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21 July 2025

यात्रा वित्तांतः- आसमान से लाहौल की बर्फीली वादियों का दीदार


जिंदगी में कुछ यात्राएं केवल मात्र गंतव्य तक पहुंचने के लिए नहीं होती, बल्कि वे हमें खुद से मिलाने का जरिया भी होती हैं। उन सुकून भरे पलों में हमें खुद से मिलने का तथा खुद का अवलोकन करने का भी समय मिल पाता है। कुछ दिनों के लिए समस्त दुनियां को दरकिनार कर हमें आत्ममिलन की सुखद अनुभूति होती है। ऐसे ही एक यात्रा हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पर्वतों में लाहौल स्पीति की हसीन वादियों में बसे केलांग की तरोताजा हो गई। यह यात्रा मेरी जिंदगी की सबसे रोमांचक और अविस्मरणीय यात्राओं में से एक रही। यह यात्रा सिर्फ एक भौगोलिक सफर नहीं थी, बल्कि आत्मा को सुकून देने वाला एक अनोखा अनुभव भी था।





   अप्रैल का महीना था। बच्चों की छुट्टियों के चलते अचानक ही हमारा कार्यक्रम बना कि क्यों ना केलांग चलें? पतिदेव जी केलांग  में सरकारी कार्य क्षेत्र में कार्यरत थे। उन्हें घर से गए डेढ़ महीना हो गया था। लाहौल स्पीति में भारी बर्फबारी होने के कारण चार-पांच महीने यह क्षेत्र बाकी दुनिया से बिल्कुल कट सा जाता था। एक हफ्ते में दो दिन हेलीकॉप्टर की फ्लाइट होती थी जो मौसम पर ही निर्भर करती थी। 


बच्चों के बार-बार आग्रह करने पर हमारा यह कार्यक्रम बना लेकिन दिक्कत यह थी कि अभी भी रोहतांग दर्रा बंद था और हेलीकॉप्टर की उड़ान ही एकमात्र माध्यम था वहां पहुंचने के लिए। हेलीकॉप्टर की बुकिंग के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ी थी हमें,,, तभी जाकर कुछ दिनों में बुकिंग हुई। बेटियों की भी जिद थी कि  इस बार हेलीकॉप्टर से जाएंगे, लेकिन अब इस बात पर असमंजस की स्थिति थी कि हम तीनों अकेली कैसे जाएंगी? बेटियां भी अभी छोटी ही उम्र की थी तो विषय थोड़ा विचारणीय था। सोच विचार कर यह तय हुआ कि क्यों ना मायके से भैया को कुल्लू भुंतर तक साथ ले लिया जाए।





भुंतर से सुबह 8:00 बजे की फ्लाइट बुक हो गई थी तो हमें बिलासपुर से रात को ही चलना पड़ना था ताकि हम सुबह 8:00 तक भुंतर हवाई अड्डे पर पहुंच सकें। रात की बस थी तो अकेले बच्चियों के साथ जाना मुमकिन भी नहीं था और ससुराल में दो हफ्तों के बाद भागवत कथा का आयोजन तय हुआ था तो घर में भी सभी बहुत व्यस्त थे, इसीलिए भैया को साथ ले जाना बेहतर समझा। भैया भी हंसी खुशी हमें भुंतर तक छोड़ने को तैयार हो गए।

मायके पहुंचकर अगले दिन जाने की योजना बनाई। बिलासपुर बस स्टैंड से रात को कल्लू के लिए 2:00 बजे की बस थी तो उसी के हिसाब से तैयारी में जुट गए। घर से काफी सब्जियां डाल दी गई थी जो अपने खेतों में उगी थी। केलांग में चार महीनों से रास्ते भी बंद थे तो सोचा कि कुछ दिनों के लिए ये ऑर्गेनिक हरी सब्जियां खाने के लिए हो जाएंगी।

     मेरी मासी जी के लड़के ने रात को 2:00 बजे हमें अपनी टैक्सी से बस स्टैंड छोड़ा। मेरी दो बेटियां, मैं और मेरा छोटा भैया खुशी खुशी बस में बैठ गए। बस में पंजाब हरियाणा से आए पर्यटक भी बैठे थे। पांच घंटे का सफर तय करते जब हम कल्लू की हसीन वादियों में पहुंचने लगे तो दूर-दूर से बर्फ के पहाड़ दिखाई देने लगे। बस में बैठी कुछ लड़कियां जो पंजाब हरियाणा से घूमने आई थी, उन बर्फ के पहाड़ों को देखकर एकदम से उछलने लगी।

उन्होंने शायद पहली बार ही बर्फ के पहाड़ देखें होंगे तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। दोनों हाथों से तालियां बजाकर वे अपनी खुशी जाहिर कर रही थी। इस रोमांच भरे सफर को  तय करते हुए हम सुबह 8 बजकर 5 मिनट पर भुंतर हवाई अड्डे पर पहुंच गए, लेकिन जैसे ही हम हवाई अड्डे पर पहुंचे तो जिस हेलीकॉप्टर में हमारी बुकिंग हुई थी वह 5 मिनट पहले ही उड़ान भर चुका था, फ्लाइट का समय तो निश्चित था लेकिन हम ही 5 मिनट लेट हो गए थे।




हम सब बहुत उदास हो गए कि अब कैसे जाएंगे? मैंने इन्हें केलांग के लिए फोन किया कि हमारी फ्लाइट तो छूट गई अब अगला प्रबंध कैसे होगा? थोड़ी देर तो ये भी टेंशन में पड़ गए, लेकिन फिर इन्होंने हवाई अड्डे पर बात कर अगली फ्लाइट के लिए हमारी बुकिंग कर दी। उस समय प्रति व्यक्ति का किराया भुंतर से केलांग के लिए ₹700 लगता था। अगली फ्लाइट 1 घंटे के बाद होनी थी तो उस बीच हमने चाय पानी का बंदोबस्त किया और ढाबे  पर इंतजार में बैठ गये।

उस समय अटल टनल नहीं बनी थी इसलिए पांच छह महीनों के लिए लाहौल स्पीति बाकी दुनिया से कट जाता था। इन पांच  छह महीनों में वहां जाने का यही एक जरिया था। नाश्ता चाय लेने के बाद तब तक हेलीकॉप्टर भी आ गया और बेटियां देखते ही चहक उठीं। उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा, क्योंकि पहली बार उन दोनों ने इतने नज़दीक से हेलीकॉप्टर देखा था। एक तरफ हैलीकॉप्टर में जाने की खुशी थी तो दूसरी तरफ भैया को अकेले छोड़ कर जाने का दुख था। मन तो कर रहा था कि उन्हें भी साथ ले जाएं, लेकिन घर में मां भी अकेली थी तो उन्हें वापस जाना था। भैया से विदा लेकर हम हेलीकॉप्टर की ओर बढ़े।

सामान बहुत भारी था तो लोडिंग अफसर मजाक में कहने लगे--"कहीं स्मगलिंग का ही माल तो नहीं है" मैंने भी हंस कर जवाब दिया ,,"सर आप खुशी-खुशी चेक कर सकते हैं, इसमें घर की उगाई हुई सब्जियां ही हैं, बाकी कुछ नहीं है। हंसी मजाक करते-करते हम हेलीकॉप्टर में बैठ गए। हेलीकॉप्टर में सामान ले जाने की भी एक सीमा होती थी। बारह किलोग्राम से ज्यादा सामान ले जाना मना था। बारी-बारी सभी के सामान की चेकिंग हो रही थी, जिसका सामान  लिमिट से ज्यादा हो रहा था, उस सामान को बाहर फेंक दिया जा रहा था। मैं भी थोड़ा डर गई थी कि कहीं हमारा सामान भी ज़्यादा न हो, पर हमारा सामान लिमिट में ही था। 

    सभी औपचारिकताओं के पूर्ण होने पर सभी को जरूरी हिदायतें दी गई और हम धीरे-धीरे आकाश की ओर उड़ने लगे। शुरू शुरू में धुकधुकी सी हो रही थी, मानो हम पंख लगाए आसमान में उड़ रहे हों। आसमान से सभी घर छोटे-छोटे डिब्बे की तरह लग रहे थे और साथ में बहती व्यास नदी एक कूहल की तरह लग रही थी।धीरे-धीरे कुल्लू मनाली से होते हुए हम बर्फीली चोटियों के ऊपर से गुज़रने लगे। आसमान से सफ़ेद बर्फ से ढके पहाड़ और पेड़ों पर बर्फ़ होने के कारण वे गुलदस्ते की भांति प्रतीत हो रहे थे। बेटियां भी उस मनमोहक दृश्य को देखकर पुलकित, रोमांचित हो रही थी।






 सच में बर्फीली वादियां प्रकृति की अद्भुत ,अलौकिक एवं अद्वितीय रचना होती है। चारों तरफ सफेद चादर सी बर्फ फैली थी, मानो धरती ने मुलायम सफेद ओढ़नी ओढ़ रखी हो। सुबह का समय था तो बर्फ पर पड़ती सूरज की किरणें सुनहरी चमक बिखेर रही थी। ये बर्फीली वादियां देखने में न केवल स्वर्ग की सी प्रतीत हो रही थी ,बल्कि एक अलौकिक शांति और सुकून भी दे रही थी। 40 मिनट के इस सुहाने सफर को तय करते हुए हम केलांग पहुंचने वाले थे। 

हेलीकॉप्टर धीरे-धीरे सिस्सू हेलीपैड की ओर बढ़ रहा था और हम खुशी में झूम रहे थे। हेलीकॉप्टर से उतरते ही पतिदेव ने गाड़ी में बिठाया और हम अपने खुशनुमा अनुभवों को उनके साथ बयां करते-करते केलांग पहुंच गए। लकड़ीनुमा बने उस सरकारी क्वार्टर में हम तीन दिनों तक रुके। वहां चारों तरफ बर्फ से लकदक पहाड़ों को निहारते हुए तीन दिनों का कुछ पता ही नहीं चला। हफ्ते में दो बार फ्लाइट होती थी तो चौथे दिन हम फ्लाइट से वापिस घर चल पड़े। सात-आठ दिनों के बाद घर में भागवत था तो इसीलिए हमें घर आने की भी जल्दी थी, लेकिन उन बर्फ से ढकी हसीन वादियों में जो आनंद हमने तीन दिनों में लिया, वह  सुनहरी यादें बनकर हमारी स्मृतियों में ताउम्र जीवंत रहेगा।



                              - वसुंधरा धर्माणी, बिलासपुर, हिप्र



29 April 2025

एक अविस्मरणीय यात्रा का सफर


अपनी उम्र के कई साल स्कूल, कॉलेज, नौकरी, गृहस्थी में बिताने के बाद मुझे अहसास हुआ है कि जीवन में अब भी कुछ अधूरा-सा हैं। मृत्यु सहज सी लगने लगी जैसे कुछ ही पलों में मृत्यु आ जायेगी, मैं बस यही सोच रही हूँ कि जीवन में आखिर खालीपन है कहाँ ? 





आखिर में समझ आया कि मैं कई सालों से जीवन की भाग-दौड़ और बहदवासी भरी ज़िन्दगी के चलते एक अकेलेपन भरे कमरे में बन्द थी, उस संसार रूपी कमरे में इतनी शक्ति है कि मैं चाहकर भी अपने अनुभवों और कहानियों से उसे तोड़ नहीं सकती थी। मैं जीवन भर चलती रहीं, फिर भी एक सुकून का कोना नहीं मिला।

23 अगस्त 2019 में मेरी मुलाकात होती है रमेश जी से जिन्होंने मुझे मिलवाया, एक नये सफर से और मेरा वो सफर शुरू हुआ "ॐ शिव शंकर तीर्थ यात्रा"  के साथ, जिस ने मेरे जीवन के जीने के वास्तविक मायने बदल दिये। इसके संचालक है श्याम चतुर्वेदी जी जब से मैंने इनके साथ यात्राएँ करनी शुरू कि ऐसा लगा मानो, मेरे जीवन में नये अध्याय का प्रारम्भ हुआ हो। मैंने हिमालय से कन्याकुमारी, द्वारिका से पुरी तक का सफर तय किया और सच कहूँ तो बहुत खुबसूरत रहा मेरा हर सफर। 





मैंने उड़ती बर्फ, ठण्डी हवा, बहता पानी, पहाड़, चलती गाड़ियों की खिड़की से बहार देखना, हवाओं को मेरे बालों के साथ खेलना सच में मेरे लिए वो दृश्य काल्पनिक सा लग रहा था। मगर यह सच था, इतनी उम्र बिताने के बाद अब ऐसा लग रहा है कि जीवन तो यात्रा ही है।

वो सारी यात्राएँ जो मैंने की श्रीलंका, भूटान, नेपाल, दार्जिलिंग, कश्मीर, केरल द्वारिका, कैलाश मानसरोवर, दुबई, तीन धाम ग्यारह ज्योतिर्लिंग, मनाली आदि वो मुझे मेरे जीवन के सबसे खूबसूरत पलों में से एक हैं। बहुत ही आरामदायक सफर रहा मेरा इन बीते सालों में और  मैं यही सलाह दूंगी कि अगर शान्तिपूर्ण और सहज यात्राएं करनी है तो ॐ शिव शंकर तीर्थ यात्रा सेक्टर-9, मालवीय नगर, जयपुर के साथ कीजिए। 





जीवन को जीने का आपका नज़रिया बदल जाएगा। मैं किसी विशेष या किसी कंपनी के प्रचार के लिए नहीं बोल रही हूँ। मैंने वास्तविकता में अपने जीवन में बहुत यात्राएं की हैं, लेकिन ऐसी यात्राएँ जिसमें सभी यात्री पारिवारिक माहौल बनाएं, शुद्ध सात्विक वचन और भोजन रखें यात्रा करें, मैंने कभी नहीं देखा था। मगर वो मैंने यहाँ देखा और महसूस किया।


मैं अपनी यात्रा के कुछ अनुभवों को आपके साथ साझा करती हूँ-

भारत की विविधता को करीब से देखने की चाह ने मुझे एक लंबी यात्रा पर निकलने के लिए प्रेरित किया। यह कोई साधारण यात्रा नहीं थी। यह आत्म की खोज, संस्कृति-साक्षात्कार और सौंदर्य-प्रेम की एक जीवंत यात्रा थी। मैंने उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक भारत के प्रमुख शहरों, गाँवों, पहाड़ों, सागरों और रेगिस्तानों की यात्रा की।


उत्तराखंड में ऋषिकेश की गंगा आरती और हरिद्वार की धार्मिकता ने मेरी आत्मा को छू लिया। मनाली और शिमला की बर्फीली वादियाँ और हिमालय की ऊँचाई किसी स्वप्नलोक से कम नहीं थीं।

पश्चिम भारत- रंग, रेगिस्तान और शौर्य राजस्थान में जयपुर, उदयपुर और जैसलमेर के किलों और हवेलियों ने राजसी संस्कृति से परिचय कराया। जबकि गुजरात में कच्छ का रण सफेद नमक से ढका था। सूरज डूबने के बाद का दृश्य आज भी आँखों में बसा है। महाराष्ट्र में मुंबई की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी और गेटवे ऑफ़ इंडिया की शाम साथ ही अजंता-एलोरा की गुफाओं ने प्राचीन कला से अवगत कराया।





दक्षिण भारत- प्रकृति, मंदिर और आत्मिक शांति केरल में हाउसबोट पर बिताई गई रातें, मुन्नार की चाय बगान और कोवलम का समुंदर शांतिदायक थे। तमिलनाडु के मदुरै और रामेश्वरम के मंदिरों ने भक्ति से भर दिया।कर्नाटक में मैसूर पैलेस और हम्पी के खंडहरों की कहानी अनसुनी और अद्भुत थी। आंध्र प्रदेश में तिरुपति बालाजी के दर्शन कर मेरी इस यात्रा को एक आध्यात्मिक ऊँचाई मिली।

पूर्व भारत- संस्कृति, प्राकृतिक सुंदरता और जनमानस कोलकाता में साहित्य, दुर्गा पूजा और रसगुल्ले ने मन मोह लिया। ओडिशा में कोणार्क सूर्य मंदिर और पुरी का समंदर जीवन में एक शांत ठहराव लेकर आया। उत्तर-पूर्व भारत में असम के चाय बगान, मेघालय के जीवित जड़ों के पुल और सिक्किम की बर्फीली चोटियाँ मानो प्रकृति की गोद में समय थम गया हो।




 

श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में उतरते ही भारतीय संस्कृति की झलक मिलती है। यहां से रामायण यात्रा की शुरुआत होती है।

मुन्नेश्वरम मंदिर (चिलाव)- यहीं वह स्थान है जहाँ भगवान राम ने रावण वध के बाद ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति के लिए भगवान शिव की पूजा की थी। इसके अलावा मांनावर मंदिर जहाँ राम ने शिवलिंग स्थापित कर पूजा की थी। यह स्थान भी चिलाव के पास है।

सीता एलिया (नुवारा एलिया)- यह वह स्थान माना जाता है, जहाँ रावण ने सीता माता को अशोक वाटिका में रखा था। यहाँ सीता अम्मन मंदिर भी स्थित है, जो माता सीता को समर्पित है।





भारत की यात्रा सिर्फ एक देश घूमने की नहीं, बल्कि आत्मा के हर कोने को छूने की प्रक्रिया है। यहाँ की विविधता, रंग-बिरंगी संस्कृति, स्वादिष्ट व्यंजन और अतिथि सत्कार मुझे आज भी बार-बार याद आते हैं। मेरी यह यात्रा केवल स्थानों की नहीं, भावनाओं और अनुभवों की थी। एक ऐसा अनुभव जिसे मेरे लिए शब्दों में समेटना बहुत ही मुश्किल है।


अनिता रोहलन 'आराध्यापरी'
निवासी- लाछड़ी, डीडवाना, राजस्थान