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08 August 2025

राखी का त्यौहार

मेरा बचपन बहुत ही शानदार बीता एक बड़े भाई और एक छोटा और दो बड़ी बहनों की छोटी बहन का दर्ज़ा मिला था। बचपन से ही बहुत होशियार और तेज थी सबकी चहेती भी थी।

          जब भी कोई त्यौहार आता बहुत ही उत्साहित हो जाती थी खासकर जब भी राखी का त्यौहार आता भाई को राखियां भेज देती तब चिट्ठी पत्री का दौर चलता था।

         भाई आर्मी में दूर-दूर पोस्टिंग होने के बाद भी हम बहनों को पैसे भेजने में कभी देरी नहीं करता था।

       हमारे पैसे टाइम पर आ जाते उस जमाने में 20 रुपए की बहुत ज्यादा वैल्यू थी तो भाई हम तीन बहनों और  ताऊ जी चाचा जी की बेटियों को भी पैसे भेजना नहीं भूलता था।

           हम लोग राखी के पैसे पाकर बहुत खुश होते थे और भाई की लंबी दुआ की कामनाएं करते थे क्योंकि हम अपने भाइयों से बहुत प्यार करते है आज भी।

प्रतिकात्मक छायाचित्र



            बचपन के वो दिन भुलाए नहीं भूलते है क्योंकि हमारे लिए हर दिन किसी त्यौहार से कम नहीं होते थे। आज भाई बहन सब अपने अपने परिवार के साथ बहुत व्यस्त हो गए है।

       मैं सबसे छोटी होने के बहुत फायदे में रहती हूं क्योंकि बहमें भी मुझे किसी बच्चे से कम नहीं समझती और आज भी वह मुझे पैसे आदि देती है बिल्कुल अपने बच्चों की तरह ही मानती हैं।

     आज भी राखी का त्यौहार आता है और भाइयों के लिए हमेशा ही ईश्वर से प्रार्थना करती हूं भाई कुछ भी दे या न दें प्रार्थना हमेशा करती रहूंगी।

            राखी हमारे भारत वर्ष का खाश त्यौहार है जो वर्षों से निरंतर चल रहा है और हमेशा निरंतर चलता रहेगा। भाई और बहनों का प्रेम का प्रतीक के रूप में।


                              - सुमन डोभाल काला, देहरादून, उत्तराखंड



रक्षाबंधन: बचपन की रेशमी यादें

रक्षाबंधन का नाम लेते ही बचपन की वो सुनहरी तस्वीरें आँखों में तैरने लगती हैं। मैं घर की सबसे छोटी थी– दो बड़ी बहनों में। भाईयो के नाम पर चाचा,ताऊ के बेटे थे, जो दूर रहते थे। त्योहार आते ही मन में उत्साह की लहर दौड़ जाती।



प्रतिकात्मक छायाचित्र




राखी से पहले ही भाईयों के लिए सुंदर सी राखी अपने छोटे - छोटे हाथों से बनाती और टीके के समान के साथ चिट्ठी भेजती, और दूर  रहने वाले भाई हर साल समय पर मनीऑर्डर भेज देते। उस समय के 50 रुपए भी ख़ुशियों का सागर लगते थे। जो भाईयों ने भी अपने पिताजी से लेकर दिए होते थे।

हम बहनें उन पैसों से चूड़ियाँ, रिबन और मिठाइयाँ खरीदकर भाई की लंबी उम्र की कामना करती थीं। आज सब अपने परिवारों में व्यस्त हैं, फिर भी राखी आते ही दिल वही बचपन ढूंढ़ता है। अब भी सभी मुझे बच्चों की तरह दुलारते हैं, कुछ न कुछ देती हैं।

राखी सिर्फ़ एक धागा नहीं, बल्कि उस रिश्ते का प्रतीक है, जो जीवन भर बिना शर्त प्रेम से बंधा रहता है।


                                      -  डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति' 





रक्षाबंधनः मेरा बचपन

मेरा बचपन गांव में गुज़रा है, अतः वह मोहक यादें, वह निश्छलता, वह चंचलता,वह स्वतंत्रता, शहरों में कहां।

आज भी उन दिनों की सुनहरी यादें दिलो दिमाग को ताजा तरीन कर देती है।
उन दिनों न पढाई का भारी बोझ था न ही बस्तों का, हां बड़े बड़े तख्त नुमा स्लेट होते थे जिसमें कोयला लगाकर चमकदार करना भी कोई पर्व से कम न था, मेरे पिताजी स्टेशन मास्टर थे।


इसलिए उनका तबादला रुरल एरिया या यों कहिए गांव में होता रहता था जिसका नाम कौवापुर, पचपेड़वा, तुलसी पुर, भवानी पुर आदि होते थे, शुरूआत की पढ़ाई मेरा गांव के स्कूलों में ही हुआ था। 

दिन भर धमा चौकड़ी करना, बागों में घूमना, तालाबों से कमल के फूल तोड़ कर उसका माला बनाकर गले में पहनना, छुपा छुपी, गोटी, कबड्डी,आदि खेल थे उस समय के, साथ ही साथ गुड़िया खेलना, गुड़िया की शादी रचाना,घर से खटाई चुरा कर लाना सखियों एवं दोस्तों के साथ मिलकर खाना आदि बातें क्या भूलें से भूलती है ?


प्रतिकात्मक छायाचित्र



मैं मां-बाप की एकलौती लड़की थी, अतः रक्षा बंधन का त्योहार सब मेरे यहां आकर मनाते थे,हमलोग मिलकर रेशमी धागों से खुद ही राखी बनाते थे, मिठाई वगैरा की दुकान तो होती नहीं थी अतः घर पर ही मालपूए, शक्कर पारा आदि बनाया जाता था। मेरी ही मां क्यों सभी बच्चों की मां इस काम में हमलोगों की हाथ बंटाती थी।

मुझे यह अनुभव ही नहीं होता था कि मेरा कोई भाई नहीं है गांव के सभी लड़के भाई एवं गांव के सभी लड़कियां एक दूसरे की बहन भाई बन जाती थी। इसी भावना से प्रेरित होकर मैंने एक कविता लिखी थी जो आज साझा करना चाह रही हूं।

रक्त संबंध नहीं है फिर भी 
हार्दिक संबध पावन है।

इस संबंध में बंधा हुआ,
जग का सारा जन जीवन हैं।

मै कैसे कह दूं सखी,
कुछ लोग यहां अनजाने है।

मुझे तो लगते सभी यहां 
जैसे जाने पहचाने हैं।


केवल रक्षा बंधन ही क्यों हर त्यौहार सादगी से पर बड़े आत्मियता से मिलकर हम लोग मनाते थे।

गांव के पास थोड़ी दूरी पर जंगल भी था हम शैतान बच्चे कहां मानने वाले थे चल देते थे कभी कभी हम बच्चों की टोली,जंगल जलेबी खाने,केवांच तोड़ने, शहतूत खाने आदि क्या क्या शायद आज की पीढ़ी इन चीजों को जानती भी न होगी।

पांचवीं कक्षा तक मै गांव में ही रही फिर शहर आ गयी पढ़ने पर आज भी वह बचपन का दिन भुला नहीं हूं।

गर्मी की छुट्टियों में मै केवल गांव ही जाती थी। एमए करने के बाद मै गांव में अन्य बच्चों को पढाना, सिलाई कढ़ाई सिखाना, आदि का काम करती थी,मन को संतुष्टि मिलती थी।

लसोढे का अचार मुझे बहुत पसंद है अतः जब भी गांव जाती ले आती थी।अंत में मै यह कहना चाहुंगी कि यदि जीवन का वास्तविक आनंद लेना हो तो गांव से बेहतर कुछ नहीं।


                                          - रत्ना बापुली, लखनऊ, उत्तरप्रदेश



रक्षाबंधन पर मनमोहक कविताएँ- 2025





राखी के दो धागों में...
         

प्यार बहिन का रचा-पचा है राखी के दो धागों में। 
दुआ और आशीष गुंथा है राखी के दो धागों में।। 

कभी रूठना कभी मनाना, भाई-बहिन का आपस में। 
रिश्तों का संसार बसा है, राखी के दो धागों में ।। 

एक वचन 'रक्षा' का लेना, या देना है पर्व यही। 
रिश्तों का आधार मिला है, राखी के दो धागों में।। 

कहीं भटक न जाऊँ दीदी, कहता है छोटा भाई। 
मुझे नेह से बाँधे रखना, राखी के दो धागों में ।। 

इसे दिखावा मान न लेना, पर्व अनूठा है यह तो। 
सारा घर-संसार जुड़ा है, राखी के दो धागों में ।। 
                  

                                             - राजेन्द्र श्रीवास्तव



*****



राखी का ये प्यारा त्यौहार,
भाई-बहन के रिश्ते का उपहार।
नन्ही कलाई पर बंधी एक डोर,
भावनाओं से भरी, स्नेह का शोर।

हर बहन की आंखों में सपना,
भाई का साथ, न कोई अपना।
वचन है रक्षा का, प्रेम अपार,
सिर्फ धागा नहीं, है संस्कार।

मीठी-सी मुस्कान लिए बहना आई,
थाल सजाकर आरती लाई।
रोली, चावल, और मिठाई साथ,
बंधा है इसमें बचपन का हाथ।

भाई ने भी मुस्कुराकर कहा,
“तू ही तो है मेरा खुदा।”
तेरे आंचल की छांव में पलूं,
हर जनम में तुझको ही बहन बनाऊं।

राखी की इस रीत में है अपनापन,
दूरी भी हो, फिर भी है बंधन।
ना कोई छल, ना दिखावा है,
ये प्रेम तो बस भावना का बहाव है।

सावन की खुशबू, बारिश की फुहार,
हर दिल में बसता रक्षाबंधन का त्यौहार।
संस्कारों की ये सुनहरी थाली,
हर घर में लाए खुशहाली।

चलो मिलकर मनाएं ये पर्व,
रिश्तों को दें फिर एक गर्व।
हर राखी बने भाई की ढाल,
हर बहना बने उस पर मिशाल।


                                   - प्रियंका सौरभ


*****




राखी का मोल नहीं होता,
अनमोल प्यार की डोर है ये।
रिश्तों को जोड़े प्यार के बंधन में,
धागे ये प्यार के, अनमोल हैं ये।
राखी जब सजे कलाई पर,
बढ़ जाती शोभा रिश्तों की तब।
सद्भाव जुड़े ये धागों के,
सींचे ये रिश्तों, अहसासों को।
बचपन से लेकर बुढ़ापे तक,
यादों में संजोए रिश्तों को।
धागे की कच्ची डोर है ये,
नहीं इसका मोल लगा सकते,
अनमोल प्यार की डोर है ये।
भाई- बहन के रिश्ते को,
खींचें है अपनी ओर सदा,
और जोड़े ये पक्के धागों से।
राखी का मोल नहीं होता,
अनमोल प्यार की डोर है ये।
सजती है जब ये कलाई पर,
बनती है वादा रक्षा का,
बहन के प्यार का प्रतीक है ये,
होती है दुआ ,भाई के लिए।
नहीं कोई मिलावट इसमें है,
अनमोल प्रेम की डोर है ये।


- कंचन चौहान


*****

भैया आए न अटरिया  रामा, 
आए न अटरिया 
बीती जाए सावन  की बहार 
ओ हो आई  गैल राखी का त्यौहार।

मोरे अच्छे से साँवरिया 
ओहो प्यारे से सावॉरिया ,
लाओ भैया को आज बुलाए, 
ओहो आई गईलै राखी  का त्यौहार।

तरह तरह के धागा बुनकर,
राखी एक बनाया,
क,ई रंगों की मोती से उसको मैंने सजाया।
आज रोवत बाटे राखी का यह तार 
ओ हो....

मोर बोले, दादुर बोले, पपीहा करे पुकार, 
मोरे भैया अजहु न आए, हिया मे उठे हुंलार, 
देखो सूना पड़ा हमरे सब देहरी और द्वार।
ओ हो आई गईलै  राखी का त्यौहार।

सालन मे एक बार भाभी, आवत यह त्योहार, 
पूरा सावन  तुम मनाओ, एक दिन देवो उधार।
बदले मे हम तुमका देबै, अच्छा  सा उपहार
भाभी आए गईले राखी  का त्यौहार।


                                             - रत्ना बापुली



*****





किसी को पाकर, फिर उसे खो देना… 
बहुत मुश्किल होता है…

उस से मेरी मुलाक़ात कोई ज़्यादा पुरानी न थी, 
और बिल्कुल नई भी नहीं थी।
बस एक ताआरुफ़ हुआ था कुछ महीनों 
पहले कुछ गुफ़्तगू, कुछ सरसरी बातें,
लेकिन उस रोज़ की मुलाक़ात जैसे 
मेरे दिल में किसी नक़्श की तरह उतर गई थी।
उसकी आँखों में एक अजब सी गहराई थी –
जैसे ख़ामोश लफ़्ज़ों में छुपी हज़ार कहानियाँ हों...
वक़्त ने करवट बदली।
उन चंद लम्हों ने अपनी अहमियत दिखानी शुरू कर दी।
हमारी मुलाक़ातें होती रहीं,
बातें लंबी होती गईं, और ख़ामोशियाँ भी गुफ़्तगू का हिस्सा बनती गईं।
और इसी दरमियान मैं उसके क़रीब आता चला गया।
शुरूआत में सारा मामला महज़ एक ताज्जुब या झुकाव तक महदूद था।
लेकिन कब वो मेरे अहसासात पर क़ाबिज़ हो गई,
मुझे ख़ुद भी एहसास न हुआ।
मैं जो मुहब्बत को महज़ एक मज़्मून समझता था,
कभी दिल से यकीन न किया था,
मगर उसकी मुस्कान ने मेरी सोच ही बदल दी थी।
मेरी फिक्रें, मेरा अंदाज़, मेरी तबीयत,
सब पर उसका असर दिखाई देने लगा।
और मैं उसकी जादूगरी में गिरफ़्तार होता चला गया...
उसकी ख़ुश-बयानी में एक सादगी और पाकीज़गी थी।
उसकी निगाहें सच्चाई से लबरेज़,
लफ़्ज़ों में नर्मी और दिल में इनसानियत की झलक।
पर उन आँखों में कहीं कोई चुप सा 
छुपा दर्द भी मौजूद था,जिसे मैंने अक्सर महसूस किया था।
जो कभी कभी उसके बोलते लफ़्ज़ों के पीछे से झाँकता था।
एक दिन अचानक उसने मुझसे पूछा।
“क्या ख़्वाब देखना गुनाह है?”
मैंने बिना सोचे जवाब दिया:
"नहीं, ख़्वाब ही तो ज़िन्दगी को ख़ूबसूरत बनाते हैं।"
उसकी आँखें हल्के से भीग गईं।
उसने धीमे से कहा।
“किसी को पाकर, फिर उसे खो देना… 
बहुत मुश्किल होता है…”
उस पल मेरे लफ़्ज़ों ने जवाब देने से इनकार कर दिया।
दिल उफान मार रहा था,
लेकिन ज़बान ख़ामोश थी।
मैं बस देखता रहा...
जब मेरे हाथ उसकी तरफ़ बढ़ने लगे,
तो जैसे मेरे वजूद ने मुझे ज़ब्त का हुक्म दे दिया।
आख़िर कुछ पलों की ख़ामोशी के बाद
मेरे होंठ हिले,
तो सिर्फ़ उसका नाम निकला…
उसके लिए दिल में इतने जज़्बात थे
कि लगता था लफ़्ज़ कम पड़ जाएंगे।
मैं कहना चाहता था,
कि मेरी दुनिया अब उसी से शुरू होती है,
लेकिन  वक़्त की नज़ाकत  ने मुझे ख़ामोशी का लिबास ओढ़ा दिया।
मुझे मालूम था
वो एक शादीशुद खातून है…
किसी की अमानत।
पर फिर भी न जाने क्यों
वो मेरे दिल से निकलने का नाम न ले रही थी।
मैं उसकी अनजानी तकलीफ़ को जाना चाहता था,
उस तकलीफ़ के पीछे छुपे सारे राज़ खोल देना चाहता था।
हर दीवार को गिरा कर
उससे बस एक बार साफ़-साफ़ पूछना चाहता था,
"तुम्हारे दिल में क्या है?"
मगर दिल के अंदर एक और आवाज़ आई,
“तू ही तो दीवार है।”
मैं चौंका: “नहीं, ये ग़लत है… मैं कोई दीवार नहीं हूं!”
इसी उधेड़बुन में था कि
मोबाईल पर मेसेज का नोटिफ़ीकेशन आया।
बेमन से मोबाइल उठाया…
तो देखा- उसका मैसेज था,
“सुनिए… क्या हो रहा है?
मैं कल आपको अपने मम्मी-पापा के घर मिलूंगी।
क्यूँकि राखी का दिन है और मैं मायके जा रही हूँ।
आपका इंतज़ार करूंगी
अगर नहीं आए तो मैं नाराज़ हो जाऊंगी।”
अब दिल की दुनिया फिर उलझ गई…
राखी के दिन की तलब थी...
किंतु एक अजीब सी बेचैनी भी।
रक्षाबंधन आने को था,
और दिल के समुन्दर में लहरें उठ रहीं थीं।
क्या रिश्ता है ये...?
दिल कुछ और चाहता है,
मगर हालात कुछ और दिखा रहे हैं।
आख़िरकार वो दिन आ ही गया।
मैंने खुद को तैयार किया –
कई बार आइने में अपना अक्स देखा,
कपड़े बदले, बाल संवारे,
ख़ुद को किसी मिलने जा रहे आशिक़ से 
कम महसूस नहीं कर रहा था।
जब वहाँ पहुँचा,
बहुत अपनापन महसूस हुआ –
जैसे सारा घर मेरे ही इंतेज़ार में था।
सबने हँसते मुस्कुराते स्वागत किया,
सब साथ बैठे, कुछ आपसी ताआरुफ़ हुआ,
गुफ़्तगू के सिलसिले में मैंने देखा कि दीवारों पर कई तस्वीरें टंगी थीं।
सहसा मेरी नज़र एक ऐसी तस्वीर पर पड़ी
जो बिल्कुल मेरी तरह थी… हूबहू!
मैं दंग रह गया-
लेकिन उस तस्वीर के नीचे लिखा था:
"स्वर्गीय..."
मेरा वजूद मुझे ज़ख्मी सा लगने लगा।
क्या मैं...?
नहीं... ये मुमकिन नहीं!
वो फ़ौरन मेरा चेहरा पढ़ गई।
नर्मी से बोली,
“आप घबराइए नहीं।
ये आपकी तस्वीर नहीं है...
ये मेरे भैया हैं...
जो बरसों पहले इस दुनिया से रुख़सत हो गए थे…
जब मैंने आपको पहली बार देखा,
तो लगा- मेरे भैया लौट आए हैं…”
 सहसा मेरी आंखें भी भर आईं।
मैं जिसे महबूब समझ कर आया था,
वो मुझे दिल से अपनाते हुए
एक बहन बन गई।
फिर उसने धीरे से मेरे हाथ में राखी बाँध दी
और कहा,
“अब तो आप मेरे भैया हो ना?
कभी छोड़कर मत जाना।”
उस पल सारी मोहब्बत,
सारा एहसास,
एक मुक़द्दस रिश्ते में ढल गया था।
मुझे समझ आया-
इश्क़ महज़ पाने का नाम नहीं होता,
कई बार ये छोड़ने,
और रिश्तों की हद में रह जाने का नाम होता है।

 
                              - डॉ. मुश्ताक़ अहमद



*****





सीमा पर तैनात सैनिकों की छायाचित्र पर रचनाकारों की समर्पित पंक्तियाँ














































कविता- एक धागे का उत्तर






कलाईयों से परे, चेतना तक ले जाने वाला उत्सव

रक्षाबंधन...
एक ऐसा पर्व जिसे हमने बचपन से जाना है-
जहां बहन, रेशमी धागे में सुरक्षा का वचन बाँधती है,
मिठाइयों में मिठास होती है,
और कलाई पर विश्वास का भार।

पर यह “रक्षा” किसकी होती है ?
किसके लिए होती है ?

अब भी कुछ लोग इन प्रश्नों में उलझे रहते हैं-
"एक ही बेटी है? तो क्या भाई नहीं?"
या- "सिर्फ बहनें हैं ? तो रक्षाबंधन कैसा ?"

और यदि कोई एकमात्र संतान हो-
तो उसकी परवरिश अधूरी मानी जाती है,
उसके बचपन को जैसे कोई कमी महसूस होती है।

“अरे! अकेली है? किसे राखी बाँधती है ?”
“भाई नहीं है? तो त्योहार का क्या अर्थ?”

यही तो सोच है-
जिसके लिए 'पूर्ण परिवार' में
एक बेटा होना अनिवार्य है,
और दो संतानें अनिवार्यता की परिभाषा।

पर कोई यह क्यों नहीं पूछता-
कि उस बेटी ने कभी किसी भाई की कमी महसूस भी की थी?
क्या वह सचमुच अकेली थी? या फिर पूर्ण, अपनी संपूर्णता में?

समाज उसकी चुप संतुष्टि को सुनने के स्थान पर
अपने मापदंडों के तराजू से उसका आकलन करता है।

क्योंकि यह समाज अब भी
बेटों को सिंहासन सौंपता है,
और बेटियों को अपेक्षाओं की बेड़ियाँ।

किन्तु समय बदल चुका है।

अब वे बेटियाँ हैं-
जो माँ की दवाओं की ज़िम्मेदारी उठाती हैं,
पिता की पेंशन समझती हैं,
बहनों के लिए दीवार बनकर खड़ी होती हैं,
और स्वयं के लिए-
एक अभेद्य दुर्ग बन चुकी हैं।

उन्हें अब किसी कलाई की प्रतीक्षा नहीं,
क्योंकि उन्होंने अपने ही हाथों को अपनी शक्ति बना लिया है।
अब राखी एकतरफ़ा भाव नहीं है।
अब यह बाँधी जाती है-
उन सब तक, जो साथ निभाते हैं,
जो मौन में भी रक्षा का आश्वासन बनते हैं,
जिन्हें ‘रिश्ते’ की नहीं, ‘समझ’ की परिभाषा आती है।

कभी वह माँ होती है-
जो हर आघात पर मौन मरहम बन जाती है,
कभी एक सखी-
जो तुम्हारी आँखों की नमी पढ़ लेती है,
और कभी- स्वयं तुम ही।

इसलिए अब जब कोई पूछे-
"किसे राखी बाँधती हो?"
तो उत्तर मौन नहीं होता।

उत्तर होता है-

"उसे, जो मेरे जीवन में संतुलन लाता है।
जो मुझे बाँधता नहीं, समझता है।
जो किसी तूफ़ान में
मेरी ढाल बनकर खड़ा होता है-
भले ही उसका कोई नामित संबंध हो या नहीं।"

क्योंकि कभी-कभी राखी
रिश्तों की सीमाओं से परे होती है।
वह एक विचार है,
एक प्रतीक-
कि “रक्षा” केवल एक वचन नहीं,
बल्कि प्रतिदिन जिया गया प्रेम, आस्था और साथ है

आज बेटियाँ घर ही नहीं, देश संभाल रही हैं।
सिर्फ राखियाँ नहीं बाँध रहीं,
रक्षा कर रही हैं-
परिवार की, मूल्यों की, और आत्म-सम्मान की।

पर कुछ सोचें अब भी बीते युगों में अटकी हैं-
"बेटा तो होना चाहिए",
"एक से कुछ नहीं होता",
"दो बच्चे ज़रूरी हैं"-
जैसे अधूरी परिभाषाओं में उलझी।

उन्हें कहना चाहिए-
कि संसार दो बच्चों की सीमा से कहीं व्यापक है।
रिश्ते केवल रक्त से नहीं, संवेदना से बनते हैं।
और "बेटी" कोई अधूरा वाक्य नहीं,
वह स्वयं एक संपूर्ण कविता है।

"राखी अब परंपरा नहीं-
एक पुनर्परिभाषा है।
जहाँ सुरक्षा का अर्थ लिंग से नहीं,
संवेदनशीलता और सम्मान से जन्म लेता है।"


                                        - शैली मिश्रा, पीएचडी अध्यनरत




06 August 2025

रक्षाबंधन पत्र- 2025






आदरणीया बड़ी बहन जी को स्नेहवन्दन,

बहुत दिन हुए आपसे मिले हुए, लेकिन आपके द्वारा नियमित फोन करना मेरे प्रति आपकी फिक्र को दर्शाता है। आपने हमेशा से ही मुझे लाड़-दुलार किया है। उम्मीद है कि आपका स्नेह जीवनभर यूँ ही मिलता रहेगा। 

जल्द ही हम दोनों का पसंदीदा त्योहार रक्षाबंधन आ रहा है, जिसके लिए मेरे मन में अभी से बहुत उत्साह है। आप जब भी मेरी कलाई पर प्रेम से राखी बाँधती हैं तो उसमें आपकी ममता और समर्पण नज़र आता है। सच बताऊं तो मुझे बेहद ख़ुशी की अनुभूति प्राप्त होती है। एक दूसरे से दूर होते हुए भी यह पावन पर्व हमें रिश्ते की मजबूत डोर से बाँधे रखता है।

प्रत्येक वर्ष की तरह इस बार भी मैं इस महान पर्व पर आपके आशीष का आकांक्षी रहूँगा। मैं भी सदैव आपकी रक्षा करने का प्रण लेता हूँ और आपके उत्तम स्वास्थ्य व अनगिनत ख़ुशियों की कामना करता हूँ।


आपका दर्शनाभिलाषी 
आपका छोटा व लाडला भाई

- आनन्द कुमार



*****





मेरी प्रेरणास्त्रोत व प्यारी बहना,
आपको कोटि -कोटि नमन

             इस वर्ष का रक्षाबंधन आ गया है और आज मुझे लगभग पैंतीस-चालीस वर्ष पहले की रक्षाबंधन की  बात याद आ गई। सोचा आपको पत्र के माध्यम से याद करवाऊं तो ज्यादा आनंद की अनुभूति होगी। मैं दूसरी कक्षा का विद्यार्थी था, उम्र सात साल के आसपास थी। बरसात का मौसम और रक्षाबंधन पर्व का दिन था। आपके स्कूल में छुट्टियाँ होने के कारण आप मामा के घर चली गई थी। आपने मुझे राखी पहनाने को उस दिन घर आना था, लेकिन भारी बारिश के  कारण आप आ नहीं पा रही थी।

 खड्ड के ऊपर उस समय कोई पुल नहीं था, हालाँकि दो बहनें और भी थी लेकिन आप हम सबसे बड़ी थी तो आप सबकी प्यारी और सम्मानित थी। इसलिए सभी के लाख समझाने पर भी मैं नहीं माना था, कि दूसरी बहनों से ही राखी पहन लो। मैं इस बात पर अड़ा रहा कि छोटी बहनों से भी राखी तभी पहनूंगा जब बड़ी बहन पहले पहनाएंगी। शाम हो गई थी लेकिन मेरी कलाई पर राखी नहीं थी। किसी तरह पिता जी तीस पैंतीस किलोमीटर सड़क मार्ग से पता नहीं कैसे-कैसे मामा के घर पहुंचे थे। आपको लेकर रात को आये थे, तब जाकर मैंने तीनों बहनों से राखी बंधवाई थी।

            समय कितनी तेज गति से गुजर गया लेकिन वो याद आज भी ताज़ा है। भगवान आपको  खुश रखे। अब की राखी पर भी आपका इंतज़ार रहेगा।

सप्रेम,

आपका अनुज
धरम चंद धीमान

*****