'जलमेव जीवनम्' (जल ही जीवन है) संस्कृत की प्रचलित सूक्ति जल के महत्त्व को दर्शाती है। प्राचीन ऋषियों ने जल के महत्त्व को स्वीकार करते हुए हजारों वर्षों पूर्व ही घोषणा कर दी थी-
'जलं हि जीवनस्य मूलं, नित्यं पातव्यं सुविशुद्धम्।
विना जले न तिष्ठेतु जगत्सर्वं सजीवनम्'।"
जिसका अर्थ है कि जल ही जीवन का मूल है, हमें हमेशा शुद्ध जल पीना चाहिए। जल के बिना यह संपूर्ण संसार नहीं टिक सकता।
और भी संस्कृत श्लोक में बताया गया है-
"पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नम् सुभाषितं।
मूढ़ै: पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।"
पृथ्वी पर तीन रत्न पाए जाते हैं: जल, अन्न और सुंदर वचन। पुराणों में जल को रत्न के रूप में अभिहित किया गया है। पृथ्वी पर सीमित मात्रा में पेयजल उपलब्ध है। पृथ्वी का स्थलीय भाग 30% है जबकि जल की उपलब्धता 70% से अधिक है; लेकिन इस 70% जल में से पीने योग्य जल महज 3% है। जबकि 97% जल महासागरों में है, जो खारा व अपेय है।
जल के स्रोत-
(i) जल के प्राकृतिक स्रोत: जल के प्राकृतिक स्रोत में नदियाँ, हिमनद, झीलें, तालाब, झरने, समुद्र और महासागर हैं। जिनमें ताजा जल के स्रोत- नदियाँ, झीलें व हिमनद हैं। खारे जल के स्रोत - समुद्र और महासागर हैं।
(ii) मानव निर्मित जल स्रोत: जल मानव निर्मित जल स्रोतों में कुएँ, ट्यूबवेल, बाँध, जलाशय, नहरें, चैक डैम आदि हैं।
3% पीने योग्य जल में 68.7% ग्लेशियर और ध्रुवीय बर्फ से उपलब्ध होता है, 30.1% भूजल (Ground Water) और 1.2% सतही जल (नदियों, झीलों) के रूप में उपलब्ध है।
जल की वर्तमान स्थिति-
UN-INWEH (United Nations University Institute for Water, Environment and Health) के द्वारा जारी वैश्विक जल दिवालियापन रिपोर्ट के अनुसार संपूर्ण विश्व जल दिवालियापन की ओर अग्रसर है तथा वैश्विक कृषि के लिए संकटोत्तर युग का संकेत दिया गया है।
जल दिवालियापन एक ऐसी स्थिति है जहाँ किसी क्षेत्र का जल उपयोग उसकी नवीकरणीय आपूर्ति (बारिश, नदियों) से लगातार अधिक होता है, जिससे भूजल भंडारण और पारिस्थितिकी तंत्र को अपरिवर्तनीय नुकसान होता है। दुनिया की आधी से ज्यादा झीलें 1990 के दशक से सिकुड़ रही हैं। कई नदियाँ अब समुद्र तक नहीं पहुँच पातीं।
1970 के बाद से 35% प्राकृतिक आर्द्रभूमियाँ (Wetlands) नष्ट हो चुकी हैं। विश्व की प्रमुख नदियां - सालवीन नदी, गंगा नदी ( दुनिया की 8% आबादी की जीवनरेखा), सिंधु नदी, मेकांग नदी, यांगत्से नदी, डेन्यूब नदी, रियो दे ला प्लाटा बेसिन, रियो ग्रांडे नदी, नील नदी और मरे- डार्लिंग बेसिन ये विश्व की प्रमुख नदियां आज खतरे में है।
हाल ही में 'विक्टोरिया झील' जो अफ्रीका की सबसे बड़ी व दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है , इसके पानी में सायनोबैक्टीरिया के अत्यधिक प्रसार के कारण झील का पानी जहरीला हो रहा है जिससे लोगों के पेयजल और मछली उद्योग के लिए संकट खड़ा हो गया है। 2025 में भारत के सबसे स्वच्छ शहर 'इंदौर' (मध्य प्रदेश) में पेयजल के संदूषित होने के कारण स्वास्थ्य संकट उत्पन्न हो गया।
चिंताएँ और मुद्दे:- जल दिवालियापन के पैटर्न
(i) प्रणालीगत वैश्विक जल असुरक्षा- 4 अरब लोग प्रत्येक वर्ष कम से कम एक माह के लिए गंभीर जल अभाव का सामना करते हैं।
(ii) घटती जल भंडारण क्षमता और कृषि तनाव- वैश्विक कृषि भूमि का 50% से अधिक भाग मध्यम या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त है जिससे मृदा की आर्द्रता धारण क्षमता घट रही है और मरुस्थलीकरण तीव्र हो रहा है।
(iii) दृश्यमान वैश्विक परिणाम:- नदियाँ महासागर तक पहुँचने से पहले ही सूख जाती हैं। झीलें और हिमनद संकुचित हो रहे हैं। अत्यधिक पंपिंग के कारण भूमि धँस रही है और भूजल स्रोत लवणीय हो रहे हैं। शहर 'डे ज़ीरो' परिदृश्य का सामना कर रहे हैं।
जल संकट के आर्थिक और मानवीय प्रभाव:- जल संकट के कारण सालाना 307 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हो रहा है। लगभग 2 अरब लोग सुरक्षित पेयजल से वंचित हैं। भारत पर प्रभाव :- लगभग 60 करोड़ भारतीय 'उच्च जल तनाव' (Water Stress) का सामना कर रहे हैं। भारत के पास विश्व की 18% आबादी है, लेकिन केवल 4% मीठे जल के संसाधन हैं।
भारतीय केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने "गतिशील भूजल संसाधन आकलन रिपोर्ट 2025" जारी की है- गतिशील भौमजल ( Dynamic Ground Water ) संसाधन का आकलन केंद्रीय भूमिजल बोर्ड (cgwb)तथा राज्यों/ संघ राज्य क्षेत्र द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है
रिपोर्ट एक नज़र:- वार्षिक भौमजल का पुनर्भरण (Recharge): कुल वार्षिक भौमजल पुनर्भरण 448.52 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) आंका गया है। यह वर्ष 2024 के 446.9 BCM की तुलना में आंशिक वृद्धि दर्शाता है।
भौमजल का दोहन:- दोहन योग्य वार्षिक भौमजल संसाधन बढ़कर 407.75 BCM हो गए हैं। वर्ष 2024 में इसकी मात्रा 406.19 BCM थी। वर्ष 2025 के लिए देश भर में कुल वार्षिक भौमजल दोहन की मात्रा 247.22 BCM आकलित की गई है। भौमजल दोहन का स्तर: देश में दोहन योग्य उपलब्ध कुल भौमजल संसाधन में से लगभग 60.63% भौमजल का प्रत्येक वर्ष उपयोग किया जा रहा है। इसमें सभी क्षेत्रों में उपयोग शामिल है।
आकलन इकाइयों का वर्गीकरण:- देश में कुल 6746 आकलन इकाइयाँ हैं। इनका वर्गीकरण निम्न प्रकार है:-
73.4% इकाइयाँ - सुरक्षित (SAFE)
10.5% इकाइयाँ - अर्ध संकटग्रस्त (SEMI CRITICAL)
3.05% इकाइयाँ - संकटग्रस्त (CRITICAL)
11.1% इकाइयाँ - अत्यधिक दोहित (OVER-EXPLOITED)
अत्यधिक दोहित इकाइयों का क्षेत्रीय संकेंद्रण:-
उत्तर-पश्चिम भारत: (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश)
पश्चिम भारत: (राजस्थान, गुजरात)
दक्षिण भारत: (कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश)
1.8% इकाइयाँ- लवणीय (Saline)
रिपोर्ट में भूजल आकलन श्रेणियों की परिभाषा:- अत्यधिक दोहित (Over-Exploited): जहाँ भूजल का दोहन स्तर वार्षिक पुनर्भरण (Recharge) से अधिक है। अर्ध संकटग्रस्त (Semi-Critical): जहाँ उपलब्ध वार्षिक भूजल दोहन योग्य संसाधनों का 70-90% उपयोग (दोहन) कर लिया जाता है।
संकटग्रस्त (Critical): जहाँ उपलब्ध वार्षिक भूजल दोहन योग्य संसाधनों का 90-100% उपयोग कर लिया जाता है। सुरक्षित (Safe): जहाँ उपलब्ध वार्षिक भूजल दोहन योग्य संसाधनों का 70% से कम उपयोग किया जाता है।
भूजल दोहन में राजस्थान की स्थिति (कुल 302 ब्लॉक):-
अति दोहित ब्लॉक- 214
संवेदनशील / संकटग्रस्त- 27
अर्ध संवेदनशील- 21
सुरक्षित ब्लॉक- 37
लवणीय ब्लॉक- 3
जल संकट का समाधान व मुख्य सुझावः- जो अमूल्य और सीमित थाती हमें हमारे पूर्वजों से मिली (जल, वन, वनस्पति) उसे हमारी भावी पीढ़ियों को सौंपना हमारा दायित्व भी बनता है और धर्म भी। उक्त रिपोर्ट के अनुसार आज विश्व 'भयंकर जल संकट' का सामना कर रहा है। अब हमें 'संकट प्रतिक्रिया' के बजाय 'जल प्रबंधन' पर ध्यान देना होगा। उपलब्ध जल का उचित उपयोग ही करना होगा, अन्यथा वे दिन दूर नहीं जब समूचा विश्व 'जल युद्ध' लड़ रहा होगा।
भूजल को सामूहिक धरोहर मानना होगा। इस पर केवल अपना ही अधिकार नहीं है, यह धरोहर उनके लिए भी सुरक्षित रखनी होगी जो अभी मौजूद ही नहीं हैं। पानी के पुनर्चक्रण (Recycling) को बढ़ाना होगा। वैश्विक स्तर पर काम कर रही संस्थाओं को न केवल रिपोर्ट जारी कर 'इतिश्री' कर लेनी होगी; बल्कि जल संरक्षण हेतु कठोर कदम उठाने होंगे, सरकारों को कड़े फैसले लेने होंगे।
हर व्यक्ति को एक जिम्मेदार नागरिक बनकर जल का अनुचित प्रयोग न करके उसका सदुपयोग करना होगा। जिसमें उसके दैनिक दिनचर्या के समस्त क्रियाकलापों से लेकर अपने दायित्व के रूप में अत्यधिक पौधारोपण, जल स्रोतों के रखरखाव संबंधी आदतों को जीवन में अनुस्यूत करना होगा। राजस्थान द्वारा जल शक्ति अभियान: कैच द रेन,रिज टू वैली जैसे जल संरक्षण प्रयासों को मॉडल के तौर पर अपनाकर जल संरक्षण किया जा सकेगा। वरना रहीम जी के अनुसार 'बिन पानी सब सून' ही रह जाएगा।
" यूं तो धरा पर जल ही जल है,
पर उसमें भी 'अपेय' प्रबल है।
बिन जल सब जीव विकल है,
सनद रहे -"जल है तो कल है।"
- वीरदत्त गुर्जर



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