रविवार का दिन था और स्कूल की छुट्टी थी। रोमी अपने दादाजी के साथ बाजार जा रहा था। उसे किताब की दुकान से कहानियों की कुछ किताबें खरीदनी थी। रोमी को कहानियां पढ़ना बहुत पसंद था, और यह आदत उसको उसके दादाजी ने लगवाई थी।
दुकान पर पहुंचकर रोमी दुकानदार से पूछता है- "अंकल जी, कहानियों की कुछ किताबें हैं, क्या ?
"हां, किस भाषा में चाहिए ? हिंदी या इंग्लिश" दुकानदार किताबों की तरफ देखते हुए पूछता है।
"इंग्लिश की ही चाहिए, हिंदी कौन पढ़ता है ?" रोमी ने हंसकर कहा।
रोमी कि यह बात सुनकर दादा जी को बहुत बुरा लगा, पर वह वहां चुप रहे। दुकानदार किताबें दिखता है और रोमी अपने लिए कुछ किताबों का चयन कर, उन्हें खरीद लेता है।
घर लौटते समय रास्ते में दादा जी रोमी से पूछते हैं- "तुम्हें हिंदी नहीं पसंद है, क्या ?"
रोमी ने उनकी तरफ देखा और मुस्कुराकर बोला- "नहीं दादाजी, मेरे सारे दोस्त और शिक्षक इंग्लिश में ही बातें करते हैं। और परीक्षा में मेरे इंग्लिश में ही सबसे ज्यादा अंक आते हैं"
दादाजी रोमी को पास के पार्क में ले गए और बेंच पर बैठाते हुए समझाया कि-
"देखो! रोमी, अन्य भाषाओं का ज्ञान लेना अच्छी बात है। पर, अपनी खुद की मातृभाषा से दूर भागना भी अच्छा नहीं है। हमारी भाषा हमारे संस्कारों का दर्पण होती हैं। उनमें हमारी संस्कृति, इतिहास और मर्यादा छिपी होती है। तो अपनी भाषा जानना, बोलना और लिखना कोई शर्म की बात नहीं है, बल्कि वह हमें स्वयं के करीब ले जाती है।"
दादाजी की बातें रोमी को समझ आ जाती हैं। वह समझ जाता है कि वह हिंदी के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक धरोहर को भी बुलाता जा रहा था। उस दिन के बाद से रोमी हिंदी किताबें पढ़ना और हिंदी को जानना शुरू कर देता है।
- प्रणव राज, बिहार

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