साहित्य चक्र

20 July 2023

कविताः स्त्री-पुरुष संवाद


अंश 1: रूप



पुरुष: सौंदर्य मणि की मलिका से , चर्चा की कौतुकता है।
स्त्री: पौरुष का प्रवाह प्रबल ,भला कभी क्या रुकता है?

पुरुष: अपने रूप की अहम् व्याधि से हो सकती हो मुक्त?
स्त्री: क्यों हो? हम ईश्वर की विशेष भेंट को उपयुक्त।

पुरुष: पुरुष दृष्टि बिन रूप लालिमा इतनी सूर्ख नहीं।
स्त्री: रूप को गुण कह दे ,स्त्री इतनी मूर्ख नहीं।

पुरुष: फिर निखार की इतनी चेष्ठा,क्यों ये रूप श्रृंगार?
स्त्री: जड़ पुरुष बुद्धि के विरुद्ध खास यह हथियार।

पुरुष: क्या हो यदि रिक्त हो जाये इस हथियार का वार?
स्त्री: स्वयं से पूछ देखिये इसके कितने है आसार।

पुरुष: प्रशंसा कर मात्र शिष्टता वरण करते है।
स्त्री: हमारी इच्छाओं का आप अनुसरण करते है।

पुरुष: काम लोलुप दुष्टों का होता ये जलपान।
स्त्री: भले बुरे में अंतर की खूब हमें पहचान।

पुरुष: रूप आंच के घाव इतिहास को अब तक साल रहे।
स्त्री: रूप भोग की लिप्सा का अपराध रूप पर डाल रहे?

पुरुष: भोग के योग्य रूप, सदा रहा पुरुष का दास।
स्त्री: तुच्छता पर गर्वित हो,ऐसा पौरुष का उजास? 

पुरुष: क्षयी आश्रय ये,भान समय के भय से ग्रसित को हैं।
स्त्री: स्त्रोत से ज्यादा जल की चिंता अतितृषित को हैं।


                       - संदीप कुमरावत


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