साहित्य चक्र
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24 November 2025

हिंदू राष्ट्र की मांग देश विभाजन का षड्यंत्र!

सोशल मीडिया में इन दोनों हिंदू राष्ट्र की मांग बहुत आम सी होती जा रही है। इस मांग के पीछे देशद्रोही ताकतें काम कर रही है। देश में बेरोजगारी और महंगाई अपनी चरम सीमा पर है, मगर युवाओं को हिंदू राष्ट्र का झुनझुना पकड़ा कर गुमराह किया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है- आखिर युवाओं को गुमराह क्यों किया जा रहा है ?




भारत में अलग राष्ट्र की मांग पहली बार नहीं उठ रही है बल्कि पहले भी खालिस्तानी (पंजाब) और तमिल में भी अलग राष्ट्र की मांग उठ चुका है। इसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ा है। आजादी से पहले भारत हजारों राजवाड़ों में बांटा था। उन सभी राजवाड़ों को सरदार वल्लभभाई पटेल ने खत्म कर भारत को एक सूत्र में बांधा था। मगर आज कुछ नफरती चिंटू हिंदू राष्ट्र की मांग करके भारत को फिर से विभाजनकारी षड्यंत्र के तहत खंडित करना चाहते हैं।

हिंदू राष्ट्र की मांग उसी प्रकार से गलत है जिस प्रकार से खालिस्तानी की मांग गलत थी। आज कुछ लोग हिंदू राष्ट्र की मांग कर रहे हैं तो कल को कोई सिख राष्ट्र मांगेगा और परसों कोई जाति के आधार पर राष्ट्र मांगेगा तो आखिर कब तक इस तरह के षड्यंत्र देश के अंदर चलते रहेंगे। 

आखिर सरकार इस तरह की मांगों पर चुप्पी क्यों साधी बैठी है, क्या सरकार भी चाहती है देश का विभाजन फिर से हो ? नहीं तो सरकार को इस तरह की मांग उठाने वालों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। विपक्ष को भी इस तरह के षड्यंत्रकारी मांगों को मुद्दा बनाकर सरकार को संसद से लेकर सड़क तक घेरना चाहिए।





सरदार वल्लभ भाई पटेल ने हिंदू राष्ट्र के विचार को खारिज करते हुए कहा था कि यह पागलपन से भरा विचार है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है और इस देश पर किसी एक धर्म का राज नहीं हो सकता है। 


पटेल के इन विचारों को हम सभी को समझना चाहिए और उन लोगों को भी समझना चाहिए जो हिंदू राष्ट्र की मांग कर देश को विभाजनकारी परिस्थितियों की ओर धकेल रहे हैं। अगर हिंदू राष्ट्र के पीछे बहुसंख्यक होने का तर्क है तो फिर इस आधार से हिंदू धर्म में भी विभिन्न जातियां हैं तो फिर बहुसंख्यक जाति का राज होना चाहिए। इसलिए कुतर्क बातों के आधार पर देश को विभाजित करने वाले संगठनों और लोगों के खिलाफ हम सभी सच्चे और स्वतंत्र भारतीयों को आवाज़ उठानी होगी। 


                                                  - दीपक कोहली


05 September 2025

खामोशी की आवाज़, जुदाई और दर्द की स्याही


खामोशी वह आईना है जिसमें दिल के टूटे हुए टुकड़े साफ़ नज़र आते हैं। जब कोई अपना हमेशा के लिए जुदा हो जाए, तो ज़िंदगी का हर रंग फीका पड़ जाता है और चारों ओर सन्नाटा बस जाता है। यह खामोशी शब्दों की कमी नहीं होती, बल्कि यह उन जज़्बातों की स्याही है जिन्हें बयां करने की हिम्मत हमारे पास नहीं होती है।





इंसान बोलना चाहता है, पुकारना चाहता है, पर होंठ जमे रहते हैं और आवाज़ दिल की दरारों में कैद हो जाती है। जुदाई का दर्द सिर्फ आँखों से गिरते आँसुओं का नाम नहीं, यह वह सूनापन है जो हर सांस के साथ भीतर उतरता चला जाता है। पहले जिन लम्हों में मोहब्बत की गूंज थी, वहाँ अब वीरानी का डेरा है।

खामोशी अक्सर हमें लिखने पर मजबूर करती है। यह बिखरे हुए अल्फ़ाज़ में वही तड़प ढूंढ लेती है जो दिल चीखकर कहना चाहता है। शायरी और कविता इस दर्द की वह भाषा बन जाते हैं जिसे दुनिया समझ सकती है। टूटा हुआ दिल जब काग़ज़ पर उतरता है, तो उसकी धड़कनें भी शब्दों में सुनाई देने लगती हैं।

जुदाई और खामोशी एक-दूसरे का सहारा हैं। जुदाई दिल को तोड़ती है और खामोशी उस खालीपन को अपने भीतर समेट लेती है। यही दोनों मिलकर हमें यह सिखाते हैं कि ज़िंदगी सिर्फ खुशियों का नाम नहीं, बल्कि दर्द और उम्मीद के संगम से बनती है।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह