साहित्य चक्र

06 January 2024

कहानीः- अंधड़



विमान की खिड़की से बाहर झाँका-सिंदूरी रंग की रेखा खचित आसमां सामने चमचमाता सूरज! अप्रतिम सौंदर्य! दृष्टि थोड़ी सी हटी तो अगली सीट वाले बच्चे पर ठहर गई। बच्चा जब से फ्लाइट में बैठा है टैब में व्यस्त है। आसपास की दुनिया से बेखबर, कार्टून की दुनिया में गुम। अमेरिकन एक्सेंट में अंग्रेज़ी बोलते बच्चे शायद परदेशी भारतीय हैं। सूरज से कटे,सूरज की रोशनी से दूर, वर्चुअल संसार के ये बच्चे.... सहसा सुमी घबरा कर सहम गई।





ये टूअर्स....नौकरी के सिलसिले में घर से बाहर रहने के कारण वह मोनू पर इतना ध्यान कहाँ दे पाती है? कहीं वह भी अपनी ऐसी ही अलग दुनिया में खोया हुआ तो नहीं रहता! एक गड़गड़ाहट! फ्लाइट लैंड हो गई। झटपट बैग टाँगें वह बाहर को निकल आई।

व्यस्त सड़क पर टैक्सी सरपट दौड़ रही थी पर रास्ता था कि खत्म होने का नाम ही ले रहा है। घड़ी साढ़े पाँच बजा रही है। टैक्सी से उतर तेज़ क़दमों से घर पहुँची।"देखो दादू मेरी पतंग आसमान तक पहुँच गई।"मोनू लॉन में पतंग उड़ा रहा था, बाबूजी प्रसन्न भाव से चकरी पकड़े खड़े थे।

ऊँची उड़ती पतंग के साथ मोनू की आँखों में एक अलग ही चमक, चेहरे पर एक अलग ही खुशी दिखाई दे रही थी। "येऽऽऽ!"वह पतंग को और ऊँचा उड़ाने की कोशिश कर रहा था। "चलो बेटा ! बहुत हो गया।अब दीया -बत्ती का समय हो गया है। चलो आओ! दीया लगा कर भगवान की आरती करते हैं।" अम्मा जी की आवाज़ किचन से लॉन तक पहुँच गई। सुमी के अंदर का अंधड़ शांत हो थम चुका था।

  
                                                          - यशोधरा भटनागर


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