साहित्य चक्र

07 June 2026

उत्तराखंड की संस्कृति का सच्चा सिपाही: झुसिया दमाई


भारत के अधिकांश राज्यों की संस्कृति को बचाने का सबसे अधिक श्रेय उन लोगों को जाता है जो लोक संगीत, गायन आदि के माध्यम से संस्कृति और सभ्यता को जन-जन तक पहुंचा कर जिंदा रखते है। भारत में जिन लोगों ने संस्कृति और सभ्यता का बोझ अपने कंधों पर उठाया, उन लोगों के साथ भारतीय समाज ने कभी भी न्याय नहीं किया; बल्कि उन लोगों को भेदभाव, अपमान और अत्याचार का शिकार होना पड़ा।

आज भले ही कुछ लोग संगीत और गाना-बजाना इत्यादि के जरिए खूब शोहरत हासिल कर रहे हैं, मगर एक समय था जब इस काम को करने वालों के साथ समस्त समाज जातीय भेदभाव करता था। इसी भेदभाव के कारण देश के कई राज्यों की संस्कृति विलुप्त होने की कगार पर आ गई है।





आज हम बात करेंगे उत्तराखंड की संस्कृति और सभ्यता को जिंदा रखने के लिए अपनी पूरी मेहनत और ईमानदारी से काम करने वाले झुसिया दमाई की। झुसिया दमाई का जन्म 1910 में बस्कोट, नेपाल में हुआ था। यह क्षेत्र उत्तराखंड के कुमाऊं से जुड़ा हुआ है। इसलिए झुसिया दमाई को आधा नेपाली आधा (भारतीय) कुमाऊनी कहा जाता है। दमाई उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल क्षेत्र में पाए जाने वाली जाति है।

सामाजिक भेदभाव और अत्याचार के कारण भारत सरकार ने इस जाति को अनुसूचित जाति में रखा है। दमाई जाति का इतिहास बताता है कि ये मुख्य रूप से उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल में देवताओं को अवतरित करने का काम यानी जागर लगाने का काम करते थे। झुसिया दमाई भी इसी जाति से आते थे। अनपढ़ होने के बाद भी झुसिया दमाई देवताओं का श्रुति गान, वीरगाथाएं, भड़गाथा, श्रुति गीत, देव श्रुति, भगनौल, हुड़का और ढोल वादन आदि कला में परिपूर्ण थे।





उत्तराखंड में जब भी संस्कृति, सभ्यता और संगीत की बात होती है तो झुसिया दमाई का नाम जरूर लिया जाता है। झुसिया दमाई को यह काम उसके पिता रानुवां दमाई के द्वारा आर्थिक मजबूरी व गरीबी में मिला था। कहते हैं ना आर्थिक मजबूरी और गरीबी इंसान से कुछ भी करवा सकती है।

कभी-कभी मुझे हैरान होती है यह जानकारी कि भारतीय समाज में एक समाज के साथ पूरा समाज भेदभाव करता है और जिस समाज के साथ भेदभाव होता है, वह समाज देवताओं का आह्वान करता यानी देवताओं को बुलाता है। मेरा प्रश्न है- जिस समाज के आह्वान से देवता आ जाते हैं, वह समाज कैसे अपवित्र और अछूत हो सकता है ?


- दीपक कोहली



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