साहित्य चक्र
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04 January 2026

लघुकथाः तसल्ली


शाम के तकरीबन 7 बज रहे थे। आज़ की पांचवीं पार्सल डिलीवरी कर तेज़ी से वापस स्टोर की ओर लौट रहा था। आमतौर पर शाम के इस वक्त लाल बिल्डिंग चौक और भालोटिया रोड पर भीड़ अपने शबाब पर होती है। लेकिन रोजाना ऐसे माहौल से गुज़रकर बाइक को सलीके से पार करने की हममें दक्षता आ गई है। सभी राइडर्स इस जगह को जल्दी से पार कर जाने पर खुद को विजयी महसूस करते हैं।





मैं भी लाल बिल्डिंग चौक पार कर विजयी मुस्कान के साथ आदित्यपुर-कांड्रा एक्सप्रेस वे पर चढ़ते ही एक उत्तेजना के साथ एक्सीलेटर को कसता चला गया। अभी केडिया चौक पार करने ही वाला था कि अचानक से मेरी नज़र उस छोटे से मासूम पिल्ले पर पड़ी जो डिवाइडर के बीच में खड़ा कभी इस ओर की सड़क तो कभी उस ओर की सड़क पर आधा कूदकर जाता, फिर तेज़ रफ़्तार गाड़ियों का रेला देखकर डर से वापस डिवाइडर पर चढ़ जाता।

मैं अपनी तेज़ रफ़्तार के कारण थोड़ा-सा आगे बढ़ चुका था लेकिन महज़ तीन-चार सेकेंड के भीतर जो मेरे मानस पटल पर कौंधा उसने मुझे बाइक रोकने पर मजबूर कर दिया। मुझे अपने मार्ग गुरू का वो कथन याद आ गया जिसमें कहा गया है कि पातक यानि पाप के तीन स्तर होते हैं। ऐसा काम जो नहीं करना चाहिए वो कर दिया।

उदाहरणार्थ किसी की हत्या करना,हाथ काट देना या चोरी करना आदि पातक की श्रेणी में आते हैं। दूसरे स्तर का पाप है अतिपातक! मतलब ऐसा काम जो करना चाहिए था और नहीं किया वह अतिपातक है। जैसे किसी जरूरतमंद या बेबस इंसान की मदद करनी चाहिए थी और मौके पर मौजूद रहकर भी नहीं किया तो यह अतिपातक है।

तीसरे स्तर का पाप ऐसे कार्य को कहा जाता है जो एक उदाहरण छोड़ जाता है। आने वाले समय में भी उससे लोग प्रेरित होकर उसकी युगों-युगों तक पुनरावृत्ति करते हैं।इसे कहा जाता है महापातक! उदाहरणार्थ रावण ने साधु के वेश में आकर सीता का हरण किया। यदि वह अपने असली रूप में आकर सीता का हरण करता तो यह केवल पातक होता।

लेकिन चूंकि उसने साधु के वेश में सीता का हरण किया तो उसने समाज में एक नया तरीका ईजाद कर दिया अपहरण का कि इस प्रकार वेश बदलकर भी अपहरण किया जा सकता है। जिसकी पुनरावृत्ति अपराधी लोग युगों-युगों तक करते आ रहे हैं।





खैर बाइक रोकने से पहले के करीब तीन-चार सेकेंड में मेरे दिमाग ने अहसास कर लिया था कि मैं क्या कर रहा हूं। उस मासूम से पिल्ले के लिए मेरे कुछ मिनट देना कर्तव्य है जिससे उसकी जान बच सकती है। वरना हो सकता है रोड पर सरपट दौड़ती गाड़ियां क्या पता उतनी संजीदगी न दिखाएं और उसे रौंदते हुए चले जाएं। शाय़द उसे मेरी ज़रूरत है और ऐसे में मैं नहीं रुका तो यह द्वितीय श्रेणी का पाप यानि अतिपातक हो जाएगा। और यूं भी यह मेरी पार्ट टाइम जॉब है, थोड़ा वक्त बर्बाद भी हो गया तो क्या ही हो जाएगा।

मैं बाइक खड़ी कर सीधे डिवाइडर पर जा पहुंचा। एक बार लगा कि पकड़ कर सीधे उसे सर्विस लेन के बाहर छोड़ आऊं। लेकिन वह बिल्कुल भी छोटा नहीं था इसलिए थोड़ा सा डर भी था कि कहीं काट न ले मुझे। मुझे अपनी ओर बढ़ता देख वह फ़िर से कभी सड़क पर तो कभी डिवाइडर पर भागदौड़ करने लगा। क़रीब दस मिनट तक मैं उससे कबड्डी-कबड्डी खेलकर परेशान हो चुका था। इस बीच मुझे देखकर एक फल बेचकर लौट रहे ठेले वाले ने भी अपना ठेला किनारे लगाकर मेरी मदद करने में जुट गया।






अब हम दो लोग मिलकर उसे एक्सप्रेस वे से बाहर ले जाने की कोशिश करने लगे। लेकिन मजाल है कि वो पिल्ला हमारे इरादे को समझ पाए। इस फेर में यह भी डर था कि हमें देखकर भागते हुए सचमुच किसी गाड़ी की चपेट में आ गया तो "रक्षा में हत्या" हो जाएगी।

क़रीब बीस -पच्चीस मिनट की आपाधापी के बाद वह मुख्य सड़क पर ही खड़ी एक कार के नीचे जाकर दुबक गया। परेशान ठेलेवाले ने हताश होकर मुझसे कहा- "जाने दीजिए भैया! इसको इसका काल खींच रहा है, हमलोग बचा नहीं पाएंगे। मुसीबत ये थी कि दोनों ओर आसपास कोई कटिंग भी नहीं थी जिससे वह पिल्ला मुख्य सड़क से सर्विस लेन पर जा सके। यानि उसे मुख्य सड़क पर ही लगभग आधा किलोमीटर ले जाने के बाद ही कटिंग थी। मैं भी कहां हार मानने वाला था।

उसे किसी तरह कार के नीचे से डांटकर बाहर निकाला। फिर ठेलेवाले की मदद से मुख्य सड़क के ही बिल्कुल किनारे-किनारे कैरी करते हुए उसे गम्हारिया प्रखंड कार्यालय के गेट तक ले गया। वहां से उसे तेज़ी से भगाते हुए कार्यालय कैंपस के काफी भीतर तक खदेड़कर आया। पूरे घटनाक्रम में कड़ाके की ठंड के बावजूद पसीना छूट गया था। लेकिन जब उसे खदेड़कर पैदल अपनी बाइक की ओर लौटने लगा तो हवाओं के साथ ठंड पड़ते पसीने के साथ ही दिल को भी ठंडक पहुंच रही थी। मन में एक तसल्ली थी कि उस पिल्ले की रक्षा का जो अवसर ईश्वर ने प्रदान किया उसे मैंने पूरा किया।






हमारे साथ दैनिक जीवन में न जाने कितने ही ऐसे मौके रोज़ाना आते हैं। कई बार हम उसे हल्के में लेते हुए नज़रंदाज़ कर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन आग्रह है सभी से कि कभी भी ऐसे मौकों को नज़रंदाज़ न करें। जहां आप सक्षम हों और संभव हो तो थोड़ा सा वक्त निकालकर जरूरतमंदों की मदद ज़रूर करें चाहे वो इंसान हों या पशु-पक्षी। दावा करता हूं कि इससे कोई प्रत्यक्ष लाभ तो नहीं होगा लेकिन मन को एक अलौकिक तसल्ली मिलेगी।


- कुणाल