पहाड़ दूर से जितने प्यारे और सुंदर दिखाई देते हैं, अक्सर पहाड़ों का जीवन उससे उतना ही डरावना व खतरनाक होता है। चौमास यानी बरसात के मौसम में पहाड़- नदियों की उफान, हरियाली की हनक और कीट-पतंगों के आक्रमण से भर जाते हैं। चौमास में महीनों बारिश लगी रहती है और बारिश के कारण स्थानीय लोगों के मन में आंतरिक डर बना रहता है।
चौमास में अधिक बारिश के कारण पहाड़ों की नदियाँ विकराल रूप धारण की रहती है। जमीन यानी पहाड़ों का खिसकना, रोड़-पुलों व घरों का टूटना, पेड़ों का गिरना और आपदा आना पहाड़ों में सामान्य बात है। इसीलिए शायद! पहाड़ के स्थानीय लोग अपने घर में हमेशा 1-2 माह का राशन बचाकर चलते हैं। कहते है कि जैसी परस्थितियाँ होती हैं, वैसे ही उपाय खोजे जाते हैं। अपने घर में हमेशा राशन का भंडार करके रखना पहाड़ों के लोग का वहां की परस्थितियों से लड़ने का एक कारगर हथियार है।
चौमास की रातों में कभी-कभी पहाड़ी लोग बिना सोए भी रहते हैं। इसलिए नहीं कि उन्हें नींद नहीं आती, बल्कि इसलिए क्योंकि पहाड़ों की ज्यादा बारिश डरा देती है। पहाड़ियों का डरना भी वाज़िब है, क्योंकि प्रकृति का कहर बिना बताएँ आती है और वो इंसानों की तरह जाति-धर्म व लिंग का किसी भी प्रकार का कोई भेद नहीं करती है। पहाड़ों के हर गांव में चौमास की रातों के कई दर्दनाक किस्से दफ्न है। शायद इन्हीं दर्दनाक किस्सों ने पहाड़ियों को कोमल हृदय का मानुष बनाया है।
पहाड़ियों के बारे में कहा जाता है कि पहाड़ी लोग हृदय से जितने कोमल होते हैं, उतने ही उनके हौंसले बुलंद होते हैं। पहाड़ी प्रकृति से बार-बार टूटता-डरता है, मगर हिम्मत नहीं हारता है। चौमास की डरावनी रातें पहाड़ियों को डराती तो जरूर हैं, मगर पहाड़ी लोग प्रकृति से कभी रूठते या नफरत नहीं करते हैं। क्योंकि पहाड़ के लोग प्रकृति को अपनी माँ मानते हैं और उसके कहर को माँ की डांट समझ कर सह लेते हैं।
पहाड़ों में चौमासा जितना डरावना होता है, उतना ही लाभदायक और प्यारा भी होता है, क्योंकि चौमासा अपने साथ हरियाली, रंग-बिरंगे फूल, नदियों की सु.. सु… सुसुहाहट और चिड़ियों की चहचहाहट लेकर आती है। चौमासा यानी आषाढ़, सावन, भादो और कार्तिक का माह और वर्षा ऋतु का मौसम होता है। चौमासा को वर्षावास, चतुर्मास और चातुर्मास्य भी कहते हैं।
- दीपक कोहली
No comments:
Post a Comment