साहित्य चक्र

30 January 2026

सारंडा की वादियों में...


बात 2022 की है उस दिन शनिवार था लेकिन मैं पहले ही स्कूल से छुट्टी लिया हुआ था। कारण कि उसके अगले दिन रविवार को सुबह आठ बजे राउरकेला में रेलवे की परीक्षा में शामिल होना था। चूंकि राउरकेला मेरे निवास स्थान जमशेदपुर से तकरीबन 200 किलोमीटर की दूरी पर है अतः निश्चित रूप से एक दिन पहले ही पहुंचना जरूरी था। मैं काफ़ी परेशान था क्योंकि उस शनिवार को पूरे झारखण्ड और पश्चिम बंगाल में कुड़मी समुदाय का रेल टेका आंदोलन प्रस्तावित होने के कारण जमशेदपुर से न कोई ट्रेन राउरकेला के लिए थी और न ही बस। मेरे पास दो ही रास्ते बचे थे। या तो एग्जाम छोड़ दूं या बाइक से सड़क मार्ग द्वारा राउरकेला जाऊं।





मुझे सड़क मार्ग का रूट भी मालूम नहीं था फ़िर भी लोगों से जानकारी जुटाकर लगभग रूट समझ चुका था। पापा सुबह सात बजे जैसे ही नाइट ड्यूटी से लौटे मैं सीधे उनके कमरे में दाखिल हुआ। उन्होंने चेंज करते हुए ही मुझसे पूछा - "क्या हुआ ? परेशान लग रहे हो ?" यहां मैं बताते चलूं कि राउरकेला जाने के लिए मेरे पास अपनी पल्सर बाइक ज़रूर थी लेकिन वो इस हालत में नहीं थी कि इतनी लंबी और वो भी अनजाने रास्तों के सफ़र में ले जा सकूं। मेरे पापा हमेशा से ही हैवी बाइक्स के शौक़ीन रहे हैं और इस लिहाज़ से उनकी नई रॉयल एनफील्ड क्लासिक 350 बाइक उनकी जान थी जिसे वो किसी को चलाना तो दूर की बात,छूने तक नहीं देते थे। इसलिए उनकी बात सुनकर भी पहले तो झेंप गया।




फ़िर भी हिम्मत जुटाकर मैं एक सांस में अपनी बात कह गया - "पापा ! कल सुबह आठ बजे एग्जाम है राउरकेला में ! रेल टेका आंदोलन की वजह से कोई ट्रेन या बस नहीं चल रही है,तो मुझे आपकी बाइक चाहिए ! मुझे आज़ दोपहर को ही बाइ रोड निकलना है।" पापा बिस्तर पर लेटते हुए अप्रत्याशित रूप से सहमति जताते हुए बोले - "ठीक है ! चले जाओ। लेकिन रूट पता है ना ?" मैं ख़ुशी और रोमांच से अंदर ही अंदर चहक उठा कि एक तो नई बाइक और अकेले इतना लंबा सफ़र ! मैं ओवर एक्साइटेड होते हुए कहा - "सब पता कर लिया हूं पापा ! मेरे पारा टीचर दोस्त जगह-जगह पर रास्ते में मिलेंगे और मनोहरपुर तक मुझे सहयोग करेंगे। वहां से ज्यादा दूर नहीं है।" पापा आश्वस्त भाव से सर हिलाने के बाद बेड पर पसर गए।




दोपहर बारह बजे तक मैं अपनी पैकिंग वगैरह संपन्न कर तैयार होकर खाने बैठ गया। अचानक देखा कि पापा भी बैग पैक कर तैयार होकर वे भी मेरे साथ ही खाने के लिए बगल में बैठ गए। मैं जिज्ञासा और अचंभित भाव से उनसे पूछा - "पापा ! आप भी कहीं जा रहे हैं क्या ?" पापा मुस्कुराते हुए बोले - "मैं भी तेरे साथ चल रहा हूं। इतने लंबे सफर और अनजान रास्ते में अकेले जाना ठीक नहीं रहेगा।"

मेरी सारी एक्साइटमेंट काफूर हो गई और थोड़ा-सा मायूस हो गया क्योंकि मैं जगह-जगह दोस्तों से मिलते हुए जाने का प्लान बना चुका था। सिर्फ़ यही नहीं ! मेरे एक दोस्त सोनू सरदार के जरिए फ़ोन पर कांटैक्ट कर राउरकेला में रहने वाले उनके एक जीजाजी के माध्यम से वहां रुकने तक की व्यवस्था कर चुका था। मैं उतरा हुआ चेहरा लेकर बोला - "कुछ नहीं होगा पापा ! जगह-जगह पर मेरे दोस्त हैं ना ! मैं पहुंच जाऊंगा सही-सलामत !" पापा ने कड़े शब्दों में कहा - "मैं साथ जाऊंगा तो बस जाऊंगा। और हां ! टेंशन मत लो सारा खर्च मेरा रहेगा। तुम्हें वहां पहुंच कर जहां रुकना है रुक जाना मैं डिस्टर्ब नहीं करूंगा।" इससे आगे मैं और कुछ बोल नहीं पाया।






तकरीबन एक बजे दोपहर को मैं अपनी पत्नी से कुछ बातें कर विदा लेकर पापा के पीछे बाइक पर चुपचाप बैठकर निकल पड़ा। क़रीब ढाई बजे हमलोग चक्रधरपुर पहुंच चुके थे। यह वही चक्रधरपुर है जिसका वर्णन मुंशी प्रेमचन्द ने अपनी झारखण्ड यात्रा के वृतांत में भी किया है। वहां चाय पीने के बाद चूंकि पापा को भी रूट की पूरी जानकारी नहीं थी तो उन्होंने चायवाले से आगे का रास्ता पूछा और वहां से हमलोग निकल चले। अजनबी रास्ते और विशुद्ध आदिवासी संस्कृति वाले इलाके होने के कारण कौतूहल और रोमांच का मिश्रण साथ-साथ दिमाग में चल रहा था। सोनुवा पार करने के बाद गोइलकेरा आने वाला था और गोइलकेरा से ही शुरू होने वाला था सारंडा की खूबसूरत पहाड़ियों,हसीन वादियों और घने जंगलों से पटा क़रीब चालीस किलोमीटर का बीहड़ रास्ता। जब हम घर से निकले थे तब भी हम दोनों को पता नहीं था कि रास्ते में सारंडा भी आएगा।

लोगों से सुना था कि अफ्रीका के अमेज़न जंगल के बाद यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी जंगली वादी है। इसलिए थोड़ी-सी डर के साथ रोमांच सातवें आसमान पर पहुंच चुका था। गोइलकेरा के ठीक बाद एक छोटा-सा रेलवे हॉल्ट मिलता है महादेवशाल हॉल्ट ! बस यहीं से शुरू होता है घनघोर, डरावना, खुबसूरत और ऐतिहासिक सारंडा जंगल। अकूत लौह अयस्क भंडार, जंगली पशु-पक्षी, जड़ी-बूटियों, करोड़ों वृक्षों के साथ ही आदिवासी जन-जीवन को अपनी गोद में समेटा सारंडा आज़ भी अपने-आप में कई रहस्य दबा रखा है।





लेकिन जिस तरह से इस विशाल जंगल का ओर-छोर पाना कठिन है उसी प्रकार इसके सारे रहस्यों को भी जान पाना पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों, भूगर्भशास्त्रियों, सैलानियों यहां तक कि किसी सरकार के लिए भी टेढ़ी खीर है। महादेवशाल से ही शुरू होता है गोइलकेरा से मनोहरपुर तक सारंडा जंगल से होकर महज़ चार फीट संकरी सड़क। कहा जाता है कि यह चार फीट की सड़क भी पहले नहीं थी। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री श्री जयराम रमेश के कार्यकाल में उनके बारंबार सारंडा दौरे और उनके प्रयासों के फलस्वरूप यह पतली-सी सड़क बिछ पाई। खैर जो भी हो हम जब सारंडा के रास्ते पर दाखिल हुए तो तकरीबन चार बज चुके थे। पतली-सी सड़क और वो भी झबरैले पेड़ों से ढंके बिल्कुल ही डरावने लग रहे थे। आगे बढ़े तो टेढ़े-मेढ़े, ऊंचे-नीचे और घुमावदार रास्ते जंगली जानवरों और पक्षियों की अजीब सी आवाजें सफ़र को और भी डरावना बना रहे थे।

क़रीब दस किलोमीटर हमलोग जंगल में दाखिल हो चुके थे। इस बीच महज़ दो-तीन ही छोटी बस्तियां मिलीं जहां बस्ती होने के बावजूद सन्नाटा पसरा हुआ था। लेकिन रास्ते में एकाध बाइक्स को देखकर थोड़ी-सी तसल्ली मिलती रही कि चलो ! इंसान तो कम से कम आते-जाते हैं ही इन रास्तों पर। दस किलोमीटर अंदर आने के बाद एक थोड़ी-सी चहल-पहल वाला गांव नज़र आया। हम लोगों ने सोचा कि पता नहीं आगे कुछ मिले या नहीं। भूख भी लग रही थी तो उसी गांव में एक छोटी-सी परचून की दुकान पर रुककर हमने कुछ बिस्कुट ले लिया। तबतक अचानक से घनघोर काली घटाएं घिरकर बारिश भी शुरू हो गई थी। हम लोगों ने कुछ देर उसी दुकान पर रुकने का निर्णय लिया। क़रीब आधा घंटा गुजर चुका था और बारिश रुकने के बजाय और विकराल रूप ले रही थी। मैंने बिस्किट चबाते हुए दुकानदार से पूछा कि मनोहरपुर यहां से और कितनी दूर है। तो उसने तीस किलोमीटर बताया।






पापा बोले - "शाम के पांच बज चुके हैं और हमने जंगल आधा भी पारा नहीं किया है। ऊपर से बारिश की वज़ह से और अंधेरा हो रहा है। भींगकर ही निकला जाए वरना बारिश नहीं रुकी तो फंस जाएंगे यहीं।" घर से निकलते वक्त बादल का नामोनिशान नहीं था और धूप खिली हुई थी सो हम लोगों ने रेनकोट भी नहीं पकड़ा था। हमलोग करीब पांच बजे शाम भींगते हुए ही निकल पड़े। रास्ते में जगह-जगह पर पहाड़ों से पानी की तेज़ धार आ रही थी और सड़क पर ड्रेनेज सिस्टम नहीं होने की वजह से पहाड़ों का पानी कुछ जगहों पर सड़क के ऊपर से ही नदी-नाले की शक्ल में बह रही थी। उन पानी की धार के अलावा सचमुच के नदी-नालों का पानी भी बिल्कुल लाल नज़र आ रहा था कारण पूरे इलाके की मिट्टी में लौह अयस्क समाया हुआ है, इसलिए यहां के नदी-नाले,कुएं-बाड़ी हर जगह का पानी लौह अयस्क मिला हुआ लाल नज़र आता है।एक तो शाम,ऊपर से बादल-बारिश और अंधेरा जंगल। सड़कों पर से बहते पानी में भी अंदाजा लगा-लगा कर गुजरना काफ़ी दुष्कर लग रहा था।





मनोहरपुर रेलवे फाटक पहुंचने तक हमलोग भींगकर सराबोर और ठंड से हालत बिना पंख के भींगे मुर्गों की तरह हो गईं थीं। ठंड बर्दाश्त से बाहर हो गई तो हमलोग मनोहरपुर रेलवे फाटक के इस पार एक हंड़िया की झोंपड़ीनुमा दुकान पर शरण ली। महादेवशाल से यहां तक पूरे रास्ते में एक चाय की दुकान तक नहीं मिली। बस जगह-जगह पर झोंपड़ीनुमा हंड़िया और महुआ की दुकानें दिखीं जहां खाने के लिए भींगे चने और गुलगुले छोड़कर कुछ नहीं था। इस दुकान में भी वही सब उपलब्ध था। दुकान वाले ने बताया कि मनोहरपुर शहर यहां से भी लगभग दस-बारह किलोमीटर है।

फाटक पार करने के बाद भी पापा ही बाइक ड्राइव कर रहे थे लेकिन कुछ ही दूर चले थे कि पापा ठंड से इतना कांपने लगे कि बाइक मैं उनसे ले लिया और उन्हें पीछे बिठाकर खुद चलाने लगा। बारिश और बीहड़ रास्तों की वज़ह से मनोहरपुर शहर के बीचोंबीच स्थित रेलवे स्टेशन बाज़ार पहुंचने तक साढ़े सात बज चुके थे।





ठंड और भूख के कारण हमलोग पस्त हो चुके थे। मनोहरपुर मार्केट में हमने थोड़ी-सी चाउमिन वगैरह खाया और चाय पिया। ठंड के चलते मन तो कर रहा था कि आज़ पिता-पुत्र की मर्यादा को किनारे रखकर उनसे कह डालूं कि चलिए अलग-अलग जगह बैठकर एक-एक रम की क्वार्टर मारते हैं फिर आगे चलते हैं। लेकिन मर्यादा के दायरे में ही ख़ुद को दबाकर आस-पास के लोगों से राउरकेला की दूरी और रास्ता पूछा और फ़िर वहां से आठ बजे निकल चले। राउरकेला तक की दूरी लगभग 50 किलोमीटर थी।

रात नौ बजे वहां पहुंचने के बाद पापा बोले कि जहां मेरे रुकने का प्लान था वहां मैं जा सकता हूं। यहां पहुंचने तक मेरे मन में वही प्लान था लेकिन मेरे अंतर्मन ने मुझे झिंझोड़ कर कहा कि मेरे पिता ने अपनी केयर दर्शाते हुए इतने दुर्गम सफ़र में मुझे अकेले आने नहीं दिया। मेरे साथ-साथ ख़ुद भी थकावट,तनाव और ठंड झेला। शाय़द पापा नहीं होते तो मैं थोड़ा सा जंगल के अंदर घुसते ही उल्टे पांव वापस भाग जाता। भाड़ में गई परीक्षा कहकर ! यही सब सोचकर मन बना लिया कि पापा जहां रुकेंगे मैं भी वहीं रहूंगा वरना उन्हें बुरा लगेगा। फ़िर मैंने फ़ोन कर सोनू दा के जीजा को मना कर दिया। फिर पापा के दोस्त के वहीं रात्रि भोजन और विश्राम किया।अगली सुबह परीक्षा लिखकर दस बजे हमलोग राउरकेला से घर के लिए रवाना हो गए। उस दिन धूप खिली हुई थी। दिन के उजाले में सारंडा जंगल उस दिन जाने वक्त की अपेक्षा थोड़ी-सी ज़्यादा चहल-पहल लग रही थी।






इक्के-दुक्के आटो, बसें और चार पहिया वाहन भी उसी संकीर्ण रास्ते से आते-जाते दिखे। उस दिन पूरे जंगल के रास्तों में घुमावदार, ऊंचे-नीचे बीहड़ रास्तों, घाटियों, नदी-नालों, गांव-कस्बों और अनुपम आदिवासी जन-जीवन की छटा का आनन्द लेते हुए आए। पूरे रास्ते अलग-अलग जगहों पर क़रीब बीसियों बार रुककर हमने मोबाइल से काफ़ी फ़ोटो भी शूटकर इस यादगार सफ़र को अपने संग्रह में कैद करने की कोशिश की। लगभग बारह बजे तक हमलोग जंगल को पार कर वापस महादेवशाल हॉल्ट पहुंच चुके थे। वहां उस झबरैले झाड़ीनुमा पेड़ों से आच्छादित टनल की तरह दिख रहे सारंडा के एंट्री मार्ग पर रुककर काफ़ी देर तक उसके रोमांच और खुबसूरती को निहार कर दिल में संजोने की तसल्ली की कोशिश की।

फिर कुछ फोटो शूट करके थोड़े से भारी मन से अपने अंतर्मन में कहा - "अलविदा सारंडा! शुक्रिया एक अभूतपूर्व रोमांचक सफ़र प्रदान करने के लिए ! फ़िर मिलेंगे!"

फिर हमलोग वापस लौट चले।


- कुणाल



आज की प्रमुख रचनाएँ- 30 जनवरी 2026





*****






यादें बोलती हैं
कभी मौसम की तरह,
कभी ख़ुशबू की तरह,
कभी किसी अजनबी की आवाज़ में,
जिसमें तेरा लहजा छुपा हो।

अब मैं तुझे
तेरी यादों की ज़बान में समझता हूँ।
तेरे लफ़्ज़ नहीं,
तेरे एहसास पढ़ता हूँ
जैसे कोई सूफ़ी
किसी किताब के बग़ैर
सच की तिलावत करता हो।


- तौसीफ़ अहमद


*****






कुंभ रौ न्हाण

बात बाळपण री है
म्हं टाबर हो
पोह अर माघ रै माह
जाडो घणों पड़तो
नाक चालतो दांत बाजता
धरती धौळी होंवती
आकड़ा तक बळज्यांवतां
न्हावण रै नावं सूं धूजता
फुरसत अर अदितवार रै दिन
न्हावण रौ ओपतो मुहुर्त होंवतों
भींत री ओट मां पाटों झलाती
म्हें धूळ माटी सूं खेलता
अघोरी बाबा बण्यां फिरता
मां पकड़ जट पाट'अ पटकती
म्हाने नंग धडंग
बाखळ बिचाळें
मां न्हावंती
म्हें नागा साधु बरगा लागता
बळबळता पाणीं सूं
मां न्हावंती
भाटा री टिकड़ी सूं
काया रौ दाळद(मेल) उतारती
मां म्हारें तेल रौ चौपड़ करती
ठोडी पकड़ पटा बाती
जट्टा रौ बुगो करती
माथा माथे काळों टिकों करतीं
आपरै हाथ दूध पिलावंती
रोटी रौ चुरमों बणाय खिलावंती
मां रै हाथ त्रिवेणी बैंवती
आजै जद बाळपण याद करूं
मां रै हाथ रौ न्हाण
आज रै महाकुम्भ सूं सवायो लागै।


- जितेन्द्र कुमार बोयल


*****




ये कैसा बसंत

खेतों में न सरसों फूली,
हुई नहीं अभी वो पीली,
पेड़ों पर न आये नव पल्लव,
पुष्प भी अभी हैं दुर्लभ,
परिवेश भी नहीं है महका,
फूलों की खुशबू से न चहका,
आम बौर भी भूला आना,
कहाँ गया कोयल का गाना,
नहीं कहीं है भंवरों की गुंजन,
तितलियों का भी नहीं है दर्शन,
उद्यानों में है सुस्ती छाई,
ली नहीं जीव जगत ने अंगड़ाई,
रंगबिरंगी कुसुमी छटा न बिखरी,
रंगहीन घाटियाँ न निखरी,
पवन न छोड़े अपनी सिरहन,
बदला सा लग रहा ऋतु मन,
बसंत पंचमी आ गई कर शिशिर का अंत,
कैलेंडर तो तिथि बता रहा,
पर है ये कैसा अब का बसंत ?


- धरम चंद धीमान


*****





सिर्फ दिल से ही आसमान छूते हैं
हम सिर्फ दिल ही जानता है
ऊँचाई का अर्थ,
वरना आँखें तो
दूरी ही नापती हैं।

हाथ थामते हैं संसार को,
बुद्धि तौलती है लाभ–हानि,
पर जो उड़ना सिखा दे-
वह केवल दिल होता है।

आसमान कोई छत नहीं
जिसे लांघा जाए,
वह तो एक मौन विस्तार है
जो हृदय के खुलते ही
अपने आप पास आ जाता है।

जहाँ तर्क थक जाता है,
वहीं प्रेम आरम्भ होता है,
और उसी क्षण
मनुष्य ईश्वर की ऊँचाई छू लेता है।
इसलिए दिल को छाती में नहीं,
अनन्तता में रखा है-
ताकि हम सीमाओं में रहकर भी
असीम को छू सकें।


- नरेंद्र मंघनानी


*****




गुरु जी
कठिन आसान जो कर दे
वही पहचान है उनकी ।
दिवाकर सी खिले शोभा
कुसुम सी शान है उनकी ।
रटाना है नहीं उद्देश्य
जिनका मैं बताता हूँ ।
उन्ही शिक्षा के नायक की
कहानी मैं सुनाता हूं।


जिनकी वाणी सें कण- कण
ज्ञान का तादाम्य स्थापित ।
बिखर जाता तिमिर लेकिन
नहीं है ओज विस्थापित ।
नही धूमिल हुआ है तेज
रवि .का मैं बताता हूँ ।
ऐसे शिक्षा के नायक की
कहानी मैं सुनाता हूं ।


जहां प र वक्ता बनकर वे
खड़े हो जाते हैं यारा ।
तिमिर को चीर कर सर्वत्र
दिखाई देता उजियारा ।
अलौकिक इल्म के वो पुंज हैं
यह मैं तुमको बताता हूँ ।
ऐसे शिक्षा के नायक की
कहानी मैं सुनाता हूं ।


जिन्होंने की मोहबत मादर
- ए वतन से इन्तहा ।
कहानी है छपी जिनकी बनी
ये आज सुर्खियां ।
ये छोटी सी झलक उनकी
जिसे मैं तुमको . दिखाता हूं ।
ऐसे शिक्षा के नायक की
कहानी मैं सुनाती हूं ।


जिसकी नीति सदा शतमान
सी प्रतीत होती है ।
उनकी अमृत . सी वाणी जो
कभी आपा न .खोती है।
धैर्य का है ये अनुबंध
ऐसा किस्सा सुनाता हूं ।
ऐसे शिक्षा के नायक
की कहानी मैं सुनाता हूं।


वो कर करि से रहम के
बीज निज उपल पे बोते हैं ।
अश्म पर पंक में हरदम वो
अम्बुज को खिलाते हैं ।
भविष्यत् हिन्द का नवहिन्द
में परिणत कराते हैं ।
ऐसे शिक्षा के नायक
की कहानी हम सुनाते हैं ।


- करन सिंह "करुण"


*****




बापू की पुण्यतिथि

बापू की पुण्यतिथि है आज
शोक संतप्त है, पूरे समाज
आज को वो तारीख,याद है
बापू, अब नही हमारे साथ है
ऐसी ही एक खबर, फैली
और देश, शोक लहर मे फैली
ये क्या हो गया और कैसे ?
शहीद हुए या शहादत हुए जैसे ?
जो भी हो,लेकिन बापू अब न रहे
सच है ये बाते, सबने कहे
दुखद अंत था, बापू का हमारे
जन जन के थे, वे प्यारे
गुलामी के जंजीरे तोड़ने वाले
सबो के लेकर, साथ थे चले
जिधर चल पड़ा था, उनके कदम
उधर ही उमड़ा था, लोगो का हुजूम
बापू के साहसी का सरहाना
लोगो के मुँह मे था, ही आना
कोई उसे महात्मा कहते
तो,कोई राष्ट्रपिता कहते
देखते ही देखते वो
मोहनदास कर्मचंद
सबके हुए आवाज, बुलंद
आजादी के बिगुल बजाकर
सबको दिया एकत्रित कर
अंततः चलाया असहयोग आन्दोलन
और चलाया सविनय अवज्ञा संगठन
डांडी यात्रा से लेकर,
करो या मरो का नारा
देकर सबका बना, बापू प्यारा
सबो के सहयोग,सबो के साथ से
हरेक लोगो ने थामे हाथ को हाथ से
और एकजुटता की बनी मिशाल
देश हुए आजाद,
हुए सब खुशी से निहाल
फिर क्या था ? होनी तो तय था
भला-बुरा तो सब जगह ही था
और एक शाम, कुछ ऐसा हुआ
जिसकी अंदाजा किसी को न हुआ
हे राम;; आखिरी शब्द बापू के निकले
और हमसब को छोड़, सदा को गये,चले
30 जनवरी वो तारीख ही है
जो इतिहास मे,पुण्यतिथि के रूप मे दर्ज है
पुनः चुन्नू कवि करते है सबो से निवेदन
पुण्यतिथि पर बापू को करे नमन।


- चुन्नू साहा


*****




सफ़ेद चादर

सफ़ेद चादर ओढ़कर, धरा हुई निहाल,
कण-कण उजला हुआ, चमका धरा का भाल।
चमका धरा का भाल, नयन मुस्काए,
पेड़ –पहाड़ शांत हैं, प्रकृति गीत गाए।
प्रकृति गीत गाए, मन हर्षित हो जाए,
देख सफ़ेद चादर, मन माल-माल हुआ जाए।

बर्फ गिरी अंबर से, संग मधुर तान,
ठिठुरन है गा रही, सौन्दर्य का सुरीला गान।
सौन्दर्य का गान सुन, मादकता है छाई,
कण-कण पवित्र हुआ, चांदनी है छाई।
चांदनी है छाई, मन को खूब भाये,
बर्फ गिरी अम्बर से, मन मद मस्त हुआ जाए।

निश्छल ये बर्फ हमें, सिखलाती व्यवहार,
शीतल रहना सीख लो, छोड़ क्रोध–विकार।
छोड़ क्रोध-विकार, पवित्र बनो मन से,
पिघल जाओ बर्फ सा, प्रेम की अगन से।
प्रेम की अगन से, जीवन खिल सा जाए,
निश्छल ये बर्फ हमें, सन्देश यही दे जाए।

सूरज किरण जब छुए, बर्फ बने जलधार,
बलिदान का ये रूप ही, है जीवन का आधार।
है जीवन का आधार, परिवर्तन को अपनाना,
कठोर बाहर से दिखना, भीतर करुण हो जाना।
भीतर करुण हो जाना, यही है सच्चा सार,
बर्फ की किरण छुए, बर्फ बने जलधार।


- धरम चंद धीमान


*****




पुरुषार्थ

जिस दिन भी सूरज ढल जाएगा,
तुम अपनी चमक बचा लेना,
इतिहासों के पन्नों में अपनी धमक बचा लेना।

मरने के डर से जो अपने ही घर में छुप जाते हैं,
इतिहासों के कूड़ेदानों में वो अक्सर फेंके जाते हैं।

पुरुषार्थ पुरुष का गहना है, कायरता विष का प्याला है,
जो तूफ़ानों से टकराए, वही तो हिम्मत वाला है।

बैठ किनारे सोच न पगले, गहराई की बातों को,
लहरों से जो लड़ जाता है, वही तो पावन ज्वाला है।

अंगद का पैर जमा देना, लक्ष्मण का मेघनाद संहार,
मर्यादा में रहकर भी जो, कर दे अधर्म पर प्रहार।

कठिन समय में राम सरीखा, धीरज जिसने धार लिया,
सच्चा पुरुषार्थी वही, जिसने निज भय को मार दिया।

रण-कौशल अर्जुन सा रखना, दानवीरता कर्ण जैसी,
लक्ष्य भेद दे जो मछली का, एकाग्रता हो बस वैसी।

मिट जाना पर झुकना मत तुम, यही धर्म का नारा है,
पुरुषार्थ की गाथा से ही, महका विश्व-सहारा है।


- देवेश चतुर्वेदी


*****




वसंत नहीं सच दूसरा

सच है आग-पानी-हवा
पृथ्वी और आकाश की ही तरह
सच है जीवन-मृत्यु भी सच-सच
इनका होना ही है सबूत मेरा होना
मेरे होने का सबूत सिर्फ़ हूॅं मैं ही
नहीं कुछ और,नहीं कहीं कुछ और
दूसरा-तीसरा भी होता नहीं कोई
सिर्फ़ एक अकेला विकल्पहीन
वसंत भी होता है एक अकेला ही
वसंत नहीं सच दूसरा।

*****

एकांत की पुकार है वसंत

जहाॅं-जहाॅं लिखना चाहता हूॅं प्रेम
वहाॅं-वहाॅं लिखता चला जाता हूॅं वसंत
पहले वसंत लिखता है मुझे,फिर मैं
वह जगाता है मुझे,जागता हूॅं मैं
सुलगने से पहले की आहट हैं कुछेक
और हैं कुछेक वे मद्धम ध्वनियाॅं भी
जिनमें इसी पृथ्वी,इसी पृष्ठभूमि के
सुख-दु;ख भी शामिल तमाम-तमाम
कई-कई बंदिशों के बाद भी आवरणहीन
अनेकांत के एकांत की पुकार है वसंत
जैसे रोशनियाॅं अनेकानेक।


*****


कितने दिन कितने वसंत और?

मुक्त है और मुक्त करता है सब
घटता है ठीक-ठीक घटनाओं की तरह
घटाता नहीं है कहीं कुछ भी ज़रा नहीं
पता भी किसी से कुछ पूछता नहीं
देता है मार्ग और दर्शन सभी-सभी को
मगर करे तो करे ही क्या उन लोगों का
जिनके शैतानी दिमाग़ों में शैतानियाॅं ढ़ेरों
और घर शरीफ़ों के ख़ाली नहीं
शराफ़त की लगातार रेंग रही चींटियों से
सब देखते हैं और देखता हूॅं मैं भी
बहुत कुछ,बहुत कुछ पूछते हुए यहीं कहीं
कितनी तारीख़ें,कितने दिन वसंत और
जब अपने हों,सपने हों सच सब ?


- राजकुमार कुम्भज


*****




प्रेम

प्रेम की कीमत प्रेम करने वाले जानते हैं,
जहां पर हृदय का स्पर्श हो जाए,
वहां पर फिर कोई कीमत नहीं
हर पल महसूस होने की एक झलक दिखाई देती है।
जब बनाती हो मीठी-मीठी गर्मा गर्म चाय,
जब मेरे हाथों में हाथ से होकर आती है।
और लबों को छूती है तो मीठा
एहसास ही कुछ अलग सा लगता है।
एक ख्वाब नहीं हकीकत है,
तेरे होने का एहसास मैंने महसूस करके देखा है।
जब तुम मुस्कुराती हो तो और भी प्यारी लगती हो,
मेरा हर दिन सुनहरा हो जाता है।
जब मैं खिली हुई मुस्कान को मैं हर पल निहरता हूं।


- रामदेवी करौठिया


*****




उम्मीद

न पास कुछ है, देने के लिए,
न बचा ही कुछ, लेने के लिए।

पास है तो बस उम्मीद रखा हूं,
जो करना था,अब कर चुके,
बहुत चले पथरीले राहों पर,
अब अपनी किस्मत से ताकीद रखा हूं।

क्यों न हो उम्मीद इसपर तो दुनिया
चलकर थमी है,
मैं भी चातक बन गया हूं,बस
स्वाति के पहली बूंद की कमी है।

दीए सब टिमटिमा रहे,दिन में
तारे नजर आ रहे।
फिर भी दिए को मंद हवाओं
से भी बचा रखा हूं।
उसी तारे से अपने किस्मत
के सितारे की उम्मीद रखा हूं।


- रोशन कुमार झा


*****





दर्द-ए-बयां

ठोकर जब देती है दर्द हमें
मरहम देता दर्द को बुझाय
दिल पे जब चोट लगती है
मरहम ना पाये उसे समुझाय
क्रोध जब धधके आग में
ङाल दो इसपर ठंडा पानी
ना जलायेगी क्रोध की आग
बुझ जायेगी गुस्से की कहानी
शांत सागर है तुफां का द्योतक
ना समझो मौन को कमजोर
जब आनी होती है यहाँ सुनामी
सब कुछ पल में हो जाता है दूर
आलस्य मानव का बना है बैरी
ना दो इन्हें तन मन में वास
टाल देती है कामों को अक्सर
जब हो जाती है जालिम निवास
अनपढ़ पूत है जग का यमदूत
कहती थी मेरी नानी अपनी जुबानी
अनपढ़ से ना करना कभी प्रीत
खत्म कर देगी जीवन की तेरी कहानी
सलाह सदैव लिजीये साधु जन से
भले ही दुश्मन हो बना घर के आगे
सज्जन देते है भलाई की सलाह
भले ही तुमको मन में ना जागे
धन दौलत है रिपु के समान
चोर डकैत को देता है आमत्रंण
कभी ना बनना धन्नामल
छीन लेता है नींद जड़ चेतन

 
- उदय किशोर साह


*****




उठो उठो हे स्त्री

अभी तो उसने फिर से
जीना शुरू किया था
पति के वियोग के बाद।
धीरे-धीरे साँसों में लौटने
लगी थी धड़कन,
वजह था उसका एकमात्र पुत्र,
जिसने अभी एक वर्ष पहले ही
इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया था।
पर ऐसा कौन-सा पाप था
जिसकी इतनी बड़ी कीमत
उसे चुकानी पड़ी?
अब तो उसके पास कोई
वजह भी नहीं बची।
कैसे जिए वह?
और उसे कौन समझाए
कि अब जीने की वजह क्या है?
पति के आकस्मिक निधन के बाद
वह जीना छोड़ चुकी थी।
लोग बार-बार उसकी एकमात्र संतान को
उसके सामने बैठाकर कहते थे
“अब तुम्हें इसके लिए जीना है।”
अब… वह भी नहीं।
मात्र पैंतालीस बसंतों में
जीवन ने उसे ऐसे-ऐसे थपेड़े दिए
माँ, पति और बेटा…
सब एक-एक कर छिन गए।
हृदय विदारक था वह चीत्कार
“अरे मेरा बाबू, मेरा लल्ला!
कहाँ गया तू?
काहे धोखा दिए बाबू?
क्या पाप किए थे हमने?
अब हमें नहीं जीना”
क्या सचमुच
किसी के कर्मों में ही कोई
कमी रह जाती है?
फिर भी
तुम्हें जीना होगा।
उठो… उठो हे देवी!
तुम धरती हो।
हर पीड़ा, हर दुख
हृदय में संजोकर भी
तुम जियो।
भगवान ने तुम्हें यूँ ही नहीं रचा-
उठो, जियो।
और हाँ,
जब तुम थोड़ा अपने
लिए जीने लगोगी,
जब माथे पर बिंदी सजेगी,
अच्छे वस्त्र पहनोगी,
किसी से दो शब्द बोल लोगी
तो वही लोग,
जो आज रुदाली बने हैं,
कल ताने देंगे।
किन्तु अब!!!
अब चुप नहीं रहना।
अब जीवन से माफी नहीं माँगनी।
अब जीना अपराध नहीं
एक साहस होगा।


- सविता सिंह मीरा


*****

कथा संस्मरण- बरसात की पहली बूंद

रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुस, चून।।

मध्य काल के महाकवि रहीम ने पानी का महत्व बताया है क्योंकि पानी के बिना संसार सूना हो जाता है। इसलिए जीवन से पहले जल पृथ्वी पर आया है। यही नहीं पानी की बूंद सीपी में मोती का निर्माण करती है वहीं पानी मनुष्य के लिए अति आवश्यक होता है और पानी से चूना उपयोगी बन जाता है।

वैसे तो पृथ्वी पर 71% भूभाग पर जल पाया जाता है। वर्षा से 800 करोड़ मानव को जल प्राप्त होता है। इसलिए नदियां, तालाब, झील और कूप पाये जाते हैं। जल हमें द्रव्य और ठोस ( हिम या बर्फ) रूप में प्राप्त होता है।





मनमोहनी प्रकृति के अनेक रूप हैं। अपने इन रूपों से यह मानव -मन को हर्षित करती है उसमें उमंग भर देती है और उसे नवीन स्फूर्ति से प्रेरित करती है। प्रकृति के इन रूपों में वर्षा ऋतुओं की रानी है। वर्षा को चौमासा भी कहा जाता है। क्योंकि इसका आरंभ आषाढ़ मास में हो जाता है। और अश्विन तक रहती है। जिस प्रकार कठिन तपस्या, कठोर संयम तथा त्याग से किसी व्यक्ति को महत्ता गौरव और श्री प्राप्त होते हैं। उसी प्रकार वसुंधरा ग्रीष्म सूर्य के असह्य आतप को सहन करके ही ' वर्षा के वरदान ' को प्राप्त करती है।

वर्षा ऋतु की भूमिका हमारे जीवन में महत्वपूर्ण मानी जाती है इसलिए महाकवि कालिदास ने लिखा है-

"रजः प्रशांतं स हिमो ऽद्य वायुः नभः प्रकीर्णाऽम्बुधरो विभाति।"


उसी प्रकार महाकवि तुलसीदास ने भी वर्षा ऋतु का वर्णन करते हुए कहा है-

वर्षा काल में नभ छाये, गरजत लागत परम सुहाये।
दामिनी दमक रही घन माही, खेल की प्रीति यथा थिर नाही।





बरसात की बूंदें मानव को विकास के लिए प्रेरित करती है। भारत कृषि प्रधान देश है यहां वर्षा ऋतु विशेष महत्व रखती है। अच्छी वर्षा हो जाती है तो वासंती और शारदीय दोनों फसलें अच्छी हो जाती हैं ।इस प्रकार इस भूखंड की समृद्धि, स्वास्थ्य और प्रसन्नता इसी ऋतु के कारण हैं। वर्षा के कारण पशुओं के लिए चारा मिल जाता है। तालाब, नदी नालों में पानी भर जाता है जो सारे वर्ष मनुष्यों के काम आता है।

ग्रीष्म ऋतु का प्रचंड ताप दूर हो जाता है ऋतु सुखद और स्वास्थ्यवर्धक हो जाती है। गांवों का जीवन वर्षा द्वारा बहुत प्रभावित होता है। वर्षा के कारण प्रकृति का रूप निखर जाता है और आकाश में इन्द्रधनुष की सतरंगी आभा मन को लुभा देती है। यह ऋतु प्रत्येक के हृदय में मस्ती, उमंग, आनंदमयी स्फूर्ति का संचार कर देती है।






बसंत ऋतु यदि ऋतुओं का राजा है तो वर्षा ऋतुओं की रानी है। वर्षा को चौमासा भी कहते हैं क्योंकि इसका आरंभ आषाढ़ मास में हो जाता है और वह अश्विन तक रहती है।जिस प्रकार कठिन तपस्या, कठोर संयम तथा त्याग से किसी व्यक्ति को महत्ता गौरव और श्री आदि प्राप्त होते हैं उसी प्रकार वसुंधरा ग्रीष्म सूर्य के असह्य ताप को सहन करके ही वर्षा के वरदान को प्राप्त करती है।

हमारा देश दक्षिण एशिया के भारतीय उपमहाद्वीप में प्रमुख रूप से स्थित है। यहां पर मुख्यतः वर्षा संपूर्ण भारत में मानसून से ही होती है। यह मानसून दक्षिणी गोलार्द्ध की व्यापारिक पवनों को उत्तरी गोलार्द्ध में मानसून कहा जाता है। यह वर्षा ग्रीष्मकालीन कहलाती है। यही नहीं शीतकाल में उत्तर पूर्व व्यापारिक पवनों से थोड़ी बहुत बर्षा दक्षिण पूर्व के तटीय राज्यों में ही होती है। थोड़ी बहुत वर्षा पश्चिमी विक्षोभ से भी देश में होती है। मानसून वर्षा का भारतीय जलवायु में बहुत महत्व है।

इसलिए उत्तर भारत में सभी प्रमुख नदियों में अति वर्षा से बाढ़ आ जाती है। नेपाल से निकलने वाली कोसी नदी को तो बिहार की शोकग्रस्त नदी कहा जाता था। मानसून द्वारा जून से लेकर सितंबर माह तक प्रत्येक वर्ष भीषण वर्षा होती है। इसलिए भारतीय उपमहाद्वीप में गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां मानसून वर्षा का जल लाभ प्राप्त करती हैं और वर्ष भर बहा करती हैं जबकि दक्षिण भारत में नदियां जैसे नर्मदा, तापी, महानदी, कृष्णा, कावेरी और गोदावरी ऋतुवत मानी जाती हैं। इसलिए करोड़ों भारतीयों का भविष्य मानसून की वर्षा निश्चित करता है।





बचपन से ही मेरा प्रिय ऋतु वर्षा ही रही है। जब बरसात होती थी तब फुटबॉल खेलने में बहुत मजा आता था। भले ही अक्सर घर में डांट पड़ती थी फिर भी मौका मिलने पर खेलना नहीं भूलता था। प्रिय ऋतु होने के कारण रेनकोट और छाता से परहेज़ रखता हूं सदैव इसलिए अक्सर लापरवाही से भींग जाता था।

कई बार भीगने के कारण बुखार भी आ गया और स्कूल और नौकरी में व्यवधान उपस्थित हो जाता था। उसके बाद अपने बच्चे को वर्षा से भीगने पर ठीक से नहीं डांट पाता हूं। वर्षाकाल में स्कूल, कालेज, आफिस और बाजार जाने में असुविधा हो जाती है। तब बच्चे, बुजुर्ग, युवा, युवतियां, महिलाएं जाता और रेनकोट का प्रयोग वर्षा से भीगने से बचने के लिए करते हैं।


- इंदु शेखर त्रिपाठी