साहित्य चक्र

16 January 2021

एक बचपन का किस्सा कैसे होता था हमारा नए साल का जश्न...?


यह किस्सा मेरे बचपन का है। हमारे परिवार में करीब 5-10 बच्चे हुआ करते थे। जब साल का अंतिम दिन हुआ करता था, तब सभी लोग बोला करते थे कि थर्टी फर्स्ट की पार्टी रखेंगे। मगर समस्या वहां पर उत्पन्न हो जाती जब हम बच्चों के पास पैसे नहीं हुआ करते थे और परिवार इतना अमीर नहीं था कि वह हमें पार्टी के लिए पैसा दे सकता था। लेकिन एक बात है जो बहनें होती हैं वह अपने स्कूल की कॉपियों में 10, 5, 20 रुपये छुपा कर रखते थे। हम बच्चे बड़ी बहनों के स्कूल के बैग चेक करके उनके कॉपियों के बीच से पैसा निकाल लिया करते थे। पार्टी के लिए आलू, सूजी, तेल, आटा, मसाले लेकर आते थे। उस दिन हम सभी एक ही कमरे में रहते थे। पुरानी पुरानी बातें होती थी, मम्मी, पापा, दादा जी, चाचा, ताऊ, चाची, ताई सब लोग थोड़ी देर आते थे उसके बाद चले जाते थे। लेकिन हम सभी बच्चे उनसे बहुत चालाक थे हम पार्टी का खाना बनाना रात के 10,11 बजे से शुरू करते थे। गांव में रहा करते थे तो इसलिए पापा मम्मी लोग जल्दी सो जाते थे। पार्टी के दौरान नाच गीत से लेकर कई सारे कार्यक्रम हुआ करते थे। कभी-कभी मार पिटाई का भी कार्यक्रम रखते थे। यह सुनिश्चित था कि एक व्यक्ति पार्टी के दौरान जरूर रोएगा। शुरू शुरू में पार्टी का आयोजन स्थल चाचा का घर या हमारा घर हुआ करता था, बाद में हमने उसे गांव के धार्मिक स्थल पर बनाना शुरू कर दिया। जब मैं गांव से 12वीं पास करके निकला तो बहुत बुरा लगा मगर मुझे अपने जीवन की शुरुआत भी तो करनी थी ना, इसलिए मैंने अपने आपको समझाया और एक नए जीवन की ओर अग्रसर हो गया। खाना पीना बना कर और खा कर 12:00 बजने का इंतजार करते थे। जैसे ही 12 बजते थे तो वैसे ही हमारा ढोलक और शोर-शराबा शुरू हो जाता था। 1-2 भाई लोग ऐसे थे जो सीटियां अभी बजाते थे। इस दौरान हम सभी भाई बहन एक दूसरे को नए साल की शुभकामनाएं देते और गले मिलते थे। इसके बाद हम सभी लोग सो जाते थे और सुबह 5:00 बजे उठते थे। 5 बजते ही हमारा, स्नान, योग और धार्मिक कार्यक्रम शुरू हो जाता था। यह सभी चीजें मेरे दिमाग में चलती थी, बच्चे आज भी मेरे साथ पहले जैसे ही रहते हैं। मैं सभी बच्चों की बातों को सुनता था सुनता हूं आगे भी सुनता रहूंगा। मगर बचपन की बहुत याद आती है। यहां पर मैं एक छोटी सी बात कहना चाहूंगा एक बार हम एक बहुत बड़े मंदिर में गए थे। उस मंदिर में जो व्यवहार हमारे दोस्तों के साथ हुआ मैं उसे यहां बता भी नहीं सकता हूं। तब से मैं मंदिर नहीं जाता हूं। अगर कभी मजबूरी में जाना भी पड़ता है तो कभी भी दर्शन नहीं करता हूं, सिर्फ बाहर खड़ा रहता हूं।

आज साल का अंतिम दिन है इसीलिए सभी बहनों और भाइयों की याद आई तो सोचा कुछ यादों को आप सभी के साथ साझा करू। आप सभी को एक बार फिर से आने वाले नव वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाएं...।

दीपक कोहली


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