साहित्य चक्र

09 January 2024

कहानीः- इस्तीफा



कार खेत खलिहानों के बीच की पगडंडी पर शहर से गाँव की ओर  दौड़ी जा रही थी।

           सुमीत अपने मन में उठते बवंडर को संभाले स्टीयरिंग थामे हुआ था।

          अम्मा बाबा अब रहे नहीं। शहर से उसका गाँव आना भी बार-बार हो नहीं पाता। 

              गाँव का घर ,खेत सब कुछ संभालना शहर की नौकरी के साथ मुश्किल होता जा रहा है इस बार जरूर खेतों और घर का सौदा कर ही देगा। 





   "कहाँ परेशान होते हो बाबू, हम देख लेंगे तुम्हारे खेत खलिहान सब कुछ।'' पटेल काका कितनी ही बार कह चुके हैं। इसीलिए गाँव आने से पहले उसने उन्हें फोन भी कर दिया था।

         घर भी बेचकर शहर में बड़ा फ्लैट ले लेगा। बच्चे भी बड़े हो गए हैं।

           गाड़ी गाँव की कच्ची सड़क पर रेंगते हुए चल रही थी। उसकी आँखों के सामने कवेलू वाला घर,आंगन में किसी बुजुर्ग से खड़े आम,नीम और पीपल घूम गए।

     तभी उसका फोन बज उठा.….पटेल काका का फोन, खेत पर इंतजार कर रहे हैं।

      सीधे खेत की ओर चल दिया।

  "राम-राम काका! ज्यादा इंतजार तो नहीं करना पड़ा?"
 "नहीं बेटा! कागज तैयार करा लाया हूँ यह पैन लो और तुम...."  

       खेत में पड़ी खटिया पर बैठ वह गौर से पेपर देखने लगा। तभी उसे खेत की जमीन में दद्दा, अम्मा और बाबा के चेहरे उभरे.... तीनों के चेहरे कुछ थके हुए,क्लांत से दिख रहे थे। और अम्मा…अम्मा तो बार-बार अपने आँचल से सुड़कती नाक पोंछ रही थीं।

   "अरे बेटा रे !ओ मेरे सुमतिया रे !"अम्मा जोर जोर से रोए जा रहीं थीं।कैसा करुण विलाप है यह!
   " क्या सोच रहे हो बेटा?कागज़ पर दस्तख़त कर दो।तुम्हारा यह रोज-रोज खत्म हो जाएगा।"
  "हाँ काका!यह रोज़-रोज़ का झंझट खत्म कर ही दैता हूँ।"

      अपने काले बैग से कोरा कागज़ निकाल अपना इस्तीफा लिख रहा था।


                                                                             - यशोधरा भटनागर


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