साहित्य चक्र
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18 August 2026

संस्कृत भाषा की रचनाएं ही राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय गीत क्यों!

बतौर भारतीय मेरे मन में एक सवाल उठता है- संस्कृत भाषा को भारत यानी हमारे देश में एक प्रतिशत लोग भी ना बोल पाते हैं और ना ही लिख पाते हैं तो फिर उस भाषा की रचनाओं को हमने अपना राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत क्यों बनाया हुआ है ? अधिकांश भारतीय ना राष्ट्रगान और ना ही राष्ट्रगीत बिना देखें गा पाते हैं। कहीं इसके पीछे का कारण संस्कृत भाषा की रचनाओं का राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का होना तो नहीं है ?





भारत अनेक संस्कृति, सभ्यता और भाषा से मिला एक लोकतांत्रिक गणराज्य है। इसकी आज तक कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हां! अंग्रेजी और हिंदी राजभाषा जरूर है। इतना ही नहीं बल्कि हिंदी भाषा कुछ ही क्षेत्र की मातृभाषा है। अधिकांश क्षेत्रों में लोगों की मातृभाषा वहां की स्थानीय बोली व भाषा है। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल की मातृभाषा बंगाली है, महाराष्ट्र की मातृभाषा मराठी है, तमिलनाडु की मातृभाषा तमिल है, उत्तराखंड की मातृभाषा गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी है। ऐसा ही अन्य राज्यों में भी है।

संस्कृत भाषा भारत की कभी भी आम बोलचाल वाली भाषा नहीं रही है। संस्कृत और तमिल भाषा में सबसे प्राचीन भाषा को लेकर आपस में विरोधाभास दिखाई देता है। जहां दक्षिण के इतिहासकार तमिल को सबसे पुरानी भाषा मानते हैं तो वही उत्तर भारत के लोग संस्कृत को सबसे पुरानी भाषा का दर्जा देते हैं। मगर इन दोनों भाषाओं में कौन सी सबसे पुरानी भाषा है, इस पर कोई ठोस शोध नहीं हो पाया है।

संस्कृत भाषा को हिंदू धर्म की भाषा भी माना जाता है क्योंकि हिंदू धर्म के अधिकांश ग्रंथ संस्कृत भाषा में ही लिखे गए हैं। ऐसे में फिर एक सवाल और उठना है- जब भारत धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राष्ट्र है और संस्कृत हमारी यानी भारत सरकार की राजभाषा भी नहीं है तो फिर इस भाषा की दो रचनाओं को राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत बनाना कितना सही है ?


बहुत सारे लोगों का तर्क होगा कि आजादी के समय यह फैसला लिया गया था। मगर जिस प्रकार से आज इतिहास को ठीक किया जा रहा है, उसी प्रकार से इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि जिस भाषा को हमारे देश की अधिकांश जनता ना बोल पाती है, ना लिख पाती है उस भाषा की रचनाओं को राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान बनाना सही है या फिर गलत! 


                                                  - दीपक कोहली


09 July 2026

चौमासा की डरावनी रातें!


पहाड़ दूर से जितने प्यारे और सुंदर दिखाई देते हैं, अक्सर पहाड़ों का जीवन उससे उतना ही डरावना व खतरनाक होता है। चौमास यानी बरसात के मौसम में पहाड़- नदियों की उफान, हरियाली की हनक और कीट-पतंगों के आक्रमण से भर जाते हैं। चौमास में महीनों बारिश लगी रहती है और बारिश के कारण स्थानीय लोगों के मन में आंतरिक डर बना रहता है।

चौमास में अधिक बारिश के कारण पहाड़ों की नदियाँ विकराल रूप धारण की रहती है। जमीन यानी पहाड़ों का खिसकना, रोड़-पुलों व घरों का टूटना, पेड़ों का गिरना और आपदा आना पहाड़ों में सामान्य बात है। इसीलिए शायद! पहाड़ के स्थानीय लोग अपने घर में हमेशा 1-2 माह का राशन बचाकर चलते हैं। कहते है कि जैसी परस्थितियाँ होती हैं, वैसे ही उपाय खोजे जाते हैं। अपने घर में हमेशा राशन का भंडार करके रखना पहाड़ों के लोग का वहां की परस्थितियों से लड़ने का एक कारगर हथियार है।






चौमास की रातों में कभी-कभी पहाड़ी लोग बिना सोए भी रहते हैं। इसलिए नहीं कि उन्हें नींद नहीं आती, बल्कि इसलिए क्योंकि पहाड़ों की ज्यादा बारिश डरा देती है। पहाड़ियों का डरना भी वाज़िब है, क्योंकि प्रकृति का कहर बिना बताएँ आती है और वो इंसानों की तरह जाति-धर्म व लिंग का किसी भी प्रकार का कोई भेद नहीं करती है। पहाड़ों के हर गांव में चौमास की रातों के कई दर्दनाक किस्से दफ्न है। शायद इन्हीं दर्दनाक किस्सों ने पहाड़ियों को कोमल हृदय का मानुष बनाया है।

पहाड़ियों के बारे में कहा जाता है कि पहाड़ी लोग हृदय से जितने कोमल होते हैं, उतने ही उनके हौंसले बुलंद होते हैं। पहाड़ी प्रकृति से बार-बार टूटता-डरता है, मगर हिम्मत नहीं हारता है। चौमास की डरावनी रातें पहाड़ियों को डराती तो जरूर हैं, मगर पहाड़ी लोग प्रकृति से कभी रूठते या नफरत नहीं करते हैं। क्योंकि पहाड़ के लोग प्रकृति को अपनी माँ मानते हैं और उसके कहर को माँ की डांट समझ कर सह लेते हैं।

पहाड़ों में चौमासा जितना डरावना होता है, उतना ही लाभदायक और प्यारा भी होता है, क्योंकि चौमासा अपने साथ हरियाली, रंग-बिरंगे फूल, नदियों की सु.. सु… सुसुहाहट और चिड़ियों की चहचहाहट लेकर आती है। चौमासा यानी आषाढ़, सावन, भादो और कार्तिक का माह और वर्षा ऋतु का मौसम होता है। चौमासा को वर्षावास, चतुर्मास और चातुर्मास्य भी कहते हैं।


- दीपक कोहली



23 March 2026

अमेरिका की ओछी हरकतें, विश्व में अशांति का कारण!

आज विश्व में चारों तरफ अशांति फैली हुई है। इस अशांति के कारण हजारों मासूम बच्चे, महिलाएं और आम नागरिक मौत के घाट उतर चुके हैं। यूरोप से लेकर एशिया और अफ्रीका तक इस अशांति का शिकार है। इस अशांति के कारण लगभग सभी देशों के नागरिकों को महंगाई और बेरोजगारी से लेकर तमाम तरह के प्रभावित होना पड़ रहा है।





विश्व में फैली अशांति का मुख्य दोषी अमेरिका है। अमेरिका अपने स्वार्थ के लिए गरीब देशों के खनिज खजानों और प्राकृतिक संप्रदाय पर अधिकार जमाने के लिए इस तरह की ओछी हरकतों से वहां के नागरिकों को टारगेट बना रहा है। अमेरिका का इतिहास रहा है कि वह हमेशा से अपने स्वार्थों को सबसे ऊपर रखता आया है।

चाहे वह सोवियत संघ को शीत युद्ध के जरिए से तोड़ना हो या फिर पाकिस्तान को हथियार देकर आतंकी गतिविधियों के जरिए भारत के विकास को प्रभावित करना हो। अमेरिका अपने स्वार्थ के लिए इस तरह की ओछी हरकतें सदियों से करता आ रहा है, मगर अब अमेरिका की ओछी हरकतों को विश्व के लगभग हर देश समझ गया है।




अमेरिका खुद को सबसे पुराना लोकतांत्रिक देश कहता है, मगर लोकतंत्र के गुण अमेरिका के पास ना के बराबर दिखाई देते हैं। लोकतंत्र कभी भी नहीं कहता कि दूसरे देश की प्राकृतिक संपदा को हड़पने के लिए उस देश पर हमला कर दो और वहां के राजनेताओं को मरवा दो।

अमेरिका का दोहरा चरित्र और काला चेहरा अब विश्व के सामने धीरे-धीरे आ रहा है।‌ चाहे वह दूसरे देशों के क्रीम मांइड बच्चों को अच्छी नौकरी और अच्छा सैलरी पैकेज देकर खरीदने की बात हो या फिर अल-कायदा जैसे संगठनों को फंडिंग और हथियार देकर अफगानिस्तान जैसे क‌ई देशों को बर्बाद करने की साजिश हो। ये सब अमेरिका की ओछी हरकतें आज विश्व के लिए अशांति का कारण बन गई है।

अमेरिका को यह समझना चाहिए कि लोकतंत्र जितना वहां के नागरिकों को अधिकार देता है, उतना ही अधिकार एशिया, अफ्रीका और यूरोप के देशों के नागरिकों को भी देता है। वक्त रहते अमेरिका अगर अपनी सोच और हरकतें में सुधार नहीं करता है तो अमेरिका का आने वाला भविष्य कितना खतरनाक होगा कि इसकी कल्पना आप और हम नहीं कर सकते हैं।


- दीपक कोहली





15 February 2026

वर्तमान में बाजार की समस्याओं से जूझता मानव!


आज जैसे-जैसे हम आधुनिकता की ओर बढ़ते जा रहे हैं और हमारे बाजारों की हालत उतनी ही खराब और चिंताजनक होती जा रही है। एक वक्त था जब खाद्य पदार्थों के मूल्य इतनी जल्दी उतार-चढ़ाव नहीं करते थे, मगर आज 1 घंटे बाद खाद्य पदार्थों के मूल्य बदल जाते हैं। इतना ही नहीं बल्कि मिलावट और गुणवत्ता की कमी खाद्य पदार्थों के सेवन में हमें चिंतित कर रही है। बाजार की दिखावे वाली अर्थव्यवस्था ने हमें चारों तरफ से घेर रखा है।





आइए इस दिखावे की अर्थव्यवस्था ने हमें कैसे घेर कर रखा है इस पर प्रकाश डालते हैं-

आज बाजारों से मानवीय स्पर्शिता यानी आपसी व्यक्तिगत रिश्ते धीरे-धीरे समाप्ति की ओर जा रही है। पहले हम सभी अपने आस-पास की दुकानों में जाकर सामान खरीदते थे। आज हम ऑनलाइन ऑर्डर कर रहे हैं, जिसके कारण हमारा लोगों से संवाद धीरे-धीरे कम हो रहा है। ई-कॉमर्स यानी ऑनलाइन खरीदारी से न सिर्फ स्थानीय दुकानदारों की आय पर असर पड़ रहा है, बल्कि पैकेजिंग यानी बड़ी मात्रा में कचरा भी इकट्ठा हो रहा है। इसका सीधा असर हमारे पर्यावरण पर पड़ रहा है।




बाजार के दिखावे के कारण आज हम सभी का गैर जरूरी खर्चा बढ़ गया है। सोचिए ऑनलाइन खरीदारी में चप्पल भी EMI पर उपलब्ध है। विज्ञापनों ने हमें चारों तरफ से घेर रखा है। चाहे वह फेसबुक हो, इंस्टाग्राम हो, गूगल हो या फिर न्यूज़ पेपर, न्यूज़ चैनल और सड़कों पर लगे बड़े-बड़े बैनर हो। हम हर समय खरीदारी के ही मूड में रहते हैं या खरीदारी के बारे में ही सोचते रहते हैं। सोशल प्लेटफॉर्म के जरिए हमारा डाटा चोरी हो रहा है। इतना ही नहीं बल्कि अगर आप अपने मोबाइल का डेटा ऑन करके किसी वस्तु की जरूरत के बारे में बातचीत करेंगे तो आपको आपके सोशल प्लेटफॉर्म पर वही विज्ञापन देखने शुरू हो जाते हैं।




आज हर चीज की मंथली सब्सक्रिप्शन की प्रणाली लगातार बढ़ती जा रही है यानी पहले हम सीडी कैसेट के माध्यम से कोई सॉफ्टवेयर या फिल्म हमेशा के लिए खरीद सकते थे। मगर आज आप पैसा दुगना दे रहे हैं और वह वस्तु आपको सिर्फ एक महीने के लिए मिल रही है। इतना ही नहीं बल्कि बाजार में ऐसे प्रोडक्ट्स लाएं जा रहे हैं, जिनकी लाइफ बहुत छोटी है या फिर उनकी लाइफ छोटी बनाई जा रही है। पैसा देकर भी सही वस्तु नहीं मिल पा रही है यानी बाजार में नकली वस्तु या फर्स्ट कॉपी की भरमार है। बाजार के इस मकड़ जाल से बाहर निकलना हमारे लिए मुश्किल नहीं बल्कि नामुमकिन हो चुका है।





बाजार के इस दिखावे की धारा में इनफ्लुएंसर मार्केटिंग का ऐसा भ्रम जाल फैला रहे हैं कि लोग गैर जरूरी वस्तुओं को इनफ्लुएंसर के दबाव में खरीद रहे हैं। बाजार से लॉयल्टी लगातार कम होती जा रही है। ग्राहकों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर डार्क पैटर्न्स यानी ऑनलाइन चालबाजी से धोखाधड़ी की जा रही है। बाजार के प्रभाव ने लोगों में इंपल्स बाइंग यानी बिना सोचे समझे वस्तु खरीदने की आदत डाल दी है। बाजारों से स्थानीय स्वाद और विविधता लगातार गायब हो रही है यानी हमारे बाजार ग्लोबल होने के चक्कर में लोकल को खो रहे हैं।




हम लोग बाजार के दिखावे में इतनी बुरी तरीके से फंस गए हैं कि अपनी प्राइवेसी को लग्जरी मानने लग गए हैं। बाजार ने हमारे दिमाग पर कब्जा कर लिया है और हम चाह कर भी बाजार के इस जाल से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। आज हमें इंस्टेंट ग्रेटिफिकेशन यानी तात्कालिक संतुष्टि की लत लग चुकी है। सामाजिक मान व मर्यादाओं का हमने अचार बना डाला है। इसलिए सोशल मीडिया पर फेमस होने के लिए शारीरिक अंगों का प्रदर्शन और गाली गलौज की हरकतें आम होती जा रही है। हमारे युवा सोशल मीडिया में ऐसा खोया है कि उसे अपने भविष्य की जरा सी भी चिंता नहीं है।




बाजार की ये समस्याएं ऐसी ही चलती रही तो वह दिन दूर नहीं जब हम सभी चांद अमीर लोगों के गुलाम बन जाएंगे। आप और हम सिर्फ नौकरी व दो वक्त के खाने को ही जीवन समझने लग जाएंगे। इसलिए वक्त रहते हम सभी को बाजार के इस प्रभाव को समझना होगा और इस पर लगाम लगानी होगी अन्यथा यह समस्या हम सभी को अपना शिकार बना लेगी और हम कुछ भी नहीं कर पाएंगे।



- दीपक कोहली


24 November 2025

हिंदू राष्ट्र की मांग देश विभाजन का षड्यंत्र!

सोशल मीडिया में इन दोनों हिंदू राष्ट्र की मांग बहुत आम सी होती जा रही है। इस मांग के पीछे देशद्रोही ताकतें काम कर रही है। देश में बेरोजगारी और महंगाई अपनी चरम सीमा पर है, मगर युवाओं को हिंदू राष्ट्र का झुनझुना पकड़ा कर गुमराह किया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है- आखिर युवाओं को गुमराह क्यों किया जा रहा है ?




भारत में अलग राष्ट्र की मांग पहली बार नहीं उठ रही है बल्कि पहले भी खालिस्तानी (पंजाब) और तमिल में भी अलग राष्ट्र की मांग उठ चुका है। इसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ा है। आजादी से पहले भारत हजारों राजवाड़ों में बांटा था। उन सभी राजवाड़ों को सरदार वल्लभभाई पटेल ने खत्म कर भारत को एक सूत्र में बांधा था। मगर आज कुछ नफरती चिंटू हिंदू राष्ट्र की मांग करके भारत को फिर से विभाजनकारी षड्यंत्र के तहत खंडित करना चाहते हैं।

हिंदू राष्ट्र की मांग उसी प्रकार से गलत है जिस प्रकार से खालिस्तानी की मांग गलत थी। आज कुछ लोग हिंदू राष्ट्र की मांग कर रहे हैं तो कल को कोई सिख राष्ट्र मांगेगा और परसों कोई जाति के आधार पर राष्ट्र मांगेगा तो आखिर कब तक इस तरह के षड्यंत्र देश के अंदर चलते रहेंगे। 

आखिर सरकार इस तरह की मांगों पर चुप्पी क्यों साधी बैठी है, क्या सरकार भी चाहती है देश का विभाजन फिर से हो ? नहीं तो सरकार को इस तरह की मांग उठाने वालों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। विपक्ष को भी इस तरह के षड्यंत्रकारी मांगों को मुद्दा बनाकर सरकार को संसद से लेकर सड़क तक घेरना चाहिए।





सरदार वल्लभ भाई पटेल ने हिंदू राष्ट्र के विचार को खारिज करते हुए कहा था कि यह पागलपन से भरा विचार है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है और इस देश पर किसी एक धर्म का राज नहीं हो सकता है। 


पटेल के इन विचारों को हम सभी को समझना चाहिए और उन लोगों को भी समझना चाहिए जो हिंदू राष्ट्र की मांग कर देश को विभाजनकारी परिस्थितियों की ओर धकेल रहे हैं। अगर हिंदू राष्ट्र के पीछे बहुसंख्यक होने का तर्क है तो फिर इस आधार से हिंदू धर्म में भी विभिन्न जातियां हैं तो फिर बहुसंख्यक जाति का राज होना चाहिए। इसलिए कुतर्क बातों के आधार पर देश को विभाजित करने वाले संगठनों और लोगों के खिलाफ हम सभी सच्चे और स्वतंत्र भारतीयों को आवाज़ उठानी होगी। 


                                                  - दीपक कोहली


17 November 2025

दिखावे का भवसागर!


अक्सर कहा जाता है कि जब से टेक्नोलॉजी आई है इंसानों का जीवन बेहतर हुआ है। मगर मेरा मानना है कि हमारा जीवन न सिर्फ बेहतर हुआ है बल्कि हमारे समाज में दिखावे का चलन भी बढ़ गया है। आज हम सभी अपनी छोटी-छोटी चीजों को सोशल मीडिया में डालकर लोगों को यह दिखाने या बताने की कोशिश करते हैं कि हमने यह चीज हासिल कर ली है। इसी दिखावे के भवसागर ने बाजारवाद को भी अपना शिकार बना लिया है।



प्राइवेट कंपनियों में मानव संसाधन यानी HR- Human Resource का काम कर्मचारी का रिकॉर्ड रखने से लेकर उनकी समस्याओं को हल करना होता है। मगर आज प्राइवेट कंपनियों के HR विभाग सिर्फ रंगोली बनाने और कर्मचारियों का रिकॉर्ड रखने के अलावा कर्मचारियों के हितों की कोई सुरक्षा नहीं कर पता है। प्राइवेट कंपनियां अपने कर्मचारियों को अचानक से नौकरी से निकाल देती हैं और HR विभाग मौन हो जाता है। इतना ही नहीं बल्कि कर्मचारियों को भी सरकार द्वारा दिए गए अधिकारों के बारे में बहुत कम पता होता है।

दिखावे का भवसागर हमारे समाज को लगातार खोखला करता जा रहा है। आज हर व्यक्ति इनफ्लुएंसर बना हुआ है या बनने की कोशिश कर रहा है। हर किसी को फेमस होने का भूत सवार हुआ है। जिन कंपनियों का न्यूज़ से दूर-दूर तक वास्ता नहीं है, आज वह भी न्यूज़ वाली पोस्ट बनाकर सोशल मीडिया पर डाल रही हैं। क्यों और किसलिए ?




कुछ कंपनियां तो न्यूज़ स्टूडियो टाइप से अपनी कंपनी का प्रचार-प्रसार कर रही है, जबकि उनके प्रोडक्ट की गुणवत्ता लगातार गिरती जा रही है। खाद्य सामग्री वाली कंपनियों का न्यूज़, जन्मदिन, पुण्यतिथि और जयंती से क्या संबंध है ? खाद्य सामग्री वाली कंपनियों को अपने प्रोडक्ट की क्वालिटी पर काम करना चाहिए- प्रोडक्ट शुद्ध, बेहतर हो और मिलावट ना हो।

आज हमारे देश में खाद्य वस्तु में ऐसी कोई भी चीज नहीं है, जिसमें मिलावट नहीं होती है। पानी और नमक तक में हमारे देश में मिलावट होती है। और हम अपनी संस्कृति और सभ्यता को लेकर समस्त विश्व को ज्ञान देते हैं। इतना ही नहीं बल्कि विश्व गुरु बनने का दम भी भरते हैं। क्या इस दिखावे के भवसागर से हम विश्व गुरु बन जाएंगे ?


- दीपक कोहली



13 November 2025

पत्रकारों की चुनावी बाढ़!


सोशल मीडिया के इस दौर में पत्रकारों की बाढ़ सी आ गई है। हर दूसरा व्यक्ति पत्रकार बनने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि उसके हाथ में कैमरा वाला फोन है। हर चीज की वीडियो बनाने की लत लोगों में लगातार फैलती जा रही है। यह लत समाज के लिए जितनी बेहतर है, उतनी ही खतरनाक भी है।

पत्रकार होना बहुत कठिन है, सिर्फ माइक, कैमरा उठा लेने से कोई पत्रकार नहीं बन सकता है। पत्रकारिता की कई सीमाएं होती हैं, मगर आजकल हर व्यक्ति अपनी विचारधारा के अनुसार चीजों को दिखाने की कोशिश कर रहा है। मेरा खुद का मानना है कि जिन लोगों ने पत्रकारिता की पढ़ाई की है, अगर वही लोग पत्रकारिता करेंगे तो हमारे देश के लिए बेहतर रहेगा।




एक और बात जो मैंने महसूस की है कि जैसे ही किसी राज्य में चुनाव आते हैं तो उस राज्य में पत्रकारों की बाढ़ सी आ जाती है। इतना ही नहीं बल्कि देश भर के पत्रकार उसी राज्य में दिखाई देते हैं। चुनाव के बाद तथाकथित पत्रकार राजनेताओं को उनके वायदे याद क्यों नहीं दिलाते हैं ?

और उस राज्य में फिर 5 साल बाद ही क्यों आते हैं ? हम सभी को यह समझने की जरूरत है कि पत्रकार चुनाव के दौरान आपके और हमारे क्षेत्र में इसलिए आते हैं क्योंकि उन्हें राजनीतिक पार्टियों के माध्यम से अच्छा खासा पैसा मिल जाता है।

आज पत्रकारिता का प्रभाव जनता के बीच लगातार कम होता जा रहा है। इसके पीछे कारण यह है कि हर व्यक्ति के हाथ में मोबाइल पहुंच गया है और गूगल के माध्यम से व्यक्ति अपने क्षेत्र या देश दुनिया के बारे में आराम से सर्च कर सकता है। मैं तो कभी-कभी अचंभा में पड़ जाता हूं कि इन यूट्यूबर्स पत्रकार के पास इतना पैसा कहां से आता है कि ये हर राज्य के चुनाव को कवर करने के लिए चले जाते हैं!

और उनके पास कोई अच्छे खासे विज्ञापन भी नहीं होते हैं। हम सभी को पत्रकारों की इस चुनावी बाढ़ के बारे में सोचना होगा और पत्रकारिता को जिंदा रखने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने होंगे।


- दीपक कोहली


29 August 2025

धन से कई गुना ताकतवर होती है 'शिक्षा'


आज सभी लोग धन कमाने के लिए दौड़-भाग कर रहे हैं या धन के पीछे पागल हुए जा रहे हैं। लोगों ने शिक्षा को भी धन कमाने का एक जरिया मान लिया है, जबकि शिक्षा, धन से कई गुना ताकतवर होती है। शिक्षा हमें वह सब कुछ दिला सकती है, जो हम धन से नहीं खरीद सकते हैं। उदाहरण के लिए हम भले ही कितने ही अमीर क्यों ना हो जाए, ज्ञान और आत्मविश्वास को हम बिना शिक्षा से प्राप्त नहीं कर सकते है। इसलिए हम सभी को अपने जीवन में धन के बजाय शिक्षा को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए।




मैंने महसूस किया है अधिकांश दलित, पिछड़े और गरीब लोग शिक्षा को वह महत्व नहीं देते, जितना धन को देते है। धन भले ही आप के परिवार को दो वक्त की रोटी और अच्छा घर दिला सकता है, मगर बिना शिक्षा के धन को बचा पाना मुश्किल है। मैं आपको अपने दोस्त सौरभ वर्मा के परिवार की कहानी बताता हूं। सौरभ के पापा और चाचा दो भाई थे और दोनों में खूब प्रेम था। दोनों का सोने-चांदी के साथ-साथ ट्रांसपोर्ट का व्यवसाय था। एक दिन अचानक सौरभ के पापा की मृत्यु हो गई। दोनों परिवारों में टकराव आ गया और दोनों परिवार अलग-अलग हो ग‌ए। सौरभ के बड़े भाई ने अपना खुद का सोने-चांदी का काम शुरू कर लिया और दूसरे भाई ने टैक्सी लेकर टैक्सी चलाना शुरू कर दिया।


सौरभ के चाचा के तीन बेटे थे और तीनों ही ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे। सौरभ के चाचा ने अपने एक बेटे को अपने साथ रखकर सोने-चांदी का काम सिखाया और दो बेटों को ट्रांसपोर्ट वाले व्यवसाय में लगा दिया। सौरभ के चाचा ने अपने बड़े बेटे की शादी की और शादी में खूब दहेज मिला यानी एक-दो गाड़ियां भी मिली। इसके बाद सौरभ के चाचा के बेटे ने अपनी खुद की सोने-चांदी की दुकान खोल ली।




इस दौरान सौरभ के चाचा के बेटे को किसी दूसरी लड़की से भी प्रेम हो जाता है और उसको बिना ब्याह घर ले आता है। शादी टूट जाती है और सौरभ के चाचा को बेटे की शादी में मिले दहेज को वापस करना पड़ता है। यूं कहे तो उनका यही से डाउनफॉल शुरू होता है। एक दिन अचानक सौरभ के चाचा के बड़े बेटे ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। लोग कहते हैं कि उसकी गर्लफ्रेंड ने उसे जहर दे दिया था, मगर सच्चाई क्या है आज तक किसी को नहीं पता चल पाया।

सौरभ के चाचा का एक बेटा मर चुका था और ट्रांसपोर्ट व्यवसाय से जुड़े दो बेटे भी शराब के आदी हो चुके थे। आए दिन कुछ ना कुछ कांड करते रहते थे। कभी गाड़ी ठोक देना, कभी गाड़ी को खेतों में चढ़ा देना इत्यादि। व्यवसाय को सही से नहीं चला पाने के कारण ट्रांसपोर्ट के बिजनेस में सौरभ के चाचा को लगातार नुकसान होता जा रहा था। फिर क्या था एक बेटा पागल हो गया। कुछ दिन बाद सौरभ की चाची का देहांत भी हो गया। अब सौरभ के चाचा अकेले पड़ गए और घर की परिस्थितियों को देखकर उनका भी हौसला टूटने लगा। बिगड़ी हालातों को देखकर सौरभ के चाचा को अपने ट्रांसपोर्ट वाले व्यवसाय को धीरे-धीरे कम करना पड़ा।

स्थानीय लोगों को लगता था कि यह व्यक्ति पूरे क्षेत्र में सबसे अमीर है, मगर हकीक़त यह थी कि उसने लोन के सहारे ट्रांसपोर्ट का बिजनेस शुरू किया था। इतना ही नहीं स्थानीय लोगों ने सौरभ के चाचा की दुकान से जो गहने व जेवरात बनाए थे उनमें भी मिलावट की शिकायत आने लग गई। कहते है ना जो जितना अमीर होता है, वो उतना ही भ्रष्ट होता है। एक दिन अचानक सौरभ के चाचा का भी देहांत हो गया।





एक जमाना हुआ करता था सौरभ के चाचा पूरे क्षेत्र में सबसे अमीर माने जाते थे। जिनकी 8-10 बसें चलती थी और पूरे क्षेत्र में उनकी सोने की दुकान बहुत ही फेमस थी। मगर कहते हैं ना अगर आप ज्यादा कमाने के चक्कर में मिलावट करेंगे और गलत तरीके से कमाने की कोशिश करेंगे तो एक दिन आपका सब कुछ खत्म हो जाएगा।

इतना ही नहीं अगर सौरभ के चाचा अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा प्रदान करते तो शायद उनका ट्रांसपोर्ट वाला बिजनेस बच जाता और इसके अलावा उनके बच्चे कोई दूसरा काम या नौकरी भी कर सकते थे। ज्यादा कमाने की लत, मिलावट करने की आदत और शिक्षा से ज्यादा धन को तवज्जो देने के कारण आज सौरभ के चाचा का परिवार लगभग समाप्त है। वर्तमान में सौरभ के चाचा के परिवार में सिर्फ एक बेटा और एक बहु और दो बच्चे हैं। धन के साथ शिक्षा का भी उतना ही महत्व है, जितना हमारे लिए ऑक्सीजन के साथ पानी का होता है।

- दीपक कोहली