईं लगदा पीणे जो पाणी,
चार-चफेरे ऐथी रिय्यासी दिखदी,
जिऊये सौगी तांजे नज़र घुमाणी
आऊँदे-जांदे ऐथी रुकदे रहन्दे
पी लैन्दे एथी रा ठण्डड़ा जेया पाणी,


- बाबू राम धीमान


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नन्हीं सी जान

नन्हीं सी जान, लिए अरमान,
एक दिन छुएगी आसमान।

अपनों से दूर, सपनों के पास,
सफल हो उसकी आस।

बचपन भूल, शौक भूल
चली बहुत दूर गुरुकुल।

रोटी में उसको मां दिखती,
गुरु में दिखते उसके पिता।

गुरुकुल में बचपन भूल,
अपना भविष्य गढ़ रही,
सब सुख चैन छोड़,
नन्हीं बिटिया पढ़ रही।

जिंदगी का हर सबक ले रही,
खामोशी से बस मुस्कुरा रही।

आंखों में चमक देखते बनती,
उसे पता है वो सीप है
जिसमें छुपा है मोती।

क्या सुबह क्या शाम,
हर वक्त है सपनो के नाम।
क्या त्याग है,क्या लग ,
क्या चाहत क्या सफलता की अगन।

खाली बिस्तर नींद नहीं आती,
अब मां सुबह नहीं जगाती।

रातों के सपने में भाई बुलाता,
पिता बाजार ले जाते और
मां खाना खिलाती।
आंख खुलती बिस्तर पर,
ऊपर सिर्फ एक पंखा घूमता पाती।

एक चारपाई,दो बर्तन और
पास एक बस्ता है।
घर जाने को मन,
बहुत तरसता है।

रिश्ते नाते अब किताबों से,
नन्हीं सी जान पल रही,
सिर्फ अरमानों में।

एक दिन मेहनत उसकी रंग लाएगी।
नन्हीं सी चिड़िया, आकाश को छू आएगी।


- रोशन कुमार झा


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