साहित्य चक्र
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22 August 2026

दिमाग़ी-नक्सल के जुमले में...


दिमाग़ी-नक्सल के जुमले में सुविधाओं और पूर्वाग्रहों की पहचान का मुद्दा भी खोजा जा सकता है। इसे बराऐख़ास सत्ता-पक्ष और विपक्ष के वरिष्ठ-बुद्धिमान अपने-अपने नज़रिए से देखने में कुछ दूसरे ही ख़ास आग्रहों-दुराग्रहों का इस्तेमाल कर सकते हैं, बल्कि करेंगे और कर ही रहे हैं।

रोटी-रोज़गार मिले,नहीं मिले,संसद में गर्मागर्म स्वादिष्ट-मसालेदार बहस का तमाशा मिलता रहना चाहिए। तीस पर तुर्रा कहिए कि अख़बार तो हैं ही। कहीं किसी एक लोकोक्ति में कहा भी गया है कि मनोरंजन से भूख मर जाती है ?





किसी भी लोकतांत्रिक-व्यवस्था में तलवार अथवा बंदूक की बजाय संवाद ही कारग़र हथियार साबित होता रहा है और उम्मीद की जा सकती है कि होता रहेगा। तमाम-तमाम दबावों और संदर्भों के बावजूद स्मरण रखा जा सकता है कि अप्प दीपो भव: ! बुद्ध ने भी असंभव को संभव तक ले आने का यही रवैया तथा रास्ता प्रतिपादित किया है।

मानाकि बुद्ध के देश में इस वक़्त,न तो कहीं बुद्ध का बुद्धत्व है और न कहीं देश-काल.फिर भी नागरिकों की पहली और आख़िरी ख़्वाहिश यही है कि सभी जन सुख-शांति का जीवन पाऍं.क्या ये संभव नहीं?एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों! कलाओं का जादू,अपने नित-नित बदलते जाते अभिप्रायों के रहते,अपनी स्थापनाऍं एक हद तक ही बरक़रार रख पाता है।

बाद मुद्दत के आज़ादी पाई है। पुरखों ने कोड़े खाए हैं, भूखे रहे हैं, सज़ाऍं काटी हैं। आज फिर से विदेशी पूॅंजीगत-शक्तियों ने देशभर में अनचाहा-मनचाहा अतिक्रमण कर लिया है। विदेशी कर्ज़ की जकड़न कुछ इस हद तक त्रस्तता-आग्रही हो गई है कि चारों ओर प्रतिबंध ही प्रतिबंध उपलब्ध हैं।


स्वतंत्र-विकलताऍं बढ़ रही हैं और स्वतंत्र-मान्यताऍं घट रही हैं। विश्वास और अविश्वास के परंपरागत पैमानों ने दम तोड़ दिया है। हर कोई शक़ के दायरे में है। हर किसी पर चाहते,न चाहते हुए भी शक़ चस्पा कर दिया गया है। निठल्लों की चाॅंदी हो रही है और मौज़ूदा सरकार अपने नागरिकों को पानी में चाॅंद देखने के लिए विशेषतः विवश कर रही है।

धर्म-कर्म के स्थानों पर भीड़ बढ़ती जा रही है और उसी अनुपात में भगदड़ तथा गंदगी का महा-सडाॅंधभरा साम्राज्य भी। दिक़्क़त और आपत्ति की बात यही है कि इस भीड़ में वह zen-z और zen-alfa भी तन-मन-धन सहित जोशोख़रोश से शामिल है, जो अभी-अभी अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर आंदोलनरत है ?

कहना कठिन नहीं है कि दिल्ली अमी अस्तो, अमी अस्तो,अमी अस्त...?


- राजकुमार कुम्भज




कच्चा मकान


बहुत समय पहले किसी गांव में शंकर नाम का एक किसान रहता था। वह बहुत ईमानदार पर आलसी था। साथ ही उसकी एक बुरी आदत थी वह अपनी गलती दूसरों पर थोप देता था और खुद अपनी गलती को स्वीकार करने से कतराता था। वह उस गांव में एक कच्चे घर में रहता था। वह एक ऐसे परिवार से आता था जिसमें सब गरीब थे। उसके पिता जी ने उसके लिए विरासत में केवल यही एक कच्चा मकान छोड़ा था।





गांव में ज्यादातर घर पक्की ईटों के बने थे जो एक-दो कच्चे थे उनके मालिकों ने अपने घर के सामने ईंटे गिरवा शुरू भी कर दिया था। अब गांव में बस शंकर का परिवार ही था जो अभी तक कच्ची मिट्टी के घर में रहता था। शंकर के पास एक जमीन थी, जो उसके पूर्वजों की थी। उसी पर परिवार का सारा बोझ था, पर वह जमीन भी अब बूढी हो चुकी थी। खेती उतनी खास होती नहीं थी। एक दिन शंकर तमतमाते हुए घर में घुसा।

“मेरे पिता ने मुझे पैदा ही क्यों किया?”

शंकर ने खाट पर बैठते हुए कहा- “क्या हुआ जी ऐसा क्यों बोल रहे हैं?”

पत्नी ने पूछा- “अरे! कम से कम इस मिट्टी के घर में तो नहीं रहना पड़ता, बरसात भी आने वाली है पता नहीं इस घर का अब क्या होगा? अब तो खेती भी बंद हो रही है। नहीं तो पैसों से मैं भी ईंटे गिरवा लेता।”

“तो इसमें आपकी बाबूजी की क्या गलती है?” “उन्हीं की तो गलती है, इतना सम्मान पाकर क्या मिला? यह कच्चा घर और बंजर होती जमीन!”

शंकर चाहता तो मेहनत मजदूरी करके कुछ पैसे इकट्ठे कर लेता, पर वह अपने पिता की हार चढ़ी तस्वीर की ओर देखकर तमतमाते हुए कुछ बुदबुदाने लगा।

शंकर ने उसकी गरीबी का जिम्मेदार अपने पिता को ठहराया। वह पहले कुछ काम किया भी करता था। अब तो वह भी बंद हो गया। सुबह देर से उठता था, दोपहर को खेत पर बिना मन के जाता और अगर धूप तेज होती तो जाता ही नहीं था। फसल हुई या नहीं, गायों ने चरा या बिना पानी के सुख गई, इसकी उसको कोई परवाह नहीं थी। उससे कोई पूछता की खेती आजकल नहीं तो रही है क्या? तो कहता- “अरे भाई मेरे पिता की बदकिस्मती मेरे सर आ गई है, झेलना ही पड़ेगा”




एक दिन ऐसा आया कि रात के चूल्हे के लिए पड़ोसी से अनाज मांगना पड़ा। घर तो कमजोर था ही और इस कमजोरी में सुई चुभाने के लिए बरसात भी हो गई और इतनी की शंकर का घर मिट्टी में मिल गया। शंकर और उसकी पत्नी जमीन पर बैठे कुछ सामान संदूक में रख रहे थे ताकि वह भीग ना जाए। तभी ऊपर बची हुई छत के खपड़े से कुछ, शंकर के सिर पर गिरा।

“हाय! सिर फोड़ डाला” शंकर चिल्लाया। जब नीचे देखा तो एक गंदा और पुराना झोला पड़ा था।

“अरे! यह क्या है?” उसकी पत्नी ने हैरान होकर पूछा।

“क्या मालूम?”

शंकर ने झोले को धीरे से खोला, वह झोला नोटों से भरा हुआ था। यह देख दोनों की आंखें फटी रह गईं। उस नोटों के साथ एक पुराना कागज़ का टुकड़ा भी था। जब शंकर ने उस कागज को खोला तो उसमें उसके पिता की लिखावट थी। और उसमें लिखा था

प्रिय शंकर,
मुझे पता है कि यदि तुम्हें यह पत्र मिला है तो तुम्हारा मिट्टी का कच्चा घर बरसात में ढह चुका है। मैने इस झोले में पैसे रखे हैं, जो मैने अपने जीवन भर में कमाए हैं। जिसे तुम अपने पक्के घर की कामना पूरी कर सकते हो। मैं चाहता था कि तुम अपनी मेहनत से एक नया घर बनवाओ। पर, ये पैसे तुम्हारी विरासत हैं। मेरा आशीर्वाद तो हमेशा तुम्हारे साथ है।

- तुम्हारे पिता

यह पढ़कर शंकर की आंखों में आंसू आ गए।
पिता के लिए उसके दिल में जो खराब तस्वीर बनी हुई थी, वह साफ हो जाती है। उसे अपनी गलती का भी पता चलता है। वह उन पैसों से एक नया पक्का घर बनावत है और एक नई उपजाऊ जमीन भी खरीदता है। उस जमीन पे वह बैल की तरह काम करके काफी तरक्की करता है।


- प्रणव राज, बिहार



उत्तराखण्ड की जनजातियाँ: कठिन परिस्थितियों में जीवन और संस्कृति की मिसाल


हमारा राज्य उत्तराखण्ड 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर एक पृथक राज्य बना। राज्य गठन के इतने वर्षों बाद भी उत्तराखण्ड की स्थायी राजधानी का प्रश्न पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है। वर्तमान में देहरादून राज्य की अस्थायी राजधानी है। भौगोलिक दृष्टि से उत्तराखण्ड एक महत्वपूर्ण सीमावर्ती राज्य है। इसकी सीमाएँ चीन और नेपाल से लगती हैं। उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ जिलों की सीमाएँ चीन-तिब्बत से लगी हुई हैं, जबकि पिथौरागढ़, चंपावत और ऊधम सिंह नगर की सीमाएँ नेपाल से जुड़ी हैं। नीति और माना जैसे सीमावर्ती क्षेत्र सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।



उत्तराखण्ड में विभिन्न जनजातियाँ निवास करती हैं। इनमें भोटिया, जौनसारी, बुक्सा, थारू, राजी और अन्य जनजातीय समुदाय प्रमुख हैं। इन समुदायों की अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपराएँ, भाषा, वेशभूषा और जीवन-पद्धति है, जो उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध बनाती है। इन जनजातीय समुदायों की आजीविका लंबे समय से भेड़-बकरी पालन, ऊनी वस्त्र निर्माण, पशुपालन, कृषि, दुग्ध उत्पादन तथा स्थानीय उत्पादों के व्यापार पर निर्भर रही है। ऊँचे हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का जीवन अत्यंत कठिन परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। नवंबर से फरवरी तक इन क्षेत्रों में कड़ाके की ठंड पड़ती है और भारी बर्फबारी के कारण कई रास्ते बंद हो जाते हैं।

इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद यहाँ के लोग अपने जीवन और परंपराओं को आज भी मजबूती से सँजोए हुए हैं। कई परिवार सर्दियों के आने से पहले ही कई महीनों के लिए राशन, ईंधन और अन्य आवश्यक वस्तुओं का भंडारण कर लेते हैं। अपने पशुओं के लिए भी पर्याप्त चारा और घास-पत्ती पहले से एकत्र कर ली जाती है, ताकि बर्फबारी और रास्ते बंद होने के दौरान उन्हें किसी प्रकार की परेशानी न हो।

इन लोगों का जीवन प्रकृति के अनुकूल ढलने का एक अद्भुत उदाहरण है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद इनके मन में जीवन के प्रति गहरा धैर्य, आत्मनिर्भरता और संतोष दिखाई देता है। परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, ये समुदाय अपनी मेहनत और परंपराओं के सहारे जीवन को आगे बढ़ाते रहे हैं।

परंपरागत रूप से कुछ जनजातीय समुदाय छह महीने ऊँचाई वाले अपने मूल क्षेत्रों में और सर्दियों के दौरान लगभग छह महीने मैदानी क्षेत्रों में बिताते हैं। वे अपने पशुओं के साथ मौसम के अनुसार स्थान परिवर्तन करते हैं। यह मौसमी प्रवास उनकी जीवन-पद्धति और आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। समय के साथ परिस्थितियाँ बदल रही हैं। शिक्षा का प्रसार हुआ है और सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ भी जनजातीय समुदायों तक पहुँच रहा है। इसके परिणामस्वरूप नई पीढ़ी शिक्षा प्राप्त कर रही है और सरकारी तथा निजी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर तलाश रही है। आज कई युवा पारंपरिक व्यवसायों के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा और रोजगार को भी अपना रहे हैं।

हालाँकि, आज भी अनेक परिवारों की जड़ें अपने पुश्तैनी गाँवों और पारंपरिक व्यवसायों से जुड़ी हुई हैं। उनके पूर्वजों से मिली जमीन, घर, पशुपालन और स्थानीय कारोबार आज भी उनकी सामाजिक और आर्थिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उत्तराखण्ड केवल देवभूमि ही नहीं, बल्कि विविध संस्कृतियों, परंपराओं और समुदायों की धरती भी है। यहाँ अनेक प्रकार के लोकपर्व और त्योहार मनाए जाते हैं। यहाँ के लोग अपनी सरलता, मिलनसारिता, मेहनत और ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं। उत्तराखण्ड की जनजातियाँ इस सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं।

इन समुदायों ने विषम भौगोलिक परिस्थितियों में रहकर न केवल अपने अस्तित्व को बचाए रखा है, बल्कि अपनी भाषा, संस्कृति, परंपराओं और जीवन-मूल्यों को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया है। इसलिए उत्तराखण्ड की जनजातियाँ हमारे प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान और गौरव का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।



- सुमन डोभाल काला


18 August 2026

संस्कृत भाषा की रचनाएं ही राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय गीत क्यों!

बतौर भारतीय मेरे मन में एक सवाल उठता है- संस्कृत भाषा को भारत यानी हमारे देश में एक प्रतिशत लोग भी ना बोल पाते हैं और ना ही लिख पाते हैं तो फिर उस भाषा की रचनाओं को हमने अपना राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत क्यों बनाया हुआ है ? अधिकांश भारतीय ना राष्ट्रगान और ना ही राष्ट्रगीत बिना देखें गा पाते हैं। कहीं इसके पीछे का कारण संस्कृत भाषा की रचनाओं का राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का होना तो नहीं है ?





भारत अनेक संस्कृति, सभ्यता और भाषा से मिला एक लोकतांत्रिक गणराज्य है। इसकी आज तक कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हां! अंग्रेजी और हिंदी राजभाषा जरूर है। इतना ही नहीं बल्कि हिंदी भाषा कुछ ही क्षेत्र की मातृभाषा है। अधिकांश क्षेत्रों में लोगों की मातृभाषा वहां की स्थानीय बोली व भाषा है। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल की मातृभाषा बंगाली है, महाराष्ट्र की मातृभाषा मराठी है, तमिलनाडु की मातृभाषा तमिल है, उत्तराखंड की मातृभाषा गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी है। ऐसा ही अन्य राज्यों में भी है।

संस्कृत भाषा भारत की कभी भी आम बोलचाल वाली भाषा नहीं रही है। संस्कृत और तमिल भाषा में सबसे प्राचीन भाषा को लेकर आपस में विरोधाभास दिखाई देता है। जहां दक्षिण के इतिहासकार तमिल को सबसे पुरानी भाषा मानते हैं तो वही उत्तर भारत के लोग संस्कृत को सबसे पुरानी भाषा का दर्जा देते हैं। मगर इन दोनों भाषाओं में कौन सी सबसे पुरानी भाषा है, इस पर कोई ठोस शोध नहीं हो पाया है।

संस्कृत भाषा को हिंदू धर्म की भाषा भी माना जाता है क्योंकि हिंदू धर्म के अधिकांश ग्रंथ संस्कृत भाषा में ही लिखे गए हैं। ऐसे में फिर एक सवाल और उठना है- जब भारत धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राष्ट्र है और संस्कृत हमारी यानी भारत सरकार की राजभाषा भी नहीं है तो फिर इस भाषा की दो रचनाओं को राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत बनाना कितना सही है ?


बहुत सारे लोगों का तर्क होगा कि आजादी के समय यह फैसला लिया गया था। मगर जिस प्रकार से आज इतिहास को ठीक किया जा रहा है, उसी प्रकार से इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि जिस भाषा को हमारे देश की अधिकांश जनता ना बोल पाती है, ना लिख पाती है उस भाषा की रचनाओं को राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान बनाना सही है या फिर गलत! 


                                                  - दीपक कोहली


13 August 2026

क्योंकि नेता तो मैं हूं ना....



कहते हैं पूत के पांव पालने में ही दिखने लगते हैं तो ये बात मेरे ऊपर भी चरितार्थ होती है। ऐसा है कि नेतागिरी का गुण बचपन से ही मुझमें कूट-कूटकर भरा था ये बात और है कि इतना बारीक कूटा गया था कि आप जैसे साधारण मनुष्यों को बिना सूक्ष्मदर्शी वो गुण दिखाई देना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है। हालांकि नेतागिरी के गुण से ओत-प्रोत होने के बावजूद मुझे कभी भी तिल मात्र भी इसका घमंड नहीं रहा है।

तो बात शुरू करते हैं हाईस्कूल के दिनों से ! उन दिनों हाईस्कूल हमारे यहां सातवीं से ही शुरू हो जाता था तो हमलोग जैसे ही सातवीं में पहुंचे तो मुझे पहली बार अपने-आप में नेता के छुपे हुए गुण का अहसास हुआ। मैंने अपनी क्लास में आठ-दस लड़कों की एक टोली बना ली थी। दो ही महीनों में एक दिनचर्या बन चुकी थी कि पहली घंटी का क्लास करने के बाद उन सभी लड़कों को बहकाकर स्कूल से बाहर ले जाना है। बाहर जाकर स्कूल के आस-पास खेतों, होटलों, साईकिल दुकान, खोमचे वाले के पास आदि जाकर खूब मटरगश्ती करनी है। कभी बेर खानी है तो कभी सिंदुआर की झाड़ियों में मोटी डालियों पर लटकना है और सीधे टिफिन से ठीक पहले वाली घंटी के वक्त क्लास लौटना है। हालांकि बाहर जाने से पहले बाक़ी लड़के बाद में होने वाली कुटाई को लेकर सशंकित रहते थे लेकिन मजाल है कि मेरे गुरु मंत्र दिए जाने के बाद कोई डर छू-मंतर न हो जाए ?





ये अलग बात है क्लास लौटने के बाद रोज़ाना शर्मनाक तरीके से स्कूल के चपरासी खुदू मामा द्वारा कुटाई होती थी। मैं मन ही मन सोचता कि कम से कम टीचर्स से मार खाते तो इज्ज़त तो बनी रहती क्लास में ! खैर मार खा-खाकर मैं और मेरे गैंग के लड़के ढीठ बन चुके थे। क्लास दर क्लास दसवीं कक्षा तक मेरी बहुमुखी नेतागिरी की प्रतिभा में और भी निखार आता गया और हमलोग हुड़दंग और फ़िर कुटाई के बड़े-बड़े कीर्तिमान रच डाले। स्कूल में सभी टीचर्स और दो चपरासी में कोई ऐसा नहीं बचा था जिसका बीपी बढ़वाकर हमलोग उनसे न धुले हों। मैं उन लड़कों का नेता था इसलिए मेरे नाम एक खास कीर्तिमान दर्ज था। कभी किसी से ऊंची आवाज़ में बात तक नहीं करने वाले अत्यंत शांत स्वभाव वाले बाउरी सर से भी मैं प्रसाद पा चुका था। मेरे अलावा पूरे स्कूल में उन्होंने कभी किसी को एक चांटा तक नहीं मारा था तो आप समझ सकते हैं मेरे टैलेंट का लेवल।

कॉलेज तो मैं कभी ज्यादा गया नहीं इसलिए मेरे कॉलेज के सहपाठी मेरी नेतागिरी के अभूतपूर्व कौशल से महरूम रह गए। लेकिन जिस लॉज में हम छह लड़के रहते थे वहां मैं कैसे चूक सकता था। सुबह चार बजे उठकर जॉगिंग करने जाना और लौटकर फिर दस बजे तक सोना। रूम में गैस चूल्हा रहने के बावजूद होटल में सामूहिक भोजन। कभी चांडिल डैम,कभी सूर्य मंदिर तो कभी रातों को ऑर्केस्ट्रा देखने जाना। रूम में समय-समय पर ताश खेल का मजमा लगाना ये सब मेरी ही उत्कृष्ट नेतागिरी और मोटिवेशन का कमाल था।

कालांतर में कुछ ख़ास कारणों से तकरीबन 19 की उम्र में मेरी शादी हुई। इसके बाद मैं गांव शिफ्ट हो गया। क़रीब एक साल बाद हमारे यहां विधानसभा चुनाव की दुंदुभी बज चुकी थी। चुनावी जंग में इस बार हमारे ईचागढ़ विधानसभा की रणभूमि में यूं तो तीन बार के विजेता विधायक सिंह जी सहित वर्तमान विधायक सह डिप्टी सीएम स्व सुधीर महतो जी ताल ठोंक रहे थे। लेकिन उस बीच इस दफे केला छाप पर मेरे पिता के मित्र श्री कार्तिक महतो जी दहाड़ रहे थे।

चहुं ओर बस उनकी ही चर्चा थी और लगभग यही सबको महसूस हो रहा था कि इस बार कार्तिक जी ही बाजी मारेंगे। मुझे वोटर बने महज़ एक या डेढ़ साल ही हुए थे। सो युवा जोश से लबरेज़ मैं जब कार्तिक जी से मिला तो एक बार फिर मेरे अंदर का कद्दावर नेता जाग गया। फिर क्या ? मैं युद्ध स्तर पर कार्तिक जी के लिए कैंपेन में लग गया। विश्वास नहीं कीजिएगा कि मैंने ग्रासरूट लेवल पर इतना भयंकर और तूफ़ानी चुनाव प्रचार किया कि अंततः कार्तिक जी 18 हज़ार वोटों से हार गए। सक्रिय राजनीति की दुनिया में यह मेरी पहली उपलब्धि थी।

चुनाव के ठीक बाद मेरा चयन पारा शिक्षक के पद पर हुआ। कुछ दिन शांत रहने के बाद जब मैं अपने प्रखंड स्तर पर पारा शिक्षक संघ का सचिव बना तो मुझे एक बार फिर अपनी नेतागिरी का कौशल दिखाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। उन दिनों पारा शिक्षकों के मानदेय का भुगतान प्रखंड स्तर से ही होता था लेकिन अनियमित ! मैंने इस अनियमितता को दूर करने का बीड़ा अपने कंधों पर ले लिया। यकीन मानिए जिस माह से मैंने मुहिम शुरू की उसके बाद अगले नौ महीनों तक मानदेय का फंड ही नहीं आया। इस प्रकार मैं अपने शिक्षक संगठन में भी नेतागिरी के कीर्तिमान हेतु एक दो-ढाई सौ ग्राम साइज़ का मील का पत्थर गाड़ चुका था।

वर्ष 2014 में सक्रिय राजनीति के क्षेत्र में मेरे सबसे फेवरेट युवा लोकप्रिय लीडर,तीन बार के डिप्टी सीएम और एक बार के होम मिनिस्टर परम आदरणीय सुदेश कुमार महतो जी हमारे लोकसभा प्रत्याशी के रूप खड़े थे। मैं तो पहले से ही पार्टी में जुड़ा ही था ऊपर से फेवरेट लीडर को देखकर मेरी बांछे खिल गई। ख़ुदा कसम मैं भाव-विभोर होकर इतनी तन्मयता से ज़मीनी स्तर पर अभियान चलाया कि उनकी जमानत जब्त होते-होते बची।

वर्ष 2018 आते-आते मैं अपने शिक्षक संगठन में अपनी धाकड़ नेतागिरी की बदौलत प्रखंड से प्रोन्नति पाकर जिला सोशल मीडिया प्रभारी बन चुका था। उन दिनों हर दूसरे-तीसरे दिन पारा शिक्षकों का धरना-प्रदर्शन,घेराव होता रहता था। मैं कहां पीछे रहने वाला था ! हर दिन अखबारों में बयानबाज़ी और जहां-तहां लोकल टीवी चैनलों पर बाइट देकर इतराना मेरी दिनचर्या बन चुकी थी। उस समय टेट पास, प्रशिक्षित और अप्रशिक्षित पारा शिक्षक एक साथ एकजुट होकर चट्टानी एकता के साथ अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत थे। मैं ही वो महामानव और कर्मठ नेता हूं जिसने पारा शिक्षकों की चट्टानी एकता में छेद कर उसमें एक बरगद का बीज डाल दिया था। 2019 तक आते-आते बरगद अपनी जड़ें फैलाकर चट्टानों में दरार पैदा करना शुरू कर चुका था।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में हम पारा शिक्षक तत्कालीन राज्य सरकार की नीतियों से इतने क्षुब्ध थे कि मैंने जीवन में पहली बार सहाय जी के "हाथ" मजबूत करने की ठान ली। मेरा आक्रोश और नेतागिरी का जोश उफ़ान मार रहा था। मैंने जी-जान लगाकर सहाय जी की सहायता करने की कोशिश की लेकिन अंततः सहाय जी असहाय हो गए।

2021 के अंत तक मैं संगठन के लिए मेहनत कर पारा शिक्षकों की एकता वाली चट्टान को कटिंग पत्थर के टुकड़ों में तब्दील करने में कामयाब हो चुका था। पारा शिक्षक संघ तीन धड़ों में बंट चुका था।अब मैं और ज्यादा प्रमोट होकर टेट पास पारा शिक्षकों के संघ का प्रदेश प्रवक्ता बन चुका था। मतलब मैं राज्य स्तर का बड़ा नेता बन चुका था। आप लोगों को विश्वास नहीं होगा कि बतौर प्रवक्ता मैंने इतना धुआंधार परफॉर्मेंस दिया कि 2022 की शुरुआत तक टेट पास पारा शिक्षक संघ मेरे सकल प्रयासों से मेरे कर-कमलों द्वारा तीन फाड़ हो चुके थे। मेरी इसी निःस्वार्थ सेवा भावना और लगन की वजह से जनवरी 2022 में मुझे टेट पास पारा शिक्षकों एवं गैर पारा कैंडीडेट्स का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया।

बतौर प्रदेश अध्यक्ष हमारी मुहिम थी कि बिना परीक्षा ही पूर्व की तरह काउंसलिंग के जरिए शिक्षक नियुक्ति कराना। मैं प्रदेश अध्यक्ष बनते ही नायक फिल्म के शिवाजी राव की तर्ज़ पर ताबड़तोड़ धरना-प्रदर्शन चालू कर दिया। सिर्फ़ यही नहीं, संगठन के सदस्यों की सहमति पर कोर्ट में केस भी करवा दिया गया। आप लोगों को विश्वास नहीं होगा कि महज़ एक साल के भीतर सरकार ने हमारी मांगों को दरकिनार कर ठिकाने लगाते हुए अपनी ही नियमावली के साथ शिक्षक नियुक्ति का विज्ञापन ज़ारी कर दिया। फिर क्या ? उसके बाद हमारी नेतागिरी के भी घोड़े लग गए !

दुर्भाग्यवश मैं आज़ प्राइमरी टीचर हूं। सरकारी प्रावधानों से बंधे होने के कारण फिलवक्त मैं खेत की मेड़ के नीचे दुम दबाकर चुपचाप बैठे सियार की तरह अपनी भी नेतागिरी की चूल मारती पूंछ को "दबड़ाकर (मोड़कर)" बैठा हुआ हूं। और इसी वज़ह से बहुत सारे लोग राहत की सांस ले रहे हैं। मैं जहां भी और जिसके भी समर्थन में नेतागिरी में उतर जाऊं, उसके घोड़े लगना तय है। यही मेरी काबिलियत और खासियत दोनों ही हैं। खैर ! मुझमें नेतागिरी का जज्बा अभी खत्म नहीं हुआ है। जनकल्याण की चाहत दिल में अभी भी तरोताजा है। बस वक्त का इंतजार है। लोगों का कल्याण मैं करता आया हूं और करके रहूंगा क्योंकि.....नेता तो मैं हूं ना।


- कुणाल



नोट- यह लेख केवल हास्य और व्यंग्य हेतु लिखा गया है।

07 August 2026

सच्चे और निस्वार्थ रिश्ते, आज के दौर की सबसे बड़ी पूंजी


जीवन के इस कठिन और तेज़ रफ़्तार दौर में जहाँ हर इंसान अपनी ही दुनिया, अपने स्वार्थ और व्यस्तता के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है, वहाँ कई बुनियादी मानवीय मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं। आज की इस स्वार्थी दुनिया में रिश्तों की नींव अक्सर लेन-देन और अपने फ़ायदे पर रखी जाने लगी है। ऐसे माहौल में सच्चे, निष्ठावान और निस्वार्थ रिश्ते किसी अनमोल मोती या उपहार से कम नहीं हैं।





निस्वार्थ रिश्तों का महत्व- किसी भी इंसान की असली दौलत उसके बैंक खाते या संपत्ति नहीं, बल्कि उसके वे वफ़ादार रिश्ते होते हैं जो ख़ुशी में मुस्कुराते हैं और दुख में ढांढस बंधाते हैं। एक सच्चा रिश्ता वह है जो किसी शर्त, पृष्ठभूमि या आर्थिक लाभ का मोहताज न हो। जो इंसान बिना किसी मतलब के आपका सम्मान करे, आपकी उपस्थिति की सराहना करे और बिना कहे आपकी तकलीफ़ को समझ ले, वही आपकी वास्तविक पूंजी है।

मुश्किल घड़ी में परीक्षा- रिश्तों की सच्ची पहचान हमेशा मुश्किल और परीक्षा के समय ही होती है। जब जीवन में संकट आता है, सफ़लताएं मुंह मोड़ लेती हैं और अपने भी अजनबी लगने लगते हैं, तब जो कुछ हाथ आपका सहारा बनते हैं, वही जीवन के असल स्तंभ होते हैं। कठिन समय में साथ निभाने वाले लोग इंसान को निराशा के अंधेरे से निकालकर नई उम्मीद और हौसला देते हैं।

रिश्तों की हिफाजत और समझदारी- आज के इस ख़ुदग़र्ज़ दौर में दिल से चाहने वाले लोग बहुत कम मिलते हैं। यही वजह है कि ऐसे रिश्तों की क़द्र करना, उनमें आने वाली दूरियों को समय रहते दूर करना और उन्हें संभालकर रखना ही असली बुद्धिमानी है। रिश्तों में अहंकार, ग़लतफ़हमियां और उपेक्षा दूरियों की वजह बनती हैं, जबकि विनम्रता, सहनशीलता और अपनापन रिश्तों को लंबे समय तक जीवंत रखते हैं।

जीवन संक्षिप्त है और यह सफर अकेले तय करना मुमकिन नहीं है। इसलिए अपने आसपास मौजूद उन निष्कपट और निस्वार्थ रिश्तों को पहचानिए जो आपसे किसी भी प्रकार की अपेक्षा रखे बिना जुड़े हैं। उनकी क़द्र कीजिए, उन्हें समय दीजिए और इन रिश्तों को सुरक्षित रखिए, क्योंकि यही वे पूंजी हैं जो इंसान को जीवन के कठिन रास्तों पर कभी अकेला नहीं छोड़ती।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


02 August 2026

विकास और पर्यावरण पर लेखकों की विशेष लेखमाला पढ़िए






विकास के नाम पर पेड़ों का काटना कितना सही ?


पेड़ हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।पेड़ों के बिना इंसान का अस्तित्व बिल्कुल शून्य है। पेड़ों को विकास के नाम पर काटना बिल्कुल भी सही नहीं है।परंतु इनके काटने के बिना जीवन में कई आवश्यक वस्तुओं का अभाव हो जाएगा।ग्रामीण क्षेत्रों में अभी अधिकतर लोग रसोई घर में ईंधन के रूप में लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं,पशुओं के लिए चारा इमारती लकड़ी,भूमि अपरदन से रोकते हैं और सबसे महत्वपूर्ण ये कि पेड़ हमें सांस लेने के लिए ऑक्सीजन देते हैं और हमारी छोड़ी हुई कार्बनडाक्साइड गैस को ग्रहण करते हैं।


पृथ्वी पर सभी प्राणियों का जीवन मुख्यत:पेड़ों पर ही टिका है।विकास के नाम पर पेड़ों को हम काट तो रहे हैं परंतु ये भी सोचने का विषय है जिस अनुपात में पेड़ काट रहे हैं क्या उस अनुपात में नए पौधे लगा भी रहे हैं कि नहीं।अक्सर हम देखते हैं कई बड़े बड़े फलदार पेड़ जिन्हें हमारे पूर्वजों ने लगाया था उनके फल और उनसे कई प्रकार के लाभ हम उठा रहे हैं।क्या हम भी अपनी आने वाली पीढ़ियों के बारे में सोच रहे हैं या नहीं।


सरकार द्वारा अक्सर पेड़ों के महत्व को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय स्तर की योजनाएं चलाकर रखी हैं।जैसे कि एक पेड़ मां के नाम परन्तु हर बार पेड़ लगाने ही नहीं हैं अपितु जो पेड़ लगाए हैं क्या उनकी हम देखभाल भी कर रहे हैं या नहीं।हमारे पूर्वजों यूँ ही पेड़ों की पूजा नहीं करते थे जैसे पीपल की पूजा करना।वे इस बात से भली भांति परिचित थे कि पेड़ सभी प्राणियों में प्राण वायु का संचार करते हैं बल्कि पीपल तो दिन रात हम सभी को ऑक्सीजन देता था।वे तो यहां तक कहते थे शाम या रात के समय किसी प्रकार का पत्ता फूल फल सब्जी नहीं तोड़ी जाती  क्योंकि ये पौधे भी रात का सोए होते हैं।


प्रोजेक्ट जैसे सड़कों व रेलवे लाइन का विस्तारीकरण बड़े  बड़े भवन जो विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं पर उनकी महत्वता के कारण पेड़ों के काटने को भी बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। हम पर्वतीय राज्यों में कई वर्षों से बरसात के दिनों इस बेतरतीब दोहन के परिणाम भयंकर बाढ़ बादल फटने जैसी घटनाओं के रूप में देख चुके हैं। अत:इस पावन कार्य की शुरुआत के लिए हमे सरकारों की तरफ ताकना बंद करना होगा जितना राज्य करता हमे भी राज्य के साथ कंधे से कंधा मिला कर पेड़ों की रक्षा कर पर्यावरण को बचाकर देश सेवा में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।


                                                                           - राज कुमार कौंडल


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विकास के नाम पर पेड़ों को काटना कितना सही है ?


"यदि पृथ्वी पर जीवन को सुरक्षित रखना है, तो विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना ही होगा।"

वर्तमान युग को विकास का युग कहा जाता है। नई सड़कें, चौड़ी राष्ट्रीय राजमार्ग, मेट्रो रेल, उद्योग, बहुमंजिला इमारतें, स्मार्ट सिटी और आधुनिक सुविधाएँ किसी भी देश की प्रगति के प्रतीक मानी जाती हैं। प्रत्येक राष्ट्र अपने नागरिकों को बेहतर जीवन, रोजगार और आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए विकास कार्यों को गति दे रहा है। 

किंतु इस विकास की दौड़ में सबसे अधिक नुकसान यदि किसी का हुआ है, तो वह प्रकृति का हुआ है। विशेष रूप से पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने पर्यावरण के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। ऐसे में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या विकास के नाम पर पेड़ों को काटना उचित है?

पेड़ केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं बढ़ाते, बल्कि वे पृथ्वी पर जीवन के सबसे बड़े रक्षक हैं। वे हमें शुद्ध ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करते हैं, वर्षा चक्र को संतुलित बनाए रखते हैं तथा मिट्टी के कटाव को रोकते हैं। जंगल असंख्य वन्य जीवों और पक्षियों का प्राकृतिक आवास हैं। 

औषधियों, फल, फूल, लकड़ी और अनेक प्राकृतिक संसाधनों का आधार भी पेड़ ही हैं। भारतीय संस्कृति में तो वृक्षों को देवतुल्य माना गया है। पीपल, बरगद, नीम और तुलसी जैसे पौधों की पूजा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण की एक वैज्ञानिक परंपरा भी रही है।

वर्तमान समय में विकास परियोजनाओं के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की जा रही है। इसके परिणाम अब स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं। वैश्विक तापमान में निरंतर वृद्धि, असामान्य वर्षा, भीषण गर्मी, बाढ़, सूखा, वायु प्रदूषण और जैव विविधता का ह्रास मानव अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती बन चुके हैं।

बढ़ती जनसंख्या और बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप सड़कें, विद्यालय, अस्पताल, उद्योग और परिवहन सुविधाएँ आवश्यक हैं। लेकिन विकास का अर्थ प्रकृति का विनाश नहीं होना चाहिए। वास्तविक विकास वही है जो पर्यावरण की रक्षा करते हुए मानव जीवन को बेहतर बना। 

 आधुनिक तकनीकों, हरित भवनों, शहरी वनों और पर्यावरण-अनुकूल निर्माण पद्धतियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। केवल पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पौधों का संरक्षण और संवर्धन भी उतना ही आवश्यक है।

इस दिशा में नागरिकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक व्यक्ति यदि अपने जीवन में कम-से-कम एक पौधा लगाकर उसकी जिम्मेदारी ले, तो पर्यावरण संरक्षण का बड़ा अभियान सफल हो सकता है। विद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को व्यवहारिक रूप दिया जाए, ताकि बच्चों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित हो। 

महात्मा गांधी ने कहा था- "पृथ्वी हर व्यक्ति की आवश्यकता पूरी कर सकती है, लेकिन हर व्यक्ति के लालच को नहीं।"

इस प्रकार कहा जा सकता है कि विकास के नाम पर अंधाधुंध पेड़ों की कटाई किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। हमें ऐसे विकास मॉडल को अपनाना होगा जिसमें प्रकृति और प्रगति एक-दूसरे के पूरक बनें, विरोधी नहीं। यदि हम आज वृक्षों की रक्षा करेंगे, तभी आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित, समृद्ध और हरित भविष्य दे सकेंगे। इसलिए हमारा संकल्प होना चाहिए- "विकास भी, पर्यावरण भी; प्रगति भी, प्रकृति भी।"


                                                              - मनोज कौशल, शिक्षक (हिंदी)


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वृक्ष: धरती की साँस, मानवता की आशा


"यदि वृक्ष हैं, तभी भविष्य है।" यह केवल नारा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता का शाश्वत सत्य है। भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से वृक्षों को देवतुल्य माना गया है। पीपल, वट, नीम और तुलसी हमारी आस्था, संस्कृति तथा जीवन के प्रतीक हैं। ऋषि-मुनियों ने वृक्षों की छाया में ज्ञान प्राप्त किया और हमारे धर्मग्रंथों ने प्रकृति संरक्षण को मानव का परम धर्म बताया है।

वैज्ञानिक दृष्टि से वृक्ष पृथ्वी के जीवन-रक्षक हैं। एक परिपक्व वृक्ष प्रतिवर्ष लगभग 22 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर वातावरण को शुद्ध करता है। संयुक्त राष्ट्र भी मानता है कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने का सबसे प्रभावी प्राकृतिक उपाय वनों का संरक्षण है। जापान में फ़ॉरेस्ट बाथिंग को स्वास्थ्य उपचार का हिस्सा बनाया गया है, जबकि कोस्टा रिका ने अपने वनों का सफल पुनर्जीवन कर विश्व के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।

विडंबना यह है कि हम विकास की ऊँची इमारतें खड़ी करने की होड़ में उन्हीं जंगलों की नींव उखाड़ रहे हैं, जिन पर मानव सभ्यता टिकी है। आज पेड़ों को काटकर सड़कें चौड़ी की जा रही हैं, पर शायद हम यह भूल रहे हैं कि कल इन्हीं सड़कों पर स्वच्छ हवा की तलाश करनी पड़ सकती है।

वृक्ष केवल फल, फूल, औषधियाँ और छाया ही नहीं देते, बल्कि असंख्य जीवों का आश्रय भी हैं। यदि वृक्ष नहीं रहेंगे, तो वर्षा, स्वच्छ वायु और जीवन—तीनों संकट में पड़ जाएंगे। इसलिए आइए, संकल्प लें कि एक भी वृक्ष अनावश्यक न कटे, क्योंकि वृक्ष बचेंगे, तभी मानवता बचेगी।


- रोशन कुमार झा, जमशेदपुर


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विकास के नाम पर पेड़ों को काटना कितना सही है ?


इस लेख को लिखने से पहले मैं अपनी माननीया राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु जी के उस भाषण का ज़िक्र करूंगी, जो उन्होंने पर्यावरण राष्ट्रीय सम्मेलन 2025, विज्ञान भवन, नई दिल्ली में दिया था। इस भाषण में उन्होंने पेड़ों और धरती को नमन और क्षमा मांगने वाली बहुत सुंदर बात कही थी।

राष्ट्रपति जी ने अपने बचपन की बात बताते हुए कहा:- "मेरे पिता और माता लकड़ियां एकत्र करते थे। फिर वे उन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर जलाने लायक बनाते थे। मैं हर दिन देखती थी कि मेरे पिता लकड़ियों को काटने से पहले उनके आगे झुकते थे। मैं अपने पिता से पूछती थी, आप लकड़ियां काटने से पहले प्रार्थना क्यों करते हैं? वह मुझसे कहते थे कि वह क्षमा मांग रहे हैं।"

उन्होंने आगे कहा कि पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए राष्ट्रपति ने याद किया कि कैसे उनके पिता खाना पकाने और कृषि के लिए पेड़ों एवं धरती का उपयोग करने से पहले उनको नमन करते थे तथा उनसे क्षमा मांगते थे।

इसका मतलब क्या था ? राष्ट्रपति जी का कहना था कि हमारे पूर्वज प्रकृति को बहुत सम्मान देते थे। पेड़ काटने से पहले, धरती पर फावड़ा चलाने से पहले हम धरती माँ से नमन करके क्षमा मांगते थे। क्योंकि हम जानते थे कि हम प्रकृति से ले रहे हैं, इसलिए उसका सम्मान करना जरूरी है। उन्होंने लोगों से सवाल किया कि "क्या उन प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करना उचित है, जिन्हें मनुष्य स्वयं नहीं बना सकता?"

यह भाषण पर्यावरण को बचाने और प्रकृति के साथ समन्वय का बहुत सुंदर संदेश है। उन्हें संरक्षित करना हमारा धर्म है। कहा भी गया है- "वृक्षो रक्षति रक्षितः" अर्थात तुम उसकी रक्षा करो, वह तुम्हारी रक्षा करेगा। अब प्रश्न यह उठता है कि यदि हम अपने वृक्षों की रक्षा नहीं करेंगे तो हमें क्या-क्या प्राकृतिक आपदा झेलनी पड़ेगी ?

शुद्ध हवा की कमी- पेड़ों के कटने से ऑक्सीजन कम होती है और प्रदूषण बढ़ता है। प्राकृतिक आपदा- जंगल उजड़ने से बाढ़ और मिट्टी खिसकने का खतरा बना रहता है। इसके कारण कभी भूस्खलन, कभी अत्यधिक वर्षा, कभी सूखा आदि की संभावना रहती है। बेघर होते जीव- पेड़ों पर या जंगल में रहने वाले पशु-पक्षियों का आशियाना छिन जाता है। भोजन की तलाश में वे बस्तियों में आ जाते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है। यह प्रकृति के नियम के विरुद्ध है।

बेहतर विकल्प और समाधान-

1- पेड़ों का प्रतिस्थापन: जितने पेड़ काटे जाएं, उससे कई गुना अधिक पेड़ लगाए जाएं। पर यह विधि आंशिक फलदायक है क्योंकि पौधे को पेड़ बनने में समय लगता है।

2- पेड़ों को शिफ्ट करना: काटने के बजाय पेड़ों को सुरक्षित तरीके से दूसरी जगह स्थानांतरित किया जाए।

3- विकास योजना में बदलाव: ऐसी योजना बनाई जाए जिसमें कम से कम पेड़ कटें।

प्रकृति और पेड़ हमारे जीवन का आधार हैं। यदि वे नहीं होंगे तो हम जीएंगे कैसे? प्रकृति ने हमें बहुत कुछ दिया है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो प्रकृति के पास अथाह संपत्ति है हमें देने के लिए, पर यह संपत्ति भी करोड़ों वर्षों के परिश्रम से हमें प्राप्त हुई है।

वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग 100 करोड़ वर्ष पहले पृथ्वी पर शैवालों से पौधे विकसित हुए। और 50 करोड़ साल पहले ये जलीय पौधे धीरे-धीरे जमीन पर आए और विशाल वृक्षों का रूप लिया। इस उत्पत्ति के रहस्य को जानते हुए हम कह सकते हैं कि प्रकृति एवं पेड़ हमें बहुत कठिनाई से मिले हैं।
अतः इसे संरक्षित करना हमारा कर्तव्य एवं धर्म दोनों है।

इसलिए अंधाधुंध होकर पेड़ों की कटाई करना, मात्र सौंदर्यीकरण के लिए या अनावश्यक विकास के लिए, यह उचित नहीं है। विकास के नाम पर पेड़ काटना ज़रूरी कब है ? सड़क, अस्पताल, स्कूल, पानी की लाइन... ये भी तो समाज के लिए जरूरी हैं। बिना बुनियादी चीजों के विकास रुक जाएगा। तो कुछ जगह पेड़ काटने पड़ते हैं।

जब "विकास" का मतलब सिर्फ कंक्रीट और इमारत हो जाए। एक पेड़ काटते हैं, पर 10 लगाते नहीं। शहर गर्म हो जाता है, भूजल नीचे चला जाता है, पक्षी बेघर हो जाते हैं, सांस लेने की हवा कम हो जाती है। गर्मी हर साल बढ़ रही है, उसका एक कारण यह भी है।

तो सही रास्ता क्या है ? "विकास + संरक्षण" साथ चले।

पहले सोचो: क्या पेड़ हटाए बिना काम हो सकता है? रोड का डिजाइन बदला जा सकता है? जैसे विदेशों में सड़कें पेड़ों को बचाकर बनती हैं, वैसे ही यहां भी बनें। काटो तो लगाओ: 1 पेड़ कटे तो 5 लगें। और लगाकर भूलें नहीं, उन्हें पाला भी जाए। पुराने पेड़ बचाओ: 50 साल का पीपल और नया पौधा बराबर नहीं होते। सार- पेड़ काटना अपने आप में गलत नहीं है। गलत है बिना सोचे काटना। विकास का मतलब विनाश नहीं होना चाहिए।


- रत्ना बापुली


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विकास के नाम पर पेड़ों को काटना कितना सही है ?


"यदि विकास की राह में प्रकृति का अस्तित्व ही समाप्त हो जाए, तो वह विकास नहीं विनाश कहलाता है।" आज ऊँची-ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें और बड़े-बड़े उद्योग विकास के प्रतीक माने जाते हैं। लेकिन इन सबकी नींव में यदि हजारों पेड़ों का बलिदान छिपा हो, तो हमें यह सोचने की आवश्यकता है कि क्या ऐसा विकास वास्तव में उचित है ?

पेड़ केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि पृथ्वी के प्राण हैं। वे हमें शुद्ध वायु, वर्षा, छाया, औषधियाँ और असंख्य जीव-जंतुओं को आश्रय प्रदान करते हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान, जल संकट और प्राकृतिक आपदाओं जैसी गंभीर समस्याएँ जन्म ले रही हैं। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी।

निस्संदेह, विकास आवश्यक है, लेकिन पर्यावरण का सम्मान करते हुए। जहाँ पेड़ काटना अपरिहार्य हो, वहाँ उससे कई गुना अधिक वृक्ष लगाए जाएँ और उनका संरक्षण भी किया जाए। वास्तव में यही सच्चा और टिकाऊ विकास है।


अंत में मैं केवल इतना कहना चाहूँगी-

"पेड़ बचेंगे, तभी पृथ्वी बचेगी!
पृथ्वी बचेगी, तभी हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा।"


इसलिए विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना मानव की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए।


- नूतन गर्ग, दिल्ली


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विकास के नाम पर पेड़ों को काटना कितना सही है ?


आज हमारा देश एक विकसित देश है, जिस पर हमें बहुत गर्व भी होता है। परन्तु इस गर्व को महसूस करने के लिए हमने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है।हम जिसे विकास समझ रहे हैं वह विकास न होकर विनाश है। हम जिस पथ पर अग्रसर हो रहे हैं हमारे आने वाली पीढ़ी स्वच्छ वायु स्वच्छ जल और स्वच्छ वातावरण के लिए तरसेगी।

क्योंकि हम वर्तमान मे उन्नति और विकास के नाम पर पृथ्वी पर से पेड़ों को काटकर के उसे नग्न बनाते जा रहे हैं, जिसका परिणाम यह होगा कि संपूर्ण पृथ्वी सूर्य के तेज गर्मी को बर्दाश्त ना कर सकेगी जिसके कारण से ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या अपने चरम पर होगी। इसीलिए यह आवश्यक हो गया है कि अब हम सबको एकजुट होकर के पृथ्वी पर से पेड़ों के नष्ट होने या काटे जाने का विरोध करना चाहिए।

यदि पेड़ों को काटना बहुत आवश्यक हो उन्हें काटने की बजाय उन्हें उस स्थान से निकलकर दूसरे स्थान पर लगाना चाहिए। क्योंकि उस पेड़ का जो मूल्य है वह हम नया पेड़ लगा करके उसकी भरपाई नहीं कर सकते हैं।


- अनुरोध त्रिपाठी, प्रयागराज



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विकास के नाम पर प्रकृति का विनाश कितना उचित ?


आज विकास के नाम पर जिस तेजी से पेड़ों की कटाई हो रही है, उसके दुष्परिणाम हमारे सामने हैं। बढ़ती गर्मी, अनियमित वर्षा, बाढ़, भूस्खलन, जल संकट और वायु प्रदूषण यह संकेत देते हैं कि कहीं न कहीं विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बिगड़ रहा है।

विकास आवश्यक है। विद्यालय, अस्पताल, सड़कें और अन्य सुविधाएँ समाज की जरूरत हैं। लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए जिससे प्रकृति को न्यूनतम क्षति पहुँचे। यदि किसी जनहित के कार्य के लिए पेड़ काटना अपरिहार्य हो, तो उसके बदले अधिक संख्या में वृक्ष लगाना भी हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए।

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग प्रकृति से गहरा जुड़ाव रखते हैं। वहीं आज की युवा पीढ़ी भी पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक है और जंगलों की अंधाधुंध कटाई का विरोध करती दिखाई देती है। इसके विपरीत, शहरी क्षेत्रों में सड़क चौड़ीकरण, नई कॉलोनियों और बड़े निर्माण कार्यों के नाम पर हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं। इसका परिणाम बढ़ते तापमान, जलभराव और प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सामने आ रहा है।

हमें ऐसा विकास चाहिए जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखे। सरकार के साथ-साथ प्रत्येक नागरिक का भी कर्तव्य है कि वह अधिक से अधिक वृक्ष लगाए, प्लास्टिक का कम उपयोग करे और पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान दे।

याद रखिए, प्रकृति हमें जीवन देती है। यदि हम उसका सम्मान करेंगे, तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रहेगी। इसलिए आइए, हम विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का भी संकल्प लें।


- सुमन डोभाल काला


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क्या विकास के लिए पेड़ों को काटना सही है ?


सामान्यतः विकास किसी क्षेत्र विशेष में उन्नति, वृद्धि या निरंतर आगे बढ़ने को कहते हैं। वर्तमान में किसी क्षेत्र, प्रदेश या देश में विकास के लिए पेड़ों को काटना आम बात है। सामान्यतः हम देखते हैं कि भवन बनाने, सड़के बनाने, खेत बनाने और उद्योग स्थापित करने के लिए जगह-जगह पेड़ काटे जा रहे हैं।

पेड़ों को काटना कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता परन्तु क्षेत्र, प्रदेश या देश विशेष का विकास भी अनिवार्य हैं। अतः हमें वनों के काटने की एक निश्चित सीमा तय करनी होगी ताकि विकास भी हो जाए और पारिस्थितिक संतुलन पर भी वृक्षों के कटान का विपरीत प्रभाव ना पड़े।

हमें वनों के काटने और विकास कार्यों के मध्य एक संतुलन बनाना होगा। हर एक विकास कार्य में हमारा यह लक्ष्य होना चाहिए कि काटे गए पेड़ों के स्थान पर ,उससे अधिक संख्या में पेड़ लगाए जाएं। इसके अतिरिक्त ,इन पेड़ों की रखवाली का दायित्व उन व्यक्तियों पर होना चाहिए जो इन विकास कार्यों से लाभान्वित हो रहे हो। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अगर पूर्ण विकसित वृक्षों को काटा जाता है तो उनकी शीघ्र प्रतिपूर्ति करना असंभव है, इसलिए हमें पूर्ण विकसित वर्षों के काटने से बचना चाहिए।

प्रत्येक समझदार व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह पेड़ों को कटने से बचाए एवं वृक्षारोपण में अपनी निरंतर भागीदारी सुनिश्चित करें। हमें एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में न सिर्फ स्वयं वृक्षारोपण करना चाहिए बल्कि औरों को भी इस पुनीत कार्य हेतु प्रेरित करना चाहिए। तभी हम बढ़ती हुई वैश्विक उष्णन और जलवायु परिवर्तन जैसी प्राकृतिक आपदाओं से निपट सकते हैं।


- प्रवीण कुमार


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15 July 2026

जीवन का 'शून्य' और हमारी भागदौड़ का अर्थ


जीवन की पूरी यात्रा एक ऐसे अंतहीन राजमार्ग की तरह है, जहाँ हम अनगिनत पड़ावों को पार करते हुए एक मंज़िल की तलाश में जुटे रहते हैं, पर क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचा है कि इस आपाधापी, इस अथक श्रम और भौतिक संसाधनों के संचय के अंत में हमारे हाथ क्या लगेगा? हम 'कर लूँ जमा दौलत-ओ-ज़र, उसके बाद क्या?' के उस बुनियादी सवाल को अक्सर अपनी व्यस्तताओं के शोर में दबा देते हैं, जबकि यही वह प्रश्न है जो हमें इंसान होने की सच्ची परिभाषा से रूबरू कराता है।





दरअसल, हमारी तमाम उपलब्धियां, सजे-धजे आशियाने और दुनियावी शोहरत का गुमान, वक्त की रेत पर बनी उन लकीरों की तरह है जो पहली लहर के साथ ही अपना अस्तित्व खो देती हैं। साहित्य और शेर-ओ-शायरी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि उस रूहानी ठहराव का आईना हैं, जहाँ हम अपनी रूह से मिलते हैं, और जब हम अपनी भावनाओं को ग़ज़ल के सांचे में ढालते हैं, तो हम केवल शब्द नहीं गढ़ते, बल्कि उन अनकहे सच को कागज़ पर उतारते हैं जो भीड़ में कहीं खो गए थे।

जीवन का शाश्वत सत्य तो वही है कि 'उठी थी ख़ाक, ख़ाक से मिल जाएगी वहीं', यह एक ऐसा दर्शन है जो हमारे भीतर के अहंकार को गलाकर करुणा की खाद बनता है, क्योंकि यदि हम यह हृदय से स्वीकार कर लें कि मिट्टी से बने इस पुतले को अंततः उसी मिट्टी में विलीन होना है, तो फ़िर नफ़रत, द्वेष और पद-प्रतिष्ठा के मोह का कोई औचित्य शेष नहीं रह जाता। हमारा जीवन महज़ एक सांख्यिकीय डेटा या संपत्तियों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह उन निश्छल पलों का समूह है जो हमने किसी के दुःख को साझा करके, किसी के चेहरे पर मुस्कान बिखेरकर या अपनों की आँखों में प्रेम बनकर जिए हैं।

अंततः, जब ज़िंदगी का चिराग़ बुझने को होगा, तब दौलत और पद की रसीदें नहीं, बल्कि हमारे द्वारा किए गए परोपकार और प्रेम की ख़ुशबू ही हमारे साथ जाएगी, इसलिए इस यात्रा के दौरान उस 'शून्य' को पहचानना आवश्यक है जहाँ हम सब एक समान हैं, ताकि अंत में जब यह सवाल ज़हन में उठे कि 'उसके बाद क्या ?', तो हमारे पास उत्तर में पछतावे की जगह एक संतुष्ट मुस्कान हो।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़



09 July 2026

चौमासा की डरावनी रातें!


पहाड़ दूर से जितने प्यारे और सुंदर दिखाई देते हैं, अक्सर पहाड़ों का जीवन उससे उतना ही डरावना व खतरनाक होता है। चौमास यानी बरसात के मौसम में पहाड़- नदियों की उफान, हरियाली की हनक और कीट-पतंगों के आक्रमण से भर जाते हैं। चौमास में महीनों बारिश लगी रहती है और बारिश के कारण स्थानीय लोगों के मन में आंतरिक डर बना रहता है।

चौमास में अधिक बारिश के कारण पहाड़ों की नदियाँ विकराल रूप धारण की रहती है। जमीन यानी पहाड़ों का खिसकना, रोड़-पुलों व घरों का टूटना, पेड़ों का गिरना और आपदा आना पहाड़ों में सामान्य बात है। इसीलिए शायद! पहाड़ के स्थानीय लोग अपने घर में हमेशा 1-2 माह का राशन बचाकर चलते हैं। कहते है कि जैसी परस्थितियाँ होती हैं, वैसे ही उपाय खोजे जाते हैं। अपने घर में हमेशा राशन का भंडार करके रखना पहाड़ों के लोग का वहां की परस्थितियों से लड़ने का एक कारगर हथियार है।






चौमास की रातों में कभी-कभी पहाड़ी लोग बिना सोए भी रहते हैं। इसलिए नहीं कि उन्हें नींद नहीं आती, बल्कि इसलिए क्योंकि पहाड़ों की ज्यादा बारिश डरा देती है। पहाड़ियों का डरना भी वाज़िब है, क्योंकि प्रकृति का कहर बिना बताएँ आती है और वो इंसानों की तरह जाति-धर्म व लिंग का किसी भी प्रकार का कोई भेद नहीं करती है। पहाड़ों के हर गांव में चौमास की रातों के कई दर्दनाक किस्से दफ्न है। शायद इन्हीं दर्दनाक किस्सों ने पहाड़ियों को कोमल हृदय का मानुष बनाया है।

पहाड़ियों के बारे में कहा जाता है कि पहाड़ी लोग हृदय से जितने कोमल होते हैं, उतने ही उनके हौंसले बुलंद होते हैं। पहाड़ी प्रकृति से बार-बार टूटता-डरता है, मगर हिम्मत नहीं हारता है। चौमास की डरावनी रातें पहाड़ियों को डराती तो जरूर हैं, मगर पहाड़ी लोग प्रकृति से कभी रूठते या नफरत नहीं करते हैं। क्योंकि पहाड़ के लोग प्रकृति को अपनी माँ मानते हैं और उसके कहर को माँ की डांट समझ कर सह लेते हैं।

पहाड़ों में चौमासा जितना डरावना होता है, उतना ही लाभदायक और प्यारा भी होता है, क्योंकि चौमासा अपने साथ हरियाली, रंग-बिरंगे फूल, नदियों की सु.. सु… सुसुहाहट और चिड़ियों की चहचहाहट लेकर आती है। चौमासा यानी आषाढ़, सावन, भादो और कार्तिक का माह और वर्षा ऋतु का मौसम होता है। चौमासा को वर्षावास, चतुर्मास और चातुर्मास्य भी कहते हैं।


- दीपक कोहली



05 July 2026

योग धर्म नहीं विज्ञान हैं, मन की शांति योग से ही संभव


यूं कहे तो योग धर्म नहीं बल्कि विज्ञान जगत हैं। योग में ये शक्ति है की ये हमारे शरीर, मन एवम आत्मा को जोड़ने का विधान है। योग सम्पूर्ण मनुष्य के शरीर, मन एवम आत्मा को ऊर्जा, तागद एवम सौंदर्य प्रदान करता है। योग से कई प्रकार की चीजे निकल कर आई है अगर मनुष्य द्वारा रोज इस मूल्यवान विधान को अपना लिया जाए तो मनुष्य को कई रोगों से छुटकारा मिल सकता है।





योग का अर्थ है अपने आप को ऊर्जा में समाहित करना, उससे जोड़ना। अगर मानव में प्रतिदिन योग करने की चाहत हो जाए तो यू मान लीजिए की वह अपने स्वास्थ्य जीवन और सौंदर्यता को प्राप्त कर ही लेगा। रोगमुक्त जीवन जीने के लिए हर व्यक्ति को इस भागदौड़ रूपी जिंदगी से कुछ समय निकालकर योग करने की आदत डालने की आवश्यकता है।

आध्यात्मिक प्रगति के तरफ मनुष्य की झुकाव हो इसके लिए योग एक अनिवार्य चीज़े बन चुकी हैं। अवसाद को दूर करने के लिए योग एक वरदान से कम नहीं है।

आत्मा से जुड़ने के लिए योग दर्शन परम आवश्यक है।स्वयं को बदलने से ही इस अलौकिक विश्व में बदलाव आएगा एवम योग से ही जीवन सुखमय होगा। जिनके शरीर और मन स्वस्थ नहीं होते हैं उनके मस्तिक में चेतना और काया में फुर्ती नाम मात्र ही होती है। अगर आप अशांत है एवम आपका किसी काम में मन नहीं लगता है तो योग जरूर अपनाएं।

सफलता तो तीन चीजों में ही आधुनिक संसार में मापी जाती रही हैं दौलत सोहरत और शांति एवम शांति हमेशा योग से ही मिलता है। अपने व्यक्तिगत कमियों पर चिंतन करना और खामियों को दूर करने के लिए योग का रास्ता तालशना होगा।


- दीपक कुमार सिंह

21 June 2026

काफल: उत्तराखंड के पहाड़ों से जुड़ी मेरे बचपन की मीठी यादें

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पला-बढ़ा मेरा बचपन प्रकृति की गोद में बीता है। गर्मियों के दिन आते ही हमें काफल के पकने का बेसब्री से इंतजार रहता था। खेतों के किनारे और जंगलों में लगे काफल के पेड़ हमारे लिए किसी खजाने से कम नहीं थे। स्कूल जाते समय, छुट्टियों में और खाली समय में हम अपने दोस्तों के साथ पेड़ों पर चढ़ जाते थे और घंटों काफल खाते रहते थे। उस समय न मोबाइल का आकर्षण था, न कंप्यूटर और न ही टीवी की दुनिया का प्रभाव। हमारा बचपन प्रकृति के साथ बीता और शायद यही कारण था कि हम शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और मजबूत रहे।




हम केवल पके हुए काफल का ही आनंद नहीं लेते थे, बल्कि कच्चे काफल का स्वाद भी हमारे लिए किसी विशेष व्यंजन से कम नहीं था। दोपहर के समय जब घर के बड़े-बुजुर्ग आराम कर रहे होते थे, तब हम सब दोस्त चुपके से कच्चे काफल इकट्ठा करते। फिर सिलबट्टे में पीसे हुए नमक में थोड़ा सरसों का तेल मिलाकर उसके साथ कच्चे काफल खाते थे। उसकी खट्टी-तीखी स्वादिष्टता आज भी याद आते ही मन को बचपन की गलियों में पहुँचा देती है।





जब हम अपने माता-पिता के साथ उत्तराखंड के जंगलों में जाते थे, तब भी पेड़ों पर चढ़कर काफल तोड़ना और वहीं बैठकर खाना हमारे लिए सबसे बड़ा आनंद होता था। हमने इस प्राकृतिक फल को खूब खाया, लेकिन कभी इससे हमारी तबीयत खराब नहीं हुई। स्थानीय लोगों के अनुभव और कई वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार काफल में अनेक लाभकारी गुण पाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माने जाते हैं।


आश्चर्य की बात यह है कि अनेक शोधों के बावजूद आज भी काफल की व्यावसायिक खेती करना आसान नहीं हो पाया है। यह फल विशेष प्रकार की मिट्टी, ठंडी जलवायु और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी वातावरण में ही अच्छी तरह पनपता है। शायद यही कारण है कि यह दुर्लभ होता जा रहा है और बड़े बाजारों में बहुत कम दिखाई देता है।


आज हम बड़े हो गए हैं। जीवन की भागदौड़ में वही काफल हमारे लिए एक दुर्लभ स्वाद बन गया है। आज भी जब स्कूल के पुराने मित्र मिलते हैं, तो बचपन की वही बातें छिड़ जाती हैं- पेड़ों पर चढ़ना, जंगलों में घूमना, कच्चे काफल को नमक और सरसों के तेल के साथ खाना और बिना किसी चिंता के प्रकृति के साथ जीना।


आज हम उसकी तस्वीरें देखते हैं और मन ही मन यही सोचते हैं- काश! उत्तराखंड के पहाड़ों में बिताए गए वे बचपन के दिन फिर लौट आते और हम एक बार फिर अपने दोस्तों के साथ पेड़ों पर चढ़कर उसी काफल का स्वाद ले पाते। मेरे लिए काफल केवल एक फल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की मिट्टी की खुशबू, पहाड़ों की संस्कृति, दोस्तों का साथ और बचपन की अनमोल यादों का एक जीवंत हिस्सा है।


- बीना सेमवाल


07 June 2026

उत्तराखंड की संस्कृति का सच्चा सिपाही: झुसिया दमाई


भारत के अधिकांश राज्यों की संस्कृति को बचाने का सबसे अधिक श्रेय उन लोगों को जाता है जो लोक संगीत, गायन आदि के माध्यम से संस्कृति और सभ्यता को जन-जन तक पहुंचा कर जिंदा रखते है। भारत में जिन लोगों ने संस्कृति और सभ्यता का बोझ अपने कंधों पर उठाया, उन लोगों के साथ भारतीय समाज ने कभी भी न्याय नहीं किया; बल्कि उन लोगों को भेदभाव, अपमान और अत्याचार का शिकार होना पड़ा।

आज भले ही कुछ लोग संगीत और गाना-बजाना इत्यादि के जरिए खूब शोहरत हासिल कर रहे हैं, मगर एक समय था जब इस काम को करने वालों के साथ समस्त समाज जातीय भेदभाव करता था। इसी भेदभाव के कारण देश के कई राज्यों की संस्कृति विलुप्त होने की कगार पर आ गई है।





आज हम बात करेंगे उत्तराखंड की संस्कृति और सभ्यता को जिंदा रखने के लिए अपनी पूरी मेहनत और ईमानदारी से काम करने वाले झुसिया दमाई की। झुसिया दमाई का जन्म 1910 में बस्कोट, नेपाल में हुआ था। यह क्षेत्र उत्तराखंड के कुमाऊं से जुड़ा हुआ है। इसलिए झुसिया दमाई को आधा नेपाली आधा (भारतीय) कुमाऊनी कहा जाता है। दमाई उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल क्षेत्र में पाए जाने वाली जाति है।

सामाजिक भेदभाव और अत्याचार के कारण भारत सरकार ने इस जाति को अनुसूचित जाति में रखा है। दमाई जाति का इतिहास बताता है कि ये मुख्य रूप से उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल में देवताओं को अवतरित करने का काम यानी जागर लगाने का काम करते थे। झुसिया दमाई भी इसी जाति से आते थे। अनपढ़ होने के बाद भी झुसिया दमाई देवताओं का श्रुति गान, वीरगाथाएं, भड़गाथा, श्रुति गीत, देव श्रुति, भगनौल, हुड़का और ढोल वादन आदि कला में परिपूर्ण थे।





उत्तराखंड में जब भी संस्कृति, सभ्यता और संगीत की बात होती है तो झुसिया दमाई का नाम जरूर लिया जाता है। झुसिया दमाई को यह काम उसके पिता रानुवां दमाई के द्वारा आर्थिक मजबूरी व गरीबी में मिला था। कहते हैं ना आर्थिक मजबूरी और गरीबी इंसान से कुछ भी करवा सकती है।

कभी-कभी मुझे हैरान होती है यह जानकारी कि भारतीय समाज में एक समाज के साथ पूरा समाज भेदभाव करता है और जिस समाज के साथ भेदभाव होता है, वह समाज देवताओं का आह्वान करता यानी देवताओं को बुलाता है। मेरा प्रश्न है- जिस समाज के आह्वान से देवता आ जाते हैं, वह समाज कैसे अपवित्र और अछूत हो सकता है ?


- दीपक कोहली