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07 September 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 07 सितम्बर 2026





वो भी क्या दिन थे

वो गाँव की मिट्टी,
वो गाँव का आँगन,
वो बचपन के सुहाने दिन,
वो अपनों का दुलार और अपनापन।
कुएँ से पानी खींचना,
आम के पेड़ पर चढ़कर आम तोड़ना,
दोस्तों के संग खेलना-कूदना,
नन्हीं नावों को पानी में छोड़ना।
बारिश की बूंदों में बेफिक्र भीगना,
मिट्टी की खुशबू में मन का महकना,
न कोई चिंता, न कोई फिक्र थी,
हर छोटी खुशी ही तब बड़ी खुशी थी।
न मोबाइल था, न कोई भागदौड़,
न रिश्तों में था कोई मन का मोड़,
वो हँसी, वो मस्ती, वो प्यारा बचपन,
आज भी ढूँढ़ता है उन्हें मेरा मन।
वो दिन लौटकर अब नहीं आएँगे,
बस यादों में आकर हमें सताएँगे,
जब भी बीते दिनों को याद करेंगे,
आँखों में नमी और होंठों पर मुस्कान लाएँगे।
सच कहूँ तो दिल आज भी यही कहता है-
वो भी क्या दिन थे,
वो भी क्या दिन थे…
जो लौटकर अब कभी नहीं आएँगे,
बस याद बनकर दिल में रह जाएँगे।

- गरिमा लखनवी


*****


अपनों की भीड़ में रह कर भी तन्हा हो गया हूँ मैं,
अपनी ही नज़र में खुद पर ही रुस्वा हो गया हूँ मैं।

​बुझा कर शम्अ खुद अपने ही हाथों से अँधेरे में,
किसी की उम्मीद में रोशनी का धोखा हो गया हूँ मैं।

​ज़माने की नज़र में मुकम्मल ज़ात हूँ लेकिन,
हक़ीक़त जानिए तो अंदर से टूट गया हूँ मैं।

तअल्लुक़ तोड़ने वालों का शिक़वा तक नहीं कोई,
यूँ चुपके से किसी की याद से रुख़्सत हो गया हूँ मैं।

​मेरे होने न होने से किसी को फ़र्क क्या पड़ता,
चराग़-ए-सुब्ह की मानिंद बुझा दिया गया हूँ मैं।

​मुश्ताक़ अब तो ख़ुद से भी वाबस्ता नहीं हूं मैं,
ख़ुदा जाने मैं अपने आप से क्या हो गया हूँ मैं।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


*****


इजहार

खत में भेज रहा हूँ प्रेम का इजहार
सच्चे दिल से करता हूँ तुमसे प्यार
वन उपवन से आती है प्रेम पुकार
कोरे कागज पे लिखा है प्रेम करार

मैं तन मन से करता हूँ आज इकरार
हर जन्म में हुआ है तुमसे मेरा प्यार
मत करना मेरे प्यार का कभी इनकार
तेरा मेरा दिल धड़कता है संग दिलदार

ना कर मेरी आरजू को अब शर्मसार
तेरे लिये कर ली है मैं जग से तकरार
फकत तुम हो मेरे जीवन की संसार
एक बार मुड़ेर पे आ कर लूँ तेरी दीदार

बादलों की धुन्ध से करा दूँ तेरी श्रृंगार
प्रेम से अर्पण है मेरा जिगर उपहार
मेरे दिल की खुली है तेरे लिये मेरा द्वार
किस बात की अब करती हो तुम विचार

आ जा मेरे आँगन में तुम इक बार
भूल जाऊँ तेरे जुल्फों में छुप संसार
ले जाऊँगा सनम तुम्हें चाँद के उस पार
एक दुजे में समाँ जाऊँगा आ मेरे दिलदार

- उदय किशोर साह


*****


हर रोज़ एक नई जंग

शिक्षक हूं मैं, हर रोज एक नई जंग लड़ती हूं,
लड़ाई के मैदान में नहीं, बच्चों के दिलों में उतरती हूं।
झांकती हूं मैं नन्हें दिलों में, अंतर की थाह पाने को,
कितने आतुर हैं ये नन्हें बालक, प्यार सबका पाने को।

एक मुस्कान ही काफी है, इनके दिल में उतर जाने को,
बाहें फैला कर रखते हैं हर पल, ये सबको अपनाने को।
करते हैं नादानियां, है शरारतों का समंदर इनमें,
नहीं सुनते ये किसी की, रहते हैं मगन निज धुन में।

जिसके लिए रोको इनको, वही तो है करना इनको,
गिर-गिर कर ही तो है, संभलना इनको।
नाज़ुक तन और निश्चल मन है,
जब-जब गौर से देखूं इनको।

नन्हें से शैतान हैं प्यारे, अल्हड़पन से भरे हुए,
नित नई शरारत सूझे इनको, करते हैं परेशान मुझे।
रोज समस्या नई है लाते, जंग में हैं मुझको उलझाते,
हर चीज़ को अपना बतलाते, नहीं जरा भी खौफ हैं खाते।

माथा अपना पकड़ मैं लेती, समस्या सुलझाते-सुलझाते।
रोज एक नई जंग लड़ती हूं, बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते।
बच्चों के दिलों में उतरती हूं, प्यार से समझाते-समझाते।
रोज एक नई जंग लड़ती हूं, खुद को आजमाते-आजमाते।

- कंचन चौहान


*****


गांव का आदमी

उठता है सुबह तड़के
डालता है सिरहाने के नीचे हाथ
निकालता है बीड़ी का बण्डल और लाइटर
जलाता है बीड़ी खींचता है जोर का कश
जैसे मानों एक ही कश में अपने अंदर
समेट लेगा जीवन के दुखों को
चलता है धीरे धीरे अपनी गौशाला की ओर
करता है इकट्ठा गोबर एक टोकरी में
उठाकर सिर पर चला जाता है दूर खेत के कोने में
फैंकता है गोबर के ढेर पर ऐसे जैसे
मानों दूर छिटक रहा हो अपनी परेशानियों को
उठाता है दूध की भरी केनी
चल पड़ता है शहर की ओर
हलवाई को बेचने के लिए
चार पैसे बन जाएंगे परिवार चलाने के लिए
लौट कर पीता है चाय फौजी जग में
लेता है एक एक घूंट ऐसे जैसे
समेटना चाहता हो परिवार के
दुखों को अपने अंदर
नहा धोकर करता है प्रार्थना अपने इष्टदेव से
मिल जाये दिन भर के लिए काम
उठाता है प्लास्टिक के डिब्बे में रखी रोटी
चटनी एक छीला हुआ प्याज साथ में हरी मिर्च
चल पड़ता है सड़क की ओर जहां
ढेर लगा है पत्थरों का
निकालता है झोले में पड़ा हथौड़ा
करता है शुरू पत्थर कूटना
ऐसे चलता है उसका हथौड़ा
मानो कूटना चाहता हो अपनी उलझनों को
शाम को थका हारा पहुंचता है घर
बैठ जाता है टूटी चारपाई पर
फिर निकालता है जेब से बीड़ी का बंडल
एक बीड़ी ही तो है जो देती है
पूरा दिन रात उसका साथ
तभी पुकारती है घरवाली खाने के लिए
हाथ मुंह धोकर पोंछता है गमछे से
जो रहता है उसके कांधे पर
रूखा सूखा जो भी बना खा लेता है
बच्चों के साथ बैठ कर
पाता है अपनेपन का एहसास
सो जाता है फिर चारपाई पर
देखता है छत्त की ओर
नज़र आती है वही बांस की कड़ियाँ
खिड़की से आती ठंडी ठंडी हवा
नींद की आगोश में ले लेती हैं उसको
सुबह उठते ही रहती है फिर
बंडल से निकली एक बीड़ी
उसकी परेशानियों को धुएं के छल्ले
में उड़ाने के लिए तैयार
यही तो है गांव का आदमी
समाप्त हो जाएगी उसकी जिंदगी
काम के बोझ तले दबकर
सबका साथ छूट जाएगा
पर बीड़ी निभाएगी साथ
अंतिम सांस तक

- रवींद्र कुमार शर्मा


*****


“गुरु- एक उजाला”

हम मिट्टी थे हम
आपने हमें आकार दिया,
अक्षरों की दुनिया से आगे
जीवन का व्यवहार दिया।

जब समय की आँधियों ने
हमारे दीप बुझाने चाहे,
आपने हथेलियों की ओट से
हमारे उजाले बचाए।

हमारी आँखों में पलते
हर छोटे-से स्वप्न को,
आपने अपनी प्रार्थनाओं में
माँगा था हर क्षण को।

हम हारकर लौटे तो
आपने हार नहीं मानी,
हमने खुद को कम आँका
आपने हमारी कीमत जानी।

हमने तो बस पाठ पढ़े,
आपने जीवन पढ़ा दिया,
हमने केवल मंज़िल माँगी
आपने रास्ता बना दिया।

आज हम जो भी हैं,
उसमें आपका अंश है,
हमारी हर उड़ान के पीछे
आपके विश्वास का आकाश है।

गुरु होना केवल पढ़ाना नहीं,
किसी के भीतर का दीप बन जाना है…
और शिष्य की सफलता देखकर
चुपचाप मुस्कुरा जाना है।

- डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’


*****


शिक्षक दिवस

पहली गुरु मेरी मां
पहला नमन मां को

दूसरा गुरु मेरे पिताजी
दूसरा नमन पिताजी को

तीसरा गुरु मेरे भाई बहन
तीसरा नमन भाई बहन को

चौथे गुरु मेरा समस्त परिवार
जिन्होंने मुझे हर चीज़ सिखाई

पाँचवां गुरु मेरे शिक्षक
नमन वंदन अपने गुरुओं को

छठवां गुरु पूरा समाज
जिन्होंने कई सारी चीजें सिखाई

सातवां गुरु मेरे साथी
कुछ अच्छे अनुभव सीखे

नमन वंदन सारे संसार को
नमन वंदन समस्त गुरुओं को


- सुमन डोभाल काला


*****


एक शिक्षक की कलम से

मैं एक शिक्षक हूँ
समाज का सच्चा पथ प्रदर्शक हूँ
शिक्षा देना है मेरा काम
मकसद है सबो को मिले शिक्षा का ज्ञान।

भेद-भाव नहीं रखता हूँ जाति-पाति का
उद्देश्य रखता हूँ समाज में शांति का
सत्य अहिंसा का पाठ सदैव पढ़ाता हूँ
अधर्म से धर्म-पंथ के ओर पग बढ़वाता हूँ

न किसी को अन्याय करने को कहता हूँ
न किसी को अन्याय सहने को कहता हूँ
धर्म-अधर्म का फर्क सदैव बतलाता हूँ
अधर्म के विरूद्ध खड़े रहने को कहता हूँ ।

जबतक हूँ मै शिक्षक पद पर विराजमान
देता रहूँगा अपनी शिक्षा का ज्ञान
अबोध को बोध कराकर
निरक्षरों को अक्षर अक्षर सिखाकर।

बनाता हूँ उनसबो को सबल
ताकि बिन अक्षर,संस्कार के न हो जाये कही निर्बल
ऐसा ही तो एक शिक्षक का है काम
अपने संपूर्ण शिक्षा का कर दे दान।

- चुन्नू साहा


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दरिया सा बहने लगता हूँ

चित्र अपना देख कर
न जाने क्यों ?
दरिया सा बहने लगता हूँ

भीतर मेरे गोविन्द सागर
लहरों सा बहता रहता हूँ
सुख-दुःख को रख कर किनारे
मैं खुद को ही गहरा करता हूँ
ये लाल साफा -
मेरी पगड़ी नहीं , निशानी है
ठौहड़ू की मिट्टी की सोंधी सुगंध
और उसी की ही कहानी है
जितना झुका हूँ, उतना ही उठा हूँ
ये दरिया नहीं
पहाड़ की रवानी है,
आँखों में देखा, तो समंदर पाया
पलकों में रोक रखा, एक अर्सा पुराना
फ़ौलाद की फैक्ट्रियों के धुएँ में भी
बिलासपुर की आबो-हवा सा
महका करता हूँ

लोग कहते हैं-
तस्वीर तो, बस तस्वीर है
मैं कहता हूँ-
ये आईना है, मेरे सफर का,
जहाँ हर लकीर में लिखा है-
इज्ज़त का, शोहरत का, और सबर का
हर वक्त इम्तहान होता है

भृगु ने लात मारी थी हरि को-
श्री हरि ने चरण दबाए थे,
मैंने तो खुद को ही लात मारी
और खुद को ही गले लगाया है

चित्र अपना देख कर,
न जाने क्यों दरिया सा बहने लगता हूँ
क्योंकि- मैं पत्थर तो हूँ नहीं,
और मैं तो ठौहडू का पानी हूँ,
जो बहता है अपने ही प्रवाह से
और बह कर भी, पहाड़ सा रहता हूँ
चित्र अपना देख कर न जाने क्यों ?
दरिया सा बहने लगता हूँ।।

- बाबू राम धीमान


*****


गुरु

जो दुनिया दिखाए वो माँ पहली गुरू है,
पर जो जग में जीने काबिल बनाए वो गुरु है।

खुद जले और औरों को रोशन करे,
वो निरंतर जलने वाला दीपक गुरू है।

वीराने में फूल खिला दे और कांट छांट कर,
सुंदर पौधे का रूप जो दे वो माली गुरू है।

अंधेरी राहों को जो उजालों से भर दे,
जीने का मकसद जो दिखाए वो राहबर गुरू है।

सजा दे जो तालीम से अपने शागिर्दों को,
वो अकेला सच्चा हमदर्द खैरख्वाह गुरू है।

नाकामी के कांटों को चुन चुन कर जो निकाले,
जीवन में साये से बढ़कर वो हमसफर गुरू है।

बेशक तनख्वाहदार होने से कद्र कम हो गई,
बेकद्री में जो तालीम की लौ जगाए वो गुरु है।

वक्त और संगीन हालातों ने गिरा दिया वजूद,
वजूद को संभालने में संघर्ष जो करे वो गुरू है।

- राज कुमार कौंडल


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शिक्षक दिवस

नमन मात पिता चरणों में
नमन गुरु के चरणों में
जीवन पथ प्रदर्शक आप हो
हो भाग्य विधाता तुम्हीं

आपके सानिध्य में बना आज मैं
आप हो जीवन दाता गुरुवर
आप से संस्कार दुलार प्यार
पाया हरपल जीवन में गुरूवर

दो आशीर्वचन इतना मैं
जीवन में हार कभी न पाऊं
आपकी की बातें
चाक और डस्टर न भूलूँ मैं
इतना सफलता पाऊं गुरुवर

- मनोज कौशल


*****


उनको कहाँ फ़ुर्सत कि अब मुलाक़ात हो,
काश फिर कभी दो घड़ी उनसे बात हो।

मुलाक़ातों के सफ़र में रह गईं ख़ामोशियाँ,
काश ख़ामोशियों में भी कोई बात हो।

दिल के आँगन में उदासी का बसेरा है मगर,
किसी दिन फिर से ख़ुशियों की बरसात हो।

वक़्त की कोई पाबंदी नहीं होती इश्क़ में,
दिन हो चाहे रात हो, बस उनकी याद हो।

हमने तो हर मोड़ पर उनका ही इंतज़ार किया,
क्या ख़बर थी रास्तों में इतनी रात हो।

वो मिले तो पूछ लेंगे हाल-ए-दिल अपना कभी,
क्या पता उस एक पल में सारी कायनात हो।

दूरियाँ बढ़ती गईं, रिश्ते भी ख़ामोश हो गए,
पर दिल नरेंद्र कहता है- कभी मुलाक़ात हो।

उनको कहाँ फ़ुर्सत कि अब मुलाक़ात हो,
काश फिर कभी दो घड़ी उनसे बात हो...

- नरेन्द्र सोनकर, बरेली


*****


भरे हुए पन्ने पर कैसे लिखूँ ?

भरे हुए पन्ने पर कैसे लिखूँ,
हर कोना किसी बीती हुई बात का घर है,
हर अक्षर किसी चेहरे की परछाईं,
हर ख़ाली जगह भी
किसी अधूरे ख़त का असर है।

मैंने सोचा था,
जहाँ शब्द खत्म होंगे,
वहीं से कुछ नया लिखूँगा;
मगर इस पन्ने की ख़ामोशी ने बताया,
कुछ जगहें खाली नहीं होतीं,
बस वहाँ शब्दों की जगह
धड़कनें रहती हैं।

ये काग़ज़ भी अजीब है,
जितना पढ़ता हूँ,
उतना अपना लगता है;
जितना अपना लगता है,
उतना ही पुराना निकलता है।
शायद ये पन्ना नहीं,
मेरा दिल है,
जिस पर हर मिलने वाले ने
अपनी एक पंक्ति लिख दी,
किसी ने स्याही से,
किसी ने आँसुओं से,
और किसी ने
सिर्फ़ छोड़कर।

कुछ पन्ने पलटे नहीं जाते,
क्योंकि उनके साथ
पूरी ज़िंदगी पलट जाती है।
और कुछ पन्ने,
कितने भी भरे हों,
हम उन्हें बार-बार पढ़ते हैं,
इस उम्मीद में कि
कहीं किसी हाशिए पर
हमारे लिए बचा हो
एक छोटा-सा ख़ाली कोना।

- नरेंद्र मंघनानी


*****


हिन्दुस्तान के कोने कोने का सुमधुर संवाद है।

धड़कनों में गूंजती है ज़बान हमारी शान है,
हिंदी अपनी मातृभाषा, देश की पहचान है।

​सरहदों को चीरती जो भाव का विस्तार है,
रीति-नीति और संस्कृति का अमर श्रृंगार है।

वेद की ऋचाओं से जो निकली अनघ नाद है,
हिन्दुस्तान के कोने कोने का सुमधुर संवाद है।

​पूरब से पश्चिम तक जो सेतु का काम है,
हर जुबां पर गूंजता जिसका प्यारा नाम है।

कबीर की साखियों में जो मिठास घोलती,
मीरा के भजनों में जो प्रेम बनके बोलती।

​आधुनिकता की दौड़ में मत इसे विस्मृत करो,
अपनी इस विरासत पर गर्व तुम निरंतर करो।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़



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26 August 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 27 अगस्त 2026






अंतिम हस्ताक्षर

जब तुम बैठा करते थे मेरे दिल के करीब
उन दिनों मेरे दिल के हुस्न का रुतबा ही कुछ और हुआ करता था
जब से तुम गए हो मेरी जिंदगी से अलविदा कह कर,
अपने लहू से मेरे दिल की जमीन पर अपने अंतिम हस्ताक्षर करके हमारी मोहब्बत के अंत पर,
तब से मेरा दिल अनाथ होकर, बंजर के साथ-साथ शमशान सा हो गया है
अपनी ही ख्वाहिशों में खोई रही मैं
मैंने अपने इस मोहब्बत के रिश्ते में तुम्हारे दिल के एहसासों को कोई अहमियत न दी
सुनो... अब मैं यह जान चुकी हूं कि यह मेरे दिल की खता है
आ जाओ ना मेरी सांसों में वापस, तुम कहीं न जाओ मेरे दिल को छोड़कर
तुम्हें मेरे साथ मोहब्बत में बीते हुए लम्हों की सौगंध है
बहुत बड़ी खुदगर्ज हो तुम
मुझे तुम आज मेरे एक सवाल का जवाब दो
तुम ये कौन से मोहब्बत में बीते हुए लम्हों की बात कर रही हो?
क्योंकि तुम्हारी कहानी के किसी भी लम्हे में, तुम्हारे मुताबिक मैं कभी था ही नहीं
तुम्हारी कहानी में तुम्हारे साथ अगर कोई था,
तो वह थे तुम्हारी ख्वाहिशें, तुम्हारे ख्वाब, तुम्हारा गुरूर, तुम्हारी जिद
और हां, सुनो यह कि मोहब्बत की सौगंध के खेल के लिए तुम कोई दूसरा दिल तलाश कर लेना
मेरे दिल को बख्श दो, तुम मेरा दिल बाजार में बिकने वाला कोई खिलौना नहीं
मैं जानता हूं तुम्हारे दिल में एक छोटी सी उम्मीद जगी होगी
कई सवाल उठे होंगे इतने वर्षों बाद मुझे अपने दिल के द्वार पर देखकर
इससे पहले कि तुम झूठी उम्मीद पालो अपने दिल में मेरी जिंदगी में वापस आने की,
मुझे अपनी ख्वाहिशों का फिर से गुलाम बनाने की,
तो यह बता दूं मैं तुम्हें, मैं तुम्हारे दिल के साथ कोई मोहब्बत के तराने गाने नहीं आया
तुम किसी की मोहब्बत की लायक हो ही नहीं
मैं तो अपने आधे-अधूरे ख्वाब, जो तुम्हारे पास रह गए थे, बाकी उन्हें वापस ले जाने आया हूं
इस कहानी को उसका आखिरी अंजाम देने आया हूं
जाओ, मुझे मेरे ख्वाबों का वह लाल जोड़ा वापस लाकर दो
जो मेरी आंखों ने तुम्हें अपनी दुल्हन के रूप में देखने के लिए दिया था अपने हाथों से
वह मेरी मां की अंतिम निशानी थी
उसमें मेरे पिता की प्रेम कहानी थी
अब मैं तुम्हें अंतिम प्रणाम करता हूं
तुमने तो मोहब्बत नहीं की मेरे दिल से कभी,
पर मेरे दिल में तो तुमसे बेपनाह प्यार किया था
आज मैं अपने उस बेपनाह प्यार के अंत का ऐलान करता हूं।

- आकाश शर्मा 'आज़ाद'



*****


पराया

समझकर भी साथ सदा
देते तो भी समझता तुम मेरे हो ?
हरदम न देते न सही यदा कदा
देते तो भी समझता तुम मेरे हो ?
अगर तुम जिन्दा हो तो
जिन्दा भी नजर आओ जरा बेजमीर!
जनाजा भी समझकर कंधा
देते तो भी समझता तुम मेरे हो।


*****


जहाँ चाह वहाँ राह में
हर दूरियाँ हार गई।
जब निकल पड़े बाँधकर
कफन हर मजबूरियाँ हार गई।
तेरी हर चाल पर हमने
हँस कर गर्दन बिछा दी,
तेरे मुख का राम,
तेरे बगल की छूरियाँ हार गई।

- राधेश विकास


*****


बंद दरवाज़ों में
क्या भावना, भाईचारा,
आदर्श और परंपरा
अब मिलेंगे सिर्फ़ किताबों में ?
कहाँ बची है वह आत्मीयता,
वह मानवीय स्पर्श-
जो कभी रिश्तों की भाषा था,
अब सिमटकर रह गया
कुछ अल्फ़ाज़ों में।
हमने ख़ुद को कैद कर लिया,
अपने ही बनाए कमरों में;
रह गए अकेले,
बनकर अपने ही कैदी
बंद दरवाज़ों में।
ख़ुद ही कहेंगे,
ख़ुद ही सुनेंगे-
दूसरी आवाज़ों के लिए
कहाँ बची जगह?
भूल गए पहचानना
कोयल और कौवे की आवाज़ों में।
कौन खोलेगा फिर
यादों की पोटली,
जो जाने कब से
बंद पड़े हैं
मेज़ की उन दराज़ों में ?

- रोशन कुमार झा


*****


खामोश है होंठ

होंठ खामाेश है पर दो नयन हैं चंचल
मन की भाषा पढ़ लेता है मंजर
आँखों-आँखों में जब होती है मुलाकात
कर लेता है मन की अन्दर की ये बात

हाेठ रहा मौन पर मन जाता है। डोल
दिल की पैगाम पढ़ खोल देता है पोल
आँखों की चमक जब होता है हलचल
बहने लगती है जैसे सरिता बहे कल कल

प्रेम की भाषा को लिपि नहीं बाँध पाया
दिल की चाहत दिल में जा कर  समाया
चुपके चुपके लिख देता है प्रेम जजबात
हो जाता है दिल को दिल से पूरी बात

मन की अल्हड़पन किसी की ना गुलाम
जग वाले को दिखाता अपनी ये पैगाम
मन की उड़ान का ना कोई है बंधन
चंचल मन की गुलशन लागे चितमन

रब ने लिख डाला जब तकदीर की मूरत
पर् मन में बसता है मनचाही एक सूरत
कहाँ ले जायेगा मन ना इसका ठिकाना
डरता नहीं है ये सोंचता क्या करेगा जमाना

- उदय किशोर साह


*****


न के आकर्षण से चला, मन का पहला ज्ञान।
मोह-जाल में उलझता, भटका मेरा ध्यान॥

रूप-सौंदर्य की चाह में, बीता जीवन-काल।
इच्छाओं के फेर में, मन भी था बेहाल॥

नारी केवल देह नहीं, नारी जीवन-धार।
उसमें ममता, प्रेम है, बसता स्नेह अपार॥

माँ के आँचल में मिला, जीवन का उपहार।
ममता के उस दूध में, पाया सच्चा प्यार॥

जिसको केवल रूप ले, मन ने माना खास।
माँ की ममता देखकर, मिटे सभी भ्रम-पाश॥

तन से मन की ओर फिर, बढ़ने लगा विचार।
प्रेम हुआ जब मातृमय, बदला ये संसार॥

काम-कुहासा छँट गया, जागा निर्मल ज्ञान।
नारी के सम्मान में, देखा सच्चा मान॥

मीरा, सूर, कबीर से, सीखा प्रेम-विवेक।
देह नहीं आधार है, निर्मल भाव है नेक॥

नारी को सम्मान दो, मत बाँटो आकार।
उसकी चेतन आत्मतव, समझो सदा उदार॥

माँ, बहना या प्रेमिका, सभी रूप अनमोल।
इनके पावन प्रेम का, जग में कहाँ है मोल॥

मोह ने मुझे बाँधकर, रखा बहुत दिन दूर।
ममता ने तब खोल दी, अंतर की हर डोर॥

अब नारी को देखता, केवल देह न मान।
उसमें जीवन, प्रेम है, उसमें पूरा प्राण॥

क्षमा करो हे मातृरूप, मेरे मन के रोष।
पावन ममत्व रूप ने, हर ली मन की दोष॥

कभी स्तनों ने बाँधकर, उलझाया था ध्यान।
मातृत्व ने मुक्त कर, बदली सब पहचान॥

- डॉ. सत्यवान ‘सौरभ’


*****


चिट्ठी लाई गाँव से, जब राखी उपहार।
आँसू छलके आँख से, देख बहन का प्यार।।
रेशम की डोरी सजी, लेकर नेह अपार।
बहना के विश्वास का, भाई है आधार।।
रक्षा बंधन प्रेम का, हृदय का त्योहार।
इसमें बसती द्रौपदी, है कान्हा का प्यार।।
कहती हमसे राखियाँ, तुच्छ सभी स्वार्थ।
बहनों की शुभकामना, जीवन करे सिधार्थ।।
भाई-बहना नेह के, रिश्तों के आधार।
इस धागे के सामने, सब कुछ है बेकार।।
बहना मूरत प्यार की, माँगे ये वरदान।
भाई को यश-बल मिले, बढ़े सदा सम्मान।।
दूर देश में हो भले, भाई अपना यार।
राखी लेकर लौटती, बचपन की झंकार।।
बचपन जुड़ी शरारतें, आँगन की मुस्कान।
राखी आते ही जगे, भूली हर पहचान।।
थाली में रोली सजी, दीपक ज्योति अपार।
बहना तिलक लगा कहे, रहना तुम खुशहाल।।
माँ की ममता-सी लगे, बहना का व्यवहार।
उसके मन की कामना, भाई का संसार।।
राखी बंधन बस नहीं, इसमें स्नेह महान।
जोड़ रही है आज भी, रिश्तों की पहचान।।
सुख में हँसना साथ में, दुख में बनना ढाल।
भाई-बहना का यही, रिश्ता है खुशहाल।।
धन-दौलत सब क्षणिक हैं, रिश्ते हैं अनमोल।
राखी बाँधे प्रेम से, खुल जाए मन मोल।।
मन में यदि हो प्रेम तो, दूरी हो निस्प्रभाव।
राखी के इस पर्व मिट, जाए सभी दुराव।।
बहना के आशीष से, खिल उठता परिवार।
उसकी हँसी में बसे, खुशियों का संसार।।
रिश्तों में सम्मान हो, मन में निर्मल भाव।
रक्षा बंधन दे सदा, प्रेम-स्नेह का चाव।।
सब बहनों पर यदि करें, मन से सच्चा गर्व।
होता तब ही मानिए, रक्षा बंधन पर्व।।

- डॉ. प्रियंका 'सौरभ'


*****


धागों का यह बंधन न टूटे अटल रहे

राखी भाई बहन के प्यार का अनूठा है बंधन
जो बड़ी धूमधाम से हर वर्ष मनाया है जाता
बहुत दूर भी रहते हो भाई बहन
मगर धागे से बंधा प्यार एक संदेश है लाता

बचपन में खेलते खेलते किसी
बात पर हो जाती थी तकरार
इक दूजे के बिना नहीं रह पाते थे
आपस में था बहुत प्यार

बचपन के राक्षबन्धन के होते थे अजब नज़ारे
उस दिन भाई ही लगते हैं सब बहनों को प्यारे
कितने भी पिटे हों या पीटे हों बच्चपन में
गले लगती हैं बहनें भूल कर शिकवे सारे

झूठ बोल कर जब बहन पापा से पिटवाती थी
जब रोते थे तो चुप करवाने खुद ही आ जाती थी
लेकिन राखी वाले दिन बड़े प्यार से बुलाती थी
कुमकुम अक्षत और फूल का टीका माथे पर लगाती थी

कलाई पर राखी बांध कर हमको मिठाई खिलाती थी
शादी के बाद अब कभी कभी ही है आ पाती
याद बहुत करती है अपने भाई को
हर वर्ष रक्षा बंधन पर राखी जरूर है भिजवाती

राखी को देख कर वो बचपन है याद आता
जब भाई रक्षाबंधन को बहन को था बुलाता
भाई और बहिन का आज का नहीं
यह तो जन्मों जन्मों का है नाता

ज़माने के साथ बदल गया इसको मनाने का ढंग
अब तो राखियों के आ गए हैं बाजार में कई रंग
जहां राखी पहले होती थी कच्चा धागा हाथ से बनाया
अब तो राखियों की कीमतें देख कर रह जाते सब दंग

अब राखियां कई रंगों की कई डिजाइनों में है मिलती
कोई दस कोई बीस की कोई हज़ारों की है बिकती
राखी की कीमत से क्या लेना खुश रहे सारा संसार
धागों का यह बंधन टूटे न अटल रहे भाई बहन का प्यार

- रविंद्र कुमार शर्मा


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राखी का बंधन

राखी का त्योहार है प्यारा,
भाई-बहन का रिश्ता न्यारा।
स्नेह-सुधा से बंधता बंधन,
पावन होता प्रेम का आँगन।
भाई देता बहना को रक्षा का विश्वास,
बहना के चेहरे पर खिलती खुशियों की आस।
हर वर्ष ये पर्व नई खुशियाँ लाता,
रिश्तों में प्रेम का दीप जलाता।
सरहद पर जब वीर जवान,
रखते हैं भारत की आन-बान।
बहनों की राखी याद दिलाती,
मातृभूमि की शान बढ़ाती।
राखी केवल धागा नहीं,
यह प्रेम, त्याग की गाथा सही।
आओ आज संकल्प उठाएँ,
हर बहना की लाज बचाएँ।
देश की धरती, देश का मान,
रहे सदा ऊँचा तिरंगा महान।
रक्षा का यह पावन बंधन,
जग में सबसे सुंदर बंधन।

                                      - गरिमा लखनवी


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ग़ज़ल

वो निगाहों को रोज़ छलता है।
चाँद छुप -छुप के जो निकलता है।

राह तकता हूँ मैं वहाँ उसकी,
वो वहाँ रास्ता बदलता है।

रोज़ सूरज सा मैं दहकता हूँ,
वो किसी बर्फ़ सा पिघलता है।

चाहता हूँ मैं देखकर उसको,
वो किसी और पर मचलता है।

है मुझे उसपे तो यकीं सारा,
वो मेरे हाल पर संभलता है।

किस तरह मान लूँ सदा उसकी,
जो कही बात से फिसलता है।

- नवीन माथुर पंचोली


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निज विधु की चाँदनी

एक ढलती संध्या, दर्पण किया साफ़,
उसने कहा, "देर से ही सही, आ गई पास।
आई हो अब, जब घिर आई है यामिनी,
फिर भी तू दीप्त है, जैसे चपल दामिनी।

क्यों इतना आकुल-व्याकुल है तेरा मन ?
आ बैठ समीप मेरे, क्षण दो क्षण।
कह दे कुछ, सुन ले कुछ मन की बात,
अब मत छिपा अंतस के जज्बात।

परिधि से निकल अब तू बाहर,
तृषा बुझा अपनी, भर-भर गागर।
लगाती थी कभी तुम कजरारे काजल,
स्मरण है, कितने थे तेरे ही कायल!

अब क्या हुआ जो तू हुई गामिनी ?
निज विधु की तो तू ही है चांदनी!
कितने भी हों ये तिमिर घनेरे,
चांदनी तू ही तो जग में बिखेरे।

बरस जा तू तृषित धरा पे सावन की तरह,
बिखर जा तू वसुधा में मुक्ता की तरह।
टप-टप बिखरेंगे जब ये मुक्ता-कण,
मानो हँस पड़ा हो तेरा अंतर्मन।

आरसी में देखा जब पुनः खुद को,
ढूंढ लिया मैंने अपने वजूद को।
लौट आई फिर वही मंद मुस्कान,
जिससे अब तक थी मैं अनजान।

मृण्मय नयनों में डाला फिर काजल,
लहरा उठा पुनः मेरा आँचल,
जैसे किसी बंदी खग को,
मिल गया हो उन्मुक्त नभ-मंडल।

- सविता सिंह मीरा


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यूपीआई: जेब से दुनिया तक

न जेब में सिक्कों की खनक, न नोटों की कोई कतार,
मोबाइल उठाया, पिन लगाया, पल में हुआ कारोबार।
दस वर्ष पहले जो सपना था, आज वही पहचान बना,
छोटे चायवाले तक पहुँचा, "डिजिटल" हिंदुस्तान बना।

न बैंक की लंबी लाइन रही, न ही छुट्टे का झंझट भारी,
एक क्लिक में भुगतान हुआ, आसाँ हुई दुनिया सारी।
कभी पैसे भेजना मुश्किल था,अब पल में पहुँच जाता,
दूर खड़ा अपना इंसान भी मोबाइल से पास हो जाता।

बाजारों से लेकर गलियों तक, इसकी गूँज सुनाई देती,
भारत की डिजिटल ताकत, दुनिया को "राह" दिखाती।
तकनीक तब ही महान है, जब जन-जन के काम आए,
यूपीआई की यह छोटी-सी धारा देश को आगे ले जाए।

नोट से डिजिटल सफर तक, बदला भुगतान का संसार,
दस साल की यात्रा ने बढ़ाया भारत का "गौरव" अपार।
कल जो थी कल्पना कभी, आज हकीकत बनकर आई,
मोबाइल की लघु स्क्रीन ने भारत की तस्वीर बदलवाई।

- संजय एम तराणेकर


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औरत कांच की सतह की तरह पारदर्शी है
इसमें आप देख सकते हैं, अपना प्रतिबिम्ब।
जितना अधिक प्यार से इसे पोंछेंगे,
उतना अधिक चमकदार आपका प्रतिबिम्ब होगा।
एक औरत के अंदर आप छुपे होते हैं विभिन्न रूपों में।
आपकी छवि उसकी लज्जा के अंदर है,
अगर आप ज़िद्द से इसे एक दिन तोड़ते हैं,
तो आपकी छवि हजार टुकड़ों में बिखर जाएगी।
और फिर लाख कोशिश के बाद भी,
उस मोहक प्रतिबिम्ब के लिए तरस जाओगे।
जब भी तुम हाथ फेरोगे, इन टूटे-जुड़े टुकड़ों पर
हमेशा एक जख्म पाओगे अपने हाथों में।
स्त्री सबके लिए बहुत ही अनमोल है
और वे सबसे अच्छी उपहार हैं।
जो ईश्वर ने सभी मर्दों को दिया है,
एक मां, एक बहन, बेटी, एक पत्नी और
बहुत सच्ची दोस्त के रूप में।

औरत होना इतना आसान नहीं,
आधे से ज्यादा अरमान दिल में ही दफ़न होते हैं।

- सुमन डोभाल काला


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फ़र्ज़ वतन का, दुआ बहन की

तिरंगे की आन हो तुम, इस वतन की शान हो तुम,
दूर रहकर भी भाई, हमारी धड़कन और जान हो तुम।
ना कहना ऐसा कभी कि तिरंगा ओढ़ कर आओगे,
सलामती की दुआ है मेरी, तुम जीतकर घर आओगे।

कलाई सूनी रहे तो रहे, पर तुम्हारा सर सलामत रहे,
सरहद पर खड़ा मेरा वीर भाई, हर पल खुशहाल रहे।
राखी का धागा मेरा, तेरी हिफाज़त का आस बनेगा,
तू लौट कर आएगा वापस, यह बहन का विश्वास रहेगा।

बूढ़ी माँ की आँखों में, तेरे लिए बस प्यार और दुआएँ हैं,
तेरी सलामती के लिए उठीं,घर के हर कोने से सदाएँ हैं।
फर्ज़ निभाओ तुम वतन का, हम घर का फर्ज़ निभाएंगे,
अगली राखी पर भैया, हम मिलकर खुशियाँ मनाएंगे।

-सूरजमल AkS


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रक्षाबंधन

बहन की थैली में
हर साल एक नया सपना होता है,
राखी से कहीं अधिक उसमें
भाई की मुस्कान का अपना होता है।

दुकान-दुकान नहीं,
वो जैसे दिल-दिल भटकती है,
हर रंग, हर धागे में
भाई की कलाई ढूँढ़ती है।

रंग गहरा हो या हल्का,
कीमत कहाँ उसे भाती है,
बस एक ही बात देखती है...
“ये राखी मेरे भाई पर कितनी सजती है।”

राखी चुनते-चुनते
कभी बचपन लौट आता है,
वो छोटी-सी जिद, वो रूठना,
फिर चुपके से मान जाना याद आता है।

कभी उन मीठे झगड़ों की
हँसी कानों में गूँजती है,
और आँखों के किसी कोने में
बचपन की तस्वीर झिलमिलाती है।

भाई चाहे कितनी दूर हो,
बहन का मन वहीं ठहर जाता है,
कलाई पर बँधता है धागा,
पर रिश्ता दिल में उतर जाता है।

कुछ रिश्ते दूरी से नहीं,
दुआओं से जुड़े रहते हैं..
बहन की राखी के धागे में
भाई के लिए पूरे संसार की
ममता, दुआ और प्रेम बँधे रहते हैं।

- नरेंद्र मंघनानी


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ढल गई शाम

दिन भर का थका हारा वो सूरज
अस्ताचल में छुप करता है विश्राम
तपती धूप से जलती ये धरती
सुकुन पाया जब ढल गई शाम

चरवाहे संग गौधन जंगल से लौटा
कलरव करती खगवृन्द ली आराम
उठ रही चहुँ ओर धुल की गुबार
आती है नित्य जब ढल गई शाम

पूरब में चन्दा पूनम की है आई
अवनि अंबर में तम का काम तमाम
आसमान पे टिमटिमाते वो सितारे
नजारे दिखलाती जब ढ्ल गई शाम

कल कल ध्वनि की नदी की रवानी
निरंतर चलने की देती है पैगाम
गिरना व संभल कर उठ चल पड़ना
ये है इस जीवन की कटु एक पयाम

आना है जग में चले जाना जग से
शाश्वत इस प्रकृति की है ये नाम
अवनति और प्रगति उतार चढ़ाव
इस जीवन की है सबका अंजाम

- उदय किशोर साह


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