साहित्य चक्र

05 November 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 06 नवंबर 2026




नक्शा

दुनिया के नक्शे में सब दिखता है,
जैसे देश... शहर और बस्तियाँ।
नहीं नजर आते तो कटे हुए जंगल,
बिल्डिंग बने खेत और मलबे से भरी नदियाँ।
वैसे ही,
जनगणना बता देती है आबादी के आंकड़े,
मगर नहीं बता पाती भूखे-नंगे मजदूर,
बेरोजगार युवक
और यौन शोषण सहती बच्चियाँ।
सवाल तो सब पर उठेंगे,
कि आखिर किसने दिए पढ़ने की उम्र में
मासूम बच्चों के हाथों में औजार?
क्यों करती है माँ, बच्चों की भूख से तंग आकर
अपनी देह का व्यापार?
माप ली जाती हैं भूकंप और तूफानों
की गतिविधियाँ,
लेकिन कोई ऐसा यंत्र नहीं जो माप सके
बुजुर्गों की आँखों की नमी!
स्त्री के नाम पर दी गई गालियाँ,
हाथों में डिग्री लेकर भटकते हुए युवाओं का दर्द
और सरहद पर खड़े जवानों की तकलीफ!
हाँ नक्शे में सब दिखता है,
दिखते हैं पहाड़, झरने और हरियाली,
मगर नहीं दिखता उनके हनन होने का डर,
सड़कों पर कूड़ा बीनते हुए बच्चे
और उसी कूड़े में मुँह मारते हुए पशु!
पशुओं से ज्यादा हैवानियत दिखाते मर्द ,
और मर्दों की हस्ती पर वार करती हुई महिलाएं!
ये भी अच्छा है कि ये सब ,
नक्शे में नजर नहीं आता ,
नक्शा तो नक्शा ही है ,
भला इतना ज्वार-भाटा उसके अंदर कैसे समाता!

- मंजू सागर


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आहट सुनाई देने लगी है मुझे दीपावली की
महकने लगा है मेरे दिल का घर-आँगन,

सदियों से जो अँधेरा पसरा था सूनी आँखों में
उस अँधेरे को भी अब जाने का मन है,

बहुत जी लिया,अँधेरों से समझौता करके
अब रौशनी से इश्क़ करने का वक़्त आया है,

इस बार सिर्फ़ दीये नहीं जलाऊँगा मैं
जलाऊँगा उन ख़्वाबों को,जो बरसों से दफ़न हैं,

जिन चिराग़ों को ज़माने ने बुझा दिया था
उन्हें फिर से जलाने का वक़्त आया है,

तेल से नहीं, अपने अश्कों से दीये भरूँगा मैं,
बाती से नहीं, अपनी साँसों को उजाला करूँगा मैं,

दीपावली सिर्फ़ दीयों की लौ का पर्व नहीं
सदियों के गहरे ज़ख़्मों पर मरहम लगाने का पर्व है,

बाज़ार में बिकते दीयों में मुझे,ऐ मेरे दोस्त!
कुम्हार के हाथों की दुआ दिखती है,

पटाखों के शोर में नहीं,
माँ के चूल्हे की मीठी हँसी सुनाई देती है,
बिछड़ गए थे जो कभी अँधेरों में,
उन अपनों को फिर से पुकारने का मौसम है,

मोहब्बत का एक ऐसा चिराग़ जलाऊँगा मैं
सात आसमानों तक जाए जिसकी रोशनी,

लक्ष्मी आए न आए, मुझे कोई परवाह ही नहीं,
पहले अपने भीतर के अंधकार को मिटाऊँगा मैं,

"धीमान" इस दीवाली ये ठान बैठा है
नफ़रतों के हर दीये को बुझा कर ही रहूँगा मैं

- बाबू राम धीमान


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लुप्त हुए मिट्टी के कद्रदान

कहाँ गई मिट्टी के वो बर्तन
कहाँ गई खपरैल की मकान
कहाँ गई पेय जल की सुराही
कहाँ गई मिट्टी के वो दीवान

कहाँ गई मिट्टी की सोंधी खुशबू
कहाँ गये मिट्टी के वो कद्रदान
कहाँ गई हॉड़ी की। वो चावल
कहाँ गई मिट्टी के कोठे मकान

कहाँ गई मिट्टी की दूध की कड़ाही
कहाँ गये मिट्टी चुल्हे में पके पकवान
कहाँ गई कबूतर की मिट्टी की भाँड़ी
कहाँ गये मिट्टी के पूजन की धुपदान

कहाँ गई मिट्टी की मोटी दीवारें
कहाँ गई मिट्टी के वर्तन निर्माण
कहाँ गई मिट्टी की गुल्लक हमारी
कहाँ गये मिट्टी के खेल मैदान

कहाँ गई मिट्टी की गाँव की पगडंडी
कहाँ गये मिट्टी के ग्लास की जहान
कहाँ गई मिट्टी के बने चबूतरे
कहाँ गई मिट्टी से लीपे खलिहान

- उदय कशोर साह


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झूठ सजा दरबार में, सच खड़ा लाचार।
न्याय माँगता रह गया, पीड़ित बारंबार।।

मंजिल पाने की धुन में, भूला जग व्यवहार।
जीत मिली तो खो दिया, अपनों का संसार।।

समय बदलता जा रहा, बदले सबके रंग।
सुख में अपने साथ हैं, दुख में छूटे संग।।

कर्म किए निष्काम जो, उन्हें मिला सम्मान।
स्वार्थों में जो खो गए, खो बैठे पहचान।।

जीवन की हर राह में, मिलते कई सवाल।
हिम्मत जिसका साथ दे, उसका हो उजियाल।।

मजबूरी की बेड़ियाँ, बाँधें बारंबार।
फिर भी मन में पालिए, सपनों का संसार।

भूखे पेट नसीब में, श्रम का मिला उपहार।
मेहनत फिर भी झेलती, किस्मत की मार।।

निर्धन की आवाज को, सुने नहीं सरकार।
धनवानों के नाम पर, सजता हर दरबार।।

विपदा से मत हारना, रख मन में विश्वास।
रात भले ही हो कठिन, होगा नया प्रकाश।।

मानवता जब रो पड़ी, मौन हुआ संसार।
पत्थर दिल के सामने, रोया प्रेम अपार।।

लाचारी को तोड़कर, बढ़ता वही महान।
ठोकर खाकर जो उठे, जग में उसकी शान।।

- डॉ. प्रियंका सौरभ


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छुक-छुल की आवाज़
रेल का इंजन करता है

मंजिल तक ले जाती सबको
हर स्टेशन पर रुकती जाती

हम भी बैठे ठिठुरती ठंड में
अपना चद्दर, झोला साथ लिए

कब आएगी रेल हमारी
पल-पल है इंतज़ार हमें

सरपट-सरपट दौड़ लगाकर
छुक-छुक करती रेल यहां

- डॉ सुमन काला


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जिंदगी के सफर की धूप जब काटी जाती है,
हर पड़ाव पर जिंदगी मंजिल पाती है।
थकान भरे सफर में जब हमसफर हो साथ,
हर मुश्किल तब मिलकर बांटी जाती है।

- स्वाति जोशी


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एक ही चादर में लिपटा, पूरा ज़माना देखा,
न महल की चाह, न गहने का बहाना देखा।
प्लेटफार्म की जमीन पर भी घर बना लिया,
तेरे साथ मैंने हर सफर सुहाना देखा।

- दिलीप कुमार


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जो वर्तमान में जीता है
उसका कोई भविष्य
कोई अतीत नहीं होता।
उसका हर मौसम सदाबहार
होता है,उष्ण नहीं होता
शीत नहीं होता।
जिसे संघर्षो ने पाला हो
हर भूख पर अभाव
निवाला हो, वो
जीवन पथ पर
काँटों की आगवानी से
कभी भयभीत नहीं होता।

- राधेश विकास


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दस्तक दो इस बार सखे
तुम बिन सूना मन का आँगन,
बन जाओ झंकार सखे
साँसें तुमको ढूँढ रही हैं,
कर लो अब स्वीकार सखे

मौन समर्पण की यह बेला,
तुमको ही आवाज़ लगाती,
जैसे चातक की व्याकुलता,
स्वाति-बूंद का राह ताकती,

सूखे मरुथल पर चाहत की,
कर दो तुम बौछार पसखे

साँसें तुमको ढूँढ रही हैं...
कर लो अब स्वीकार सखे

- सविता सिंह मीरा


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दिव्य लिपि

जब अंधा हिस्सा कट जाता है
टकराव का लेवल टूटकर बिखर जाता है
गुफा की दीवार पर
आयताकार रंग का ड्रम साफ़ हो जाता है।
आसमान दिव्य अक्षरों की माला से सजा हुआ है।
इसके दोनों किनारों पर
एक-एक करके,
अनगिनत चौकोर तस्वीरें,
गर्म लाल चमक,
पीले, बैंगनी, लाल रंग के रिफ्लेक्शन
गर्म और ठंडे त्रिकोण लिखे हुए हैं।
जब चाँद डूबता है और चुपचाप निकलता है
खामोश तारे बातचीत कर रहे होते हैं
एक अनजान साइन लैंग्वेज का निशान छोड़ते हुए।

- निर्मल रॉय


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बड़ा लम्बा सफ़र है।
हमें इसकी ख़बर है।

यहाँ चलते , ठहरते,
हुई शामों -सहर है।

पले हैं हौसले तो,
शिकायत बेअसर है।

भले दुनियां बड़ी हैे,
ठिकाना मुख्तसर है।

मिला हैे काम जैसा,
रही वैसी गुज़र है ।

इरादे जान लेगी,
लगी पैनी नज़र हैे।

नया क्या है जहाँ में,
इधर जैसा उधर है।

- नवीन माथुर पंचोली


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आजादी के मायने

अरे!अब तुम क्या करोगे
देश को आजाद
तुम तो ढूंढते हो
इंस्टा और फेसबुक पर
सच्चा प्यार।

कभी ढूंढ लेते
तुम उन विचारों को
जो जगा देते
तुम्हारी सोइ हुई
अंतर आत्मा को।

कभी जला लेते
सीने में दफन
दहकते अंगारों को
शायद दिख जाती
स्वतंत्रता की पक्की नींव।

- डॉ. राजीव डोगरा


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मौन रहना तुम

मौन रहना तुम,
तुझे पढ़ना है मुझे।

चाँद-सा ये चेहरा,
ज़रा सोचना है मुझे।
ज़ुल्फ़ों का है पहरा,
ज़रा बिखेरना है मुझे।

होंठों की लालियाँ,
बस छूना है मुझे।
कजरारी ये अँखियाँ,
बस डूबना है मुझे।

ये दूधिया गोराई,
बस परखना है मुझे।
परियों की परछाईं,
बस खेलना है मुझे।

ये सुंदर-सी काया,
महसूस करना है मुझे।
ये नज़रों की माया,
एहसास करना है मुझे।

पास बैठी रहो,
सुकून पाना है मुझे।
ख़ामोश हैं गलियाँ,
तेरा हाल जानना है मुझे।

मौन रहना तुम,
तुझे पढ़ना है मुझे।
तुझे पढ़ना है मुझे।

- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


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"मत बाँधो हमें सीमाओं में"

मत बाँधो हमें सीमाओं में
वरना खिंच जाएगी लक्ष्मण रेखाएँ,
सिर्फ़ ज़मीन पर नहीं खिंचतीं,ये रेखाएँ
खिंचती हैं ये दिलों पर, रिश्तों पर और ख़्वाबों पर,
एक बार खिंच गईं तो,वनवास शुरू होता है
सीता को भी होता है बनवास और राम को भी,

मुझे मत बाँधो
क्योंकि मैं बंधा तो मेरे शब्द बंधेंगे,
मेरे शब्द बंधे तो मेरी सोच बंधेगी
और अगर सोच बंधी तो पूरा युग बंध जाएगा,
जहाँ कवि चुप हो जाए
वहाँ लक्ष्मण रेखाएँ नहीं,कब्रें खिंचती हैं,

हमें खुला छोड़ो
बादलों की तरह, नदियों की तरह,
क्योंकि मैं जानता हूँ -
परिंदों के लिए जहाँ आसमान छोटा पड़ जाए,
तो वह आसमान को भी बदल देते हैं
मगर सीमाएं नहीं मानते,

मुझे मत बाँधो
मैं शब्द नहीं हूँ, जो कोष में समा जाऊँ,
अर्थ हूँ मैं वह,जो कोष से बाहर निकलता है
अब मैं खुद ही बनूँगा,लक्ष्मण रेखा ,
न बाहर की दुनिया के लिए
अपने ही भीतर के डर के लिए,

मैं खींचूँगा एक रेखा-
मेरी आत्मा और मेरी आदतों के बीच,
मेरे मौन और मेरे शब्दों के बीच
मेरे ज़िंदा होने और ज़िंदा दिखने के बीच,
नफ़रत और मोहब्बत के बीच
झूठ और सच के बीच,
मैं और मेरे "मैं" के बीच

- बाबू राम धीमान


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दीप से दीप जले

चहुं ओर दिवाली को दीप जले,
मन का अंधियारा अब दूर टले।

हर घर दीप हर्ष के जले,
हर आनन खुशी से खिले।

जैसे दीप घर में वैसे मन में भी जले,
हर मन से अंधियारे का राज टले।

हर घर आंगन में रंगों के पुष्प खिले,
बुराई से सबके कदम बचकर चलें।

नव उपहारों से सबके हृदय खिलें,
देवपूजन का दर्ज़ा मात पिता को भी मिले।

वचन मात पिता का मान दर्जा प्रभु का मिले,
तभी राम प्रेम में युगों से घर घर में दीप जले।

हर स्थिति में सत्य मन में ढले,
जग चाहे संग हो या विपरीत चले।

प्रभु राम के आदर्श जीवन में ढले,
हर मन राम नाम के पथ पर चले।

जैसे दिवाली को दीप से दीप जले,
वैसे ही हम सबमें प्रेम बाँटते चलें।

- राज कुमार कौंडल


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बेनूर

जिसे थामना चाहा, दूर होते गए,
अपनी ख़्वाहिशों के आगे मजबूर होते गए।

रेत के घरौंदे बनाता रहा मैं,
बारिश में न जाने कितने आशियाने काफ़ूर हो गए।

जिस पर भरोसा था अपनों-सा,
मेरी ख़ुशी देखकर वो भी मगरूर हो गए।

मेरे नाम को बदनाम करके,
ख़ुद मेरे ही नाम से मशहूर हो गए।

देखे थे आज जो भी सपने हमने,
ख़ैरियत रही कि उन्हें सच होने का वहम न रहा,
पल भर में ही वो चकनाचूर हो गए।

ऐ ज़िंदगी! तेरे रंग तुझे मुबारक,
हम तो बस जीने की चाह में बेनूर हो गए।

- रोशन कुमार झा


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वक़्त कहाँ?

झाँकते हैं चुपचाप झरोखे से,
दरवाज़े को ताकते हैं, निकलने का वक़्त कहाँ?

अपनों के ख़ातिर ही अपनों से हैं दूर,
अपनों से मिलने, अपनापन जताने का वक़्त कहाँ?

रोज़-रोज़ ही तो कदम ज़मीन पर पड़ते,
ख़ुद गिरते, ख़ुद सँभलते,
पूनम के चाँद के दीदार को वक़्त कहाँ?

हमें वक़्त नहीं मिलता, या फिर
वक़्त को हम नहीं मिलते,
दोनों एक-दूजे से हैं इतर,
ये समझने का वक़्त कहाँ?

लगे रहते बाग़ को सींचने, सँवारने में,
जब गुल खिलें, तो निहारने का वक़्त कहाँ?

- रोशन कुमार झा


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हर रात

देखो ये रात कितनी प्यारी है,
चांद की चांदनी कितनी न्यारी है,
मुझे डूब जाने को दिल करता है,
ये अंधेरी रात बहुत दुलारी है।

मैं कभी खिड़की खोलता हूं,
अपने आप से ये बोलता हूं,
नहीं जानता हूं उस आवाज को,
जो मैं हर रात आंगन में सुनता हूं।

सुनता हूं वो आवाज़ तुम्हारे पायलों में,
कोई तो आता है मेरे खख्यालों में,
चांद को निहारते ही सुबह हो जाती है,
मेरी भी गिनती होती है उन घायलों में।

- प्रणव राज


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वलय

नीचे पाताल लोक में अभी भी अंधेरा था,
जानवरों की खाल की गंध,
आदमी और औरत की जगह।
उस समय, रात के आसमान से
पहाड़ की चोटी पर,
तारों का एक झुंड ध्यान की जगह पर उतरा,
बहुत चमकीले रंग के आदमियों का एक झुंड,
घाटी, पहाड़ी, सख्त पत्थर की ज़मीन को छूते हुए,
करुणा की रोशनी धीमी हो गई।
शायद ज़िंदगी का मतलब है
किसी आधे-अचेतन, आधे-बेहोश
इंसान का गिरना
और उसके आगे बढ़ने की
लगातार कोशिशों का एक रोता हुआ घेरा बनना।

- निर्मल रॉय


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शुभ दीवाली आ गई, झूम रहा संसार।
माँ लक्ष्मी का आगमन, सजे सभी घर-द्वार।।

सुख-वैभव सबको मिले, मिले प्यार-उपहार।
सच में सौरभ हो तभी, दीपावली त्योहार।।

दीवाली का पर्व यह, हो सौरभ तब खास।
आँगन झोंपड़ियों के भी, महलों को दें आस।।

जिनके स्वच्छ विचार हैं, प्रेमपूर्ण व्यवहार।
उनके जीवन में सदा, दीपावली त्योहार।।

दीवाली उनकी मने, सुखी रहे परिवार।
दीप बेचकर जो करे, सौरभ घर उजियार।।

मैंने उनको भेंट की, दीपावली और ईद।
जान देश पर कर गए, जो वीर जवान शहीद।।

फीके-फीके हो गए, त्योहारों के रंग।
दीप दिवाली के बुझे, होली भी बेरंग।।

नेह भरे मोती नहीं, खाली मन का सीप।
सूख गई हैं बातियाँ, जलता कैसे दीप।।

बाती रूठी दीप से, कैसे हो प्रकाश।
बैठा मन को बाँधकर, अँधियारे का पाश।।

- डॉ. सत्यवान सौरभ


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सबके पास उजाले हो

मानवता का संदेश फैलाते,
मस्जिद और शिवाले हो।
नीर प्रेम का भरा हो सब में,
ऐसे सब के प्याले हो।

होली जैसे रंग हो बिखरे,
दीपों की बारात सजी हो,
अंधियारे का नाम न हो,
सबके पास उजाले हो।

हो श्रद्धा और विश्वास सभी में,
नैतिक मूल्य पाले हो।
संस्कृति का करे सब पूजन,
संस्कारों के रखवाले हो।

चौराहें न लुटे अस्मत,
दु:शासन न फिर बढ़ पाए,
भूख, गरीबी, आतंक मिटे,
न देश में धंधे काले हो।

सच्चाई को मिले आजादी,
लगे झूठ पर ताले हो।
तन को कपड़ा, सिर को साया,
सबके पास निवाले हो।

दर्द किसी को छू न पाए,
न किसी आंख से आंसू आए,
झोंपड़ियों के आंगन में भी,
खुशियों की फैली डाले हो।

‘जिए और जीने दे’ सब
न चलते बरछी भाले हो।
हर दिल में हो भाईचारा
नाग न पलते काले हो।

नगमों-सा हो जाए जीवन,
फूलों से भर जाए आंगन,
सुख ही सुख मिले सभी को,
एक दूजे को संभाले हो।

- डॉ. प्रियंका सौरभ


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समय का जीवन

समय बड़ी जल्दी
उम्रदराज़ हो जाता है।

भोर में वह किसी नवजात
स्वप्न की तरह आँखें खोलता है
कोमल, कमसिन,ओस में
भीगी कच्ची कली-सा।

फिर धीरे-धीरे सूरज उसके कंधों पर
जिम्मेदारियों का आकाश रख देता है।
वह चलता है तपती धूप में भी,
बिना शिकायत,जैसे कोई जवान
अपने हिस्से का युद्ध
पूरी शक्ति से लड़ रहा हो।

दोपहर तक समय के चेहरे पर
अनुभव की रेखाएँ उतरने लगती हैं।
जो सुबह तक सपना था,
वह अब जीवन का यथार्थ है।

और फिर साँझ में समय एक गृहिणी-सा
दिन भर की थकान समेटकर
देहरी पर खड़ा मिलता है
पाँव थके हुए, कंधे बोझिल,
पर होंठों पर मुस्कान।

शायद जीवन की सबसे बड़ी विडंबना
यही है कि थक जाने के बाद भी
मनुष्य मुस्कुराना नहीं छोड़ता।

और रात होते ही वही समय
अचानक बूढ़ा हो जाता है।

खामोश...निःशब्द...जैसे कोई अधेड़
अपनी खाट पर लेटा दिन भर का हिसाब
बिना किसी से कहे मन ही मन करता हो।

एक ही दिन में समय हमें
जन्म से वृद्धावस्था तक ले जाता है।
तभी तो लगता है समय गुजरता नहीं,
हम गुजरते हैं।

घड़ी की सुइयाँ केवल अपनी
जगह बदलती हैं, पर उनके साथ
हमारी उम्र, हमारे स्वप्न,हमारे संबंध
और अंततः हम स्वयं
थोड़े-थोड़े कम होते जाते हैं।

समय की सबसे बड़ी सच्चाई शायद यही है
वह कभी बूढ़ा नहीं होता, बूढ़े तो हम होते हैं;
वह केवल हर दिन हमें हमारा एक दिन
कम करके हमारी पूरी उम्र का
अर्थ समझाता रहता है।

- सविता सिंह ‘मीरा’


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