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15 July 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 15 जुलाई 2026





अपने-अपने कामों सब व्यस्त
किसके पास वक्त है साकी ?
मकड़जाल में ऐसे फंसे
नज़र रखना नहीं है बाकी,

पहले चाय पर घंटों बातें
अब मैसेज का ज़बाब नहीं है साकी,
दिल के रिश्ते रूक से गये हैं सब,
बस लाईक-कमेन्ट की जंग है बाकी,

फ़िर भी कोई पूछ ले-"कैसे हो" ?
तो लगता है दुनियां बची है अभी,
एक फ़ोन, एक मुलाकात से
मकड़जाल के तार कट जाते हैं सभी,

अँधेरे के बाद ही रोशनी
आखिरी उम्मीद बची है अभी बाकी,
दिल का चिराग़ जलाकर
चलना भी एक इबादत है साकी।


- बाबू राम धीमान


*****


मातृभूमि

मातृभूमि में होता मार्मिक शक्ति
कई जाती धर्मों की अपार भक्ति
भिन्नत्व में एकत्व का महान शक्ति
सब केलिए आवश्यक देश भक्ति।

मातृभूमि से मिला है पदार्थ
बहू मूल्य संपदा है यदार्थ
इसको बचाना है निस्वार्थ
हम को मिला है परमार्थ।

मातृभूमि पर होता मंदिर
प्रभू केलिए जाता अंदर
लोक पूजा करता प्यार
इसे मिला भक्ति अपार।

नदियां बहती निरंतर निर्मल
पेड़ पौधों देता है परिमल
प्रकृति शोभा बढ़ता बेमिसाल
स्वच्छ पर्यावरण बदलता सरल।

मातृभूमि हमारेलिए कर्मभूमि
मातृभूमि हमारेलिए शक्तिभूमि
मातृभूमि हमारेलिए स्वर्ग भूमि
मातृभूमि हमारेलिए पुण्यभूमि
इसे मातृभूमि का सम्मान करना।


- श्रीनिवास एन
आंध्रप्रदेश

*****


बरगी डैम को समर्पित

जंग लड़ रही हूँ, हारी तो तेरे साथ
जीती तो भी तेरे साथ
कोशिश सर से पाँव तक करूँगी
अपनी हर साँस तुझमें भरूँगी
जरूरत पड़ी तो खुद डूब जाऊँगी
पर तुझे अकेले नहीं छोड़ पाऊँगी
लड़ूँगी किस्मत से, भगवान से
जब तक हूँ तेरे साथ हूँ
लड़ूँगी इस तूफान से
नहीं हूँ तो मुझे माफ करना
एक माँ हार जायेगी,
फिर भगवान से...


- नंदिनी


*****


​अब शौक़ क्या बाकी, क़लम-ए-बे-असर लिखने का,
खून ए जिगर से जो लिखा मैंने,उसने पढ़ा ही नहीं।

​किताब-ए-इश्क़ में शामिल था मेरा ज़िक्र भी शायद,
उसे इतनी फ़ुर्सत ही कहां सफ़ा वो पलटा ही नहीं।

​सीने में दबी ख़ामोशियाँ वो भी शोर से कम न थीं,
उसने कभी ग़ौर से उन लफ़्ज़ों को सुना ही नहीं।

​बिख़र कर रह गए हम आईना-ए-दिल की तरह ऐसे,
कोशिश तो की, मगर टूटा जो दिल वो जुड़ा ही नहीं।

हजूम-ए-शहर में गुमनाम हम ऐसे हुए ,'मुश्ताक़'
न हुई ढूँढने की कोशिश और मैं मिला भी नहीं।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह


*****


उर्दू दोहे

इतना ग़ुरुर मत करो, कौन यहाॅं है साथ,
सब मरने के बाद में, छूकर धोते हाथ।

जीवन तो इक वहम है, कर्मों का है खेल,
सच तो है बस मौत ये, दुनिया है इक जेल।

कर्म सही तो सब सही, पटरी पर है रेल,
बुरा भला कोई नहीं, क़ुदरत का सब खेल।

वैद्य डॉक्टर को यहाॅं, सब कहते भगवान,
कुछ सौदागर लाश के, बेच रहे ईमान।

हिम्मत सब में है नहीं, सच कहने की बात,
सच को सच कहता वही, जो सच पर दिन रात।

आज यहाॅं तो कल वहाॅं, जग में फिरे फ़क़ीर,
अच्छे दिन के आस में, नैनन बरसे नीर।

सच से फ़ुर्सत है नहीं, कैसे बोले झूठ,
उसकी दुकान झूठ की, धन्था है मत रूठ।

भाग गया सलवार में, डर की ऐसी पीर,
सबको योग सीखा रहा, कहता खुद को वीर।

फ़रियादी अब कर रहे, क़ातिल से फ़रियाद,
बुज़दिल इतना मत बनो, सब कुछ हो बर्बाद।

राजा अच्छा है वही, कर जो करे मुआफ़,
भेद-भाव भी मत करे, सही करे इंसाफ़।

सजा ज़िना-बिल-जब्र की, फाॅंसी मिले कठोर,
मौत डरे जब मौत से, देख मौत का शोर।


- निज़ाम फतेहपुरी


*****


उम्र-सीमा

सबकी अपनी-अपनी सीमाएँ हैं,
पर, कवि की कल्पना की कोई सीमा नहीं है।
नौकरी में भी उम्र-सीमा है,
प्रतियोगिता कविता लिखने में भी उम्र-सीमा है,
लेकिन, लाचार , बेबस, बेसहारा
बेरोज़गार व्यक्ति की कोई उम्र-सीमा नहीं है।


- चेतना सिंह 'चितेरी'


*****


ऐ गुजरा जमाना तेरा शुकराना
तुझे मैंने जिया, तेरा शुकराना
तूने मुझे सीखों का समंदर दिया
मैं अदना सा मानुष,
तेरे एहसानों को कैसे चुकाऊं ?
बस लफ्जों से बार-बार, हर बार
तेरा शुकराना करूं...


- दीपक कोहली


*****



काश! मैं भी
एक पुरुष होती।
हर वो काम करती,
जो मेरा मन करता।
जहां दिल करता,
वहां घूमने जाती।
कभी अकेली तो
कभी दोस्तों के साथ
मौज करती... काश!
मैं एक पुरुष होती।


- रेखा चंदेल


*****


कभी जब किसी से न हारी मुहब्बत।
मज़े में रही ये हमारी मुहब्बत।

कभी मिल गए हमसफ़र रास्ते में,
कभी बस अकेले गुज़ारी मुहब्बत।

निगाहें छुपाकर, निगाहें लगाकर,
यूंँही बच-बचा कर निहारी मुहब्बत।

जहाँ पास देखा इक मौका सुनहरा,
वहाँ ठीक हमने उतारी मुहब्बत।

बुलाकर,बताकर ,मनाकर,हँसाकर,
हमेशा यूँ हमने सँवारी मुहब्बत।

जहाँ भी मिले जान पहचान वाले,
वहाँ हमने अपनी बघारी मुहब्बत।


- नवीन माथुर पंचोली


*****


नज़रिया

कोई सम्भलकर चला,
कोई गिरकर सम्भला है।
किसी को मालूम ही नहीं,
ये चलना क्या बला है।

क्या अच्छा, क्या बुरा—
सबका अपना पैमाना है।
जिस पर बीतती है,
उसी ने दर्द को जाना है।

कोई चाँद भी छू आया,
फिर भी ख़ुद को तन्हा पाया है।
कोई उलझनों में उलझकर भी,
हर रिश्ता दिल से निभाया है।

रूप अनेक हैं जग में,
हर चेहरे का अपना रंग है।
कोई बुरा होकर भी
किसी की दुआओँ के संग है।

सबकी नज़र अलग है,
सबका नज़रिया जुदा है।
किसी के लिए पत्थर में ख़ुदा,
तो कहीं ख़ुद ही पत्थर बना है।

इसलिए छोड़ो दुनिया की
अच्छी-बुरी सौ बातें।
बस ऐसा जीवन जी जाओ,
जो बन जाए सबकी सौग़ातें।

जब नाम तुम्हारा आए,
याद आएँ तुम्हारे कर्म।
यही रहे असली दौलत,
यही रहे जीवन का मर्म।


- रोशन कुमार झा


*****


बैल हूँ मैं कभी मेरा भी था ज़माना

जब निकला खाने की तलाश में इधर उधर
तो मैं आवारा हो गया
लोगों को अब मैं अच्छा नहीं लगता
मेरी शक्ल देखना भी ना गवारा हो गया

जब तक ताकत थी मुझमें
मैंने पूरा जोर लगाया
खेतों में फसलें लहलहाई
उम्मीद से ज़्यादा अन्न उगाया

कंधे मेरे दुख गए हल खींचते
फिर भी मैंने जोर लगाया
सुहागे पर बजन भी रखा खूब दबाया फिर भी
चुपचाप चलता रहा न चीखा न चिल्लाया

कभी खूब खिलाते थे मुझे
रखते थे मेरा भरपूर ख्याल
छोड़ दिया घर से अब हो गया आवारा
देखते ही दौड़ते हैं मारने ऐसा हो गया अब हाल

समय का खेल है बदल गया ज़माना
कभी सेवा की थी अब मुझ पर है सबका निशाना
ऐसा लगता है जैसे जीवन नरक बन गया
वह भी दिन थे जब मुझको मिलता था सबसे पहले खाना


- रवींद्र कुमार शर्मा


*****



हवा तुम कितनी कोमल हो कि तुम
लिपटी हो मेरे आसपास
चिपकी हो मेरे सीने से
बैठी हो मेरे काँधे पर
नन्ही बिटिया की तरह
पर तुम्हारे वज़न का अहसास ही नहीं होता

हवा तुम कितनी भारी हो
कि तुम्हारे वज़न से दबकर
बड़े बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं
छोड़ देते हैं ज़मीन

हवा तुम बहुत प्यारी हो
तुम मेरे जीवन में समाई हो
तुम रूठीं तो यह जीवन रूठा
साँसों का काफ़िला यहीं छूटा


- अजय नेमा


*****


मैं कौन हूँ

मैं संजीदगी से
मुस्कान भरे
कुछ गीत
सुनाया करता हूँ
जो आँसू मुझको
देते हैं
मैं उनको भी
हंँसाया करता हूँ
मैं जनता का ही
सेवक हूँ
राष्ट्र निर्माण का मैं
अधिनायक हूँ
मैं सेवा में ही
निरत रहूँ
मैं सीधा सादा
अध्यापक हूँ
अभिभावक भी
कहते हैं
मैं विद्या को
महकाता हूँ और
बच्चों को
चहकाता हूँ।


- भुवनेश मालव


*****








09 July 2026

मैं सोचती हूँ





कभी-कभी मैं सोचती हूँ...
क्या सचमुच मेरी ज़िंदगी में भी कोई ऐसा सवेरा आएगा,
जहाँ दर्द दरवाज़ा खटखटाए बिना लौट जाएगा,
और आँखें बिना किसी वजह के मुस्कुरा सकेंगी?

हर रात मैं अपने टूटे हुए हिस्सों को समेटकर सोती हूँ,
और हर सुबह फिर एक नई लड़ाई के लिए खड़ी हो जाती हूँ।

लोग कहते हैं, वक्त सब ठीक कर देता है...
मगर शायद उन्होंने उन लोगों का दर्द नहीं देखा,
जो बरसों तक उम्मीद और निराशा के बीच झूलते रहते हैं।

मेरे हिस्से की ज़िंदगी ने मुझे फूल कम,
काँटे ज़्यादा दिए हैं। मैंने अपनों को बदलते देखा है,
रिश्तों को बिखरते देखा है,
सपनों को आँखों के सामने दम तोड़ते देखा है।

और फिर भी... हर बार जब मैं पूरी तरह टूटने लगती हूँ,
मेरे भीतर कहीं एक छोटी-सी उम्मीद धीमे से कहती है-
"अभी नहीं... अभी तुम्हें और चलना है।"

जीवन की परीक्षाएँ अजीब होती हैं, इनमें न कोई घंटी बजती है,
न कोई प्रश्नपत्र मिलता है, न कोई समय सीमा होती है।

यहाँ हर दिन एक नया सवाल है, हर साँस एक संघर्ष,
और हर धड़कन हिम्मत का एक नया प्रमाण।

कई बार मैं मुस्कुराती हूँ,
लेकिन मेरी मुस्कान के पीछे दर्द का एक समंदर छिपा होता है।
कई बार मैं खामोश रहती हूँ,
क्योंकि शब्द भी मेरे घावों का बोझ नहीं उठा पाते।

कुछ लोग पूछते हैं- "तुम इतनी चुप क्यों हो?"
काश वे जान पाते, कि कुछ दर्द ऐसे होते हैं जो रोने से नहीं,
जीने से महसूस होते हैं।

मैं थकी हूँ... बहुत थकी हूँ... मगर रुकी नहीं हूँ।

क्योंकि मुझे पता है, मेरे संघर्षों की कहानी अभी अधूरी है।
और शायद एक दिन, जब यह लंबी अँधेरी सुरंग खत्म होगी,
तब मेरी आँखों से निकला हर आँसू मेरी जीत की गवाही देगा।

उस दिन मैं वक्त से सिर्फ इतना कहूँगी-
"देख, तूने मुझे तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी,
मगर मैं फिर भी बच गई...
क्योंकि मेरे भीतर उम्मीद अभी ज़िंदा थी।"


- आरती कुमारी (झाँसी)


07 July 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 08 जुलाई 2026






स्वार्थ
दुनिया में सिर्फ स्वार्थ ही स्वार्थ भरा है,
स्वार्थी दुनिया में और कुछ नहीं स्वार्थ के सिवा,
दोस्ती भी स्वार्थी हो गई बस स्वार्थ के लिए है।

भाई-बहनों में भी बस स्वार्थ के रिश्ते रह गए,
आज की दुनिया में सगा कोई नहीं बस किससे क्या मिले,
पड़ोसी भी बस एक-दूसरे से खार खाए बैठे है।

उस पे ये है, उस पे वो है, बस सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ छुपा है,
कौन किसका है, इस दुनिया में ये पता ही नहीं चल रहा,
कब, कौन किसी को नीचा दिखा दे पता ही नहीं चल रहा।

कब और कैसे थमेगा, ये सब कुछ नहीं पता, कब थमेगा ये तूफ़ान,
आज रिश्तों का खून कब, कौन और कैसे कर दे स्वार्थी दुनिया में,
आज कोई किसी का सगा बचा ही नहीं, बस सिर्फ मेरा हो और मैं हूं,
स्वार्थ इतना फलीभूत है कि न कोई सगा, न अपना बस झूठ फरेबी है।


- सुमन डोभाल काला


*****


सदी और लम्हें

जिंदगी के दिन यूं गुजर गए ,
वो लम्हा और हम सदी बन गए।
उलझने ही इतनी थीं,
लम्हें कब के गुजर गए और हम
आज भी सदियों की तरह ठहरे हैं।
जिन्हें अलविदा किया वो लम्हे थे ,
सदियां आज भी दोहराई जाती है
फर्क सिर्फ इतना है कि
लम्हें गुजर जाते हैं लेकिन
सदी पर आज भी समय के पहरे हैं।
जो गुजर जाते हैं , वो यादों में रहते हैं
एक सदी है जो सदियों तक नहीं गुजरती
वो देखती है
सबका आना और जाना
देखती है आने जाने के निशान
कितने फीके और कितने गहरे हैं !
अब कैसी शिकायत समय से ?
अब कैसा गिला उन लम्हों से ?
जान लिया है इतना कि
कुछ लम्हे उम्र से बड़े होते हैं,
वो बीतते नहीं, हम में उतर जाते हैं
और हम... हम लम्हें से सदी बन जाते हैं।


- मंजू सागर


*****


प्रेम की मृत्यु: एक हुस्न का षड्यंत्र

मेरे दिल से क्या कसर रह गई,
तेरे हुस्न से प्यार निभाने में,
क्यों तेरे हुस्न ने मेरे दिल के इश्क को लिया,
अपने खंजर के निशाने पे...

अरे मेरे दिल की धड़कनें तो तेरे दिल से,
बेहिसाब मोहब्बत करती थीं...
तेरे प्यार में पागल थीं...
तेरे दिल की हर हसरत को
मेरे दिल ने अपनी मोहब्बत से,
तेरे भाग्य में लिखा था

खोल कर देख ज़रा ऐ जालिम
मेरे दिल को तू,
मैंने अपनी इश्क की वसीयत में,
अपनी एक-एक साँस पर,
तेरे हुस्न का नाम लिखा था...
और क्या चाहिए था तेरे दिल को...
मैं,, और तुम कुछ दिनों बाद
सात फेरों के पवित्र बंधन में बंध कर...
हम होने वाले थे...

जो तेरा दिल मेरे दिल से बात करता
तो,, तेरे दिल के हर नखरे को,
मैं अपने ख्वाबों में शामिल करता...
पर तेरे पत्थर दिल को तो,
मेरी कहानी का कत्ल ही करना था...

अगर मेरे दिल को मालूम होते,
तेरे दिल के जज़्बात
कि तेरा दिल मेरे दिल से
मोहब्बत करता ही नहीं है,
तब मैं अपने हाथों से,
तेरी मेहंदी से अपना नाम मिटाता
तेरे ख्वाबों की मोहब्बत से,
मैं स्वयं तुझे मिलाता
कसम से...

तेरे साथ जीवित न रह सका मैं,
पर इस बात की राहत है,, मेरे दिल को
कि अपने अंतिम समय में
तेरा चेहरा देखकर...
मृत्यु को प्राप्त कर रहा हूँ मैं,

देख एक अंतिम ख्वाहिश है,
मेरे दिल की...
यदि तेरा दिल माने तो,
तेरी रूह ने,, कभी
किसी के दिल के साथ,
प्रेम नृत्य किया था
ये,, किसी से न कहना तू...

तेरे हलक से निकली जो,
प्रेम की बात आज के बाद
तो, मेरी रूह की...
ये बद्दुआ है,,
तेरे दिल को...
इस सृष्टि से प्रेम की मृत्यु हो जाएगी,
मेरा यकीन कर तू फिर शांति
कभी कहीं न पाएगी...


- आकाश शर्मा "आज़ाद"


*****


अतीत के झरोखों में झांका जब मैंने,
खुद को इंसान से गुनहगार बनते पाया मेंने,
दिल ने पूछा-किसके गुनहगार हो तुम !
कहा दिल से-अपनी ही जिंदगी का हूं...
मगर... अब मुझे फिर इंसान बनना है...

ख्यालों में बचपन से लड़कपन तक गया मैं,
देखा लड़कपन के बाद वो कांटों का मंजर,
जहां बेरहम दुनिया के तिलिस्म में,
उलझा किस कदर अपनी ही भावनाओं से खेलकर...
मगर... अब मुझे फिर इंसान बनना है.....

क्या दिलकश थे वो मयखाने के रास्ते,
भूला जहां खुद को..... बस दो घूंट के वास्ते,
वो मौज, वो मस्ती, वो बेपरवाही के दिन,
जाओ ! आजाद किया आज इन्हें, रह लूंगा इनके बिन...
क्यूंकि... अब मुझे फिर इंसान बनना है...

पसार बाहें खड़ी है खुबसुरत जिंदगी,
बस खुदा से यही है अब मेरी बंदगी,
ना धुंध कर देना, ये हसरतों के रास्ते,
सुबह का भूला... लौटा हूं इस शाम, जिंदगी जीने के वास्ते...
हौसले हैं फौलादी कि... अब मुझे फिर इंसान बनना है...


- कुणाल


*****


उलझन में हूँ

कुछ ख्वाब हैं मेरे, न जाने कब होगे पूरे ?
प्रयास तो है जारी, फिर भी है अधुरी।

अपने ही लगा दिये हैं अड़ंगा,
बने हैं वो सियार रंगा।
साथ मे रहकर दिया है घाव,
छिपकर दिखाया है अपना स्वभाव।

सच कहते हैं लोग यहाँ,
चेहरा रंगकर अपने बैठा है जहां तहाँ।
सोच समझकर ही कदम उठाना,
नहीं तो कसर नहीं छोड़ेगे जमीन छीनना।

मर गया है सबका यहाँ जमीर,
भूखे नंगे है फिर भी कहता है खुद को अमीर।
चुन्नू कवि है हताश और निराश,
किस पर करे भरोसा और किसपर विश्वास ?


- चुन्नू साहा


*****


दोहे

बच्चों सा निश्छल अगर हो अपना व्यवहार,
प्रेम-प्यार की हर समय हों हम पर बौछार।
जब जीवन की नाव पर लदता ज़्यादा भार,
रहती डावाँडोल वो नहीं पहुँचती पार।

धन दौलत को देखकर गढ़ते जो अनुबंध,
होते फ़़ौरन ही वहाँ तार-तार संबंध।
सुख दुख मान अपमान हो नफ्ऱत पीड़ा प्यार,
आता है सब लौटकर देते जो हर बार।

जीवन-झरने से अगर सुनना है संगीत,
राग-द्वेष का आयतन कम कर दे तू मीत।
अच्छे रिश्तों के लिए रखना इतना ध्यान,
इक दूजे को दीजिए, पूरा पूरा स्थान।

संबंधों को चाहिए, देखभाल की खाद,
उदासीनता से सदा होते ये बरबाद।
संबंधों के बीच में जो आ गई दरार,
बिना गँवाए ही समय उसको करिए पार।

संबंधों की नींव को मत कर तू कमज़ोर,
जो कहना चुपचाप कह बिना मचाए शोर।
योगदान की सभी के चर्चा कर दिल खोल,
अच्छे रिश्तों के लिए, मीठे मीठे बोल।

मित्रों से जो भूल हों मत दो उनको तूल,
योगदान उनका सदा मन से करो क़बूल।
छोटी मोटी ग़लतियाँ करो नज़रअंदाज़,
कोई भी इससे नहीं होता है नाराज़।

घर में तेरे साथ जो रख उनका तू ध्यान,
उजड़ गया घरबार तो है बेकार मकान।
मिला आपका साथ जो प्रेम प्यार विश्वास,
मुझको तो आने लगा जीवन अब कुछ रास।


- सीताराम गुप्ता


*****


सदियों के संघर्ष को भी
भूल गए लालच के कारण
राम सेवा की शपथ लेकर
बन गये तुम क्यूं कर रावण।
कितने दिए बलिदान
मान की हानि झेली
भूले गये थे जो रंगों को
खून की होली खेली।
सदियां आई चली गई पर
जन्मभूमि की दशा ना बदली
पर अब बदली तो क्या बदली
तुम ने कर दी अदला-बदली।
पहले सोचा षड़यंत्र होगा
कुछ राजनीतिक हठधर्मियों का
पर ये तो सच में सच निकला
मंदिर बैठे कुछ कुकर्मियों का।
दान की चोरी मान की चोरी
यूं विश्वास की चोरी कर डाली
राममंदिर धर्मध्वज है अपना
ये कुत्सित मंशा क्यूं पाली।
सरकार सजा तो देगी ही
भगवान भी सजा तुमको देंगे
धर्म-द्रोहियों पापियों दुष्टों
सब भक्त श्राप तुमको देंगे।
मंदिर को भी ना छोड़ा
अपने कुत्सित कर्मों से
कलम बंद करता हूं अब
क्या कहना इन बेशर्मों से।


- व्यग्र पाण्डे


*****


आसार

मुझे नफ़रत ज़रा
सोच समझ कर करना
मोहब्बत होने के
आसार होते हैं।

मेरी बात औरों से ज़रा
सोच समझ कर करना
इश्क होने पर
सब कुर्बान होते हैं।

दिल की बात
सोच समझ कर करना
अपनों में भी कई
गद्दार होते हैं।

हमराही को हमसफर
सोच समझकर बनाना
धोखा मिलने के भी
आसार होते हैं।


- डॉ. राजीव डोगरा


*****


मन आकाशगंगा

हृदय के भीतर
न जाने कितने ब्रह्मांड बसते हैं।
विचार कभी ग्रह बनकर
परिक्रमा करते हैं,
कभी टूटते तारों-से
बिखर जाते हैं।

कुछ स्मृतियाँ चाँद की
शीतलता बनकर ठहरती हैं,
तो कुछ इच्छाएँ
सूर्य-सी दहकती रहती हैं।

और मन इन्हीं अनगिनत
आकाशगंगाओं में भटकता है।

और जो शब्दों में उतर आता है,
आपके पास चला आता है।
आपके स्नेह और दुलार के लिए।


- सविता सिंह मीरा


*****


नन्हीं चिड़िया

एक नन्ही चिड़िया थी,
पहली बार बाहर निकली,
उड़कर एक खेत में पहुंची,
खेत में एक पेड़ था।
उसने साहस करके तिनके चुने
पेड़ पर एक घोंसला बनाया।
एक पेड़, एक घोंसला...
एक चिड़िया, शिकारी अनेक...
गिद्ध, कौवे, चील
सबकी नजर उस पर थी ,
वह डरी नहीं...
और फिर... फिर क्या...?
चिड़िया ने उड़ना सीख लिया।


- मंजू सागर


*****


अनकहे फासले
निस्वार्थ भाव से जुड़ा था
मेरा दिल तुमसे,
गलती हुई कि समझ बैठे
सब कुछ तुमको।
​क्या पता था
इस भोले दिल को,
कि तुम दिल देने नहीं,
बस मन बहलाने आए थे,
अपना बनाने नहीं,
मेरा दिल तुड़वाने आए थे,
साथ ले चलने नहीं,
मुझे मेरी औकात
दिखाने आए थे।
​क्या कम्बख्त चीज़ है वो पैसा,
जिसके लिए आज
छोड़ गए तुम हमको!
इतनी भी क्या
मजबूरी थी तुम्हारी,
कि तुमने मेरा दिल नहीं,
उस पैसे को चुन लिया...
कि तुमने हमें नहीं,
उसे चुन लिया।


- वैभवी मिश्रा


*****


म्याना रे ध्याड़े

म्याना रे ध्याड़े लगी गए औणें
सबणी ते पैहले डोहरूआ जो हाल पौणा लाणें।
फेरी बरखा रा टैम लगया औणें
लोका री दौड़ डोहरूआ खा लगी पौणें।
बरखा ते बाद डोहरू पाणी ने भरी जाणें।
मैड़ा देणे ते बाद धाना रे डाल दूर दूर लगाणें।
धान लगांदें लगांदें कांडे पीड़ पई जाणी
एहड़ा लगां के जांघा पई गया पाणी।
जे डोहरिया भूख लगी जाओ
तां खसरे, त्याम्बल कने आम्ब पेट भरी ने खाओ।
धूपे री चलकोर तांजे लगी जांदी
तां खाडा नहाई ने ही चैन औंदी।
सांझा  मुश्कल हुई जां  घरा पूजणां
बुझो डोहरिया ही सई जाणां।
रोटी खांदे खांदे नींद्र लगी जाई पौणां
पर हाली भांडे भी पौणे धोणां ।
मांजे पर पूजदे ही स्याणें पीड़ा ने करलांदे
कने जवान खर्राटे मारी ने सई जांदे।
ता एहड़े हुंए म्याना रे ध्याड़े 
चौल खाणे जो ता हुएं
बांके पर कमाणें जो हुएं माड़े।


- विनोद वर्मा


*****


आत्मीयता

मौन हृदय के कोमल उपवन में
कुछ भाव सहज मुस्काते हैं,
बिन कहे, बिन कुछ चाहे ही
अपनेपन के दीप जलाते हैं।

न कोई परिचय, न कोई बंधन,
न संबंधों का कोई विधान,
फिर भी मन के सूने आँगन में
भर देते मधुरिम मुस्कान।

स्नेह जहाँ निस्वार्थ बहता हो,
विश्वास जहाँ आधार बने,
वहाँ शब्दों की आवश्यकता क्या,
मौन स्वयं ही उद्गार बने।

समय, दूरी, परिस्थिति चाहे
कितनी ही परीक्षा ले लें,
सच्चे भावों की दृढ़ डोरी
हर विघ्न सहज ही सह ले।

कुछ रिश्ते नाम नहीं माँगते,
वे केवल हृदय का सम्मान हैं।
जो आत्मा से आत्मा तक पहुँचें,
वही जीवन का सच्चा वरदान हैं।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


*****


घोगड़ा रिया धारा डैणा री लड़ाई

आई गई डगवांस हुण घोगड़ा
रिया धारा हुणी बड़ी लड़ाई
जे डैणा जितियाँ तां औणी विपदा
जे जीते देवते तां समझो खुशहाली आई

इस दिन सारियाँ डैणा कठी हुई कने
घोगड़ा रिया ताहरा जांदियाँ थी
अपणे जादू टोणे रा लोहा
दुज्यां ते मनवांदियाँ थी

कोई झाड़ूये पर कोई पेड़ूये पर
कोई सुपा छज्जा पर जांदियाँ थी
कोई बौंक्रिया पर सवार हुई कने
घोगड़ा रिया धारा रा फेरा पांदियां थी

माहणु जादू टोणे जो बड़ा भारी मनदा था
चेलेयां रे धूनी धागे ने ई कम्म चलदा था
चब्बाटे पर जाई कने हुँदा था लाज
सारी सारी रात चब्बाटे पर दिवा जलदा था

टूणे टोटके जंतर मन्त्रा कने हुँदा था बमारिया रा लाज
टिहडा सिरा जंगें पीड़ तां ओपरा दसदे थे
अस्पताल हुंदे थे बौहत दूर
चेलेयां रे चकरा च झट फसदे थे

चेलेयां री तां काल़े मिहने हुंदी थी नंद
खेलदेयाँ खेलदेयाँ हुई जांदा था सवेर
कुक्कडां कने छेलुआं रा
बड्डी बड्डी कने लांदे थे ढेर


- रवींद्र कुमार शर्मा


*****


पुराना घर

पुराना घर और उसका दरवाजा...
सब लोग छोड़कर चले गए,
लेकिन वो अब भी वहीं खड़ा है।
उदास, खामोश और लाचार
सदियों से खड़ा,
उसमें बूढ़ा पेड़...
महसूस करता है उसकी तकलीफ
उसकी रीढ़ की हड्डी का दर्द।
उसकी टूटती हुई हिम्मत
गुम होती हुई रौनक...
कैसे हो गया है वह बंजर...?
दीमक खा चुकी है...
जर्जर हो चुका है फिर भी
वहीं खड़ा है...
पुराना घर और उसका दरवाजा...
अब कभी नहीं खुलता किसी के लिए
ना कोई आता...
ना कुत्ते... ना जोगी...
ना भूखी गाय...
ना मनिहारी और ना ही  बिसाती
आती है तो हवा
लेकिन उनसे टकराकर लौट जाती है।
कितना मातम रखता है!
पुराना घर और उसका दरवाजा...
घर में है यादों का मलबा
खोखली हुई अलमारी
झड़ती हुई छत...
झींगुर और कीटक का शोर
चिपचिपी दीवारें
कपड़ों की खूटीं, जंग लगा लालटेन
बूढ़ा पेड़ कहता है... गिर जा...
यहां की रौनके शहर में चहकती हैं।
लेकिन प्रतीक्षा में खड़ा है
पुराना घर और उसका दरवाजा...


- मंजू सागर


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फूल

हे ईश्वर
हो सके तो मुझे
मत बनाना इंसान

आजकल
इस धरती पर
इंसान बदल गए हैं
शैतानों के शक्ल में

अगर बनाना ही है मुझे
तो एक फूल बना देना
और भेज देना
उस शैतान के बगीचे में
शायद किसी दिन
उसकी नजर मुझ पर पड़े
और मुझे तोड़ने की बजाए
हौले से मुझे सहलाए

बस उसी पल
समझ लेना
बदल रहा है शैतान
इंसान के शक्ल में।


- मोतीलाल दास


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जो ज़रूरी नहीं रोज़ व्यवहार में,
हम निभाया किए अपने किरदार में।

सब वहाँ की फिज़ा में ज़हर बन गए,
जो उड़ाए गए रंग बाजार में।

वो रहेंगे इधर न रहेंगे उधर,
जिनको कश्ती डुबोनी है मझधार में।

अब सलीका,शराफ़त,वफ़ा न हया,
रह गई बस शरारत ही आचार में।

वोट देकर नतीज़ा यूँ हासिल हुआ,
आ गए लोग केैसे भी सरकार में।

लोग कह न सके,आप कर न सके,
लूट चलती रही राम दरबार में।

है जुबां आपकी, सोच भी आपकी,
चुप्पियाँ ले गई जीत तकरार में।

हाल अपने बताएं , सुनाएं किसे,
साथ देते नहीं लोग इज़हार में।


- नवीन माथुर पंचोली


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बढ़ती जनसंख्या

जनसंख्या में देश हमारा,विश्व में अव्वल होगा,
हम दो हमारे दो से इस समस्या का हल होगा।

बेटा-बेटी दोनों को समान शिक्षा व अधिकार दो,
हर परिवार का हो एक ही नारा हम दो हमारे दो।

बेटा की चाहत में अपने परिवार को ना बढ़ने दो,
शिक्षा,और संस्कार के लिए बच्चों को खूब पढ़ने दो।

भुखमरी और बेरोजगारी से लोगों की जान बचायेंगे,
छोटा परिवार के नारे को सच कर हम दिखायेंगे।

छोटा सा परिवार हमारा,खुशियाँ का आधार हैं,
मिल जुल कर हम रहते है यही हमारा प्यार है।

शिक्षा-दीक्षा देकर बच्चों को काबिल हम बनायेंगे,
अशिक्षा को दूर भगाकर,शिक्षा की अलख जगायेंगे।

बेटा-बेटी दोनों अच्छा उसमें ना तुम भेद करो,
बेटियाँ, बेटों से कम नहीं यह सच स्वीकार करो।


- प्रीतम कुमार साहू


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बूढों का कैसा हो मौसम

कौन कहता है कि बुढ़े सपने नहीं देखते,
कौन कहता है बुढ़े इश्क नहीं करते,
आज भी मेरे सपनों में लड़कियां आती हैं 
आज भी वो अमरूद जामून तोड़ने को कहती हैं 
आज भी वो आमों पर निशाना लगाने को उकसाती हैं 
आज भी वो खेत खलिहानों में लुका छुपी को बुलाती हैं 
आज भी वो गांव के बड़े तालाब में-
बतखों वाली पनडुब्बी खेल को ललकारती हैं 
आज भी वो भूंजा चना-गुड लाने को पुचकारती हैं 
आज भी वो भोर-भिनसौर देह से चादर खींच -
महुआ चुनने चलने को पीछे से धकेलती हैं 
क्योंकि वो जानती हैं, 
यह सब आज़ के युवाओं के बस की बात नहीं है 
आज के युवा यह सब नहीं कर सकेगा 
गिफ्ट में महंगी से महंगी मोबाइल दे देगा
उसका और उसके महीने भर का रिचार्ज कर देगा
पर वो आम जामुन तोड़ लाकर नहीं देगा
कंद मूल, फल फूल, लाकर नहीं देगा
जंगली बेर,कनोद, सैंया कोइर,केन्द,भेलवा,पियार
खखसा -कुंदरी, और वन खीरा लाकर नहीं देगा
 यह सब उन्होंने कभी देखा नहीं, कभी चखा नहीं है
कभी बिहड़ जंगलों में गये नही
कभी पेड़-पर्वतों पर चढ़े नही 
और सपने में यह सब  आते नहीं
 गूगल कोई जंगल नहीं है 
गूगल कंद मूल फल उगाते नहीं 
गूगल का जंगल से कोई वास्ता नहीं 
 हकीक़त से उसका नाता नहीं।

तभी तो कहता हूं:-

"बूढों का मौसम कभी बुढ़ाता नहीं 
इश्क तो करते हैं, पर जताते नहीं"


- श्यामल बिहारी महतो


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हे राम! ये क्या कर रहे हैं हम?
बने हुए हैं हम कामचोर,
काम को बुलाते हैं और और।
जो कल थे हमारे प्यारे, दुलारे, पालनहारे,
कर दिए बेचारे, फिरते हैं मारे मारे और,
आज उन्हीं आवारा पशुओं से डर रहे हैं हम!
आवारा कुत्तों से भी डर रहे हैं हम!
हैवान बने इंसान से डर रहे हैं हम।
आवारा संतानों से भी डरने लगे हैं हम!
इकलौती संतानें ?
और फिर, अपना ही वंश नाश कर रहे हैं हम।
हर सांस में विदेशी भाषा
अंग्रेजी सिखाने और बोलने लगे हैं हम।
रहन सहन, ख़ान पान,भाषा बोली, वेशभूषा, आचरण में,
देखा देखी, भेड़ चाल अंधानुकरण अंगीकार कर रहे हैं हम,
आखिर जा कहां रहे हैं हम?
रोजगार हेतु योग्य को अयोग्य,
संरक्षण नहीं अंधाधुंध आरक्षण,
और फिर अयोग्य को योग्य बनाते ही जा रहे हैं हम।
हर क्षेत्र में जीवन को केवल और
केवल व्यापार ही व्यापार बना बैठे हैं हम।
मेरा मेरी, हेराफेरी, रिश्वतखोरी, कमीशनखोरी।
हाय पैसा!हाय हाय पैसा!
मेरी जाति-तेरी जाति,
मेरा श्मशान घाट- तेरा शमशान घाट,
मेरा धर्म-तेरा धर्म।
करते -2 कहां जा रहे हैं हम ?
देश को फिर से गुलामी और गृहयुद्ध में धकेल रहे हैं हम ?
जी हां सचमुच में अपनी ही मौत पास-पास बुला रहे हैं हम।
अपनी पहचान और संस्कृति का परित्याग कर रहे हैं हम।
श्रद्धा का भी श्राद्ध ही तो कर रहे हैं हम!
ना हया,ना शर्म लज्जा,
बाल बिखेरे,सभ्य कहला रहे हैं हम!
अपने-अपने स्वार्थ के लिए
प्रकृति को विकृत कर रहे हैं हम!
धरा से भी अन्याय कर रहे हैं हम!
भ्रम पाले कैसी सभ्यता अपना रहे हैं हम ?
हे राम! ये कहां जा रहे हैं हम ?
रघुपति राघव राजाराम!
सबको सन्मति दे भगवान!


- बृजलाल लखनपाल


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हँस रहा है सय्याद

बोझिल हो गई गम से मेरी पलकें
टुट गई जीने की मेरी जग से आस
दशो दिशा में लुट की कहर मची है
नहीं दीख रहा है कोई भी मेरे पास

बेईमानों चोरों की बस्ती में हमारी
पड़ोस में बस गये चेहरे दागदार
एक एक की परख है मेरी गजरों में
बैठा है नुक्कड़ पे चोरों का सरदार

जाहिलों की इस बेदर्द शिकंजे में
छट्पटाता है मेरे जिगर परवरदिगार
रूठ गई अरमानों का दिल का पिटारा
रो रहा है मेरी हौसला टुटा मेरा प्यार

मन की दर्द व्यथा कौन सुने अब
किस किस से करूँ मैं आज फरियाद
डूब गई जीवन ईष्या द्वैष की दलदल में
बैठ मंच पे हँस रहा है जालिम सय्याद

रे पुरवाई ले चल मुझे बहा कर साथ
जहाँ करता है संब प्रेम की संवाद
रे बदरा तेरे संग संग मैं चल जाऊंगा
ले चल कर देना मेरा जीवन को आबाद


- उदय किशोर साह


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शख्स

एक शख्स है
जो तुम्हारे इंतजार में बैठा है
मोहब्बत न सही
दोस्ती के इजहार में बैठा है।

एक शख्स है
जो सुनता नहीं
कभी किसी की भी
मगर तुम्हारी हर बात
सुनने के इंतजार में बैठा है।

एक शख्स है
जो सोचता नहीं
कभी किसी का भी
वो हर जगह हर लम्हा
तेरा एहसास लेकर बैठा है।


- डॉ. राजीव डोगरा


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उफ्फ्फ! यह चाय

आज फिर वही रस, वही तृप्ति,
युगों बाद जागी वह सुवास,
या कोई गुप्त रहस्य छिपा है,
जिसकी लगी रहती है आस।

कतिपय अनकहे शब्द मौन के,
घुल जाते चाय में हर बार,
मात्र तुम्हारी सुधि आते ही,
जीवंत हो उठता वही स्वाद।


- सविता सिंह मीरा


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