सांझ ढलने से पहले
तुम जल्दी आना,
सांझ ढलने से पहले
जब अंतर्मन में शंखनाद हो,
हवा की गति बढ़ने लगे
मन मंदिर में दीपक जले,
उसी पहर तुम चले आना...
क्योंकि ढलते ही सांझ,
मैं अकेली हो जाती हूं
जैसे खाली नदी,
भावनाओं के शोर में
अनगिनत लहरों के बीच
रह जाती है अकेली,
वैसे ही मैं भी रह जाती हूं अकेली।
तुम जल्दी आना...
रात के गहन होने से पहले ,
इस अंधेरे से मुझे डर लगता है
क्योंकि अंधेरे में
अपना ही साया डराता है।
मुझे प्रतीक्षा रहेगी कि तुम आओगे,
चिड़ियों के घोंसले में लौटने से पहले।
जब दिन थककर
मेरे कंधे पर रख देगा सिर,
जब तुम मुझे भी सहारा देना,
सुनना बातें मेरे दिल की
और फिर कुछ अपनी भी कहना।
मैं उस पल को संजोकर रख लूंगी आंखों में,
तुम जल्दी आना...
तुम आओगे तो मैं फिर से पूरी ही जाऊंगी,
मेरे शब्दों के मौन होने से पहले,
तुम चले आना,
इससे पहले कि मेरी आँखें
तुम्हारी राह देखना छोड़ दें
तुम जल्दी आना...
- मंजू सागर
*****
ग़ज़ल
बस हमसे रखना यारी।
छोड़ सभी दुनियादारी।
साथ ख़ुशी के थोड़ी सी,
ग़म से हो साझेदारी।
पलती है सबके दिल में,
यादें कुछ मीठी - खारी।
सब अपनाए जाते हैं ,
तौर - तरीके हितकारी।
मिलता है अवसर सबको,
जीवन में बारी - बारी।
परिणामों का हासिल है,
संधानों की तैयारी।
लोकतंत्र की चूक बनी,
नेताओं की अय्यारी ।
अपना मतलब निकला तो,
भूल गए बातें सारी।
- नवीन माथुर पंचोली
*****
नज़रों के धागे से
तुम्हें बाँध लूँ,
न शब्द हों, न शोर हो,
बस तुम्हें थाम लूँ।
इक टकटकी की शाम हो,
तेरा ही तो नाम हो,
कुछ न कहो, कुछ न सुनो,
बस ख़ामोशी का जाम हो।
मौन में जो बह गया,
वही दर्द तो रह गया,
तू सामने बैठा रहा,
और दिल सब कुछ कह गया।
- नरेंद्र मंघनानी
*****
जो बात करते थे मुँह में मुँह डाल के।
वह लोग आज बैठे हैं मुँह निकाल के।।
नजर मिलते ही नजर बचाने लगते हैं,
कितने रौबदार चेहरे हैं हर सवाल के।।
बड़ी हिकमत से बने थे सारे ताने बाने,
कितने कमजोर हैं धागे उनकी जाल के।।
जो एक बार लगाया हमने इंकलाब का नारा,
धुआँ धुआँ हो गए सारे लौ उनकी मशाल के।।
मजाल है कि ना को हाँ,हाँ को ना कह दे कोई,
जो सर हमने उठाया तो हवा निकल गई मजाल के।।
चार सौ बीस होता तो जमाना जान जाता विकास,
हर कोई नहीं जानता चार सौ बीस घाते तीन के मकड़जाल को।।
- राधेश विकास
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कर्म का मर्म
कर्ण से जाती पूछी गई,
कृष्ण को ग्वाला कहा गया।
सुदामा थे ब्राह्मण, फिर भी
क्यों जीवन भर खाली हाथ रहा?
जाति ने कब किसका मान बढ़ाया,
कर्म ने ही हर इंसान को आज़माया।
कृष्ण हों, कर्ण हों या सुदामा-
महानता ने कभी जाति नहीं बताया।
- रोशन कुमार झा
*****
विरह और शृंगार के अनुगामी दोहे
थम थम कर क्यों बज रही, पायल तेरी बोल।
झुमकी धरती पर मिली,राज जरा तू खोल।
छेड़ नहीं मुझको प्रिये,जाने तू सब बात।
पिया बसे परदेस हैं, डसती काली रात।
कंगन पहने हाथ में, राह निहारे रोज़।
पिया बिना फीका लगे, सिंदूरी यह ओज़।
काजल बहता नैन से, सावन की बौछार।
सूना-सूना घर लगे, रूठा सब शृंगार।
दर्पण देखूँ तो प्रिये, नैना दिखते लाल।
अधरों की लाली उड़ी, खिले न बिंदी भाल।
- सविता सिंह मीरा
*****
रूठा मत करो
रूठा मत करो तुम, बैचेनी सी होती है मुझे
कुछ भी शिकायत यदि मुझसे तो, कहने की छूट है तुझे
अपना ही हूँ मैं तेरा, समझा करो तुम मुझे
छोड़कर तुझे जीयेगे कैसे, समझाये कैसे तुझे ?
संग-संग चलने की किये है वादा, याद है मुझे
तुम भी वादा की हो संग मेरे, याद है न तुझे ?
फिर ये इस तरह से रूठना, अच्छा नहीं लगता मुझे
रूठा मत करो तुम, बैचेनी सी होती है मुझे।
मेरा तो सब कुछ तेरा ही, ये तो बताये है तुझे
तुम और मैं, एक ही है, यही कहती हो न मुझे
फिर ये अचानक रूठना, समझ ना आया मुझे
रूठा मत करो तुम, बैचेनी सी होती है मुझे।
चलो छोड़ो सब गिले शिकवे, गले लगा लो मुझे
हुए अनेक दिन गले लगे तुझसे, याद है ना तुझे
निकाल लो मन की बात, दिल में लगकर मुझसे
लेकिन रूठा मत करो तुम, बैचेनी सी होती है मुझे।
- चुन्नू साहा
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दिल है खिलौना
मयकदे की अय हँसीन साकी
मदिरा से भर दे मेरी खाली जाम
भूल जाऊँ मैं उस बेवफा की बेवफाई
शर्मसार किया है जो जग में हमें सरेआम
टुट गई भरोसे की वो मजबूत तार
दौलत को बना दिया प्यार का कारोबार
वो क्या समझेगी दिल की दिल से प्यार
जिसके लिये बना दिल एक खिलौना मेरे यार
दिग्भ्रमित हुआ सपनों का मेरा अरमान
ख्वाब में देखा था मोहब्बत का आसमान
मिला प्यार के नाम पे तन्हाई व अपमान
काश ! ना आता मेरे दर पे ये प्यार का तुफान
बेवफा के लिये दिल है खेलने की खिलौना
मोहब्बत से उनका नहीं है जग में कोई लेना देना
घरौंदां बना खेल खेल कर मिटा भूल जाना
आश निराश का है प्यार उनका एक घिनौना पैमाना
धोखा की नश्तर मेरे दिल में वो धीरे से चुभाई
दौलत के मद में करना था जिनको बेवफाई
जग में हुस्न के नाम है फकत और फकत हरजाई
दौलत वाले के लिये है प्यार सिर्फ एक शौक की कमाई
- उदय किशोर साह
*****
जो दिल में है, वही जुबां पर रखती हूँ,
नकाब ओढ़कर जीना मुझे आता नहीं।
भीड़ की गूँज में खुद को खो दूँ,
ऐसा समझौता मेरा ज़मीर चाहता नहीं।
रिश्ते कम ही सही, पर सच्चे हैं,
जहाँ भरोसा ही सबसे बड़ी दौलत है।
निभाती हूँ साथ पूरी ईमानदारी से,
क्योंकि अपनों की कद्र ही मेरी आदत है।
दुनिया क्या सोचती है, अब फर्क नहीं पड़ता,
मैं अपनी राह खुद चुनकर आई हूँ।
दूसरों की मर्जी से ढलने नहीं,
अपने स्वाभिमान से जीने आई हूँ।
- रेखा चंदेल
नकाब ओढ़कर जीना मुझे आता नहीं।
भीड़ की गूँज में खुद को खो दूँ,
ऐसा समझौता मेरा ज़मीर चाहता नहीं।
रिश्ते कम ही सही, पर सच्चे हैं,
जहाँ भरोसा ही सबसे बड़ी दौलत है।
निभाती हूँ साथ पूरी ईमानदारी से,
क्योंकि अपनों की कद्र ही मेरी आदत है।
दुनिया क्या सोचती है, अब फर्क नहीं पड़ता,
मैं अपनी राह खुद चुनकर आई हूँ।
दूसरों की मर्जी से ढलने नहीं,
अपने स्वाभिमान से जीने आई हूँ।
- रेखा चंदेल
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सम्मान
कुछ लोग आपके सम्मान के लायक ही नहीं होते
न ही हो सकते।
आप चाहे जितना भी सम्मान दे दो,
उन्हें सिर्फ चापडूसी ही समझ आती।
जो दूसरे को सम्मान दे ही नहीं सकते,
वो सम्मान की कीमत क्या ही जाने, क्या ही समझे!
पर अपमान करने वाले लोगों का,
कभी कोई सम्मान होता ही नहीं।
औधा का दम भरने वाले अक्सर भूल जाते है,
रावण का तो औचित्य रहा नहीं,
न कुबेर जी का अहम।
रावण का अहम को पहले शिवजी,
फिर राम जी ने तोड़ा।
जब कुबेर को अहंकार ने ग्रासा,
तो गणेश जी ने उनका भी दंभ तोड़ा।
और यहां लोग पद के अहंकार में,
दूसरे के गरिमा को हानि पहुंचा देते।
हिसाब रब सबसे लेता,
न किसका झूठा रुतबा रहता,
न किसका झूठा अहंकार बचता।
मेरे मन की बात।
- पूनम गूंजा
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शपथ है हिंदी में हिंदी की
शपथ है हिंदी में,हिंदी की
जो कुछ कहूॅंगा,सच्चे अंदाज़ में कहूॅंगा
मदिरापान करते हुए मेला लगाऊॅंगा
निषिद्धताओं पर भूरे-भूरे प्रवचन दूॅंगा
मनगढ़ंत कथाऍं गढूॅंगा,चाहे जितनी
झूठ और फ़रेब और कपट से छलछलाती
अजूबा हो जाऊॅंगा बेमतलब ही
चीज़ों के बदलूॅंगा नाम क्रमशः और पुनः
उत्तरोत्तर अफ़लातून कहलाऊॅंगा
कहूॅंगा बच्चों से बार-बार कहूॅंगा यही-यही
अपनी ज़ुबान,अपनी भाषा,अपने रौब में
बचाते हुए नज़रें,मातृभाषा में कहूॅंगा
सीखें बार-बार सीखें शपथ ले लें
अच्छी है हिंदी,सरल है,सच्ची है हिंदी
कमी है यही कि किसी काम की नहीं है
दो दुनिया में,दो रोटी,दो दाम की नहीं है
घर के घर में भी बदनाम ही रही है
बस पीटते रहो ढ़ोल,खोजते रहो पोल
और बोलते रहो मनमर्ज़ी के लंपट बोल
हिंदी इज़ ए वैरी फ़न्नी लेंग्वेज़
रद्दी भी अंग्रेज़ी की बिकती है महॅंगी
दोहराऊॅंगा,कमोबेश यही सब दोहराऊॅंगा
पादुकाऍं उठाई हैं,पादुकाऍं उठाऊॅंगा
यहाॅं-वहाॅं बनाऊॅंगा ख़ास वातावरण स्वैग
सर्कस हो जाऊॅंगा,जोकर कहलाऊॅंगा
शपथ है हिंदी में, हिंदी की।
- राजकुमार कुम्भज
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समर्पण
आने वाले बिखराव का घबराहट
भरा तनाव बना रहता है,
ठीक वैसे ही, जैसे किसी
अप्राकृतिक मौत की वजह।
जब वह अपने ऊपर उसकी ठुड्डी के
भारहीन बोझ को महसूस करता है।
तो उसे उस पथरीली
और बंद गली से निकलने की
ज़बरदस्त ज़रूरत महसूस होती है।
लेकिन बाहर निकलने का रास्ता कहाँ है ?
कहीं नहीं, कहीं नहीं, कहीं नहीं।
- निर्मल रॉय
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कलम
थामा है, ये जो कलम तुमने,
दिन को कोई रात लाख कहे,
तुम दिन को दिन लिखना।
जब सच के चेहरे पर
झूठ का मुखौटा चढ़े,
जब किसी की आँखों में
इंसाफ़ बुझने लगे,
तब उस अँधेरे के ख़िलाफ़
एक उजली लकीर लिखना।
कोई माँगे न्याय तुमसे,
किसी की उम्मीद
तुम्हारी मेज़ पर रखी हो,
स्याही को गवाही बनाना,
और शब्दों को तराज़ू करना।
शिक्षक हो तो
सिर्फ़ पाठ मत पढ़ाना,
मासूम आँखों में
एक रास्ता भी गढ़ना,
कलम की नोक से
बच्चों का भविष्य लिखना।
और अगर अधिकारी हो,
तो याद रखना-
हर फ़ाइल के पीछे
किसी का घर,
किसी की उम्मीद होती है।
किसी की हकमारी
अपने दस्तख़त से मत करना।
क्योंकि छोटी-सी ये कलम
बहुत कुछ लिखती है-
आज का फैसला,
कल का इतिहास,
और अंत में
तुम्हारी अपनी गवाही।
- रोशन कुमार झा
*****
एक सन्देश
भ्रमित हो रहे युवा हमारे
मौन खड़ी क्यों? सरकारें।
हक अधिकार मांगने पर
क्यों? दक्षिण पंथी ललकारें।
ललकार सहेंगे हम न अब
अधिकार हेतु रण निश्चित है।
हैं गांधी बाबा की संतानें
डर खौफ न मन में किंचित है।
डर दिखलाकर युवा शक्ति को
रोक नहीं तुम पाओगे।
या अधिकार दिलाओगे
या प्रभुत्व हीन हो जाओगे।
है धरा हिन्द कई मजहब की
सबका है सम्मान यहां।
माता सबकी की कुटिया में
है हिंसा का स्थान कहां।
जो देश अहिंसा का साधक
वहां हिंसा कब तक ठहरेगी।
है भोर की बेला होने वाली
आभा दिनकर की फैलेगी।
रहीम और रसखान ने जैसे
कृष्ण भक्ति का पान किया।
उन्हीं के वंशज को हमने
बोलो कैसा? सम्मान दिया।
बिखर रहे मोती जिनसे
माला अब भी बन जायेगी।
सर्व - धर्म सम भावों से
हर्षित माता हो जायेगी।
कहे "करुण" यह शब्द प्रेरणा
मां वाक् से मिलती हमको है।
हो संचार प्रेम का सब में
सलाह सखाओं तुमको है।
- करन सिंह "करुण"
*****
हिंदी कहाँ है ?
किस सितम की आ गया है सितंबर,
फिर हिंदी की याद आई है,
साल भर जो मौन रहे हम,
आज अचानक भाषा पर छाई है।
मंच सजे, भाषण हुए,
हिंदी पर खूब विचार हुए,
पर मंच से उतरते ही देखो
अंग्रेज़ी के व्यवहार हुए।
अभिवादन भी अंग्रेज़ी में,
गौरव हिंदी का गाते हैं,
हिंदी दिवस पर हिंदी की
कसम उठाकर भूल जाते हैं।
क्या भाषा भी कोई उत्सव है,
जो कैलेंडर पर मनाया जाए?
क्या मातृभाषा का सम्मान
सिर्फ़ एक दिन जताया जाए?
पतझड़ की तरह हिंदी को
ऋतुओं में मत बाँटिए,
जिस मिट्टी ने पहचान दी है
उसकी भाषा को मत छाँटिए।
सितंबर आए, जाए
पर हिंदी हर दिन बोलिए,
हिंदी को दिवस नहीं,
अपनी पहचान बनाकर रखिए।
- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'
*****
हिन्दी की शान निराली है,
अपने आप में मतवाली है।
संस्कृत संग लाड़ लड़ाती,
मधुर-मधुर रस बरसाती है।
सुंदर, सरल, सुगम और मीठी,
हर दिल को लगती है प्रीति।
ओजस्विता का संगम है,
हिन्दी में अद्भुत दमखम है।
आपस में मैत्री बढ़ाती है,
सबको अपना बनाती है।
साहित्य-साधना हिन्दी है,
कवियों की अभिमान हिन्दी है।
किसी भाषा से बैर नहीं,
सब भाषाओं से प्यार सही।
माँ शारदा की आराधना है,
भारत की सच्ची साधना है।
राष्ट्र के माथे की बिंदी है,
भारत की पहचान हिन्दी है।
हर दिशा में इसकी शान है,
भारत की हिन्दी ही जान है।
- गरिमा लखनवी
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आततायी का हुआ है अन्त
जग में कर ले तुँ खुद की मनमानी
पूरी होगी एक दिन तेरी भी कहानी
तेरी कृत्य देख रहा गगन से आफताब
तेरी कर्मों की होगी यमपुरी में हिसाब
हर नुक्कड़ पर बैठा मिल जाता है शैतान
हैवानियत की पथ चलकर बना है हैवान
गुण्डागर्दी जिनकी है बन चुकी पहचान
हद के पार बैठा है मवाली वो नादान
समाज में है इनकी अलग ही अपनी कहानी
मानवता शर्मसार है देख इनकी। करस्तानी
इन्सानियत की रोक दी गुरूर से ये रवानी
मुख पे बस गया अपशब्द निकलता जुवानी
आतताईयों से परेशान है शरीफ इन्सान
सर्वत्र जाल बिछाया है जहाँ तहाँ बेईमान
फिर भी क्यूँ मौन है देख कर ओ भगवान
सार्मर्थ्य पे क्यूं है जग के कुछ मेहरबान
पर मत भूल इतिहास सदैव है दुहराता
करनी का फल उपरवाला देकर दिखलाता
धर्मराज करता है सब का उत्तम उपचार
अन्त समय में होता है आतताईयों का संहार
- उदय किशोर साह
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शिक्षक
शिक्षक की महिमा अपार, अपरंपार।
शिक्षक देता ज्ञान,
अज्ञान अंधकार को करता दूर,
शिष्य के अंतस में भरता सद्गुणों,
दुर्गुणों को करता दूर,
अभिमान को करता चूर।
सम्मान बढ़ाता नित,
सच्चा पथ प्रदर्शक,
बन सही राह बतलाता,
आत्मनिर्भर बनाता,
चंदन सम जीवन महकाता,
पुष्प-सम सुगंध फैलाता।
अच्छे-बुरे का ज्ञान कराता।
कठिन मार्ग पर चलना सिखाता।
विषम परिस्थिति का सामना,
करना सीखता।
ऊंच-नीच,छोटे-बड़े का भेदभाव भुलाता,
नैतिक मूल्यों का विकास करता,
डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, नेता,
अभिनेता,फौजी बनाता।
तभी तो शिक्षक राष्ट्र निर्माता कहलाता,
सदाचार का पाठ पढ़ाता,
शिष्टाचार सिखलाता,
ईमानदारी सिखलाता।
- संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया
*****
है हिंदी यूँ हीन
बोल-तोल बदले सभी, बदली सबकी चाल।
परभाषा से देश का, हाल हुआ बेहाल॥
जल में रहकर ज्यों सदा, रहती प्यासी मीन।
होकर भाषा राज की, है हिंदी यूँ हीन॥
हिंदी मेरे देश की, पहली गूढ़ जुबान।
फ़र्ज़ सभी का है यही, इसका हो उत्थान॥
अपनी भाषा साधना, गूढ़ ज्ञान का सार।
खुद की भाषा से बने, निराकार साकार॥
हो जाते हैं हल सभी, यक्ष-प्रश्न तब मीत।
निज भाषा से जब जुड़ें, जागे अंतर-प्रीत॥
अपनी भाषा से करें, अपने ही आघात।
हिंदी के उत्थान की, अंग्रेज़ी में बात॥
हिंदी माँ का रूप है, ममता की पहचान।
हिंदी ने पैदा किए, तुलसी और रसखान॥
मन से चाहें हम अगर, भारत का उत्थान।
परभाषा को त्यागकर, बाँटें हिंदी ज्ञान॥
भाषा के बिन देश का, होता कब उत्थान।
बात पते की जो कहे, समझे वही सुजान॥
जिनकी भाषा है नहीं, उनका रुके विकास।
करती भाषा गैर की, हाथों-हाथ विनाश॥
- डॉ. सत्यवान सौरभ
*****
हिंदी हृदय गान है
आन-बान सब शान है, और हमारा गर्व।
हिंदी से ही पर्व है, हिंदी सौरभ सर्व।।
हिंदी हृदय गान है, मृदु गुणों की खान।
आखर-आखर प्रेम है, शब्द-शब्द है ज्ञान।।
बिंदिया भारत भाल की, हिंदी एक पहचान।
सैर कराती विश्व की, बने किताबी यान।।
प्रीत प्रेम की भूमि है, हिंदी निज अभिमान।
मिला कहाँ किसको कहीं, बिन भाषा सम्मान।।
वन्दन, अभिनन्दन करे, ऐसा हो गुणगान।
ग्रंथन हिंदी का कर लो, तभी मिले सम्मान।।
हिंदी भाषा रस भरी, रखती अलग पहचान।
हिंदी वेद पुराण है, हिंदी हिन्दुस्तान।।
हिंदी का मैं दास हूँ, करूँ मैं इसकी बात।
हिंदी मेरे उर बसे, हिंदी हो जज्बात ।।
निज भाषा का धनी जो, वही सही धनवान।
अपनी भाषा सीख कर, बनता व्यक्ति महान।।
मौसम बदले रंग ज़ब, तब बदले परिवेश।
हो हिंदीमय स्वयं जब, तभी बदलता देश।।
निज भाषा बिन ज्ञान का, होता कब उत्थान।
अपनी भाषा में रचे, सौरभ छंद सुजान।।
एक दिवस में क्यों बंधे, हिन्दी का अभियान।
रचे बसे हर पल रहे, हिन्दी हिन्दुस्तान।।
- डॉ. प्रियंका सौरभ
*****
हिंदी है माँ जैसी, मीठी मधुर,
बचपन का प्रारम्भ, दोनों ही माँ जैसी।
मातृभाषा है अत्यंत स्वर्णिम,
माँ की भावनाओं समान करुणिम।
इसके अक्षर कितने अनमोल,
इसके वर्ण कितने रंगीन।
जैसे माँ की गोद में स्नेह,
वैसे ही हिंदी में भावों का बंधन।
अलंकारों का सौंदर्य,
जैसे माँ के गहनों की चमक।
रूपक, उपमा, अनुप्रास,
सब मिलकर बनते माँ की मुस्कान।
माँ सिखाती है बोलना,
हिंदी सिखाती है समझना।
माँ देती है जीवन का पहला शब्द,
हिंदी देती है संस्कृति का पहला स्वर।
माँ और हिंदी दोनों का रखना मान,
इनसे ही है हमारा भारत महान।
- अंशिता त्रिपाठी
*****
विचार की भाषा है हिंदी!
जनमानस की भाषा है हिंदी
सर्वसमाज की भाषा है हिंदी
भाषा है ये पुरखों की
पुरनियों की भाषा है हिंदी
अपनेपन की भाषा है हिंदी
संस्कार की भाषा है हिंदी
विचार की भाषा है हिंदी
अधिकार की भाषा है हिंदी
सरोकार की भाषा है हिंदी
व्यवहार की भाषा है हिंदी
अनेकता में एकता की भाषा है हिंदी
समानता की भाषा है हिंदी।
- मनोज कौशल
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हिन्दी दिवस
हिन्दी दिवस जब जब है आया
खूब जश्न सबने है मनाया।
हिन्दी हमारी मातृभाषा, हिन्दी हमारी जननी
न जाने कैसे कैसे शब्दों से प्रसंशा सबने है करनी।
कोई इसकी बिंदी से खुश होता
तो कोई इसके राष्ट्र भाषा बनने के सपने देखता।
बस एक दिन ही हिस्से में आता
बाकि पूरा वर्ष कभी कभी याद नहीं किया जाता।
हिन्दी बोलने में भी शर्म जताते
कई स्थानों पर तो इसे वर्जित ही करवाते।
जिस देश की भाषा जन्मदात्री कहलाती
उसी में उपेक्षा का शिकार होती जाती।
कई वर्षों से सम्मान का रास्ता देख रही
पर इस मुट्ठी भर से कुंठित हो रही।
हिन्दी को मात्र दिवस तक मत रखो
जाल इतना फैलाओ कि चंहु ओर इसे ही देखो।
मां का सम्मान एक दिन से नहीं होता
इसके लिए पल पल संजोया है जाता।
राष्ट्र भाषा तभी बन पाएगी
जब यह देश के कोने कोने तक जाएगी।
जश्न मनाने से कुछ नहीं होने वाला
मजा तो तब आएगा
जब हर कोई होगा इसे अपनाने वाला।
- विनोद वर्मा
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हिंदी
भारत माता की बिंदु हिन्दी है
भारत देश की शान हिंदी है
बढ़ाता भाईचारे का भाव हिंदी है
एकता की शक्ति भाषा हिंदी है।
सरल भाषा होती है हिंदी
मधुर भाषा होती है हिंदी
संपर्क भाषा होती है हिंदी
राष्ट्र भाषा होती है हिंदी
सभी भाषा को मिलता झुलता हिंदी
सुबोध और सुमधुर भाषा होती हिंदी
यह भाषा की शक्ति बेमिसाल होती
जोड़ने वाली वैज्ञानिक भाषा हिंदी
- श्रीनिवास एन
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सिर्फ राजभाषा, राष्ट्रभाषा,
मातृभाषा, अतीत की
विरासत ही नहींभविष्य का
गौरव गान है हिंदी।
जब प्रेम की सुवास
विखेरता हृदय गगन में
तब बन जाती रसखान
की जुबान हिंदी।
भरती भाव मन में करती
काव्य कला भारती
के आंगन में उठती
हिलोर जन-जन में,
मनरंजन से मर्म तक पहुँचाती,
मिलाती माँ,मातृभूमि से
बनकर मातृभाषा सजाती
सदा भारत का अभिमान हिंदी।
- राधेश विकास
*****
सोशल मीडिया भी अब रिश्ते बिगाड़ने का
एक खामोश माध्यम बनता जा रहा है।
हम कुछ लिखते हैं…
कुछ पोस्ट करते हैं…
फिर बार-बार देखते हैं...
किसने देखा? किसने लाइक किया?
किसने कमेंट किया? किसने नहीं किया?
ग्रुप में किसने जवाब दिया और किसने अनदेखा कर दिया?
और यहीं से शुरू होती है हमारी अपनी बनाई हुई कहानी।
किसी ने पोस्ट देखी, लेकिन प्रतिक्रिया नहीं दी...
हमने मान लिया, उसे परवाह नहीं।
किसी ने कमेंट नहीं किया..
हमने समझ लिया, वह बदल गया है।
किसी ने हमारी पोस्ट पर ध्यान नहीं दिया..
हमने मन में फैसला कर लिया,
अब हमारे रिश्ते में पहले जैसी गर्माहट नहीं रही।
रिश्ते 'Seen', 'Like', 'Comment' और
'Reply' से नहीं चलते।
रिश्ते चलते हैं, विश्वास से, समझ से,
संवाद से और दिल में बसे अपनापन से।
सोशल मीडिया पर किसी की चुप्पी को
अपने रिश्ते के खिलाफ सबूत मत बनाइए।
रिश्ते स्क्रीन पर नहीं, दिल में पढ़े जाते हैं।
सोशल मीडिया को रिश्तों का आईना मत बनाइए,
वरना एक दिन आभासी दुनिया की छोटी-छोटी खामोशियाँ
हकीकत के खूबसूरत रिश्तों में बड़ी-बड़ी दरारें डाल देंगी।
रिश्ते प्रतिक्रिया से नहीं,
रिश्तों की सच्चाई से जिंदा रहते हैं।
- नरेंद्र मंघनानी
*****
संस्कृत है जिसकी जननी,
ऐसी संस्कारी है भाषा हिंदी।
माथे पर सदा ही सजती बिन्दी,
मीठे बोल से सबको लुभाती हिंदी।
शुद्धता की पहचान हमारी हिंदी,
हिंद देश का परिचय हमारी हिंदी।
नदी सी चंचल तो कभी शांत बहती,
हर मुख की सरस भाषा हिंदी कहती।
युग युगांतर से जानी जाती है हिंदी,
महापुरुषों की जुबानी यही है हिंदी।
उच्च संस्कारों से जानी जाती हिंदी,
सन्मार्ग पर ले जाती ये भाषा हिंदी।
सबका मान सम्मान है हिंदी,
राष्ट्र का अभिमान है हिंदी।
अंग्रेज़ी आज हावी हो रही भाषा,
बदल रही हिंदी की आज परिभाषा।
हिंदी को बचाना हम सबका है फ़र्ज़,
दो सम्मान,अपनाओ हिंदी यही अर्ज़।
- कांता शर्मा
ऐसी संस्कारी है भाषा हिंदी।
माथे पर सदा ही सजती बिन्दी,
मीठे बोल से सबको लुभाती हिंदी।
शुद्धता की पहचान हमारी हिंदी,
हिंद देश का परिचय हमारी हिंदी।
नदी सी चंचल तो कभी शांत बहती,
हर मुख की सरस भाषा हिंदी कहती।
युग युगांतर से जानी जाती है हिंदी,
महापुरुषों की जुबानी यही है हिंदी।
उच्च संस्कारों से जानी जाती हिंदी,
सन्मार्ग पर ले जाती ये भाषा हिंदी।
सबका मान सम्मान है हिंदी,
राष्ट्र का अभिमान है हिंदी।
अंग्रेज़ी आज हावी हो रही भाषा,
बदल रही हिंदी की आज परिभाषा।
हिंदी को बचाना हम सबका है फ़र्ज़,
दो सम्मान,अपनाओ हिंदी यही अर्ज़।
- कांता शर्मा
*****
हिन्दी सम्मान की भाषा
हिन्दी अभिमान की भाषा।
मिले सम्मान जन - जन का
हिन्द की है यही आशा।
खरे उतरेंगे आशा पर
प्रेम भाषा को लायेंगे।
वतन नव जागरित अब है
भाषा हिन्दी पढ़ायेंगे।
जिसे मां ने सिखाया है
उसे फिर क्यों? भगाया है।
विचारों में रमी हिन्दी
ये पुरखों ने बताया है।
मुल्क भारत अनोखा जग में
जहां परि - भाषा हावी है।
हिन्दी में वाद न करना
मानों खुद की नवाबी है।
नवाबी झूठी है यारों
जिसे मिलकर हटायेंगे।
करेंगे प्रश्न सत्ता से
विजयी होकर के आयेंगे।
जर्मनी चीन से सीखें
अहमियत भाषा की अपनी।
"करुण" अब देता नारा है
जाग जाओ सनातनी।
- करन सिंह "करुण"
हिन्दी अभिमान की भाषा।
मिले सम्मान जन - जन का
हिन्द की है यही आशा।
खरे उतरेंगे आशा पर
प्रेम भाषा को लायेंगे।
वतन नव जागरित अब है
भाषा हिन्दी पढ़ायेंगे।
जिसे मां ने सिखाया है
उसे फिर क्यों? भगाया है।
विचारों में रमी हिन्दी
ये पुरखों ने बताया है।
मुल्क भारत अनोखा जग में
जहां परि - भाषा हावी है।
हिन्दी में वाद न करना
मानों खुद की नवाबी है।
नवाबी झूठी है यारों
जिसे मिलकर हटायेंगे।
करेंगे प्रश्न सत्ता से
विजयी होकर के आयेंगे।
जर्मनी चीन से सीखें
अहमियत भाषा की अपनी।
"करुण" अब देता नारा है
जाग जाओ सनातनी।
- करन सिंह "करुण"
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हमारी हिंदी
हिंदी हमारी प्यारी है,
सब भाषाओं में न्यारी है,
हमारी जुबान की बिंदी है,
यह सुंदरता हमारी है।
'अ' से अनपढ़ से शुरू होती है,
'ज्ञ' से ज्ञानी पे खत्म होती है,
रस, छंद, अलंकारों से भरपूर,
ऐसी हमारी हिंदी होती है।
इतनी प्यारी मिठास घोले,
सब कोई सुने, सब कोई बोले,
संविधान सभा से जो हुंकार भरी,
आज बोलते हर गली और मोहल्ले।
हिंद की पहचान है हिंदी,
कलम का गुमान है हिंदी,
पूरे जगत में परचम है इसका,
भाषाओं की रानी है हिंदी।
- प्रणव राज
हिंदी हमारी प्यारी है,
सब भाषाओं में न्यारी है,
हमारी जुबान की बिंदी है,
यह सुंदरता हमारी है।
'अ' से अनपढ़ से शुरू होती है,
'ज्ञ' से ज्ञानी पे खत्म होती है,
रस, छंद, अलंकारों से भरपूर,
ऐसी हमारी हिंदी होती है।
इतनी प्यारी मिठास घोले,
सब कोई सुने, सब कोई बोले,
संविधान सभा से जो हुंकार भरी,
आज बोलते हर गली और मोहल्ले।
हिंद की पहचान है हिंदी,
कलम का गुमान है हिंदी,
पूरे जगत में परचम है इसका,
भाषाओं की रानी है हिंदी।
- प्रणव राज
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