सोशल मीडिया खोलते ही ऐसा महसूस होता है कि हर दूसरा व्यक्ति लेखक है। लेखक होना गलत नहीं है, मगर लेखक की अपनी एक गरिमा और मर्यादा भी होती है। साहित्य, समाज का दर्पण होता है। अगर हम अपने समाज की बुराइयों को अपने साहित्य के माध्यम से उजागर नहीं करते हैं, तो कही ना कही हम अपने साहित्य के प्रति ईमानदारी खो रहे होते है।
क्या पुस्तक प्रकाशित करने से कोई लेखक बन जाता है ? इस सवाल का जवाब देना बेहद चुनौतीपूर्ण है। मगर आज लोग अपनी पुस्तक प्रकाशित कर खुद को लेखक कहने लगे हैं। भले ही उस पुस्तक को लिखने में AI माता का प्रयोग किया गया हो। प्रकाशकों की बाढ़ सी आ गई है, हर दिन हजारों पुस्तक प्रकाशित हो रहे हैं। फिर सवाल मन में उठता है- क्या इतने पाठक हैं ?
कभी-कभी मैं मन ही मन सोचता हूं कि कही लोगों ने खुद को लेखक साबित करने को एक सामाजिक दिखावा तो नहीं बना लिया है! मैं यह इसलिए कह रहा हूं क्योंकि आजकल के तथाकथित लेखक पढ़ते कम है और लिखने ज्यादा है, जबकि बतौर लेखक अध्ययन करना सबसे बड़ी पूंजी है। एक बात कही जाती कि लगातार अध्ययन करने से ही एक लेखक परिपक्व बनता है। दूसरा सोशल मीडिया के माध्यम से दूसरों की रचनाओं को चोरी कर और थोड़ी काट-छांट करके अपने नाम से प्रकाशित करने वाले लोग भी लेखक बनकर घूम रहे हैं।
वही कुछ लोग हिंदी साहित्य को हिंदू धर्म या हिंदुत्व से जोड़ने की कोशिश भी कर रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि हिंदी और उर्दू भाषा का जन्म भारत में ही हुआ है। हिंदी भाषा बिना उर्दू और फारसी के बिना अधूरी है। और कुछ तथाकथित स्वघोषित लेखक हिंदी को भारत की मातृभाषा बोलकर दूसरों पर थोपने की कोशिश करते हैं, जबकि हिंदी किसी भी राज्य की मातृभाषा नहीं है। भारत के अधिकांश राज्यों में मातृभाषा वहां की स्थानीय बोलियां रही है, हां! हिंदी धीरे-धीरे स्थानीय बोलियों को खत्म कर उनका स्थान लेने की कोशिश कर रही है।
मुझे लगता है कि बतौर लेखक हमें सभी बोलियों और भाषाओं का सम्मान करना चाहिए। हां! भारत में हिंदी भाषा को बोलने वालों की जनसंख्या ज्यादा है, मगर जो लोग हिंदी नहीं बोल पाते हैं, हमें हिंदी उन लोगों पर थोपने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। भाषा के कारण ही बांग्लादेश, पाकिस्तान से अलग हुआ था। इसलिए हमें अपने देश की सभी भाषाओं को समान दृष्टिकोण से देखना चाहिए।
- दीपक कोहली

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