हिम्मत को मत दो विराम
हिम्मत को मत दो जीवन में आराम
हिम्मत से हासिल होगी तेरी मुकाम
हिम्मत है जीवन का एक पैगाम
आलस को दूर से ही है मेरा सलाम
हिम्मत को मत दो जीवन में विराम
हिम्मत है अमूल्य धन का ही नाम
हिम्मत से लेते रहना है सदैव काम
आलस को दूर से ही है मेरा राम राम
हिम्मत से पूरा होता सपनों का अरमान
हिम्मत से मुकाबला कर युद्ध का मैदान
हिम्मत कब माँगता है तुमसे कोई दाम
आलस को दूर से ही है मेरा सलाम
हिम्मत है सफलता का दूसरा ही नाम
हिम्मत देता है आरजू को। गुलफाम
हिम्मत है जीवन। संघर्ष का तुफान
आलस को दूर से ही है मेरा सलाम
हिम्मत पैदा करता है कर्मों का अंजाम
हिम्मत दिखलाता है रंगीन सुबह शाम
हिम्मत को कर जीवन भर सम्मान
आलस को दूर से ही है मेरा सलाम
- उदय किशोर साह
*****
आश्रय
दलितों को,
यह समझने की
बहुत जरूरत है कि
किसी सवर्ण के आसरे जीना
और उसके सहारे खड़ा होना-
दो विविध बातें हैं।
जिन्हें शुरू से यह बताया गया हो,
कि कोई स्वर्ण आएगा
और तुम्हारी जिंदगी संवार देगा।
एक दिन
यह प्रश्न जाग जाता है कि-
यह मेरी जिंदगी है,
तो भला इसे संवारने
का अधिकार किसी और को क्यों?
दलित को,
सिर्फ़ सवर्णों के सहारे जीना नहीं है,
उसे अपनी पहचान बनाना भी है।
क्योंकि जिस समाज ने
दलित को,
अपने आश्रय रखने का
दावा किया है,
उसी समाज ने अक्सर
उसके पैरों के नीचे की ज़मीन
अपनी बाजुओं में रखा है।
दलित को,
किसी सवर्ण के आसरे,
सुरक्षित होने की बजाय,
अपने पैरों पर खड़ा होकर
यह कहे कि -
'हमें आपका साथ चाहिए,
आपका आश्रय नहीं....
- आनंद दास
*****
आँखों में विश्वास हो, चेहरे पर मुस्कान।
ऐसे ही सुंदर बने, रिश्तों जुड़ा जहान॥
आँखों में जब प्रेम हो, मिट जाए हर भेद।
एक नज़र की छाँव में, सूखें मन के खेद॥
आँखों में उम्मीद रख, राह कठिन हो आज।
सपनों को आकार दे, मेहनत का अंदाज॥
आँख बचाकर मत चलो, जग को देखो गौर।
दुखियों के आँसू पढ़ो, मानवता की ओर॥
आँखों में करुणा रहे, मन में रहे प्रकाश।
दुनिया सुंदर हो उठे, मिट जाए अविश्वास॥
आँखों में जो दर्द है, चेहरे पर मुस्कान।
ऐसे कितने लोग हैं, पढ़ न सका इंसान॥
आँखों से पहचानिए, चेहरे के उस पार।
मौन खड़े इंसान में, छिपा हुआ संसार॥
आँखों का पानी कभी, जाने मत दे सूख।
जिसके नयनों में दया, उसके सही रसूख॥
आँखें हों तो देखिए, सौरभ सच्ची प्रीत।
दूजे के दुख को समझ, यही मनुज की रीत॥
नयन रहें संवेदनशील, हृदय रहे निष्काम।
आँखों में इंसानियत, यही जगत का काम॥
- डॉ. प्रियंका सौरभ
*****
भूखे रहने से कौन मिला?
भूखे रहने से अगर भगवान खुश होते हैं,
तो गरीब के बच्चे रोटी के लिए क्यों रोते हैं ?
स्त्री अपने पुरुष के लिए अनेकों व्रत करती है,
पुरुषों द्वारा बनाए कठिन नियमों से वह डरती है।
प्रकृति ने पीने हेतु जल दिया, और प्रकृति ने हमें फल दिए,
और, तुम कहते हो कि स्त्री उसे न खाए और नाही पिए ?
अगर तुम्हारी आयु बढ़ गई तो भाग्य का लिखा मिटा दोगे,
अपनी दकियानूसी परंपराओं को नहीं हटाया तो जानवर हो यह दिखा दोगे।
व्रत के दिन पंडित "व्रत करना जरूरी है" यह बताता है,
फिर शाम को स्त्रियों द्वारा चढ़ाए फल खूब खाता है,
पुरुष भी तो चाहते होंगे अपनी स्त्री को हर जन्म में उनके लिए,
तो फिर वह कब व्रत करते हैं, और किनके लिए ?
- प्रणव राज
*****
कसक
कसक दिल में यही रहा कि कसूर अपना जान ना सके
बेइंतहा मुहब्बत जो करते थे मुझसे, उसे जाते रोक ना सके
चाहा दिल ने बहुत की उसे रोके, लेकिन हिम्मत जुटा ना सके
नाराज़गी उसके दिल में देखे ऐसे कि सामने उनके आ ना सके।
अब तो सिर्फ ख्यालों में ही उनके, रहती हूँ खोयी खोयी
बीतें लम्हों में साथ बिताये पल को, दिमाग में रहती है छाई
ज्यादा कुछ नहीं तो कम से कम, कसूर एक बार बता देते
कसक दिल का कसूरवार खुद को मान, उससे दूर चले जाते।
लेकिन पता है मुझे कि वो बड़े स्वाभिमानी है इंसान
खुद ही सारे कसक सह लेंगे, मुझे ना करेगे परेशान
दिल में उनके मेरे प्रति चाहत कम नहीं, ये है मुझे भान
काश वो वापस आते तो, सहर्ष उसके हाथ लेते थाम।
- चुन्नू साहा
*****
सच
कहीं नहीं जाता
वे अंधेरे में फंसे रहते हैं
वो कायर
जो रोशनी से डरता है
वो कमज़ोरी
जो और पीछे हटती जाती है।
उनकी दुनिया
हर गली-मोहल्ले में
छिपे बेबस काले चमगादड़
अंधी मकड़ी का जाल
और जमा हुए कचरे से
पैदा होने वाली बीमारियाँ और तकलीफें
आग में जल जाती हैं।
एक-एक करके, उसूल और नाइंसाफ़ी,
सफ़ाई और गंदगी,
सारे सिद्धांत, नियम, गड़बड़ियाँ
और नियम टूट जाते हैं।
अनंत गुफा के आखिर में
तुम रह जाते हो
एक साफ़-सुथरी
पवित्र करने वाली लौ।
मैं सब कुछ खुला
छोड़कर तुम्हारे पास आता हूँ।
- निर्मल राय
कहीं नहीं जाता
वे अंधेरे में फंसे रहते हैं
वो कायर
जो रोशनी से डरता है
वो कमज़ोरी
जो और पीछे हटती जाती है।
उनकी दुनिया
हर गली-मोहल्ले में
छिपे बेबस काले चमगादड़
अंधी मकड़ी का जाल
और जमा हुए कचरे से
पैदा होने वाली बीमारियाँ और तकलीफें
आग में जल जाती हैं।
एक-एक करके, उसूल और नाइंसाफ़ी,
सफ़ाई और गंदगी,
सारे सिद्धांत, नियम, गड़बड़ियाँ
और नियम टूट जाते हैं।
अनंत गुफा के आखिर में
तुम रह जाते हो
एक साफ़-सुथरी
पवित्र करने वाली लौ।
मैं सब कुछ खुला
छोड़कर तुम्हारे पास आता हूँ।
- निर्मल राय
*****
बस दिखना पड़ता है।
घी नकली, तेल नकली,
दूध नकली, मसाला नकली,
साधु नकली, दवा नकली-
डॉक्टर फर्जी, कागज़ात नकली,
सबमें मिलावट,
सब कुछ नकली।
नकली है
तो असल भी होगा-
कहीं दबा,
कहीं छुपा,
किसी कोने में।
मिल भी गया असली अगर,
तो क्या पहचान पाओगे
इस मिलावटी ज़माने में ?
नकली इतने असली लगते हैं
कि असली ही संदिग्ध लगता है।
असल सामने आ भी जाए,
तो नकली
उसे मानने नहीं देता।
और शायद
सबसे बड़ा संकट यही है-
मिलावट चीज़ों में कम,
हमारी पहचान में ज़्यादा है।
अब असली को
साबित होना पड़ता है,
नकली को
बस दिखना पड़ता है।
घी नकली, तेल नकली,
दूध नकली, मसाला नकली,
साधु नकली, दवा नकली-
डॉक्टर फर्जी, कागज़ात नकली,
सबमें मिलावट,
सब कुछ नकली।
नकली है
तो असल भी होगा-
कहीं दबा,
कहीं छुपा,
किसी कोने में।
मिल भी गया असली अगर,
तो क्या पहचान पाओगे
इस मिलावटी ज़माने में ?
नकली इतने असली लगते हैं
कि असली ही संदिग्ध लगता है।
असल सामने आ भी जाए,
तो नकली
उसे मानने नहीं देता।
और शायद
सबसे बड़ा संकट यही है-
मिलावट चीज़ों में कम,
हमारी पहचान में ज़्यादा है।
अब असली को
साबित होना पड़ता है,
नकली को
बस दिखना पड़ता है।
- रोशन कुमार झा
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अर्की री सायर
सायरी रे मेले रिया लगी गईया रौणका
ख़त्म हुई गई बरसात चली गईया बौणका
रस आई गया गलगले, निसरी गए धान
आर्किया रिया सायरी री बी बखरी ई शान
भैंसेया रे हुन्दे मुकाबले अर्की री सायिरा रा रिवाज़
देखणे जो आऊँदी खलक दुनियां,बजदा रहन्दा साज
सायरी रा साजा पूजते बणाई लैंदे पकवान
भल्ले भात, दहीं खाई कन्ने जिऊये बिच आई गई जान
दादा-दादिया रा नाच देखो, पोते-पोतियां रा गान
अर्की री सायिरा रा सारे हिमाचला बिच आ मान
बजुर्गा रा मिलदा आशीर्वाद, घरा बिच आऊँदी बहार
आर्किया रे मेले बिच मिलदे सारे, बिछुड़े रे यार
सुखी बसदे रहो सारे, टब्बरा री होए मौज़ बहार
साजा सायिरा रा पूजो घरे , कदी बी नी आवे हार
- बाबू राम धीमान
सायरी रे मेले रिया लगी गईया रौणका
ख़त्म हुई गई बरसात चली गईया बौणका
रस आई गया गलगले, निसरी गए धान
आर्किया रिया सायरी री बी बखरी ई शान
भैंसेया रे हुन्दे मुकाबले अर्की री सायिरा रा रिवाज़
देखणे जो आऊँदी खलक दुनियां,बजदा रहन्दा साज
सायरी रा साजा पूजते बणाई लैंदे पकवान
भल्ले भात, दहीं खाई कन्ने जिऊये बिच आई गई जान
दादा-दादिया रा नाच देखो, पोते-पोतियां रा गान
अर्की री सायिरा रा सारे हिमाचला बिच आ मान
बजुर्गा रा मिलदा आशीर्वाद, घरा बिच आऊँदी बहार
आर्किया रे मेले बिच मिलदे सारे, बिछुड़े रे यार
सुखी बसदे रहो सारे, टब्बरा री होए मौज़ बहार
साजा सायिरा रा पूजो घरे , कदी बी नी आवे हार
- बाबू राम धीमान
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चलते चलो
रात की गोद से निकला गगन में लाल गोला,
लेकर आया संग अपने किरणों का झोला।
उठो जागो छोड़ो बिस्तर सारे जग से रवि बोला,
दिन है मेहनत करने को उतारो आलस का चोला।
पेड़ पौधे जंतु पशु पंछी मानव सब जग गए,
किरणों का जब उसने अपना झोला खोला।
नभ धरा जल जंगल सब स्फूर्ति से भर गए,
सबने प्रेम से सबको मधुर अभिवादन बोला।
पत्तों पर पानी ने बनाया सुंदर मोती का गोला,
हवा के झोंके ने फिर उस मोती का राज खोला।
नभ में उड़ चला स्वच्छंद पंछियों का टोला,
मेहनत कर दाना खाएंगे सारे जग से बोला।
हर सुबह जब अम्बर में आता है सूरज गोला,
सतत् अपने पथ पर चलते चलो सबसे बोला।
- राज कुमार कौंडल
रात की गोद से निकला गगन में लाल गोला,
लेकर आया संग अपने किरणों का झोला।
उठो जागो छोड़ो बिस्तर सारे जग से रवि बोला,
दिन है मेहनत करने को उतारो आलस का चोला।
पेड़ पौधे जंतु पशु पंछी मानव सब जग गए,
किरणों का जब उसने अपना झोला खोला।
नभ धरा जल जंगल सब स्फूर्ति से भर गए,
सबने प्रेम से सबको मधुर अभिवादन बोला।
पत्तों पर पानी ने बनाया सुंदर मोती का गोला,
हवा के झोंके ने फिर उस मोती का राज खोला।
नभ में उड़ चला स्वच्छंद पंछियों का टोला,
मेहनत कर दाना खाएंगे सारे जग से बोला।
हर सुबह जब अम्बर में आता है सूरज गोला,
सतत् अपने पथ पर चलते चलो सबसे बोला।
- राज कुमार कौंडल
*****
जीवन मरण सत्य है
जीवन मरण सत्य है
पंच तत्व से बना शरीर
पुनः मिट्टी हो जायेगा
मनुष्य जीवनभर करता है
सुख शांति के तलाश में
दिन-रात खूब मेहनत
तलाश करता है सुकून की
आजीवन बहाकर पसीना
अंत में पता चलता है कि
सब मोहमाया है!
चुन चुन कर तिनका
महल बनाता है
बेटा बेटी के सुख शांति
के लिए
लड़ा है अंधेरी रातों से
प्रेम दया करुणा
उपासना तीरथ
सब करता है आने वाले
पीढ़ियों की सुख के लिए
निष्कर्ष यह निकलता है कि
जीवन मरण सत्य है।
- मनोज कौशल
जीवन मरण सत्य है
पंच तत्व से बना शरीर
पुनः मिट्टी हो जायेगा
मनुष्य जीवनभर करता है
सुख शांति के तलाश में
दिन-रात खूब मेहनत
तलाश करता है सुकून की
आजीवन बहाकर पसीना
अंत में पता चलता है कि
सब मोहमाया है!
चुन चुन कर तिनका
महल बनाता है
बेटा बेटी के सुख शांति
के लिए
लड़ा है अंधेरी रातों से
प्रेम दया करुणा
उपासना तीरथ
सब करता है आने वाले
पीढ़ियों की सुख के लिए
निष्कर्ष यह निकलता है कि
जीवन मरण सत्य है।
- मनोज कौशल
*****
ख़ुद को ख़ाक-नशीं समझकर,
गया था अहबाब के घर एक रोज़।
क्या ख़बर थी कि वहाँ
मेरे हिस्से में इतना एहतराम आएगा,
कि ख़ुदा के उस नेक बंदे ने
मुझे क़ाबिल-ए-मसनद समझकर नवाज़ दिया।
उसकी निगाह में जो क़द्र पाई,
तो अपने ही वजूद पर नाज़ नहीं,
बल्कि उसके इल्म पर फ़ख़्र हुआ मुझे।
उसकी शख़्सियत की बुलंदी ने
मेरे दिल के आईने पर ऐसा असर छोड़ा,
कि वह शख़्स मेरे दिल में
एक आला मुक़ाम पा गया।
न दौलत की आरज़ू है,
न शोहरत की कोई तमन्ना-
मेरे लबों पर बस एक दुआ है
मेरे परवरदिगार के हुज़ूर:
जिसने ख़ाक को भी इज़्ज़त की नज़र से देखा,
उस नेक दिल को तू हमेशा सरफ़राज़ रखना।
उसके इल्म को और रौशनियाँ अता करना,
उसकी राहों में अपनी रहमतें बिछाए रखना,
और मुस्तक़बिल के हर मोड़ पर
उसे ख़ुशियों से हमकिनार रखना।
- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'
गया था अहबाब के घर एक रोज़।
क्या ख़बर थी कि वहाँ
मेरे हिस्से में इतना एहतराम आएगा,
कि ख़ुदा के उस नेक बंदे ने
मुझे क़ाबिल-ए-मसनद समझकर नवाज़ दिया।
उसकी निगाह में जो क़द्र पाई,
तो अपने ही वजूद पर नाज़ नहीं,
बल्कि उसके इल्म पर फ़ख़्र हुआ मुझे।
उसकी शख़्सियत की बुलंदी ने
मेरे दिल के आईने पर ऐसा असर छोड़ा,
कि वह शख़्स मेरे दिल में
एक आला मुक़ाम पा गया।
न दौलत की आरज़ू है,
न शोहरत की कोई तमन्ना-
मेरे लबों पर बस एक दुआ है
मेरे परवरदिगार के हुज़ूर:
जिसने ख़ाक को भी इज़्ज़त की नज़र से देखा,
उस नेक दिल को तू हमेशा सरफ़राज़ रखना।
उसके इल्म को और रौशनियाँ अता करना,
उसकी राहों में अपनी रहमतें बिछाए रखना,
और मुस्तक़बिल के हर मोड़ पर
उसे ख़ुशियों से हमकिनार रखना।
- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'
*****
मेरी छोटी सी मुस्कान के लिए
अपनी थकान भुला देती है।
मैं हारकर लौटी
घर मां उम्मीदों की लौ जला देती है।
मेरे सपनों की उड़ान मे
मां विश्वास के पंख लगानी है
मैं कितनी भी दूर चली जाऊ
मां की दुआ मेरे साथ जाती है
मां सिर्फ एक रिश्ता नही वह
मेरे जीवन का आधार है।
मेरी हर खुशी में उसकी खुशी
मेरी हर जीत में प्यार है।
ईश्वर से क्या? मांगू
जब मां का आंचल मेरे पास है
मेरी यह कविता सबसे सुन्दर हो
बस मां मेरी यही आस है।
- आरुषी सिंह
अपनी थकान भुला देती है।
मैं हारकर लौटी
घर मां उम्मीदों की लौ जला देती है।
मेरे सपनों की उड़ान मे
मां विश्वास के पंख लगानी है
मैं कितनी भी दूर चली जाऊ
मां की दुआ मेरे साथ जाती है
मां सिर्फ एक रिश्ता नही वह
मेरे जीवन का आधार है।
मेरी हर खुशी में उसकी खुशी
मेरी हर जीत में प्यार है।
ईश्वर से क्या? मांगू
जब मां का आंचल मेरे पास है
मेरी यह कविता सबसे सुन्दर हो
बस मां मेरी यही आस है।
- आरुषी सिंह
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तेरी रज़ा में जीना सिखा दे
मुझे तैरना दे या फिर बहना सिखा दे,
जो तेरी रज़ा हो, वही रहना सिखा दे।
न शिकायत रहे, न कोई शिकवा किसी से,
हर हाल में हँसकर मुझे जीना सिखा दे।
जो मिला है उसे प्रेम से स्वीकार कर लूँ,
जो छूट जाए, उसको भी भूलना सिखा दे।
न सुख का अहंकार, न दुःख की उदासी,
मुझे दोनों के पार निकलना सिखा दे।
जहाँ राह मेरी और मंज़िल तेरी हो,
वहाँ अपने कदमों को चलना सिखा दे।
जब मन डगमगाए, जब हिम्मत भी टूटे,
तू भीतर से मुझको सँभलना सिखा दे।
न पाने की जल्दी, न खोने का डर हो,
मुझे आज में ही सुकून से रहना सिखा दे।
मैं क्या चाहता हूँ...यह भी भूल जाऊँ,
बस तू क्या चाहता है, समझना सिखा दे।
- नरेंद्र मंघनानी
मुझे तैरना दे या फिर बहना सिखा दे,
जो तेरी रज़ा हो, वही रहना सिखा दे।
न शिकायत रहे, न कोई शिकवा किसी से,
हर हाल में हँसकर मुझे जीना सिखा दे।
जो मिला है उसे प्रेम से स्वीकार कर लूँ,
जो छूट जाए, उसको भी भूलना सिखा दे।
न सुख का अहंकार, न दुःख की उदासी,
मुझे दोनों के पार निकलना सिखा दे।
जहाँ राह मेरी और मंज़िल तेरी हो,
वहाँ अपने कदमों को चलना सिखा दे।
जब मन डगमगाए, जब हिम्मत भी टूटे,
तू भीतर से मुझको सँभलना सिखा दे।
न पाने की जल्दी, न खोने का डर हो,
मुझे आज में ही सुकून से रहना सिखा दे।
मैं क्या चाहता हूँ...यह भी भूल जाऊँ,
बस तू क्या चाहता है, समझना सिखा दे।
- नरेंद्र मंघनानी
*****
सैरा री सबीं जो बधाई
स्याल़े री हुई गई शुरुआत
आई गई सैर फसल हुई गी त्यार
अपणियाँ दराटियाँ चंडाई लवा करी लवा तेज
बडणे जो नी हुण करा इन्तज़ार
गर्मी बी घटी गई
बरखां बी चकोई गईयाँ
धान घाह बडणे जो कने
छल्लियां खोटणे जो रई गईयाँ
कई जगह मेले लगदे
लोक लैंदे पूरी नंद
लदरौरा रे मेले जो जाणा जरूर
कम्म करी देणे सारे बन्द
काल़ा मिहना हुई गया खत्म
नवियाँ ब्याईरियाँ हुण सौरियाँ रे जाणे जो त्यार
शिवजिये बी जटां कठियाँ करी लई
अंदर हुई जाने किडू मकोडू
सैजे कदके आइरे थे बाहर
फसला रा बी अया बुरा हाल
छल्लियां पईरी लमी क्या करनी बडाई
कुछ पंछिंएँ बांदरें नी छड्डी
कुछ सुअरें दिति री मुकाई
सैरी जो नाई राती
घरें घरें जांदे थे
नवियाँ फसलां जो टोकरिया च
सजाई कने ल्यान्दे थे
लोग बी पहले सैरी जो बड़ा थे मनान्दे
खरे खरे बधिया पकवान थे बणान्दे
सैरी माता अग्गे बड़ा कुछ थे चढान्दे
सेवईयां भल्ले कने खीर थे खूब खाँदे
हुण लोग सैर तां क्या सारे त्वाहर
बड़े घट मनान्दे
मनाणा क्या तन्जे टैम ई नियाँ किसिगे
फसलां बी हुण बड़ी घट बाहन्दे
पुन्या कने दूजी रा चंद्रमा देखी लयो
पत्थर चौथ भी कने कने ई आई
चौथी रा चंद्रमा बिल्कुल नी देखणा
सैरा री तुहांजो बौहत बौहत बधाई
- रवींद्र कुमार शर्मा
स्याल़े री हुई गई शुरुआत
आई गई सैर फसल हुई गी त्यार
अपणियाँ दराटियाँ चंडाई लवा करी लवा तेज
बडणे जो नी हुण करा इन्तज़ार
गर्मी बी घटी गई
बरखां बी चकोई गईयाँ
धान घाह बडणे जो कने
छल्लियां खोटणे जो रई गईयाँ
कई जगह मेले लगदे
लोक लैंदे पूरी नंद
लदरौरा रे मेले जो जाणा जरूर
कम्म करी देणे सारे बन्द
काल़ा मिहना हुई गया खत्म
नवियाँ ब्याईरियाँ हुण सौरियाँ रे जाणे जो त्यार
शिवजिये बी जटां कठियाँ करी लई
अंदर हुई जाने किडू मकोडू
सैजे कदके आइरे थे बाहर
फसला रा बी अया बुरा हाल
छल्लियां पईरी लमी क्या करनी बडाई
कुछ पंछिंएँ बांदरें नी छड्डी
कुछ सुअरें दिति री मुकाई
सैरी जो नाई राती
घरें घरें जांदे थे
नवियाँ फसलां जो टोकरिया च
सजाई कने ल्यान्दे थे
लोग बी पहले सैरी जो बड़ा थे मनान्दे
खरे खरे बधिया पकवान थे बणान्दे
सैरी माता अग्गे बड़ा कुछ थे चढान्दे
सेवईयां भल्ले कने खीर थे खूब खाँदे
हुण लोग सैर तां क्या सारे त्वाहर
बड़े घट मनान्दे
मनाणा क्या तन्जे टैम ई नियाँ किसिगे
फसलां बी हुण बड़ी घट बाहन्दे
पुन्या कने दूजी रा चंद्रमा देखी लयो
पत्थर चौथ भी कने कने ई आई
चौथी रा चंद्रमा बिल्कुल नी देखणा
सैरा री तुहांजो बौहत बौहत बधाई
- रवींद्र कुमार शर्मा
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वो एहसास...अलग है
तुमसे मिलने की वो बात अलग है,
तुझे न पा सकने का एहसास अलग है।
रह गए कई ख़्वाब अभी भी अधूरे,
फिर तेरा वो हर पल का साथ...अलग है।
वो अधूरी बातें, वो ख़ामोश रातें,
फ़ासलों में भी होती रहीं मुलाक़ातें।
दुनिया की नज़रों में भले ही दूर हैं हम,
पर रूह से रूह का वो वास्ता है...अलग है।
चाहत की राहों में इम्तिहान बहुत हैं,
दिल को बहलाने के सामान बहुत हैं।
मगर जो सुकून बस तेरी यादों में मिलता है,
उस बेनाम से रिश्ते का वो एहसास..अलग है।
ना कोई वादा, ना कोई शिकायत,
फिर भी हर धड़कन में तेरी ही आहट।
जो नाम लेकर भी लबों पर न आए,
उस अनकहे प्यार की वो दास्ताँ...अलग है।
- सूरजमल AkS
तुमसे मिलने की वो बात अलग है,
तुझे न पा सकने का एहसास अलग है।
रह गए कई ख़्वाब अभी भी अधूरे,
फिर तेरा वो हर पल का साथ...अलग है।
वो अधूरी बातें, वो ख़ामोश रातें,
फ़ासलों में भी होती रहीं मुलाक़ातें।
दुनिया की नज़रों में भले ही दूर हैं हम,
पर रूह से रूह का वो वास्ता है...अलग है।
चाहत की राहों में इम्तिहान बहुत हैं,
दिल को बहलाने के सामान बहुत हैं।
मगर जो सुकून बस तेरी यादों में मिलता है,
उस बेनाम से रिश्ते का वो एहसास..अलग है।
ना कोई वादा, ना कोई शिकायत,
फिर भी हर धड़कन में तेरी ही आहट।
जो नाम लेकर भी लबों पर न आए,
उस अनकहे प्यार की वो दास्ताँ...अलग है।
- सूरजमल AkS
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शीशे की तरह क्यों टूट जाता है दिल,
ज़रा सी ठेस पे बिखर जाता है दिल,
भुला दे सारे ग़म तू ए दोस्त!
और पुष्प की तरह फिर से खिल,
लाखों ग़म छुपा रखे हैं इस दिल में हमने
बुक्के और गुलदस्तों की तरह सजा रखे हैं हमने,
ऊपर से हँसते हैं, अंदर से रोते हैं, आख़िर
क्या खूब ये चेहरे पर मुस्कान टिका रखी हैं हमने,
हँसने वालों के साथ हँसना सीख लिया है हमने
हज़ार यातनाएँ सह के, मुस्कुराना सीख लिया है हमने,
दिल तो करता था टूट कर बिखर जाएं,
पर खंडहरों में भी घर बनाना सीख लिया है हमने,
हमने कहाँ बुरा माना, लाख ज़ख्म देने वालों का,
हँस कर हर सितम सहा है हमने,
वो समझते रहे हम टूट जाएंगे
पर हर ज़ख्म को हुनर बना लिया है हमने,
भटक रहा था शीशा अपने ही गुरूर में,
काबू कर उसको चेहरा दिखाने के काबिल बनाया हमने,
वो समझता था खुद को बेमिसाल है,
आईना बना के उसे भी अदब सिखाया हमने,
दिल की तरह न टूट, ऐ शीशे!
कभी अपने गिरेबाँ में झाँक कर तो देख,
हर चेहरे में नज़र आते हो तुम,
पर खुद को भी कभी पहचान कर तो देख।
- बाबू राम धीमान
ज़रा सी ठेस पे बिखर जाता है दिल,
भुला दे सारे ग़म तू ए दोस्त!
और पुष्प की तरह फिर से खिल,
लाखों ग़म छुपा रखे हैं इस दिल में हमने
बुक्के और गुलदस्तों की तरह सजा रखे हैं हमने,
ऊपर से हँसते हैं, अंदर से रोते हैं, आख़िर
क्या खूब ये चेहरे पर मुस्कान टिका रखी हैं हमने,
हँसने वालों के साथ हँसना सीख लिया है हमने
हज़ार यातनाएँ सह के, मुस्कुराना सीख लिया है हमने,
दिल तो करता था टूट कर बिखर जाएं,
पर खंडहरों में भी घर बनाना सीख लिया है हमने,
हमने कहाँ बुरा माना, लाख ज़ख्म देने वालों का,
हँस कर हर सितम सहा है हमने,
वो समझते रहे हम टूट जाएंगे
पर हर ज़ख्म को हुनर बना लिया है हमने,
भटक रहा था शीशा अपने ही गुरूर में,
काबू कर उसको चेहरा दिखाने के काबिल बनाया हमने,
वो समझता था खुद को बेमिसाल है,
आईना बना के उसे भी अदब सिखाया हमने,
दिल की तरह न टूट, ऐ शीशे!
कभी अपने गिरेबाँ में झाँक कर तो देख,
हर चेहरे में नज़र आते हो तुम,
पर खुद को भी कभी पहचान कर तो देख।
- बाबू राम धीमान
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बड़ी चालाकी से
जिंदगी को कर
तहस-नहस रहे हैं।
छोड़कर
सांप को,
लकीर पर जमकर
कर बहस रहे हैं।
चालबाज
कितनी भी चालाकी से
भाग्य विधाता बन जाए,
मगर उसकी
चालाकी पर
भाग्य और विधाता
दोनों हँस रहे हैं।
- राधेश विकास
जिंदगी को कर
तहस-नहस रहे हैं।
छोड़कर
सांप को,
लकीर पर जमकर
कर बहस रहे हैं।
चालबाज
कितनी भी चालाकी से
भाग्य विधाता बन जाए,
मगर उसकी
चालाकी पर
भाग्य और विधाता
दोनों हँस रहे हैं।
- राधेश विकास
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रिश्तों की राख में
अब अपने कभी कभी बेगाने
से लगते है,
जो आग भड़क रही थी।जिन्हें हम
कहें गैर,वो बुझाने लगते है।
करते थे बातें मीठी मीठी,
वास्ता जो पड़ा हमसे,
नज़रे बचाने वो लगते हैं।
अब गैर ही हुए अपने,
ग़म में साथ अश्रु बहाने लगते है।
यहां बैल जोत रहे खेत,
फसल पर कुते हक
जमाने लगते है।
हम तो किनारे पर खड़े,
दरिया के
बाढ़ लाकर अपने हमें
डुबाने आते हैं।
शुक्र है, वही अपनों का
जो यह दिखाकर,
अपनी को असलियत,
और ग़ैरों की मुहब्बत
का फर्क बता जाते है।
- रोशन कुमार झा
अब अपने कभी कभी बेगाने
से लगते है,
जो आग भड़क रही थी।जिन्हें हम
कहें गैर,वो बुझाने लगते है।
करते थे बातें मीठी मीठी,
वास्ता जो पड़ा हमसे,
नज़रे बचाने वो लगते हैं।
अब गैर ही हुए अपने,
ग़म में साथ अश्रु बहाने लगते है।
यहां बैल जोत रहे खेत,
फसल पर कुते हक
जमाने लगते है।
हम तो किनारे पर खड़े,
दरिया के
बाढ़ लाकर अपने हमें
डुबाने आते हैं।
शुक्र है, वही अपनों का
जो यह दिखाकर,
अपनी को असलियत,
और ग़ैरों की मुहब्बत
का फर्क बता जाते है।
- रोशन कुमार झा
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