कैसे भूल जाऊँ अपनी गाँव की पावन मिट्टी।
जेहन में कौंध रहा जिनकी यादें खट्टी मिठी॥
बचपन से सिखाया ना रोना सदा मस्कुराना।
शहर में आकर मैं बन गया सबका बेगाना॥
शुद्ध हवा शुद्ध पानी की नदी थी हमें प्यारी।
अमुवा के बगीचे में बीतता था वक्त हमारी॥
पहाड़ों से आती थी जब शेर की दहाड़।
सीने में धड़कता था बैरी जन का भी प्यार॥
बाग बगीचे हरी भरी वन व घर की गुलशन।
मेहमानों का भी मोह लेते थे उनके चित्तमन॥
कोयलिया काली काली की करूण पुकार।
याद आती है नित्य हमें घर व गाँव जवार॥
माता पिता का था घर में एकलौता दुलारा।
उनके लिये मैं था एक अनमोल ही सितारा॥
ये पत्थर के महल ये कंकरीट पथ अनजाना।
मजबूरी में भी नहीं होता इस शहर में जमाना॥
काश ! ये पापी पेट, जीवन में ना हमें रूलाता।
रोटी कमाने शहर हमें, कभी ना बुलाता॥
गाँव की पर्णकुटी था, स्वर्ग सा अपन नजारा।
सुकून देता था घर का टूटी खाट पे सारा॥
- उदय किशोर साह
*****
साथ सच का
जीवन में हमेशा सही के साथ चले हैं,
शायद तभी आज अकेले खड़े हैं।
हमें चाहिए ही नहीं
गलत लोगों का साथ,
क्योंकि कुछ रिश्ते सिर्फ़ दिखावे के होते हैं,
सामने अपनापन जताते हैं,
और पीछे से
आपकी जड़ें खोद जाते हैं।
हमने तो सच को ही अपना साथी माना है,
सच की राह को ही अपना रास्ता जाना है।
फिर भला दुनिया की भीड़ से
क्यों डरें हम,
जब सिर पर रब का हाथ है,
तो किस बात का संशय,
किस बात का डर है?
मन को उम्मीद के धागे से बाँध रखा है,
विश्वास की लौ को अब भी जला रखा है।
कर्म के पथ पर
निर्भय होकर कदम बढ़ाते हैं,
जो होगा, अच्छा ही होगा-
बस इसी विश्वास के साथ
यूँ ही चलते जाते हैं।
न किसी से शिकायत,
न किसी से होड़,
सच का साथ हो
तो अकेलापन भी
ईश्वर का दिया हुआ एक सुकून है।
क्योंकि भीड़ में खड़े होने से बेहतर है,
सच के साथ अकेले खड़ा होना।
- पूनम गूंजा
*****
क्या है मेरिट ?
मैं पूछता हूं!
एक व्यक्ति,
अपनी पीढ़ी का
पहला साक्षर है।
यानी उसके माता-पिता,
दादा-दादी अनपढ़ थे।
तथाकथित मेरिट के अनुसार!
जबकि वे कुशल कारीगर थे।
जिन्हें तुम आज!
सिविल इंजीनियर...
फैशन डिजाइनर...
हेयर डिजाइनर...
और वैज्ञानिक कहते हो।
जरा! अपने दादा-दादी से पूछो
कि तुम्हारा पुश्तैनी घर
किसने बनाया था ?
क्या घर बनाना,
मेरिट में नहीं आता ?
क्या विशाल मंदिर बनाना
मेरिट में नहीं आता ?
क्या चमड़ा उतार कर
जूते-चप्पल बनाना
मेरिट में नहीं आता ?
फिर! तुम्हारी मेरिट में
क्या आता है ? और
इस तथाकथित मेरिट का
आधार क्या है ?
ना बराबर संपत्ति...
ना बराबर व्यापार...
ना बराबर जमीन...
ना बराबर अधिकार...
कही तुम्हारी मेरिट,
जातिवादी तो नहीं है!
- दीपक कोहली
*****
हादसा हो जाऊं
तेरी नज़रों सी नज़र मैं कहां से लाऊं,
बेसबब क्यों मैं तुझ से ख़फ़ा हो जाऊं।
राबता मुझसे महफ़िल में नहीं था उसका,
बेहतर है खामोशी से अब मैं दफ़ा हो जाऊं।
मायूस जुस्तजू है दिल भी टूटने वाला,
सफ़ीना मेरा डूबे, मैं हादसा) हो जाऊं।
अफ़साना मेरा किसी अफ़साने में नहीं,
बहती रहे आंखें टूटा आइना हो जाऊं।
छेड़ते क्यों हैं बरसों पुराने मंज़र मुझको,
दीदार का यारब कोई तो बहाना हो जाऊं।
शर्मिंदा न कर तर्केतालुक़ करके मुश्ताक़,
मेरी तो यही तमन्ना के बस में तेरा हो जाऊं।
- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
*****
दरवाज़ा खुला रहने दो
दरवाज़ा खुला हो
तो ज़रूरी नहीं
आँधियाँ ही घर में आएँ,
कभी किसी सुबह की
सुनहरी धूप भी दस्तक देती है।
हर खुली खिड़की
खतरे का संकेत नहीं होती,
कभी कोई खूबसूरत पंख
उड़ता हुआ भीतर आता है,
और सूने आँगन में
उम्मीद के रंग भर जाता है।
हाँ, कुछ हवाएँ
घर अस्त-व्यस्त कर जाती हैं,
मगर हर हवा तूफ़ान नहीं होती,
कुछ हवाएँ तो
बंद कमरों में
जीने की खुशबू भर जाती हैं।
कभी-कभी
ज़िंदगी भी तो
पंख लगाकर आती है,
और बस इतना चाहती है
कि कोई दरवाज़ा खुला हो…!
- नरेंद्र मंघनानी
*****
जीवन का सार बस प्यार
जीवन का सार है, बस प्यार
प्यार बिना जीवन है बेकार
इस बात से क्यों करते है इंकार
जीवन है तो होगा ही प्यार।
प्यार का मतलब सब में है भिन्न-भिन्न
जितने भी रिश्ते है, सब में ये है अभिन्न
भाई का भाई के प्रति है प्यार
माता पिता का बच्चों से है प्यार।
दोस्ती में दोस्ती जैसा है प्यार
तो भाई-बहन का है अनोखा प्यार
पेड़-पौधों से भी होता है प्यार
तो जीव-जंतुओं में भी है आधार।
एक-दूसरे से करो सब प्यार
सुकून की जीवन का रहे हकदार
बनेगा बहुत सुन्दर सा संसार
जीवन का सार है, बस प्यार और प्यार।
- चुन्नू साहा
*****
काम नेकी का हरदम किया कीजिए।
मुफ़्लिसों का सदा तुम भला कीजिए।।
देख राहों में काँटे रुके ना कदम।
साथ अपनों के हरदम चला कीजिए।।
प्रेम तेरा कभी कम न हो साथिया।
चाँद-तारों की बातें किया कीजिए।।
हाथ में हाथ तेरा रहे हर जनम।
रब से मेरे लिए ये दुआ कीजिए।।
दिल की हसरत थी जो वो मिली ही नहीं।
ज़िंदगी से भला क्या गिला कीजिए।।
- रति सिंह 'रिंकी'
*****
वो सच को क्या समझेंगे
जो जीवित है सिर्फ अभिनय में।
नित लिपटे हैं रति से,
कब डुबोया खुद को प्रणय में।
देह की भूख मन की
कहाँ भरपाई करता है?
वासना-भावना ऐसे ही
खेलतीं हर सांस हर शय में।
- राधेश विकास
*****
युवा पीढ़ी क्यों गांवों को भूलती जा रही
एक दिन वह गांव का घर भी छूट जाएगा
वह शहर का घर भी नहीं बचा पायेगा
जाना तो पड़ेगा अकेले उस मंजिल की ओर
जहां से फिर कोई वापिस नहीं आएगा
घर का आंगन मिट्टी से भरा हुआ
वह कच्ची दीवारें भी मिट्टी में समा जाएंगी
एक एक ईंट पत्थर जोड़ कर बनाया था जिहोने
उनकी यादे भी धीरे धीरे धुंधली नज़र आएंगी
सब मस्त हैं सब की अपनी अपनी ज़िंदगी है
बचपन के यार दोस्त कोई अब नहीं बुलाते
कहाँ गए वह सुंदर लम्हें वह अनमोल समय
नाम लेकर दूर से अब कोई आवाज़ नहीं लगाते
सुनसान आंगन में लगे पत्थर अब भी करते हैं याद
एक दूसरे के पीछे दौड़ते कितना होता था वाद विवाद
ऐसा क्या हुआ वक्त ने कैसी यह करवट बदली
हर कोई क्यों चाह रहा गांव से होना आज़ाद
शहर की ज़िंदगी क्यों सभी को रास आ रही
एकदूसरे से अनजान ऐसी ज़िन्दगी क्यों भा रही
गांव अब वैसे नहीं रहे तेजी से हो रहा विकास
फिर भी युवा पीढ़ी क्यों गांवों को भूलती जा रही
शहर तो शहर है कभी किसी का अपना न हुआ
युवा पीढ़ी को चाहिए बना लो गांव में भी एक ठाँव
कोरोना जैसी महामारी से जो हो गया फिर सामना
तो फिर याद आएगा अपना वही छोटा सा गांव
- रवींद्र कुमार शर्मा
*****
मुझसे उसका नाम बड़ा है।
मुझको इससे लेना क्या है।
जीत हमेशा होगी उसकी,
अफ़वाहों से कौन डरा है।
वो कैसे बिल्ली पालेगा,
जिसने तोता पाल रखा है।
पहले ही तासीर है कड़वी,
और करेला नीम चढ़ा है।
भूख मिटेगी किससे किसकी,
दाने -दाने पर लिक्खा है।
उसको डर है खो जाने का,
जिसको ज़्यादा साथ मिला है।
साथ हमारे दूर सफ़र में,
कौन पराया कौन सगा है।
सबकी अपनी-अपनी हस्ती,
अपना-अपना फ़न, रुतबा है।
- नवीन माथुर पंचोली
मुझको इससे लेना क्या है।
जीत हमेशा होगी उसकी,
अफ़वाहों से कौन डरा है।
वो कैसे बिल्ली पालेगा,
जिसने तोता पाल रखा है।
पहले ही तासीर है कड़वी,
और करेला नीम चढ़ा है।
भूख मिटेगी किससे किसकी,
दाने -दाने पर लिक्खा है।
उसको डर है खो जाने का,
जिसको ज़्यादा साथ मिला है।
साथ हमारे दूर सफ़र में,
कौन पराया कौन सगा है।
सबकी अपनी-अपनी हस्ती,
अपना-अपना फ़न, रुतबा है।
- नवीन माथुर पंचोली
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काया कंचन
आँखों से हिय में गया उतर,
अब मौन प्रीत हो गई मुखर।
वो छुवन दुपहरी धूप हुई,
काया कंचन-सी गई निखर।
नयनों में नूतन स्वप्न सजे,
साँसों में सुरमई साज़ बजे।
तपती दुपहरी शीतल हो,
जब संग प्रिये का रूप सजे।
धड़कन की गति पल-पल बढ़े,
चंदन-सी चाहत मन में चढ़े।
इस चंचल मन के आँगन में,
चाहत के मधुर चिराग जले।
चमकी चाहत की छाँव घनी,
हर साँस आज सर्वस्व बनी।
मीरा के मोहन मिल ही गए,
सुंदर-सी यह सांझ बनी।
- सविता सिंह मीरा
आँखों से हिय में गया उतर,
अब मौन प्रीत हो गई मुखर।
वो छुवन दुपहरी धूप हुई,
काया कंचन-सी गई निखर।
नयनों में नूतन स्वप्न सजे,
साँसों में सुरमई साज़ बजे।
तपती दुपहरी शीतल हो,
जब संग प्रिये का रूप सजे।
धड़कन की गति पल-पल बढ़े,
चंदन-सी चाहत मन में चढ़े।
इस चंचल मन के आँगन में,
चाहत के मधुर चिराग जले।
चमकी चाहत की छाँव घनी,
हर साँस आज सर्वस्व बनी।
मीरा के मोहन मिल ही गए,
सुंदर-सी यह सांझ बनी।
- सविता सिंह मीरा
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