सुख-दुःख का ताना-बाना बिनते जुलाहा दम्पत्ति।
कातते सूत बनाते वस्त्र यही उनकी पूर्ण सम्पत्ति।
- डॉ. उपासना पाण्डेय
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कपड़ा बुनने वाले जुलाहा हम, दोनों मेहनत करते मिलकर
जब कोई धागा टूट गया तो, एक छोर से बाँध जोड़ कर,
फिर से सूत पिरो कर हम, नए-नए वस्त्र बनाने हम।
- सुमन डोभाल काला
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कमाई
लाखों धागें जोड़ एक कपड़ा बुनते,
कितने सपनें कितने उम्मीदें साथ पिरोते।
उम्र का ताना-बाना, धागों की आवाजाही,
एक दूसरे का साथ ही जिंदगी की सच्ची कमाई।
- सुतपा घोष
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साथी का हाथ पकड़ कर चलना इसी को कहते हैं।
साथी धागे का एक सिरा है पकड़े, तो दूसरा सिरा स्वयं भी पकड़ ले।
जिंदगी की राह कितनी भी कठिन हो।
इस तरह साथ चलने से सफर जिंदगी का कट जाएगा।
- अनुरोध त्रिपाठी
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श्रम की डोर से जीवन संवारते, ताना-बाना रोज़ सजाते।
हुनर की अपनी सुंदर कहानी, बुनकर हैं संस्कृति की निशानी।
- बीना सेमवाल
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मिट्टी से बने घर में कला और संस्कृति देख रहा हूँ।
पगड़ी और माथे पर आँचल में अपना भारत देख रहा हूँ।
- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'
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ना महल, ना जाह-ओ-हशम , बस मिट्टी और हुनर का रिश्ता,
इस छोटे से बरामदे में भारत की असली विरासत देख रहा हूं।
- तौसीफ़ अहमद
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अपनी संस्कृति,अपना पहनावा, अपने प्राचीन रीति रिवाज
यहां है सादगी, मधुरता और रिश्तों की अनुपम मिठास
- प्रवीण कुमार
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धागे नहीं रिश्ते बुन रहे हम,
हो साथ तुम तो क्या है गम।।
- कुणाल
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बांस से बनी वस्तुएं का करता हूं निर्माण, रोजमर्रा के जीवन में आते जो काम।
मेहनत इसमें है बहुत लो जान, फिर भी ना मिलता है हमें उचित दाम।
- चुन्नू साह
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जो कर्म को जीते हैं, आखिर वो कब थकते हैं।
उम्र तो महज़ पड़ाव है, बुजुर्ग ही असल जुड़ाव हैं।
- डॉ. जितेन्द्र बोयल
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अपने जीवन के संघर्षों को धागों में पिरोकर,
हमारी आबरू के सुंदर वस्त्र बुनते हैं बुनकर।
- सूरजमल AkS
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जीवन के धागे सुलझा, संवार कर सजा रहा हूं-
ना थका हूं, ना हार मानी, बस खुद को बुनता जा रहा हूं।
- रोशन कुमार झा
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माटी की दीवारों में बसी है पुरखों की कहानी,
हाथों के हुनर से चलती चरखे की रवानी।
रंग-बिरंगी पगड़ी, लाल चुनर की छांव में,
राजस्थान की माटी बसी है हर एक गांव में।
- नरेंद्र मंघनानी
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हाथ में धागा
धूप-छाँव में बैठा, कर-कर हाथ में धागा,
आँगन में है पल रहा, युगों पुराना ढाँचा।
- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
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खड्डी बुनकर पेट पालते हैं, अजीब कहानी है भाग्य की,
हाथों में छाले, आँखों में सपने, यही निशानी है भाग्य की।
रेशम औरों के तन पर सजता, हम तो धागों में ही उम्र बिता देते हैं।
- बाबू राम धीमान
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