साहित्य चक्र

07 January 2024

कविताः- भू-कानून






देवभूमि की जनता अब के,
मांग रही है “भू-कानून”।।

ये देवभूमि तुमने बतलाओ,
किसके हवाले छोड़ी है।।

कोई भी आकर बस जाए,
क्या ये “धर्मशाला” थोड़ी है।।

देवभूमि का नौजवान,
चण्डीगढ देहरदून में भटक रहा।।

और यहां की सुख सुविधाएं,
कोई और ही गटक रहा।।

उत्तराखंड के लोगों को,
ना शिक्षा ना रोजगार मिला।।

20 साल से हम सबको क्यों,
धोखा ही हर बार मिला।।

सपनों के उत्तराखंड के लिए,
सैकड़ों ने दी है कुर्बानी।।

खून तुम्हारा नहीं खौलता,
क्या खून हो गया है पानी।।

सत्ता में बैठे नेताओ,
इस बार ये काम तुम खास करो।।

50 साल के मूल निवास का,
कानून जल्दी पास करो।।

ध्यान रहे ये देवभूमि,
जम्मू कश्मीर ना बनने पाए।।

अपनी कोख से कोई माँ,
“आतंकी” ना जनने पाए।।

जागो देवभूमि के लोगों,
सबके मन में ये जोश भरो।।

हमें चाहिए “भू-कानून”,
इस नारे का “उद्घोष”करो।।

जो करे पहल इन कानूनों की,
वो सरकार हमारी है।।

जो करे विरोध इन आवाजों का,
तो वो “संस्कृति” की हत्यारी है।।

अब के तो इस राज्य का पूरा,
वोट उसी को जाएगा।।

जो देवभूमि की रक्षा हेतु,
जल्दी “भू-कानून” लाएगा।।


- अनूप सिंह


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