हरियाली
घनघोर घटा चहुंओर अब छा गई,
छम-छम कर नाचती देखो वर्षा आ गई।
पंछियों की डार भी पीहू-पीहू कर नाचने लग गई,
छाई थी जो काली बदरी वो पानी बन बरस गई।
बेरहम गर्मी जो सबके हाल बेहाल कर गई,
शीतल बूंदें बारिश की सुकून पहुंचाने आ गई।
बच्चों की टोलियाँ वर्षा में मस्ती करने निकल गई,
वो कागज की किश्तियां भी दूर तक निकल गई।
सूखा चारा खाते पशुओं में भी ऊब सी आ गई,
फिर हरी घास से उनके मनों में रौनक छा गई।
हर कली डाली मुस्कराते गीत खुशी के गा गई,
सबके जीवन में वर्षा से नवबहार सी छा गई।
मिट्टी के हर कण में नई उमंग सी छा गई,
देखो अब के वर्ष धरा पर फिर हरियाली छा गई।
- राज कुमार कौंडल
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इस ग़म से कोई कैसे निजात पाए,
इश्क़ हो और फिर भी कह ना पाए।
उनकी नज़रों में बहती गहराई है इतनी,
वो बस देखें आह भर तो डूब जाए।
कैसे मानूँ कि बस दुनियादारी निभाती है!,
जो मिलते ही छोटे बच्चे की तरह लिपट जाए।
इस इंतज़ार में आँखों में सपने लिए बैठा है कोई,
कि सुबह का भूला शाम होते ही लौट आए।
मेरे अश्कों के कुछ अशआर को पूरी कहानी ना समझना,
इश्क़ का दरिया यूँ चंद बूँदों में समेटा ना जाए।
- स्वाति जोशी
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जीने की उपहार
कल्पनाओं की पंख लगाकर हम दोनों
चलों ख्वाबों की दुनियां में। बस जायें
हवा महल सपनों में बनाकर जन्नत में
तेरी जुल्फों के साये में। हम सो जायें
ना कोई फिक्र ना कोई चिन्ता व गम
रोक ना पाये छुकर हमारे बढ़ते कदम
ना कोई विपत्त ना कोई कष्ट व दुःख
चारों तरफ मिले खुशियों का सुख
साथ जीने की व साथ मरने की जब
हमने मिलकर मंदिर में कसमें खाई
फिर क्यूं मरने की डर भय तुमको
तेरी उम्मीद के बाजू में अब दिखलाई
हमें मौत की परवाह कब है जानूँ
हम तो हैं प्यार के जाबांज मतवाले
हमें आकाश से गिरने की डर नहीं
हम हैं राही दिल के अमर दिलवाले
री पुरवाई ले चल हमें अपने संग संग
ले चल सफर मेंचन्दा के उसपार
जहाँ सुकून की बहती है एक दरिया
ला दो हमें तुम जीने की अनुपम उपहार
- उदय किशोर साह
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देखना चाहता था मैं
जिन्हें अपनी दुआओं में भी ऊँचा,
वही मुझे अपनी महफ़िल में
बौना समझ बैठे,
चले हम भी अपनी ही फितरत से
मेहनत की सीढ़ियाँ चढ़ते रहे ,
और उनके समकक्ष बन बैठे,
कल तक जो साया समझते थे
होश उड़ जाते हैं अब उनके
हम को देखकर...
आँखें झुका लेते हैं अब वह
जो सर उठा कर बात करते थे,
और हम सोचते हैं के
अरसा बीत गया उनसे भेंट हुए ,
पर दर्द ये है के
भेंट अब भी अजनबी सी लगती है ,
वह भी पूछते हैं अब हाल
जो हाल पूछने लायक न समझते थे
और हम मुस्कराकर कहते हैं
अरसा बीत गया उनसे भेंट हुए,
देखना चाहता था मैं
जिन्हें अपनी दुआओं में भी ऊँचा,
वही मुझे अपनी महफ़िल में
बौना समझ बैठे।
- बाबू राम धीमान
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महिला पुलिस
मैं पुलिस हूँ,
हाँ, महिला पुलिस हूँ!
माँ की मैं भी लाड़ली-दुलारी हूँ,
हर प्रदेश, हर क्षेत्र में अब मैं भारी हूँ।
हाँ, इस लोकतांत्रिक देश की शान हूँ,
अपने फर्ज और सम्मान की पहचान हूँ।
मैं नारी हूँ,
हाँ, अपने पापा की लाड़ली हूँ!
हर संघर्ष से लड़कर आज वर्दीधारी हूँ।
करुणा भरे हृदय और स्त्रीत्व के साथ,
फर्ज की खातिर लाठियाँ भी उठाई हैं हाथ।
मैं पली हूँ
एक ऐसी दुनिया में,
जहाँ अपनों से ज़्यादा,
रिश्तेदारों और आस-पड़ोस के ताने खाए हैं।
पर इन्हीं तानों से मैंने
अपनी मेहनत के हथियार बनाए हैं।
मैं दौड़ी हूँ,
हाँ, मैदानों में बहुत तेज भागी हूँ!
सर्दी, गर्मी और बरसात में रातों को जागी हूँ।
खुद को तपाकर लाखों प्रतिद्वंद्वियों के बीच से निकली हूँ,
कलम घिस-घिस कर, पसीने में ढलकर आगे बढ़ी हूँ।
मैं कांस्टेबल बनी हूँ,
अपनी मेहनत से यह वर्दी पाई है!
गाँव के मैदान में तैयारी के वे दिन याद हैं,
जब बेवक़्त पापियों की गंदी नज़रें मँडराई हैं।
पर मैं झुकी नहीं, किताबों में खुद को खपाया है,
तब जाकर यह मुकाम हासिल कर पाया है।
मैं SI (सब-इंस्पेक्टर) हूँ,
आज कांधे पर 'डबल स्टार' सजाए हैं!
तैयारी के लिए भेजते समय, जो माँ-बाप को कोसते थे,
जिनकी नज़रों में मैं काँटे की तरह खटकती थी,
उनकी संकीर्ण सोच को मात देकर यह रुतबा पाया है!
आज मैं खुश हूँ...
संघर्ष के वो दिन याद कर आँखें ज़रूर नम हैं,
पर पापा की रुंधती मुस्कान और माँ की पुचकार में,
मेरा पूरा जहाँ और सारी खुशियाँ समाई हैं।
बदलती नज़रों के बीच, आज मैंने सबकी सच्ची प्रीति पाई है।
- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'
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गिरने लगी चट्टानें, ज़ख्म देने लगी बरसात
गिरने लगी चट्टानें, ज़ख्म देने लगी बरसात
नदी नाले ऊफान पर, बरतो सदैव एतिहात,
नदी किनारें न जाएं, मानो कविराय की बात
निठल्ले कभी न बैठिये, न धरो हाथ पर हाथ,
सेल्फ़ी लेने के चक्कर में अक्सर, जाते नदी के पास
खड़े होते बीच नदी में, बड़ी सी चट्टान पर इन्सान
वीडियो बनती रह जाती, चलता हँसी मज़ाक
ऊफान आया नदी में, पलभर में सब कुछ खाक,
सब देखते रह जाते, नदी प्रवाह बहा ले जब साथ
चीखें गूँजती रह जाती, पर हाथ नहीं आता हाथ
गलती खुद की ही होती, कोई देखता तक नहीं,
भगवान भी नहीं बचा पाते,जब बहते प्रवाह के साथ,
सैल्फी लेने के चक्कर में,उजड़ गए कीमती चिराग़
रोक पाए नदी प्रवाह को, इतना बलशाली नहीं इन्सान
राह देखती रह गई माँ, दरवाजा ताकता रह गया बाप,
जीवन दायनी नदियाँ देखो, अब बनने लगी हैअभिशाप।
- बाबू राम धीमान
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लौट कर हर जन्म में मैं हिन्दुतान आता हूं
मैं भारत का फौजी हूँ भारत के गीत मैं गाता हूँ
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ
बेशक कुर्बान हो गया मैं सरहद पर लड़ते लड़ते
लौट कर हर जन्म में मैं हिन्दुतान आता हूं
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ
नहीं मानता करता रहता शरारत वह बार बार
कर दिया था हमने बंगला देश बनाकर इसको दोफाड़
नब्बे हज़ार सैनिक गिगिड़ाये थे हमारे वीरों के आगे
चटगांव बंदरगाह पर जब मारी थी हमारे वीरों ने दहाड़
उन वीरों को नमन करें हम सबको यह समझाता हूँ
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ
दुश्मन कारगिल द्रास की चोटियों पर बैठ गया
सोच कर यह कि हिंदुस्तान को नहीं है खबर
युद्ध हुआ कारगिल में हमने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए
चोटियों पर जो बैठे थे नसीब नहीं हुई उनको कब्र
कुछ लौट कर जो घर नहीं आये उनकी याद दिलाता हूं
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ
चीन भी लगा रहता है करता रहता है
सीमा का उलंघन बार बार
गलवान में ठोका हमने चालीस को
दिया मौत के घाट उतार
चीन भूल जाये 1962 को
आधुनिक भारत की मैं ताकत दिखाता हूं
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ
देश मेरा भारत है है माता भारती
उठो मेरे देशवासियो मां है पुकारती
उनका ख्याल रखो जो सीमा के है पहरेदार
उनकी बदौलत जीती हूँ हमेशा कभी नहीं मैं हारती
देश पहला प्रेम है मेरा यह सबको बतलाता हूँ
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ
बार बार पिटने के बाद भी नहीं सँभलता है
कभी आतंकी भेजता है कभी सीमा पर चालें चलता है
कुत्ते की पूंछ है कभी सीधी नही होगी
हर बार मुंह की खाता है फिर हाथ मलता है
सर्जिकल स्ट्राइक करता हूँ घर में घुस कर मार आता हूँ
जो देशभक्त हैं उनके लिए मैं यह कविता सुनाता हूँ
- रवींद्र कुमार शर्मा
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विरहन की दर्द
काली कोयलिया डाली से करती फरियाद
बेशरमी क्यूं भूल गया घर की तुम याद
गम की मारी चन्दा तेरी प्यारी अबोध चकोरी
कब समझोगो तुम प्रीत की रीत संवाद
सावन बीता भादो भी ना मन को है जीता
फागुन की भी क्या बीत जायेगी फुहार
लौट आ परदेशी अपने घर वापस आ जौशी
खेत खलिहान में हैं जीने की संभावना अपार
चुन्नु नित्य रोता मुन्नु भी तेरी याद में ना सोता
नित्य करता रहता है तेरी यादों की हर बात
ना चाहिये हमें निगोड़ी झुमका लौट आ दुमका
दुःख सुख सह लेगें हम दोनों झोपड़ी में साथ
मंगरू घर आया सहरु को भी परदेश ना भाया
उन सब के घर मन रही दीपावली की त्यौहार
किस बात पे रूठा तुँ बेदर्दी मेरे प्रियवर
छोड़ छाड़ के आ वापस घर आज है इतवार
ये जीवन है संग जीने की संग संग मरने की
मत कर जीवन की अरमानों को तुँ। बरबाद
ना जाने कब आ जायेगी धरती पे.. कयामत
मन की हर बातें तुम कर दो आज अबाद
- उदय किशोर साह
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ऐसे ही नहीं...
कभी कलम, कभी तलवार,
कभी मशाल थामनी पड़ती है,
ऐसे ही नहीं मिलती आज़ादी,
ऐसे ही जंग जीती जाती है।
कभी सूरज, कभी चाँद,
कभी दीप बनना पड़ता है,
ऐसे ही नहीं मिटता तिमिर,
ऐसे ही जीवन में उजाला होता है।
कभी इंतज़ार, कभी इनकार,
कभी बेवफ़ाई भी सहनी पड़ती है,
ऐसे ही जन्म लेता है सच्चा प्यार,
नहीं तो हर दिल खिलौना होता है।
कभी बारिश, कभी धूप,
कभी शिशिर की मार सहनी पड़ती है,
तभी नन्हा पौधा वृक्ष बनता है।
ऐसे ही नहीं खिलते गुल,
महकने के लिए हर मौसम में मुस्कुराना पड़ता है।
कभी गिरना, कभी संभालना,
कभी खुद से लड़ना होता है।
ऐसे नहीं मिलता मुकाम,
हर कदम इंतहान से गुजरना होता है।
- रोशन कुमार झा
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जीवन संघर्ष है
जीवन में संघर्ष नहीं किया तो फिर क्या किया ?
सुबह तो सब जागते हैं,
सांस तो सब लेते हैं,
तुमने भी लिया तो क्या किया ?
कभी अपने को नहीं कोसा तो क्या किया ?
कभी परिस्थित से नहीं लड़े तो क्या किया ?
अपने मन को मारा नहीं जिम्मेदारी के लिए तो क्या किया ?
सबकी तरह तुम भी एक समतल जीवन चाहते हो ?
पथिक को मजा नहीं आता है समतल जमीन पे,
तुमको तो पर्वत, नदी और खाई से डर लगता है,
तो तुम अपने जीवन के पथिक नहीं हो ?
तुम जीना चाहते हो एक ऐसा जीवन जो लोग देखते हैं सपनों में,
और सपने वही देखते है,
जिन्हें परिस्थित ने कभी रातों को जगाया नहीं।
- प्रणव राज
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सोच अपनी बदल नहीं पाए।
हम किसी राह चल नहीं पाए।
आजमाते रहे कभी जिनको,
उन रिवाज़ो में ढल नहीं पाए।
आस जितनी रही घटाओं से,
अब्र उतने पिघल नहीं पाए।
रात-दिन राह भर चले लेकिन,
पार हद से निकल नहीं पाए।
वक़्त के साथ-साथ रहकर भी,
चंद लम्हें संभल नहीं पाए।
बोल थे,साज़ थे,मिले सुर भी,
दिल हमारे बहल नहीं पाए।
- नवीन माथुर पंचोली
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कौन बो रहा है ऐसी फसल,
बिगड़ रही है आज की ऐसी नस्ल।
फूल से सुंदर बच्चे, काँटे हो रहे हैं,
बड़ों के मुँह पर अब चाँटे हो रहे हैं।
धीरज इनका हीमोग्लोबिन-सा घट रहा है,
गुस्सा जैसे भयानक बिलीरूबिन-सा बढ़ रहा है।
बड़ों की बातें रुकावट लग रही हैं,
बाहरी दुनिया ही सजावट लग रही है।
अपनों के लिए जीने का दौर खो गया,
ख़ून-ख़राबा, क़त्ल-ए-आम अपनों का हो गया।
न कोई पश्चाताप है, न कोई शिकन,
कैसे आ लगा यह रिश्तों को ग्रहण।
- अजय नेमा
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