साहित्य चक्र
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15 March 2026

आज की विशेष रचनाएँ- 15 मार्च 2026




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ये पृथ्वी है घर सभी का

चलती हुई ट्रेन में बेटिकट
मैं देखता हूॅं अपने समय के दृश्य में
गॅंगातीरे शहनाई फूॅंक रहे हैं बिस्मिल्लाह
अमज़द अली खोज रहे हैं भैरवी के रॅंग
और पूछ रही हैं उमराव जान पूछ रही हैं
दरवाज़े खोलते हुए,खोजते हुए बचपन
ये क्या जगह है दोस्तों,कौन-सा मुक़ाम है
कि जगह-जगह,ग़र्दो-ग़ुबार ही गुबार है
बताते हैं,समझाते हैं भीमसेन जोशी
किशोरी अमोणकर को स्मृतियों में
ज़रा भी अपराध नहीं है सपने देखना
देखना सपने सबूत है आदमी होने का
सपने नहीं तो आदमी भी कहीं नहीं
सपनों का होना,आदमी होने का सपना है
किसी को भी घटाने से घटता है ख़ुद ही
सच्चा-झूठा नहीं होता है देश कोई भी करते हैं
होड़ काल से और मरते हैं बेमौत
हथियारों की होड़ ही बनाती है पागल
और पागल आदमी देश नहीं,दुश्मन है
किसी भी देश में,किसी भी देश का
भूल जाता है आदमी कि आदमी है वह
नहीं किसी दूसरी दुनिया का दूसरा प्राणी
हाथ हैं दो ही उसके भी,जैसेकि अन्य
पाॅंव हैं दो ही उसके भी,जैसेकि अन्य
कान हैं दो ही उसके भी,जैसेकि अन्य
और है एक खोपड़ी भी सभी के जैसी ही
फिर क्यों घृणा,क्यों ईर्ष्या,युद्ध क्यों
फिर क्यों ध्वस्त बारहखड़ी फिर-फिर
फिर क्यों मटियामेट पानी के संकल्प
क्यों क़त्ल किये जाते हैं फिर उड़ते पक्षी
अपनी-अपनी हद के बेहद में हैं सभी
और अपनी-अपनी ध्वनियों के ताप में भी
अपनी-अपनी स्वतंत्रताओं सहित निर्मल
है नहीं जगह कम किसी की भी,कहीं भी
ज़रा-सा वक़्त,ज़रा-सी जगह है सभी की
ज़रा-ज़रा मिट्टी,ज़रा-ज़रा आग,है सभी में
ये पृथ्वी है घर सभी का।


- राजकुमार कुम्भज


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यू टर्न

जब देखो आजकल लोग यू टर्न लेते हैं मार
अपने कंधों से जिम्मेवारी एकदम देते हैं उतार
सोचता रह जाता है कोई कि यह क्या हो गया
झूठ बोलते है फिर मुकर जाते हैं लेते है पल्ला झाड़

सबसे ज्यादा यू टर्न लेते हैं नेता छोटा हो या बड़ा
कड़वे बचनों का तीर रहता है इनके तरकश में पड़ा
चिकना घड़ा होते हैं इनको परवाह नहीं किसी की
वक्त पड़ने पर होता नहीं किसी के साथ खड़ा

अभी कहते हैं कुछ थोड़ी देर में हैं मुकर जाते
जुबान इनकी चलती है दोष मीडिया पर हैं मढ़ आते
आका को खुश करने से बिल्कुल नहीं हैं घबराते
असर इन पर कोई नहीं चिकने घड़े हैं बन जाते

सड़क पर जब आगे हैं निकल जाते
तब यू टर्न लेकर फिर हैं लौट आते
यू टर्न लेना भी कई बार होता है जरूरी
वरना अपनी मंजिल तक कभी नहीं पहुंच पाते

बॉस अपने मातहत से करवाता है बहुत काम
न करे तो फिर फंस जाती है आफत में जान
लिखित में होता नहीं धौंस से है करवाता
उसकी यू टर्न से फंस जाता है कोई,
आता नहीं उसका नाम


- रवींद्र कुमार शर्मा


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आज भी याद है वह किताब,
खोलूँ तो महके जनाब,
उड़ते हैं पन्नों से अलसाए ख़्वाब,
भीग उठे मन का शबाब।

बीच पन्नों में सूखा गुलाब,
दबा हुआ कोई अनकहा जवाब,
हल्की सी खुशबू, हल्का सा हिसाब,
और धड़कनें बेहिसाब।

कहीं शार्पनर से छिली पेंसिल की कुरचन,
कोनों में अटकी बचपन की धड़कन,
स्याही के धब्बे, आधी सी रचना,
जैसे समय की कोई अटकी कम्पन।

कभी नाम लिखा था चुपके से,
कभी आँसू गिरे थे पन्नों पे,
कभी हँसी छिपी थी लफ़्ज़ों में
सब दर्ज है उस किताब में।

कैसे भूलें वह किताब,
जिसमें उम्र का हर पड़ाव,
कुछ यादें थीं बेहद ख़ास,
और कुछ सपने… बेहिसाब।


- सविता सिंह मीरा


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इल्जाम

एक इल्जाम
मेरे नाम आया है
न होते हुए भी मोहब्बत
सरेआम
मेरा नाम आया है।

मैं ढूंढता रहा
हर जगह खुद को ही
न जाने क्यों
फिर भी मेरा नाम
किसी ओर के साथ आया है।

लोग पूछते रहे मुझे
मेरे गम का कारण
और मैं हर गम में
खुदा तेरा नाम
हर बार लेता आये हूँ।


- डॉ. राजीव डोगरा


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सभ्यता

सुनो सभ्यता!
पूर्णता को तरसती तुम्हारी परिभाषा
विचलित करती है मुझे
कितनी बदरंग हो गयी है
तुम्हारी प्रकृति
तुम्हारी रक्त-नलिका में बहने वाला लहू
संवेदनशीलता से दूर
क्यों होता जा रहा है
देखने को बाध्य क्यों है
आज का मनुष्य
अपने समाज में एक भीषण युद्ध
सभ्यता का
सभ्यता के विरुद्ध ?


- अनिल कुमार मिश्र


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मातृ भाषा हिंदी दिवस

आज बनी त्योहार है हिंदी,
आज बड़ी खाश है हिंदी।
मिट रहा जिसका अस्तित्व,
पहन कर ताज खड़ी हिंदी।

पाती थी सम्मान जो हिंदी,
आहत सी ताकती वो हिंदी।
नहीं क्यों रोज देते सम्मान,
आज ही सिर्फ बोलते हिंदी।

चमकी बिंदिया सी हिंदी,
बन प्रश्नचिह्न सी खड़ी हिंदी।
लेकर उपहास की थैली,
कहते हमारी मैया है हिंदी।

दंश उपहास का झेलती,
अपमानित होती रहती हिंदी
सीमित वेद उपनिषद भाषा
सूर तुलसी,मीरा की हिंदी।

खोखली रस्मों का पहना ताज,
बनाते है महान हम हिंदी।
पढ़ा बच्चों को हम अंग्रेजी,
कहते हमारी शान है हिंदी।


- मीना तिवारी

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गांव में एक घर

सड़क के उस छोर पर
छोटे से गांव में,
नीम की छांव में
घर के आंगन में एक नल हुआ करता था
गांव में मेरा भी एक घर हुआ करता था।
मिल जाती थी अक्सर
बाट जोहती अम्मा, हुक्का पीते बाऊजी,
शाम से ही ताक में जलता,
एक दिया हुआ करता था,
गांव में मेरा भी एक घर हुआ करता था।
मिट्टी का एक चूल्हा,
खूंटे से बंधे चौपाए,
आंगन में बिछाकर खाट,
हमारा बिस्तर हुआ करता था,
गांव में मेरा भी एक घर हुआ करता था।
चूल्हे पर हांडी में पकता हुआ साग,
आंगन में मिट्टी से लीपने की खुशबू,
कोने पर चटनी बनाने को,
सिल पर पत्थर हुआ करता था,
गांव में मेरा भी एक घर हुआ करता था।
छत पर नाचता मोर,
गली के बाहर पहरेदारी करता कुत्ता,
पेड़ पर गौरैया का घर,
गुटर गूं करता कबूतर हुआ करता था,
मेरा भी गांव में एक घर हुआ करता था।
हरे भरे खेत , खेतों में बहता ताजा पानी
पानी में गोते लगाते बगुले,
गेहूं और बाजरे की बाल,
मीठा मीठा मटर हुआ करता था,
गांव में मेरा भी एक घर हुआ करता था।


- मंजू सागर



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समंदर मे चीनी घोलना सीखिए
हो सके त मीठ बोलना सीखिए

अगर पूर्णिमा देखना चाहते है,
दिल के दराज़ खोलना सीखिए

ज़ब चराग जलाए है आसियानो मे
तूफान जैसा भी हो संभालना ‘सीखिए

जिनगी को आराम से चलने दीजिये
मधुमक्खी के छाता मे हाथ न डालना सीखिए

बिना मेहनत के घी नही निकता
मन लगा के दही मोहना सीखिए

दुनिया बस मे हो या ना हो लेकिन
परिवार के बाट खोजना सीखिए

घर आंगन मे घास पुस लग जाए तो
मुहब्बत के खुरपी से सोहना सीखिए

मछलीं पानी मे नहांने से शुद्ध नहीं होंगी
ईमानदारी के साबुन से दाग धोना सीखिए

जिस कश्ती मे मुसाफिर बैठे हुए है ‘सदानंद’
एक इलतेज़ा है नाव मत डुबोना सीखिए


- सदानंद गाज़ीपुरी


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हिसाब

लाशों पर बने महलों में क्या चैन से रह पाओगे,
छीनी जो सांसे उनका हिसाब क्या दे पाओगे ?

भूख से बिलबिला रहे हैं जो बेबस मजबूरी में,
उन लोगों को कभी अपना मुख दिखा पाओगे ?

इंसान है खुदा की बनाई बेशकीमती रचना,
उस कीमत को कैसे सिद्ध कर पाओगे ?

कीड़े मकोड़े की तरह मसल देते हो इंसानों को,
उनका इंसान होने का दर्द कब समझ पाओगे ?

हर मसला नहीं होता बम गोली बारूद से हल,
इस छोटी सी बात को दिमाग में कब बिठाओगे ?

माना की आप जैसी समझ नहीं है हम लोगों की,
इंसा को इंसा समझने की समझ कब लाओगे ?

खुदगर्जी में फंसकर मत खेलो होली रक्त की,
रक्त के हर कतरे का हिसाब कैसे दे पाओगे ?


- राज कुमार कौंडल



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तेरी दोस्ती

तेरी दोस्ती ने हमको
जीवन जीना सिखा दिया
उदास रहता था मेरा चेहरा
उसको मुस्कुराना सिखा दिया।

न मिली मोहब्बत जीवन में
इसका अब कोई गम नहीं रहा
तेरी दोस्ती ने मुझको
हर लम्हा जीना सिखा दिया।

रब करे तू हमेशा खुश रहे
मेरी हर दुआ में शामिल रहे
तेरी दोस्ती ने मुझको
जीवन का बदलाव सिखा दिया।

मेरी रिद्धियां मेरी सिद्धियां
तुमको सदा सलामत रखें
तेरी दोस्ती ने मुझको
मानव से महामानव बना दिया।


- डॉ. राजीव डोगरा


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अब चलते हैं...

जिंदगी के इस रंगमंच पर सब
अपना किरदार निभा जाते हैं।
कुछ लोग कठपुतली बन जाते है
कुछ लोग मेहनत करते जाते हैं।

बहुत हुआ एहसान ए जिंदगी मुझ पर...
अब चलते है बस अब चलते हैं।
सुबह सुबह जब आँखें
खुलती मंज़िल ही दिख जाती हैं।

लिए बोझ सर पर जिंदगी की
मेहनत करते जाते हैं।
बहुत हुआ एहसान ए जिंदगी मुझ पर..
अब चलते है बस अब चलते हैं।

मदद किया अपनो का अपना दर्द भुलाकर।
अपनो ने मुँह ऐसा मोड़ा कि गिरगये हम जमी पर।
बहुत हुआ एहसान ए जिंदगी मुझ पर...
अब चलते है बस अब चलते है।


- अजीत कुमार सिंह



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काश! मैं, आपको अपनी कमाई से
एक छोटा सा तोहफा दे पाता...
मेरा सारा कर्जा उतर जाता...
आपकी दी गई ज्ञान की तिजोरी
मैंने आज भी संभाल कर रखी है...
चाहे पांच पीढ़ी पहले का इतिहास हो
या समाज को आईना दिखाते हुए
आपका विधवा से शादी कर लेना हो
आप हमारे बरगद के वृक्ष हो...
जिसकी छाया हमेशा हमारे और
आने वाले पीढ़ी के ऊपर रहेगी...
आपका परिश्रम, संघर्ष की कहानी,
मजबूत दृढ़ संकल्प.. और
अपनी बातों से लोगों को जीतने की कला...
मुझे हमेशा आपकी याद दिला देती है।
काश! मैं आपको अपनी कमाई से
एक तोहफा दे पाता...


- दीपक कोहली



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10 October 2025

आज की प्रमुख रचनाएँ- 10 अक्टूबर 2025





आँखें

बरामदे में खाट पर पड़ी
वृद्ध पिता की पथराई आँखें
तलाशती हैं
अपने बच्चों को
जो थोड़ी देर साथ बैठें
पिता की आँखें देखकर
समझ जाएँ उनके दर्द
जैसे उनके बचपन में
वह पिता झट से समझ जाता था
और पल में एक फूँक से
उनके सारे कष्ट हर लेता था
समय बदल गया है
आईने ने संस्कार के विकृत रूपों को
तरह-तरह से दिखाया है
पथराई आँखों में सिर्फ
उम्मीदें हैं,सपने हैं
घरों में चलते हुए कुछ लोग
अपने हैं
हाँ, सपने हैं।


- अनिल कुमार मिश्र


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प्रेम के रंग
किस रंग में तुझे देखूं
प्रेम तेरे रंग अनेक,
निश्चल सी हंसी तेरी
शुभ्र रंग भरती नेक।

निस्वार्थ की भाव ले,
जो आती है चुपचाप।
नेह रंग से भर जाती,
मन के ये सारे ताप।

पाने की न खोने की
हो न जिसमें अहसास,
लाल रंग फूलों में जैसे
सौरभ की हो प्यास।

चांद व चकोर सी
जिस प्रेम में हो लास,
हरी हरी बसुंधरा सी
बिखराती है उल्लास।

समर्पित हो जिसमें
तन मन एकाकार कर
नयी सृष्टि की रचना,
देखी इस भूतल पर।

हवस व वासना का
भूखा है जो प्रेम।
काले रंग की कालिमा,
दे जाती है वह प्रेम।

प्रभु चरणों में समर्पित,
प्रेम का रंग अनोखा है,
जग में अभी तक वह रंग
नहीं किसी ने देखा है।

ऐसे ही एक नये रंग में
रंग डालो प्रेमिल भाव,
जिसमें सब रंग घुलकर,
हों जाए बस सम भाव।


- रत्ना बापुली


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आजकल का व्यापारी

व्यापार में न कोई मित्र होता
न ही कोई दुश्मन होता।
यहां तो सिर्फ ग्राहक व दूकानदार होता।
ग्राहक आए तो आदर होता
न आए तो सलाम दूर से होता।
दूसरे की दुकान में ग्राहक जब जाता
तो पहला अपने को कोसता नजर आता।
ग्राहक अपनी मर्जी का मालिक है होता
हमेशा अपनी पसंद की वस्तुएं ही देखता।
व्यापारी अपने व्यापार में मस्त रहता
ग्राहक को देवतुल्य है पूजता।
ग्राहक जब भी प्रवेश करता
उसको आवभगत में ही हर लेता।
आजकल ग्राहक भी जागरूक सा लगता
व्यापारी से कभी कभी जरूर है अड़ता।


- विनोद वर्मा


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सपनों की दुनिया

ज़िन्दगी के कुछ पुराने सपनों को हटाकर,
दिल में और नये-नये सपने मैंने सजा लिये।

फिर उन सब नये सपनों को पाने के खातिर,
दिल के सारे अरमान मैंने दिल में दबा लिये।

अब इन नये-नये सपनों में घिरी ये ज़िन्दगी,
चाहकर भी इनसे बाहर आना नहीं चाहती।

मगर इन सपनों का ये चक्रव्यूह भी तो मैंने,
मस्तिष्क से बार बार सोचकर ही तो रचा है।

अपने मस्तिष्क के इन निष्कर्षों पर ही मैंने,
दिल की धरा पर इन सपनों को सजाया है।

अब इन सपनों की दुनिया में डूबा मेरा मन,
स्वतंत्र विचारों की एक लम्बी उड़ान भरकर।

कागज और कलम से इन्हें साकार करता है,
ये सपने ही बन चुके हैं हकीकत ज़िन्दगी की,
अब तो मैं रोज इनमें ही जीता और मरता हूं।


- केशव शर्मा रसिक


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प्रकृति माँ

हरी घास पर ओस झलके, सूरज की किरणें मुसकाएँ,
फूलों की खुशबू संग-संग, मंद पवन गीत सुनाएँ।

नदियाँ गाएँ मधुर तराने, झरनों की रुनझुन प्यारी,
पर्वत की चोटी पर बैठी, बादल बनती सवारी।

वन की छाया, शीतल छूआँ, देती जीवन को आधार,
प्रकृति माँ की ममता अद्भुत, करती सृष्टि का श्रृंगार।

किन्तु मनुज ने लोभ में आकर, काट दिए सब पेड़ हज़ार,
धरती रोई, नदियाँ सूखी, खो गया उसका श्रृंगार।

आओ फिर से प्रण ये लें हम, हरित धरा को सजाएँ,
पेड़ लगाएँ, जल बचाएँ, माँ प्रकृति को अपनाएँ।

“प्रकृति हमारी पूजा है, जीवन का है सार,
इसे सहेजें, इसे निखारें, यही सच्चा कर्म हमारा”


- डॉ सारिका ठाकुर 'जागृति'


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चौथ को क्या लिखूँ!
यहां तो शब्द भी धोखा खा जाते है।
चांद लिखूँ,
निर्जला उपवास लिखूँ,
प्रेम लिखूँ,
दोस्ती लिखूँ ,
जीवनसाथी लिखूँ ,
जिंदगी लिखूँ,
या दो अजनबियों का सामजंस्य लिखूँ,
खुदखुशी न कर ले ये चांदनी रात भी
दीदार कर
उस तारों में तुम्हारी उजास देख!


- अंशिता त्रिपाठी


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शाम अभागी

कोई आज जब सुबह घर से निकला था,
शाम अभागी थी वो घर नहीं पहुंच पाया।

मौत कैसी बेरहम आई पहाड़ बनकर,
दो तीन बच्चों को छोड़ कोई बच नहीं पाया।

जिन घरों के सूरज अस्त हो गए इस घटना में,
उन घरों में अब कैसा ये अंतहीन मातम छाया ।

जहां की लिखी है वहां सबने शरीर छोड़ना है,
विधना के लेख से भला कोई नहीं बच पाया।

नन्हे बच्चों की किलकारियां भी खामोश हो गई,
इस अनहोनी में युवा स्वप्न कोई नहीं बच पाया।

हे परमात्मा सबको ये दुख सहने की देना शक्ति,
जो खो चुका सब कुछ वो फिर कब हंस पाया।

अपने श्री चरणों में देना उन सबको स्थान,
प्रभु जिन जिन को तूने अपने पास है बुलाया।


- राज कुमार कौंडल


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चलाने वाला था लेखनी,
कुछ लिखने के लिए
कागज पर उकेर सकूं शब्दों को,
ये सोच कर चिंतन करता रहा,
मस्तिष्क में दौड़ते रहे अनगिनत शब्द,
मुझे अचंभित करते रहे और
अपनी ज़िद पर अड़े रहे
मुझे पहले लिखो,
यह कह कर विवश करते रहे,
मेरी आज की लेखनी उत्कृष्ट बने
मैं भी इसी ज़िद पर अड़ा रहा,
तभी शब्द ने मुझसे कहा,
इसका फैसला तो निर्णायक मण्डल करेगा
हाथ में थामे हुए अपनी लेखनी को,
मैं भी चिन्तन करता रहा,
आज की उत्कृष्ट बने मेरी लेखनी
बस यही सोचता रहा।


- बाबू राम धीमान


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अजनबी तन्हाई

कौन सा दर्द
अपने सीने में छुपाए रखते हो?
मुस्कुराहट के पीछे
कौन सा गम
अपने ह्रदय में दबाए रखते हो?
कहते हो तुम
लोगों से अक्सर
कि मुझे कोई गम नहीं ?
फिर इस
तन्हाई के आलम में
किस से गुफ्तगू का
माहौल बनाए रखते हो?
सुना है लोगों से
कि तुम बहुत
बातें करते हो
पर आता है नाम मेरा तो
क्यों अपने लबों पर खामोशी
और आंखों में मुस्कुराहट रखते हो?


- डॉ. राजीव डोगरा


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दर्द देता है

दिल में चोट,
पैर में मोच,
रिश्तों में विस्फोट,
इंसानों की टोक
दर्द देता है।
पुरानी यादें,
टूटे वादे,
नापाक इरादे,
बिस्वास हद से जादे ,
दर्द देता है।
यात्रा में भारी समान,
घमंड से भरा इंसान ,
बेलगाम जुबान,
निकलता हुआ प्राण,
दर्द देता है।
विरह की रात,
अपनों से विश्वासघात
देश में जात पात,
कड़वी बात,
दर्द देता है।
निरंकुश सरकार,
गरीबी से लाचार,
फैला व्याभिचार ,
बहु बेटों का दुर्व्यवहार
दर्द देता है।
बिच्छू का डंक
परिंदों का कटा पंख
परीक्षा में कम अंक
दिमाग में लगा जंग
दर्द देता है।


- सदानंद गाजीपुरी


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23 September 2025

आज की प्रमुख रचनाएँ- 23 सितंबर 2025






दादाजी का वह पुराना जैकिट और चश्मा
मुझे आज भी याद है वह दादाजी की काले रंग की पुरानी जैकिट,
जिसे वे विद्यालय के उत्सवों,
सामाजिक कार्यक्रमों व त्योहारों पर पहना करते थे।
यह सिलसिला कई वर्षों तक बदस्तूर जारी रहा,
पता नहीं क्या कारण रहा कि उन्होंने नई जैकिट ही नहीं खरीदी।
शायद उन्हें नई जैकिट की जरूरत महसूस ही नहीं हुई होगी,
या फिर वे जैकिट जैसी वस्तु पर फिजूल खर्च नहीं करना चाहते थे।
उनकी आँखों की शोभा बढ़ाता
वह पुराना गोल कांच का चश्मा जिसकी डंडी भले टूट गई थी,
फिर भी उन्होंने कई वर्षों तक उस पुराने चश्मे की डंडी को नहीं बदला।
चश्मे की डंडी टूट भी गई तो उस पर धागा बांधकर काम चलाया,
उस पर चश्मे ने भी दादाजी पर अपना प्रेम दर्शाते हुए
पूरी तल्लीनता से कई वर्षों तक उनका साथ निभाया।
दादाजी द्वारा कई वर्षों तक नई जैकिट
न खरीदना और पुराने चश्मे से ही काम चलाना,
मुझे नहीं पता कि उसके पीछे उनका कौनसा तर्क छिपा था।
जहां आज के समय में चीजें व
रिश्ते किसी के जीवन में ज्यादा समय टिकते ही नहीं है,
शायद दादाजी जैसे पुराने लोग ही थे
जो हर रिश्ते और चीज से जुड़कर रहना जानते थे।
अब वे दादाजी जैसे पुराने लोग धीरे धीरे
हमारे बीच से अलविदा लेते जा रहे हैं,
पर जाते जाते हम सबको जीवन में एक गहरी सीख दिए जा रहे हैं।


- भुवनेश मालव


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काश मैं लड़का होती!

काश मैं लड़का होती!
बाइक लेकर घूमने की आज़ादी
बाहर जाने पर जवाब
देने की ज़िम्मेदारी न होती।
सड़क पर घूमने पर
लोग ये न कहते,
"अरे, ये तो मिश्रा जी की बेटी है।"

पतली हो या मोटी, या
शादी कैसे होगी, इसका
ताना न सुनना पड़ता।
काश मैं लड़का होती!
"अरे, खाना बनाना नहीं आता,
लड़की है, शादी कैसे होगी,
"ये सुनने का सिरदर्द न होता।

काश मैं लड़का होती!
बाहर जाने से पहले
हज़ार दफ़ा देखने की
चिंता न होती कि ठीक है,
कहीं से कुछ दिख तो नहीं रहा।
काश मैं लड़का होती,
खुलकर जीने की चाहत पूरी होती।

गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड होने पर
समाज में बेइज़्ज़ती और
गली की आंटियों की
पंचायत की चिंता न होती।

काश मैं लड़का होती!
रात में बाहर रहने की इजाज़त
न लेनी पड़ती।
रेप होने का डर न होता।

चाहे जो हो जाए,
भले ही नौकरी करती हो,
"खाना तो बनाना आना ही चाहिए,"
ये सुनने का सिरदर्द न होता।
काश मैं लड़का होती!
काश मैं लड़का होती!


- वैभवी मिश्रा


*****


कंचन–चंदन

जो क्षय से मुक्त सदा, वह तन कैसा?
जो हिया से रहित, वह जग कैसा?
जो बाँध ले मन को मर्यादा में,
उससे उत्तम बंधन कैसा?

जो विलास में व्यतीत हो, वह जन्म कैसा?
जो अहंकार का प्रतीक हो, वह धन कैसा?
मन रम गया हो पीताम्बर में, उससे उत्तम चिंतन कैसा?

ध्येय न्याय न हो, तो रण कैसा?
असत्य का आलिंगन करे, वह जन कैसा?
कांति कंचन की धूमिल कर दे,
उससे उत्तम चंदन कैसा!


- शिवांशी पाण्डेय


*****


"बचपन और हम"

एक ऐसा दौर जहाँ हँसी-खुशियों सी और हम, हम से थे।
एक ऐसा लम्हा जो जीते-जी जीना पाए।
एक ऐसा वक़्त जो वक़्त भुला दे… और समय रुकवा दे।
एक ऐसा किस्सा जो हर ग़म भुला दे…
और एक रौशनी ऐसी जो अंधकार भुला दे…
बचपन सुकून सा और हम चंचल से…
बचपन चाँद की शीतल रौशनी सा और हम चकोर पक्षी से…
बचपन एक शांति था, बचपन एक लम्हा था, बचपन एक प्रेम था।
बचपन एक किस्सा था और बचपन एक बचपन था।
ना आज की माया और ना आज का दुःख था…
ना आज की फ़ितरत और ना आज की किस्मत थी…
ना आज से हम और ना आज से तुम थे…
थे तो बस हम और हमारे खिलौने…
ना होता था दुःख का बोझ और ना होती थी माया की माया…
वो एक लम्हा था जो डूब गया समय में…
वो एक लम्हा था जो डूब गया समय में…
वो एक बचपन था जो बीत गया बचपन में…


- मानव. वी. बारड


*****


इससे
ज्यादा पागल
हो पाउँगा।
इतना
आवारा बादल
न हो पाउँगा।
मैं
नहीं देख पाउँगा
दो आदमियों के
काम के समय से
दो घंटे अधिक
काम करना
मगर परिणाम
शून्य गुणे शून्य
बराबर शून्य?
कारण
अठारह घंटे
काम मतलब
स्वयं के साथ ज्यादती
और शोषण,
नियमानुसार
एक आदमी
का केवल आठ घंटे काम
विधि सम्मत है,
इस प्रकार
आठ घंटे के
अतिरिक्त दस घंटे
काम करना
एक आदमी की दिहाड़ी
और दूसरे आदमी कीआँखों
में दिहाड़ी की
चमक के दो घंटे
छीनना किसी अपराध से
कम नहीं है।
रोजगार छीनना
संज्ञेय अपराध है,
राष्ट्र की नींव को दरकाना है,
विकास पर ब्रेक लगाना है,
कायर और नपुंसक
इतिहास पर रोते हैं।
पराक्रमी, पुरुषार्थी
अतीत का रोना छोड़कर
वर्तमान को दृढता से मज़बूत
करते हैं
और
नापते हैं वो डग
जो बन जाती है
अनुकरणीय लीक...
जिस पर चलते हैं सब
जाति,मजहब से मुक्त होकर
त्यागकर समस्त संकीर्णतायें
निरपेक्ष भाव से....
मगर
तुम
मज़बूत नहीं,
मजबूर
में अपना
अस्तित्व सुरक्षित देखते हो,
पर याद रखना मजबूर
जब मर्यादाएं लाँघता है...
तब उठती ऊँची ऊँची ज्वार भाटाएँ
दरकने लगती हैं
केवल अपने अस्तित्व की
रक्षा करती चहरदिवारियां...
ईमारतें करने लगती खून की उल्टियां
याद रखना
सड़कों का नंगानाच
बहुत खतरनाक
होता है...


- राधेश विकास


*****


तीस लाख का चैक चमका
साहित्यिक मंच के बीच,
तालियाँ गड़गड़ाईं,
कैमरों की फ्लैश से चमका
एक लेखक का नाम।

बधाई हो!
कवि ने रच दिया वह उपन्यास
जिसने सैकड़ों प्रतियाँ रोज़
पाठकों की अलमारियों में जगह पाई।
यह गौरव है,
यह इतिहास है,
यह हिंदी का वह उत्सव है
जिसकी प्रतीक्षा सदियों से थी।

पर,
इतिहास हमेशा सीधा नहीं होता।
प्रश्न पंक्तिबद्ध खड़े हैं,
आँखों में धधकती संशय की लपट लिए-
क्या यह बिक्री सचमुच पाठक की भूख है?
या किसी और भूख का विस्तार?

नई वाली हिंदी
अपने कोमल वस्त्र पहनकर
पुरानी हिंदी की देह पर चढ़ती है,
और कहती है-
"मैं हूँ आधुनिक!
मैं हूँ विश्व-स्तरीय!
मैं ही हूँ वह खिड़की
जिससे बाज़ार की हवा आती है।"

किन्तु,
यह खिड़की कभी
’दीवार में एक खिड़की रहती थी’ से अलग नहीं,
फिर भी अलग है।
क्योंकि वहाँ शब्द थे आत्मा के,
यहाँ शब्द हैं मुद्रा के।

रॉयल्टी का चैक
एक तमाशे की तरह लहराया गया,
मानो कहा जा रहा हो-
देखो! लेखक भी करोड़ों का खेल खेल सकते हैं।
मगर प्रश्न है-
बाकी कवि, बाकी गद्यकार,
बाकी वे सैकड़ों चेहरे
जिनकी पांडुलिपियाँ धूल खाती हैं,
उन्हें किसने पूछा?
कितनी रॉयल्टी उनके हिस्से आई?

यह व्यावसायिक स्टंट
केवल एक शोभायात्रा नहीं,
यह है सांस्कृतिक षड्यंत्र,
जहाँ एक सादगीपूर्ण लेखक की छवि
प्रकाशक की प्रचार-योजना की मूर्ति बन जाती है।

पाठक चाहिए सबको-
पर पाठक कहाँ हैं?
पाठक की दुनिया भी संकट में है।
पढ़ने की आदत
लुगदी साहित्य की आग में जल रही है,
जहाँ ’नई वाली हिंदी’
सिर्फ़ ’नई वाली फिल्म’ की तरह
अंग्रेज़ी लहजे में हिंदी का मुखौटा पहनती है।

क्या यह साहित्य है
या ग्लोबलाइजेशन का नया ब्रांड ?
जहाँ लेखक का नाम
विज्ञापन की तरह चमकता है,
पर शब्दों का दर्द
धीरे–धीरे अदृश्य हो जाता है।

रहीम ने गंग को छप्पय पर
छत्तीस लाख दिए थे,
क्योंकि कविता ने सम्राट को झुकाया था।
आज तीस लाख का चैक
कविता नहीं,
मार्केटिंग की रणनीति को झुकाता है।

कबीर-तुलसी को मदद मिली थी
मानवीय करुणा से,
आज लेखक को मदद मिलती है
किसी राजनीतिक मंच से।

कविता पूछती है-
क्या साहित्य वही है
जो बिक सके?
क्या वह शब्द,
जो आँसुओं को चीरकर निकलते हैं,
अब केवल आँकड़ों की तालिका में दर्ज होंगे?

सच यह भी है-
विनोद कुमार शुक्ल अनुपम हैं,
उनकी सादगी से लिपटी भाषा
एक गाँव की मिट्टी सी महकती है।
उन्हें मिला धन,
एक व्यक्तिगत सम्मान है।
पर यह भी सच है-
उनकी रचना को बाज़ार का उत्सव बनाकर
अन्य लेखकों की उपेक्षा
हिंदी की आत्मा पर प्रहार है।

नई वाली हिंदी!
तू कब तक नकल करती रहेगी
नई वाली फिल्मों की,
नई वाली अर्थव्यवस्था की,
नई वाली भूख की?
क्या तू कभी
पाठकों और लेखकों के बीच
साझी संस्कृति की आवाज़ बनेगी?

हमें चाहिए
नया अभियान,
जहाँ प्रकाशक लाभ नहीं,
संस्कृति का प्रसार सोचें,
जहाँ लेखक ईर्ष्या नहीं,
आपसी सम्मान बाँटें,
जहाँ पाठक किताब को
सजावट नहीं,
साँस की तरह अपनाएँ।

साहित्य का संकट
स्टंट से नहीं टलेगा।
हमें फिर से खड़ा करना होगा
पढ़ने का लोकतंत्र।
और नई वाली हिंदी को कहना होगा-
तू चमकदार आवरण नहीं,
साधारण शब्दों की गहराई बन।


- गोलेन्द्र पटेल


*****


मेरा बचपन

समय था बहुत पुराना
वह भी क्या था ज़माना
जब सबके घर में थे झांकते
बेरोकटोक था आना जाना

पट्टी पर गाज़ण थे चढ़ाते
नाल की कलम से थे लिखते जाते
केले के पत्तों को जलाकर बनती थी स्याही
कलम से हाथ मुंह काले करके थे घर आते

किताबें नई नहीं थी होती
पुरानी से काम थे चलाते
हर साल नहीं बदलते थे किताबें
बड़े भाई बहिन की किताब से थे पढ़ जाते

सैल से निकालते थे कांटा
पट्टी पर लाइनें उसी से थे लगाते
मशक देते थे उसी से अध्यापक
कान भी खींचते थे डंडे भी थे बरसाते

जूते नहीं होते थे
नंगे पांव स्कूल थे जाते
अरमानों से भरी काग़ज़ की किश्ती
बरसात के पानी में खूब थे चलाते

पैसा नहीं होता था जेब में
फिर भी कागज़ के जहाज थे उड़ाते
गुल्ली डंडा बहुत थे खेलते
गुल्ली को बहुत दूर थे गिराते

आजकल के बच्चे टैब हैं चलाते
पर हम लकड़ी की पट्टी पर थे लिखते जाते
स्लेट के ऊपर स्लेटी से थे लिखते
गलत को झट थूक से थे मिटाते

अब वह बचपन न जाने कहाँ खो गया
पीठ पर भारी बस्ता जमाने को क्या हो गया
नौनिहाल करे तो क्या करे
होम वर्क करते करते ही सो गया


- रवींद्र कुमार शर्मा


*****


“प्यार से भरे होते”

खलबली, हलचल, हाहाकार,
बेशर्मी, बेहया, भव्याचार,
कुकृत्य, चोरी, भ्रष्टाचार,
बेबस, असहाय, लाचार,
आपदा, विपत्ति, अनाचार,
दुर्घटना, आगजनी, अत्याचार,
निंदा, चुगली, कुविचार,
गोली, चाकू, बम वौछार,
खून, हमला और प्रहार,
झगड़ा, फसाद, ललकार ,
धन, जमीन, नार,
रंजिश, इर्ष्या, खार,
अल्पवृष्टि, अतिवृष्टि, बाढ़,
तूफ़ान, चक्रवात, भूकंप बार-बार,
ये चंद शब्द आजकल पा रहे व्यवहार,
अति पड़ी है इनसे हर पत्रिका, अखबार,
विपरीत शब्द इनके अगर प्रयोग में होते,
सुख चैन न अपना, न औरों का खोते,
हर घर, गली और मोहल्ला प्यार से भरे होते।


- धरम चंद धीमान


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बारिश की बूँद

जाती बारिश की सहमी बूंदें
बरस रहीं देखो थम-थम कर
जाने वाले का अंतस बदला
रफ्तार थमी है आज सहमकर।

बूँदों की ताकत सब जाने
बारिश की शक्ति पहचानें
देश-विदेश सब जल में डूबे
क्या जाने,क्या-क्या पहचानें।

विकल हो गयी सारी दुनिया
इस बारिश ने सबको तड़पाया
कई गाँव,शहर,उजड़े,बिखरे
जलमग्न हुए सब खूब सताया।

उफनी सब नदियाँ,सागर उछले
जगत लीलने को तैयार
कई पर्वत की साँसें डोली
आया भूभृत कर सीमा पार।

धरती काँपी, हिल उठा व्योम
देखा बारिश का रौद्र रूप
अब जाने की बेला आयी
बदला अब तो रूप अनूप।

सब आते हैं सब जाते हैं
प्रकृति ने सबको बांधा है
गर्जन-तर्जन की भी सीमा है
सुख पूरा तो दुःख आधा है।

सहमो ऐ बारिश की बूँदे!
अपने कर्मों पर लज्जित हो
फिर एक वर्ष बाद तुम आना
संस्कारों से सज्जित हो।

कभी विनाश की बात ना करना
अपना स्वरूप विकराल न करना
सुंदरता की परिभाषा
ऐ बूँद! सदा तुम सुंदर रहना।


- अनिल कुमार मिश्र


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हिंदी का गुणगान

हिंदी का मैं गान करता हूँ
हिंदी का मैं सम्मान करता हूँ।
कभी मीरा को सुनता हूँ
कभी कबीर को सुनाता हूँ।
कभी जायसी के रहस्य में खो जाता हूँ
कभी केशव के काव्य प्रेत से टकराता हूँ।
कभी नानक की गुरुबानी बोलता हूँ
कभी चंदबरदाई की वीरगाथा गाता हूँ।
कभी तुलसीदास की तरह
राम नाम का गुणगान करता हूँ।
कभी सूरदास की तरह
कृष्ण की हठकेलिया सुनाता हूँ।
कवि हूँ हर हाव में, हर भाव में
हिंदी का गुणगान करता हूँ।


- डॉ. राजीव डोगरा



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मोहब्बत की राह में दुश्वारियों, सदियों से रही हैं।

मुझे उससे मुहब्बत है, उसे भी इश्क़ हुआ है ।
आंखों आंखों में दिल की बात ये चमकती है ।

नज़रों से नजर जो मिलती, ख्वाब संवर जाता है
धुंआ, धुंआ सा है, या जुल्फें,जैसे शाम ढलती है।

हर पल हर घड़ी तेरे आने का ग़ुमाँ होता है,मुझे।
जाने कैसे ये फिज़ा है, तुझे साथ लेके चलती है,

मोहब्बत की राह में दुश्वारियों, सदियों से रही हैं।
दुख सुख की सभी माला, दुआओं से ही संवरती है

बहुत शातिर हैं,निगाहें ज़माने की सुन ले मुश्ताक़।
इश्क और मुश्क की खुशबू जब बिखरने लगती है।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़



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वक़्त के साथ

वक़्त के साथ हर याद छोड़ गया हर निशान,
धुंधली सी रह गई बस वो पुरानी पहचान।

वो जमाना जब करते थे मस्तियाँ बेहिसाब,
अब सब खत्म हुआ, खो गया वो ख्वाब।

कहाँ चली गईं वो सुनहरी यादें,
क्यों रह गईं बस खामोश फ़साने।

अब तो बस याद है-
काम, काम और काम,
क्यों हो गए इतने बड़े?
आ गईं ज़िम्मेदारियाँ तमाम।

संघर्षों के साथ पूरी करने लगे ख्वाहिशें,
और बढ़ने लगे ऊँचाई की राहों में।

इसी जद्दोजहद में बीते हसीं पल,
और वक़्त उड़ गया-
पता ही न चला कहाँ निकल।

रह गईं पीछे बस यादें धुंधली,
दिल में बसी कुछ बातें अधूरी।


- गरिमा लखनवी


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आह! नीलापन...
जब अपराजिता का रोपण किया गया
तो मन में ये सवाल था,,,,
जब नाम इतना मोहक है
तो पुष्प कैसे खिलेंगे?
पर जिसने भी..
इसका 'नामकरण' किया ।
ठीक ही तो नाम दिया है।
कभी पराजित नहीं होना,
जब तक जीना,
ऐसे ही जीना,
निपट बंकिम,
छबीले, हंसमुख और
झिलमिलाते हुए,
गहरे नीलेपन के साथ,
जैसे सारा आसमान और समुद्र ,
सिमट आए हों एक 'बीतेभर' फूल में।
क्षणभर के लिए जीना,
पर तुम 'अपराजिता' की तरह जीना।


- वीरदत्त गुर्जर


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मैं बाज़ हूं...
मेरी उड़ान को ना रोक
समुद्र और तूफान...
मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते
मैं हौसला रखता हूं
तूफानों से टकराने का...
पहाड़ों से ऊंचे उड़ने का...
मैं बाज़ हूं...
तू मत काट मेरे पंखों को...
उड़ान के बगैर मेरा जीना,
मुझे कायर घोषित करता है।


- दीपक कोहली


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रंगमंच

मैं पढ़ूं गजल तो जमाना वाह वाह करता है,
कोई बजाता है ताली तो कोई सोचता है
तो कोई करता है टिप्पणी,
अलग-अलग प्रसंग हैं यहां तमाम के,
अनोखा रंगमंच है यह जिंदगी,
किरदार में रह कर लोग अभिनय शानदार करते हैं,
कोई करता हैं प्रेम तो दगा हजार करता है
मीठी-मीठी बातों से सौदा हजार करता है,
कोई झेलता है घाव तो कोई घाव हजार करता है,
मिन्नतों के साथ कोई मन्नत हजार करता है,
मैं दुख पढ़ता हूं अपना और जमाना हंसहंस कर बात करता है,
चुपके चुपके वह बातों में अपनी शिकायत करता है,
कोई कहता है खुद का किस्सा अनोखा
और कोई दुख की भरमार करता है,
अलग-अलग प्रसंग हैं यहां तमाम के,
अनोखा रंगमंच है यह जिंदगी,
किरदार में रह कर लोग अभिनय शानदार करते हैं,
कोई पहुंचता है सीधे और कोई मार्ग हजार करता है,
धीरे-धीरे सपनों के कोई सौदा हजार करता है,
कोई रखता है धीरज तो कोई आक्रोश हजार करता है,
धीरे-धीरे सफलता का कोई सफर हजार करता है,
मैं कहता हूं सत्य और जमाना मुंह से वाह वाह करता है,
पीठ पीछे क्या पता तानों की बौछार करता है,
भाईचारा यानी क्या! जिसमें राजा बने
रंक के महल में रंक राज करता है।


- वीरेंद्र बहादुर सिंह


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