साहित्य चक्र
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12 April 2026

युवाओं में सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव


लगातार सोशल मीडिया पर लगे रहने की आदत की तुलना तंबाकू की लत से की गई है। सोशल मीडिया की लत की समस्या का समाधान आसान नहीं है। केवल अदालत द्वारा प्रतिबंध लगाने से यह लत खत्म हो जाएगी, ऐसा मानना सही नहीं है। कैलिफोर्निया की अदालत ने मेटा और अल्फाबेट जैसी बड़ी तकनीकी कंपनियों से कहा है कि वे जानबूझकर ऐसे फीचर्स बनाती हैं, जो युवाओं को ऑनलाइन बने रहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इंस्टाग्राम, स्नैपचैट आदि को इस तरह डिजाइन किया गया है कि 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे (और यहां तक कि बड़े लोग भी) फोन नीचे रखने का मन नहीं करते।


फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप तीनों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मेटा के पास हैं, जबकि यूट्यूब और गूगल अल्फाबेट के पास हैं। मेटा और अल्फाबेट दोनों ही ऐसे फीचर्स डालते हैं, जो किशोरों को आकर्षित करते हैं और धीरे-धीरे उन्हें इसका आदी बना देते हैं। इसके परिणामस्वरूप वे अवसाद और निराशा का शिकार हो जाते हैं तथा किसी भी काम में एकाग्रता नहीं रख पाते।

सोशल मीडिया की लत की तुलना तंबाकू की लत से की गई है। मेटा और अल्फाबेट की कमाई अरबों डालर में होती है। 2025 में अल्फाबेट की शुद्ध आय 132 बिलियन डालर थी, जबकि मेटा की शुद्ध आय 60.46 बिलियन डालर थी। एक 20 वर्षीय युवती के बिगड़े मानसिक स्वास्थ्य के लिए मेटा और अल्फाबेट को जिम्मेदार ठहराते हुए कैलिफोर्निया की अदालत ने दोनों कंपनियों पर कुल 6 मिलियन डालर का जुर्माना लगाया। हालांकि सच्चाई यह है कि इतनी बड़ी कंपनियों पर 6 मिलियन डालर का जुर्माना कोई खास असर नहीं डालता।




अदालत ने कहा कि जुर्माने की राशि महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इन कंपनियों को कानून के दायरे में लाना जरूरी है। 16 वर्ष से कम उम्र के नागरिकों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाला आस्ट्रेलिया पहला देश बना है। वहां 16 साल से कम उम्र के बच्चे टिकटॉक, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, स्नैपचैट और थ्रेड्स का उपयोग नहीं कर सकते। वे नए अकाउंट नहीं बना सकते और उनके पुराने अकाउंट भी निष्क्रिय कर दिए गए हैं।

कुछ सोशल मीडिया कंपनियां अन्य नामों से सेवाएं शुरू करके युवाओं को आकर्षित करने की कोशिश करती हैं, लेकिन आस्ट्रेलिया इस पर कड़ी निगरानी रख रहा है। दुनिया के अन्य देश भी आस्ट्रेलिया के इस कदम के प्रभाव पर नजर रख रहे हैं, क्योंकि सभी देश अपने युवाओं को सुरक्षित रखना चाहते हैं।

आस्ट्रेलिया के इस प्रतिबंध का उद्देश्य युवाओं को सकारात्मक सोच और रचनात्मक कार्यों की ओर प्रेरित करना है। इससे वे स्क्रीन पर कम समय बिताएं और उनका मानसिक स्वास्थ्य बेहतर बना रहे। 2025 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार 10 से 15 वर्ष के 96 प्रतिशत बच्चे मोबाइल का उपयोग करते हैं और हानिकारक सामग्री देखते हैं। किशोरों में अत्यधिक जिज्ञासा होती है और वे जानना चाहते हैं कि उनके माता-पिता या बड़े मोबाइल पर क्या देखते रहते हैं।




आजकल तीन साल के बच्चे भी अपने दादा-दादी से बेहतर मोबाइल चला लेते हैं। कई बच्चे साइबर बुलिंग का शिकार भी होते हैं। छोटे बच्चों को मोबाइल की ओर आकर्षित करने में उनके परिवारजन ही जिम्मेदार होते हैं। बच्चों को शांत रखने के लिए उनके हाथ में मोबाइल दे दिया जाता है। इसलिए बचपन से ही बच्चों को मोबाइल से दूर रखकर उन्हें आउटडोर खेलों की ओर प्रेरित करना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले परिवार के लोगों को खुद मोबाइल का कम उपयोग करना चाहिए।

भारत में भी सोशल मीडिया की लत बड़े पैमाने पर देखी जा रही है। अक्टूबर, 2025 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में फेसबुक के 403 मिलियन, इंस्टाग्राम के 481 मिलियन और यूट्यूब के 500 मिलियन सक्रिय उपयोगकर्ता हैं। इसलिए आस्ट्रेलिया की तरह भारत में भी 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता है।


- अनिकेत सिंह



10 November 2025

अस्त्र-शस्त्र निर्माण के जनक 'लोहार'

भारत की संस्कृति में जाति व्यवस्था का गहरा असर दिखाई देता है। इसी जाति व्यवस्था में धातु से शस्त्र बनाने वाली जाति का नाम लोहार या लुहार जाति है। जमीन से धातु निकालना और धातु को आग की भट्टी में गरम कर पीट-पीट कर आकर देना लोहार जाति का हुनर है। इस जाति का इतिहास उतना ही पुराना है, जितनी पुरानी मानव सभ्यता और संस्कृति है। आदिमानव काल में मानव ने पत्थर के औजारों के बाद तांबे और लोहे के औजार बनाने शुरू किए। उस काल में लोहार जाति के गुण सभी जाति और धर्म के लोगों में रहे होंगे।




धीरे-धीरे सभ्यता के विकास के साथ-साथ यह गुण कुछ लोगों तक सीमित होता गया और उन लोगों को लोहार जाति का नाम दे दिया गया। इतना ही नहीं बल्कि हिंदू धर्म शास्त्रों में हर श्रमिक को शूद्र यानी अछूत कहा गया है। खैर छोड़िए! मैंने यह इसलिए बताया क्योंकि श्रमिक वर्ग को विश्व की लगभग हर संस्कृति और सभ्यता में नीच ही बताया गया है। श्रम करने वाला नीच कैसे हो सकता है यह सवाल मुझे हमेशा परेशान करता है।




लोहार जाति भारत सहित बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, म्यांमार और श्रीलंका आदि देशों में अलग-अलग नाम और समुदाय से पहचानी जाती है। वर्तमान में इस जाति का काम धीरे-धीरे आधुनिक मशीनों पर कंपनियों ने ले लिया है। भारत में आज लगभग सभी समुदाय और धर्म के लोग इस जाति का पेशा आधुनिक रूप से अपनाएं हुए हैं।

जिसमें आयरन वर्कर, स्ट्रक्चरल आयरन और स्टील वर्कर, मेटल फैब्रिकेटर, वेल्डर, मैकेनिकल इंजीनियर और मशीनिस्ट आदि शामिल हैं। आजादी के बाद भारत में लोहार जाति राज्य के अनुसार एससी-एसटी, ओबीसी वर्ग में आती है।




भारतीय संस्कृति और सभ्यता में लोहार जाति का उतना ही महत्वपूर्ण योगदान है, जितना अन्य सभी समुदायों और जातियों का रहा है। बल्कि इस समुदाय ने राजा-महाराजाओं को युद्ध जीतने और महल, मंदिर आदि निर्माण में जो योगदान और भूमिका निभाई है, शायद ही किसी अन्य वर्ग ने निभाई होगी। राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सहित कई अन्य राज्यों में यह समुदाय सड़क किनारे आज भी लोहे के औजार, बर्तन बनाते दिखाई देते हैं।


- दीपक कोहली



18 October 2025

मिट्टी के दीये प्राणवान होने से घर- घर लुटाते है आनंद ओर समृद्धि!



मिट्टी तो मिट्टी है, हमें इसी तात्विक ज्ञान का परिचय है लेकिन परमात्म विषयक चिंतन की मान्यता है कि मिट्टी के कण-कण में परमतत्व प्राण व्याप्त है। मिट्टी जो पृथ्वी तत्व है ओर पृथ्वी में स्थित सर्वन्त्यामी है। पृथ्वी अखिल विश्व की सृष्टि को धारण करती है अर्थात अपने वक्षस्थल पर धारती है इसलिए धरती मैया भी कहाती है ओर इसी धरती मैया की सत्ता चिरन्तन है। मिट्टी धरती की आत्मा है ओर आत्मा सुषुप्तावस्था में मिट्टी में रोपे जाने वाले बीजों के प्राणों में प्राण भरती है। मिट्टी मिट्टी भी है ओर चराचर की स्थिति इसी मिट्टी यानी धरती मैया की दया पर अवलम्बित है।






मिट्टी मृत भी है ओर मिट्टी प्राणों का प्राण राम भी है तभी पंचतत्व को अपने में समेटे इसी मिट्टी का मानव पंचतत्व की काया लिए अंत में इसी मिट्टी में मिल जाता है। प्राणकर्ता परमात्मा राम के लिए जो संभव है वह सभी प्राणियों –जीवात्माओं में प्राणों के प्राण लेने देने कि अपनी सृष्टि की उत्पत्ति, पालन ओर संहार का एक सर्वकालीन हिस्सा भी है वहीं पृथ्वी का अंश मिट्टी अपनी आत्मा को पेड़ पौधे ओर वनस्पति सहित मौसमकालीन फसलों में प्राणवान बनाए रखती है ओर बीजों को हजारगुणा लौटाकर एक जननी की भांति जगत का भरण पोषण करती है, यही मिट्टी सर्वलोक, सर्वभूत, सर्वात्मा को अन्न प्रदान कर अन्न को ब्रम्हा स्वरूप प्रतिष्ठित करती है ओर गृह नक्षत्र राशि आदि के लाभ हानि आदि दोषों सहित दिशाओं में जातक के आवास व अन्य कृषि कार्याधि हेतु शुभ अशुभता प्रदान करती है।

मानव जाति के जीवन का आधार अन्नादि धरती पर ही उत्पन्न होता है ओर धन संपत्ति का उपार्जन विशंभरा धरती पर ही सारा संसार प्राप्त कर रहा है, कहना होगा की संसार में सभी की गति ओर आकर्षण धरती पर निर्भर है इसलिए यह धरती जगत जननी है, पुज्या है।


पञ्चभूत में धरती भी एक तत्व है ओर उसकी मिट्टी में शेष चार तत्व जल, तेज, वायु और आकाश की धारणा की गई है जो सभी तत्व मनुष्य के चित्त में बंधे हुए हैं ओर ये पाँचों भूत, जो उसकी इन्द्रियों से बाहर दीख रहे हैं, सब-के-सब उसके मन के अंदर हैं। मनुष्य- शरीर में ये पांच तत्व है। इन पांच तत्वों से इस प्रकृति का निर्माण हुआ है ओर मनुष्य ही की भांति मिट्टी के इन दीपों में ये पांच तत्व की मौजूदगी की मान्यता है।

भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीला हो या माता पार्वती या गणेश के जन्म की कहानी. मिट्टी का हर युग में वर्णन मिलता है. धार्मिक अनुष्ठानों में दीप प्रज्वलन की प्रक्रिया तीनों लोकों और तीनों कालों का भी प्रतिनिधित्व करती है. इसमें मिट्टी का दीया पृथ्वी लोक व वर्तमान को दिखाता है जबकि उसमें जलने वाला तेल और घी भूतकाल व पाताल लोक का प्रतिनिधित्व करता है. वहीं इसमें रुई की बाती प्रज्जवलित को लौ आकाश, स्वर्ग लोक व भविष्य काल काल का सूचक है।





दुनिया के अन्य देश की तुलना में, भारत में सबसे अधिक कुम्हार रहते हैं. जो मिट्टी का बख़ूबी इस्तेमाल करते हैं. यहां तक कि हमारे आराध्य देवताओं की मूर्तियां भी मिट्टी की बनी हुई रहती है. मिट्टी को धरती मां कहा गया है, इसलिए बिना पकी हुई मिट्टी में बनाई गई छवियों को देवताओं को बनाने के लिए सबसे उपयुक्त माना है।

धरती विश्व का भरण पोषण करने वाली,धन को धारण करने वाली गृह रूपा, सुवर्ण की खान रूप वक्षस्थल वाली, समस्त संसार को आश्रय देने वाली, सबमें प्रविष्ट अग्नि को धारण करने वाली है तभी भगवान भी बाल रूप में इसी धरा की गोद में बैठते है। यह धरती मैया कभी लक्ष्मी स्वरूपा होती है, कभी पार्वती स्वरूप तो कभी ज्ञान की देवी सरस्वती के रूप में अज्ञान रूपी अंधकार को समाप्त करती है। विश्वस्वरूप धरती माँ रिद्धि-सिद्धि है, महिमा-गरिमा है इसका स्वरूप विराट है सम्पूर्ण संसार इस धरती की छाया के अंतर्गत आता है ओर प्रत्येक प्राणी इसी धरा की संतान है।

यह धरती अपने दो हाथों से कर्म करने वाली है, एक हाथ से सृष्टि में जीवन के रंग भरकर जीने की उमंग तरंगित कर जीवन देती है तो दूसरे हाथ में महाप्रलय को लिए अपनी ही सृष्टि में जीवन के रंग भरने वाले मनुष्यों को भूकंप,अतिवृष्टि, महामारी ओर विनाशकारी तूफानों के बवंडर की विनाशलीलाओं से सबक सिखाती है। आज दुनिया के कई देशों में चल रहे विनाशकारी युद्धों से नष्ट होने वाली प्रकृति ओर इंसान की मौत इसी का एक स्वरूप है । अथर्ववेद के बारहवें कांड का प्रथम सूक्त पृथ्वी सूक्त है जिसमे 63 मंत्र है जो पृथ्वी सूक्त, भूमि सूक्त ओर मातृ सूक्त भी कहे गए है जिसमे हमें पृथ्वी कि प्रकृति ओर पर्यावरण का विस्तृत विवेचित परिचय है जिसमे उल्लेखित है कि मिट्टी रूपी ब्रम्हविद ही परमतत्व है जो तम के अज्ञान से चंद्र, सूर्य, तारे आदि को अपने आलोक से ज्योतिर्मय करता है, जो सभी परमात्मा से व्याप्त है।

मिट्टी मिट्टी होकर भी अपनी मिट्टी के बने दीप में प्रज्वलित रोशनी के सहारे उपासना करने वाले को इस संदेश के साथ कि वह खुद अमावस्या के घने काले अंधेरे को विदा कर निशिथ के महामार्ग को प्रशस्त करने तत्पर है ताकि पृथ्वी कि आत्मा रूपी मिट्टी के दीये अपनी रश्मियों कि पावन जीवनदायिनी ऊष्मा से नहाते रहे। यही मिट्टी कि दीये जीवात्मा के ज्ञान ओर आनंद आदि गुणों को परमात्मा ज्योति में विकसित कर सभी कामनाओं को पूर्ण कर सुखद जीवन संदेश देते आ रहे है।





मिट्टी के दीप जिसे कौन नहीं जानता है , खुद मिट्टी को अपने अस्तित्व का पता होता है पर इंसान भूल जाता है कि आखिर में उसे भी तो मिट्टी हो जाना है। संत कबीरदास जी संसार कि असारता को समझते थे तभी उनके हृदय से मिट्टी कि पीड़ा बाहर आ सकी। मिट्टी की पहचान क्या है ? उसका अस्तित्व क्या है ? खुद कबीर बताते है कि माटी कहे कुंभार से तू क्यों रोंधे मोय, एक दिन ऐसा आएगा मैं रौंदूगी तोय। मिट्टी एक तरह से मृत्यु ही तो है, दोनों का सार भी है ओर संसार में दोनों की असारता भी है। सार देखे तो हम ओर आप मिट्टी में जन्मते है, मिट्टी में खेलकूदकर बड़े होते है, सारा जीवन मिट्टी से तादात्म्य में रहकर खिलते है, मुरझाते है ओर अंत में मिट्टी में मिल जाते है।

माटी नाना प्रकार के रूप धरती है, मनुष्य रूप में वह सुघड बन जाती है लेकिन मनुष्य अपने को मन से सुघड नही बना पाया जबकि वह जानता है कि इसी माटी में मिल जाना है। आज हम जिसे कंचन की काया कहते है वह कंचन नही है माटी ही है। इस माटी से बने दीप ने सदियों से मनुष्य के जीवन को प्रकाश दिया और अंधकार से लडऩा सिखाया। मिट्टी सदियों से हमारी मित्र है, हमारे शरीर को निरोगी ओर कंचनकाया बनाने के लिए मिट्टी परम ओषधी है पर हम मिट्टी से अपना नाता तोड़कर मिट्टी के इस दिव्य स्वरूप के लाभ से वंचित है। मिट्टी मौन रहकर सक्रिय है ओर जाने अंजाने जब मिट्टी हमारे शरीर को अपने आगोश में ले लेती है तब मिट्टी का सुख आभास होता है ओर व्यक्ति धरा की गोद में परम सुख पाता है।




सदियाँ बीत गई, कई युग बीत गए मिट्टी से हमारा नाता आज भी उतना ही है जितना पहले था। आज भी मिट्टी के बने दीप मौन रहकर सक्रिय है ओर पूरी मनुष्यता इस मिट्टी के दीप की ऋणी है । मनुष्य तो दीपक की कृतज्ञता से भरा है किन्तु दीपक को शायद पता न हो की मनुष्य के दिल में उसे लेकर क्या भावनाए है। मिट्टी के दीपक से मिटे अंधकार ओर मनुष्य के जीवन में आए प्रकाश से मिले सुख शांति आनंद, उल्लास ओर पवित्रता ने दीपक की परम सत्ता को स्वीकारा है।

जब धरा पर मनुष्यों के घरों में पहली बार मिट्टी के दीपक ने रोशनी बिखेरी तब यही मनुष्य प्रज्जल वित दीप के प्रकाश में देवत्व की आभा से अनुग्रहित हो उठा। फिर नन्हे-नन्हे दीप की यात्रा तब से अब तक दीपोत्सव पर शुभ प्रभा में हमें परम सत्ता का आभास देने लगी, मंदिरों में देवी देवताओं के श्रीविग्रह के समक्ष दीपदान का क्रम शुरू हुआ ओर तुलसी चौरे पर दीपक को प्रतिष्ठिïत करने की परंपरा को घर की माताएं बहने ओर बहुए आजीवन काल तक सुहागन स्वर्णिम आभा से मंडित होकर अखंड सौभाग्य का विश्वास प्राप्त कर दीपदान करते आ रही है।

मां शारदा के समक्ष इसके प्रज्जवलन के साथ ही उसकी अलौकिक वीणा के तार झंकृत हो उठते है हर अवसर को मांगलिकता प्रदान करने वाला दीप जीवन को भी आलोकमय बना देता है यह जगमगाहट कहां से आई इसे दीप अपने मुख से नही कहता क्योकि परमानंद को प्रदान करने वाला दीप तो अपने जन्म काल से ही अहंकार रहित है अहंकार तो मनुज रखता है मिट्टी नही इसलिए दीप का जलाना आवश्यक है हमे उसकी ज्योति आवश्यक है, परंतु मनुष्य की ही तरह दीपक को भी अपनी यात्रा संघर्षो के बीच ही तो पूरी करनी होती है वैसे दीप की यात्रा अनंत है मनुष्य की नही, दीप गहन अंधकारमयी निशा को भी आलोकित करती है और भेार को भी। आपको यह प्रश्न अटपटा लगेगा कि भोर को कैसे आलोकित करती है ?






भोर होते ही अंधकार तो विदा हो जाता है लेकिन देव मंदिरों में देवी देवताओं ओर भगवान के श्री विग्रह के समक्ष दीपक जलता है ओर उनका आशीर्वाद लेता दीप मनुष्य की तरह मंदिर से चला नहीं जाता वह आरती आराधना अर्चना को निरंतर जीता रहता है उसकी आयु इसीलिए दीर्घ होती है। अंधकार दीपों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है वह तीव्र वायु का वेग भी सहता है और फिर भी प्रकाश फैलाता है उसे मालूम है कि मनुष्य को उसके पथ से विचलित नही होने देता है। वायु अंधकार प्रलय सब उसके लिए चुनौतियां बनकर आते है परंतु माटी के दीप उनका साहस से सामना करते है।

अंधकार जीवन के मार्ग में बार-बार बाधा बनकर आता है। वह तन-मन-वचन और हमारे कर्म तक में समाविष्ट हो जाता है वह आकाश से धरती से आच्छादित कर देता है जब वह मौन जड़ता से सक्रिय हो उठता है तो हिंसा,उत्पाद,अन्याय,उत्पीडऩ, अनैतिकता और प्रलय को जन्म देता है वह रूदन ओर अश्रुओं से अप्रभावित रहता है क्योंकि वह हृदयीन ओर विवेक हीन है कभी कभी उसकी रंगत माटी में भी तो दिखाई दे जाती है। यह तो मिट्टी की बलिहारी है उसके रंग को सदियों से सहती आई है।

अंधकार का प्रकोप बढ़ते-बढ़ते अमावस में बदल गया तो माटी ने इस चुनौती को स्वीकार किया और वह दीपक बन गई इस विराट अंधेरे कें सामने एक नन्हा सा दीपक इस दीपक ने अपार अंधकार को पी जाने का इस पर विजय पाने ओर इसका विनाश करने का संकल्प कर लिया है, इसलिए वह अपनी पराजय स्वीकार नहीं कर लड़ता है ताकि वह अपने संकल्प की आंच में इतना तपा कि पक्का हो गया उसमें अंधकार से लडऩे की अपार शक्ति जाग गई ओर सदियों से यह दीपक संस्कृति की सुरभि प्रकाश के रूप में बिखेर रहा है उसने धरती का स्नेह संजोना प्रारंभ कर दिया है वह उस स्नेह में आप्लावित हो उठा उसमें नये प्राण संचारित हुए बाती उसमें इस प्रकार तैरने लगी जैसे जीवन लहरों की तरह तैर रहा हों दीप की यह उत्कर्श मय यात्रा कर रहा हो, इस माटी के दीप के निर्माण के पहले माटी ने यही कोमल और सदाशयता जी होगी कि उससे निर्मित हेनेवाली दीप इस धरती का अंधकार पीयेगा ओर वही हुआ भी कि आज गहरा अंधकार जाने कहां छिप गया ?

माटी के नन्हे-नन्हे दीप बडे ही जिद्दी है ये युग-युग से गहरे अंधेरे का पीछा कर रहे है ये घोर तमिश्रा में भी नही डरते इन दीपों ने विश्व की बड़ी-बड़ी प्रतिभाओं को भी प्रकाश किया ओर उसने हमें ज्ञान की अतुल राशि का जन्म ही इन दीपों के कारण हुआ।

मिट्टी के ये दीये सही मायने में सूरज के वंशज है इसलिए इनकी यात्रा अकेले ही होती आई है। इन दीपों के रूप, रस, गंध,स्पर्श ओर निसशब्द मौन की विचित्रता का वर्णन नही किया जा सकता है जब भी इन्हे ये चर्म चक्षु निहारते है तो उन नेत्रों में बनने वाली झांकी से उमड़ने वाला प्रेम भावना से भर देता है। जिनके मन में क्रोध, ईर्ष्या की ज्वालाये धधक रही हो वे भी इन दीपों की रोशनी से नहाकर शान का अनुभव कर आशा के प्रभात को पा जाते है ओर उनके मन में निराशा की काली रात विदा हो जाती है।

वहाँ कोमल कान्त भावनाएँ, मृदु-सुन्नीव कल्पनाएँ, उदात्त विचार और मधुर स्मृतियाँ शेष रह जाती है अर्थात सही मायने में इस प्रवृति के बदलाव के बाद उनके चेतन अनुभव के भी मूल में अनन्त, अचेतन शक्तियाँ क्रियाशील हो जाती है ओर उनके जीवन में आया यह दीपोत्सव उन्हे प्रकाशित कर देता हैं। सच कहा जाये तो मिट्टी के ये दीये जीवन में गंभीरतम, क्रान्तिकारी अनुभव, प्रदान करने के साथ नवीन युगों में प्रवेश करता है जहा नवीन सौन्दर्य की सृष्टि और सत्य का उद्घाटन होता है।






मिट्टी के ये दीप अपनी मूल प्रकृति में इतने समृद्घ है कि किसी राष्ट्र से, किसी राज्य से या किसी उच्च राजनयिक अथवा राजपथ से याचना नही करते ओर न ही उनमें भेद करते है, मिट्टी का दीप कोई उच्च पदासीन के हाथ हो या निर्धन से निर्धन के हाथ मे हो, प्रज्ल्वित दीप राजपथ पर भी उसी प्रकार जगमग रोशनी फैलाएगे जिस तरह किसी झोपड़ी या पगडंडी पर उन्हे रखा जाये। ये मिट्टी के दीप न किसी से भेदभाव करते है ओर न किसी से मोह पालते है बस इनकी अपराजित मुस्कान कभी हार नही मानती संभवामि युगे-युगे का नाद इनकी हर किरण से झरता है।

ये मिट्टी कि दीप अपनी सारी गरिमा, शक्ति लिए प्रज्जवल के इतिहास में समाहित है सच कहा जाये तो ये दीप जीवन है, जीवन का सार है, क्योकि ये मिट्टी के दीये है। मिट्टी के होकर भी ये दीये अपनी उच्चतम ओर शील को समुद्र की भांति गांभीर्य रहते है, इनमें करुणा के स्त्रोत फूटते है, इनमें शांति ओर क्रांति दोनों पलते है, ये चिरकाल से आज तक सृष्टि में परिवर्तन के बीजारोपण उपरांत अपनी रोशनी बिखेरकर घर घर आनंद ओर समृद्धि लूटा रहे है। इन मिट्टी के दीये ने एक संस्कृति के पश्चात दूसरी नवीन संस्कृति के जन्म के साक्षी रहकर भी अंधकार मिटाने के अपने स्वभाव को नहीं त्यागा है ओर आज भी दीपोत्सव का इंतजार करते ये दीप जगत को आलोकित करने की प्रतीक्षा में होते है।


- आत्माराम यादव



बदलते समय की रौशनी और यादों की महक है दिवाली


दीपावली, यह नाम लेते ही मन में एक अनोखी उजास भर जाती है। बचपन की यादों में आज भी वह दीपावली बसी है, जब पूरा घर हफ्तों पहले से सजने लगता था। माँ की आवाज़ गूंजती थी- “साफ़-सफ़ाई अच्छे से करना, लक्ष्मीजी को स्वच्छ घर पसंद है।” हम सब मिलकर अलमारी से लेकर आँगन तक चमका देते थे। मिट्टी के दीयों में तेल डालकर जलाने की तैयारी होती थी, और उनकी लौ में एक अपनापन झिलमिलाता था।





उन दिनों दीपावली केवल एक त्यौहार नहीं थी, घर-घर में रिश्तों की गर्माहट का उत्सव थी। पड़ोसी के यहाँ बनी मिठाइयाँ अपने घर आतीं, और हमारी मिठाइयाँ उनके घर जातीं। न कोई औपचारिकता थी, न दिखावा- बस एक स्नेहिल भाव था जो हर चेहरे पर मुस्कान बनकर चमकता था।

आज दीपावली कहीं अधिक आधुनिक हो गई है। रंग-बिरंगी लड़ियों ने दीयों की जगह ले ली है, ऑनलाइन गिफ़्ट्स ने हाथों से दिए जाने वाले तोहफ़ों का स्थान ले लिया है। मगर इन सबके बीच भी, जब पहली दीपावली की रात को हम दीप जलाते हैं- तो भीतर कहीं बचपन की वही मासूम खुशी फिर से जाग उठती है।

अब हम व्यस्त जीवन में भी कोशिश करते हैं कि अपने बच्चों को वही दीपावली दिखाएँ- जिसमें दीयों की लौ में संस्कार हों, मिठाइयों में अपनापन हो, और रोशनी में भावनाओं की गरमाहट हो।

हर साल जब घर की चौखट पर पहला दीप जलता है, तो लगता है जैसे बीते सालों की सारी यादें फिर से मुस्कुरा उठी हों। माँ की आवाज़, पापा की हँसी, दोस्तों की शरारतें, और आँगन में जलते सैकड़ों दीपक सब एक साथ लौट आते हैं।

दीपावली आज भी वही है। बस नज़र बदल गई है। रोशनी अब भी जलती है, फर्क इतना है कि पहले दिलों में दीप जलते थे, अब बिजली की लाइटों में। पर सच्ची दीपावली तो तभी होती है जब हमारे भीतर का अंधकार मिटे जब हम किसी के चेहरे पर मुस्कान जला सकें।

तो आइए, इस दीपावली पर एक दीप अपने मन के अंधकार के लिए जलाएँ,
एक दीप अपने पुरखों की स्मृतियों के नाम, और एक दीप उस भविष्य के लिए- जो उम्मीद की उजास से भरा हो।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'



हास्य व्यंग्य लेख- खिचड़ी

यदि हम कहे कि हमारी जिन्दगी खिचड़ी सी होकर झंडू वाम हो गई तो अतिशयोक्ति न होगी। आप कहेंगे कैसे ? तो आईए मैं अपनी ही जिन्दगी से कुछ उदाहरण पेश कर रही हूँ किसी का हो या न हो पर मेरी तो जिन्दगी खिचड़ी हो गई। मातृ भाषा बंगाली, जन्म विहार मे, पढ़ाई उत्तर प्रदेश मे सब मिलकर ज़िन्दगी कैसी होगी ?

जिन्दगी भई खिचड़ी ही तो होगी, बंगाल की चावल, उत्तर प्रदेश की दाल मिलाकर जीवन को परम पिता ने खिचड़ी बना दिया उसमे तड़का भाषाओ का, रहन सहन का रिवाजों का क्या लग गया जिन्दगी झंडू बाम हो गयी। ऐसा क्यों नही होता है कि सम्पूर्ण भारत की सभ्यता, रहन सहन, भाषा सब एक हो ताकि हम जैसे रोजी रोजगार मे तलाशते हुए जीवन को हर जगह सरलता का भान हो।





एक चीज तो इस तड़के मे डालना भूल ही गए वह है अँग्रेज़ी भाषा ।हिन्दू राज्य मे अँग्रेज़ी भाषा इस कदर घुस पैठ कर रही है कि गॉव के भोले भाले लड़के जो इस उमींद से आते हैं कि कुछ करेंगे उन्हें असफलताओं का सामना बार बार करना पड़ता है और उनकी ज़िन्दगी खिचड़ी बनकर रह जाती है। लेखन के क्षेत्र मे भी यही बात दृष्टिगोचर होती है।

अपनी खिचड़ी होती ज़िन्दगी मे भी यही हो रहा है मातृ भाषा बंगाली, और अराध्य देवी ने कलम पकड़ा दी हिन्दी भाषा की, बर्चस्व अँग्रेज़ीं भाषा की। जाए तो कहॉ जाए। ज़िन्दगी खिचड़ी हो गई, खिचड़ी खाना सबको पंसद नही अतः पुरस्कार देने वालों को क्यों यह खिचड़ी पंसद आएगी वह लोग तो यही चाहेंगे कि हिन्दी मे जो भी लेख लिखो विशुद्ध हिन्दी मे ही हो विना व्याकरण के भूल के या विना वर्तनी के भूल के ऐसी परिस्थिति मे हमारी लेखनी हर ओर से हारे हुए बाजी की तरह मुहँ चुराए गुजरती रहती है। ऐ दुनिया के मालिक बता तुझे मेरी ज़िन्दगी को जब हराना ही था तो मेरे हाथ मे लेखनी क्यों पकड़ाया, और पकड़ाया भी तो मेरा जन्म, एंव मातृभाषा को हिन्दी का जामा क्यो नही पहनाया ?

या तो कलकत्ता की भाषा बंगला को ही हमारे हाथ की लेखनी मे थमा देता ।न घर के न घाट के रहे हम लोग, जी जान दे दें, पर कहलायेंगे प्रवासी ही। चाहे भले ही हम उत्तर प्रदेश मे जन्म से निवास कर रहे हैं पर कहलाते हैं अभी भी हम प्रवासी , हमारी ज़िन्दगी की रस्सी न तोड़ते बनता है न बॉधते बनता है। मातृभाषा बंगाली होने की वजह से बंगाली महानुभावों की तरफ से दबाव आता है बंगला लिखे और यहॉ के लोगों के मन मे यह भाव आ जाता है कि हम दूसरे भाषा भाषी को क्यों सम्मानित करे क्या हमारे हिन्दी भाषी मर गए हैं उनको हमारी इस भावना से कोई लेना देना नही कि हम बंगाली भाषी होते हुए भी अपनी जगह बनाने के लिए कितना संघर्ष किए हैं।

धर्म की अवधारणा मे भी खिचड़ी का वर्चस्व दिखाई पड़ता है, अलग अलग विचारों से बना पंथ खिचड़ी ही तो बन गया है उसमे राजनीति का शुद्ध देशी घी का ऐसा तड़का लगता है कि वह प्रसाद सा स्वाद देने लगता है। हम भी तो खिचड़ी खाने के आदी हो गए हैं। आपस के प्यार एंव मेलजोल ने हमारे भी पूजा पाठ रहन सहन सबको बदल कर खिचड़ी के रूप मे परोस दिया है और यह अच्छा भी है, आपस की कटुता यदि इसी माध्यम दूर हो तो अच्छा है।

न जाने वह दिन कब आएगा जब हम मानवता एंव प्रेम की मिक्स खिचड़ी बनाकर हर जगह पड़ोसेंगे। अब आप ही बताए ज़िन्दगी हमारी खिचड़ी बन गई और वह भी विना गली हुई। कहे तो किससे कहे। पिछले वर्ष माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने मातृभाषा सीखने की प्रेरणा दी पर जब तक उसे राजनीति का जामा नही पहनाया जाएगा तब तक यह कारगर नही होगा।

मातृभाषा को सम्मान देने के लिए हर स्कूल में कक्षा आठ तक मातृभाषा पढ़ा जाना अनिवार्य करना चाहिए तभी यहां सभी भाषाओं का वर्चस्व होगा एवं यही भाषा हमे एक दूजे के संग जोड़ेगी भी। भारत तभी भावनात्मक रूप से एक होगा। बच्चे एक दूसरे के भाषाओं को जाने,रहन सहन को जाने इसके लिए यह जरूरी है कि हर वर्ष गर्मी की छुट्टियों मे स्कूलों की तरफ से ही एक भाषा कैम्प का आयोजन किया जाए जिसमें भारत की हर भाषा का अध्ययन कराया जाए जो अनिवार्य हो।

हम रचनाकारों का कर्तव्य है अपने विचारों को सरकार तक पहुचाना, मानना न मानना सरकार की अपनी मर्जी है,भारत की संस्कृति की जो धारणा है अनेकता में एकता यह धारणा इसी कार्य से ही सफलीभूत हो सकती है। इस कार्य के फलीभूत होने पर हम अंग्रेज़ी भाषा को जो हमारी विदेशी भाषा है, और जो जामवंत की तरह अपना पैर जमाकर बैठी हुई है उसको कुछ हद तक अपने भारतीय होने का गौरव दिखा सकते हैं। मेरा अन्तर मन तक इस पीड़ा से घायल होता है कि हम एक होकर भी भाषा, जाति, रहन-सहन से अलगाव बाद की तरफ बढ़े जा रहे हैं। काश हमारी आने वाली पीढ़ी इस दंश को न झेले।


- रत्ना बापुली


09 October 2025

डाक दिवस और चिट्ठियों का वो खोया हुआ संसार


आज के डिजिटल युग में संवाद की परिभाषा बदल चुकी है। एक क्षण में संदेश दुनिया के किसी भी कोने तक पहुँच सकता है, परंतु इस तीव्रता के साथ भावनाओं की गहराई कहीं पीछे छूट गई है। विश्व डाक दिवस हमें उस दौर की याद दिलाता है जब चिट्ठी का आना केवल सूचना नहीं, बल्कि आत्मीय अनुभव हुआ करता था। लिफ़ाफ़े, पोस्ट कार्ड और अंतर्देशी में लिखा हर शब्द रिश्तों की ताप और प्रतीक्षा की मिठास से भरपूर होता था। डाकिए की सायकल की घंटी सुनते ही मन में उत्सुकता और धड़कन तेज़ हो जाती थी।





उस पत्र के अक्षरों में माँ की ममता, पिता की चिंता, प्रिय दोस्त की यादें या प्रियतमा का प्रेम सजीव हो उठता था। चिट्ठी लिखना एक कला थी, जिसमें भावनाओं को शब्द देने से पहले दिल की गहराइयों में उतरना पड़ता था। लोग पोस्ट बॉक्स तक जाते हुए भी एक अनोखा आनंद महसूस करते थे, और पत्र के उत्तर का इंतज़ार करते हुए दिनों और हफ़्तों में जीते थे। यह प्रतीक्षा ही चिट्ठियों की सबसे सुंदर विशेषता थी, क्योंकि हर उत्तर में भावनाओं का निवेश हुआ करता था। आज संवाद तेज़, आसान और सतही हो गया है। मोबाइल स्क्रीन पर टाइप किए गए संदेश तुरंत भेजे जाते हैं, पर महसूस नहीं किए जाते।

इमोजियों और त्वरित प्रतिक्रियाओं ने शब्दों का वह स्पर्श छीन लिया है, जिसमें आत्मीयता बसी होती थी। डाक दिवस हमें चेताता है कि संवाद का मूल्य केवल उसके समय और गति में नहीं, बल्कि उसकी आत्मा में है। वह आत्मा अब भी कागज़, कलम और स्याही की तिकोनी संगति में सबसे अधिक जीवित है। पुरानी चिट्ठियाँ चाहे पीली पड़ गई हों, उनकी स्याही चाहे धूमिल हो गई हो, मगर उनमें जिन भावनाओं की छाप है, वह समय के किसी भी प्रवाह से मिट नहीं सकती।

यही वह धरोहर है जिसे हमने सुविधा की दौड़ में खो दिया है। इस दिन का असली संदेश है कि हमें फिर से रिश्तों को शब्द देने की परंपरा को जीवित करना होगा। किसी प्रियजन को अपने हाथों से कुछ पंक्तियाँ लिखना, यादों और संबंधों को पुनर्जीवित करने का सबसे सरल और सशक्त माध्यम है। चिट्ठियाँ केवल पत्र नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों को एक गहरी और स्थायी अभिव्यक्ति देती हैं।

स्क्रीन और संदेशों की त्वरित दुनिया में भी यह ज़रूरी है कि हम समय निकालकर धीमे, सच्चे और गहरे संवाद को चुनें। डाक दिवस हमें स्मरण कराता है कि भावनाओं का आदान-प्रदान हर युग में संभव है, बस हमें उन्हें सहेजने और लिखने का मन होना चाहिए। चिट्ठियों का दिया गया स्नेह कभी समाप्त नहीं होता, क्योंकि वह दिल से लिखा जाता है और दिल में ही सुरक्षित रहता है।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह


25 September 2025

आयुर्वेदः ऋृषि-मुनियों के गहन अध्ययन और भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर

आयुर्वेद का महत्त्व इस बात में है कि यह केवल रोग के उपचार की पद्धति नहीं बल्कि स्वस्थ जीवन जीने की संपूर्ण कला है। इसमें शरीर, मन और आत्मा को संतुलित रखते हुए दीर्घायु और सुखमय जीवन पाने के उपाय बताए गए हैं। यह हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है जिसे ऋषि-मुनियों ने गहन अध्ययन और अनुभवों के आधार पर विकसित किया था।





आयुर्वेद आहार, विहार और व्यवहार पर विशेष ध्यान देता है और बताता है कि समयानुसार खानपान और दिनचर्या ही अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी है। इसमें रोगों की जड़ तक पहुंचने और शरीर को पुनः स्वस्थ व संतुलित बनाने की क्षमता है। आधुनिक युग में जब रासायनिक औषधियों के दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं, तब विश्व भी आयुर्वेद की ओर आकृष्ट हो रहा है।







यह केवल भारत की नहीं बल्कि पूरी मानवता की धरोहर बन चुका है क्योंकि यह प्राकृतिक संसाधनों से रोग-निवारण और स्वास्थ्य संवर्धन का मार्ग प्रशस्त करता है। आयुर्वेद हमें यह भी सिखाता है कि रोकथाम उपचार से अधिक महत्वपूर्ण है और यदि जीवनशैली सही हो तो रोग पास तक नहीं आता। इस प्रकार आयुर्वेद का महत्त्व अमूल्य है और इसे अपनाना हमारे वर्तमान तथा भविष्य दोनों के लिए आवश्यक है।


डॉ. आरज़ू अहमद शाह



05 September 2025

खामोशी की आवाज़, जुदाई और दर्द की स्याही


खामोशी वह आईना है जिसमें दिल के टूटे हुए टुकड़े साफ़ नज़र आते हैं। जब कोई अपना हमेशा के लिए जुदा हो जाए, तो ज़िंदगी का हर रंग फीका पड़ जाता है और चारों ओर सन्नाटा बस जाता है। यह खामोशी शब्दों की कमी नहीं होती, बल्कि यह उन जज़्बातों की स्याही है जिन्हें बयां करने की हिम्मत हमारे पास नहीं होती है।





इंसान बोलना चाहता है, पुकारना चाहता है, पर होंठ जमे रहते हैं और आवाज़ दिल की दरारों में कैद हो जाती है। जुदाई का दर्द सिर्फ आँखों से गिरते आँसुओं का नाम नहीं, यह वह सूनापन है जो हर सांस के साथ भीतर उतरता चला जाता है। पहले जिन लम्हों में मोहब्बत की गूंज थी, वहाँ अब वीरानी का डेरा है।

खामोशी अक्सर हमें लिखने पर मजबूर करती है। यह बिखरे हुए अल्फ़ाज़ में वही तड़प ढूंढ लेती है जो दिल चीखकर कहना चाहता है। शायरी और कविता इस दर्द की वह भाषा बन जाते हैं जिसे दुनिया समझ सकती है। टूटा हुआ दिल जब काग़ज़ पर उतरता है, तो उसकी धड़कनें भी शब्दों में सुनाई देने लगती हैं।

जुदाई और खामोशी एक-दूसरे का सहारा हैं। जुदाई दिल को तोड़ती है और खामोशी उस खालीपन को अपने भीतर समेट लेती है। यही दोनों मिलकर हमें यह सिखाते हैं कि ज़िंदगी सिर्फ खुशियों का नाम नहीं, बल्कि दर्द और उम्मीद के संगम से बनती है।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह



12 August 2025

शब्दों की तितलियों संग उड़ते बचपन की अनुभूति- गीत गाते अक्षर





"गीत गाते अक्षर" मनोज कुमार शिव द्वारा रचित एक ऐसी महकती पुष्प वाटिका है, जहां हर शब्द एक खिलता हुआ फूल है और कविता एक खिलती हुई कली। कवि ने इस संग्रह में नन्हे बालमन के लिए एक ऐसा काव्य लोक रचा है, जो ज्ञान, भाव और मनोरंजन का संगम है और बाल हृदय की नाजुक भावना, जिज्ञासा और कल्पना शक्ति को सजीव रूप में प्रस्तुत करता है।

इस संग्रह की सबसे खास बात यह है कि इसमें कुल 66 कविताएं हैं जो जीवन के विविध पक्षों को बड़ी सहजता से समेटे हुए हैं- जैसी प्रकृति ,विज्ञान, स्वास्थ्य, देश प्रेम ,पर्यावरण, नैतिक मूल्य, मौसम, संस्कार और रिश्ते। हर कविता का एक नया अनुभव है--कहीं पेड़ की छांव में प्रकृति प्रेम की झलक, कहीं कंप्यूटर अंकल से टेक्नोलॉजी का परिचय मिलता है कहीं बारिश की फुहारों से बच्चों की किलकारियां सुनाई देती हैं तो कहीं "बापूजी" जैसी कविता से आदर्श का पाठ।

बाल काव्य संग्रह की पहली कविता "चारपाई" एक सरल लेकिन भावनात्मक रूप से समृद्ध कविता है, जो पारंपरिक भारतीय जीवन शैली में चारपाई के महत्व को उजागर करती है। चारपाई को केवल एक वस्तु ही नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर की तरह प्रस्तुत किया गया है-


"चारों पैर इसके एक साथ हैं भार उठाते
एकता में बल है, मानो हमें सिखलाते "

"चारपाई है बढ़ाती घर आंगन की शान
हमारी संस्कृति, सभ्यता की यह पहचान "

" कंप्यूटर अंकल" कविता आधुनिक तकनीक और कंप्यूटर की बुद्धिमत्ता पर केंद्रित है। कवि ने कंप्यूटर को असाधारण स्मरण शक्ति, गणना और मार्गदर्शक बताया है। प्रश्नात्मक शैली का प्रयोग बच्चों को सोचने पर मजबूर करता है। निश्चय ही जो प्रश्न बच्चों के मन में उठते हैं इन्होंने बड़ी सजीवता से दर्शाये हैं-

"हर बात तुम्हें याद है कैसे रहती? 
हर पहली तुमने चुटकी में सुलझाई। 
आखिर कौन है तुम्हें सिखाने वाला?
किसके पास तुमने ट्यूशन लगवाई?"


"घर का खाना" कविता बच्चों को स्वास्थ्य वर्धक भोजन की ओर प्रेरित करती है और साथ ही हमारी पारंपरिक खान-पान संस्कृति को भी आदर पूर्वक 
सामने रखती है-

"दालें और अनाज प्रोटीन से भरपूर
हरी पत्तेदार सब्जियां खाओ जरूर 
दूध उत्पाद कैल्शियम के लिए मशहूर
मदिरा, तंबाकू से रहना हमेशा दूर" 

"यातायात के नियम" कविता बच्चों के लिए अत्यंत उपयोगी रोचक और ज्ञानवर्धक रचना है। यह कविता सिखाती है कि सड़क पर अनुशासन और सतर्कता से हम अपने और दूसरों  के जीवन को सुरक्षित रख सकते हैं। यह बाल कविता न केवल स्कूली पाठ्यक्रम में बल्कि जीवन की पाठशाला में भी अत्यंत उपयोगी है-

"लाल बत्ती दिखे तो वहीं रुक जाओ 
बिल्कुल भी ना कोई जल्दबाजी दिखाओ 
पीली बत्ती कहती कि करो थोड़ा इंतज़ार 
चलने के लिए ख़ुद को कर लो तैयार 
हरी बत्ती जले तो समझो चलना है 
आवारा जानवरों से हमेशा संभलना है"

"त्योहार "कविता भारत की सांस्कृतिक विविधता और त्योहारों की समृद्ध परंपरा का सुंदर चित्रण है। इसमें कवि ने भारतवर्ष में मनाए जाने वाले विभिन्न त्योहारों के सामाजिक, भावनात्मक और सांस्कृतिक पक्षों को सहज भाषा में प्रस्तुत किया है-

"गेहूं की फसल पकने पर 
बैसाखी पर बजते ढोल नगाड़े 
असम में होती बिहू की धूम 
दक्षिण भारत में पोंगल के नज़ारे"


"राज्य और उनकी राजधानियां" कविता में भारत के विभिन्न राज्यों और उनकी राजधानियां को याद रखने का एक सरल , लयबद्ध और बाल उपयोगी माध्यम है। इसमें बच्चों को भूगोल की जानकारी रोचक और कविता के रूप में दी गई है जिससे उन्हें पढ़ना और याद रखना दोनों ही आसान हो जाता है-

"राजस्थान का गम इलाका है चूरू
कर्नाटक की राजधानी है बेंगलुरु 

"वंदन करो जो भी गुरुजन तुम्हें मिला 
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला"


"मुहावरों का संसार" यह कविता बच्चों को मुहावरों की दुनिया से परिचित कराने का एक सुंदर, रचनात्मक और शिक्षाप्रद प्रयास है। इसमें हिंदी भाषा के लोकप्रिय मुहावरों को सरल उदाहरण के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है, जिससे बाल पाठक न केवल उन्हें समझ सके बल्कि उनका व्यावहारिक अर्थ भी जान सकें।

"जब कोई इंसान लगता है बड़ा प्यारा 
तब उसको हैं कहते आंखों का तारा"

"अक्सर हैं कहते, एक और एक ग्यारह
यानी काम में एक दूजे का बने सहारा"

"अखबार" कविता रोज़मर्रा की एक सामान्य परंतु रोचक आदत-अखबार पढ़ने को सरल, संजीव और हल्की-फुल्की अंदाज में प्रस्तुत करती है जिसमें परिवार के सभी सदस्यों की रुचि के अनुसार समाचार पत्र के महत्व को सहजता से प्रस्तुत किया गया है। यह कविता बच्चों को पढ़ने की आदत, परिवार के साथ साझा समय और सूचनात्मक सामग्री से जुड़ने की प्रेरणा भी देती है। 


"दादा को राहत उनका इंतजार 
कि कब जैसे वो लाए अखबार।
दादी मां को धार्मिक पेज है भाता 
पापा को राजनीति वाला पृष्ठ सुहाता।"


"स्वास्थ्य और योगक्षेम" कविता बच्चों को स्वस्थ जीवन शैली, योग और प्राकृतिक जीवन मूल्यों की प्रेरणा देती है। प्रेरणात्मक कविता के रूप में यह बच्चों को सुबह जल्दी उठने, सूर्य नमस्कार करने, प्राणायाम व योग के महत्व को समझने का सरल और लयबद्ध प्रयास करती है।

" प्रकृति और हम" कविता में प्रकृति के विविध रूपों--जैसे बादल, झरने ,नदियां ,जंगल, फूल पत्तियों और जानवरों का वर्णन करते हुए बताया गया है कि प्रकृति ने मानव को जीवन जीने के लिए कितना कुछ दिया है। साथ ही कविता हमें चेतावनी भी देती है कि यदि हमने प्रकृति को नुकसान पहुंचा तो हमारा अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा।

"प्रकृति ने दिया है मानव को जीवन, 
नदियां,पहाड़, जीव जंतु और वन"

"प्रकृति को हम अगर पहुंच जाएंगे नुकसान, 
धरती पर जीवन तब नहीं होगा आसान"

" गन्ने का बलिदान" कविता एक छोटी किंतु गहन रूपकात्मक कविता है जो बच्चों के मन में त्याग, सेवा और आत्मन्यौछावर जैसे मूल्यों को ग्रहण करने का संदेश देती है।

"दादा बोले, गन्ने ने दिया है अपना बलिदान,
औरों के लिए खुद को किया है कुर्बान, 
जब अपना अहम इसने मिटाया है, 
तभी तो मिठास इतना घोल पाया है।"

बाल काव्य संग्रह की अंतिम कविता " मित्रता" बाल पाठकों के लिए लिखी गई एक प्रेरणात्मक रचना है जो श्री कृष्ण और सुदामा की प्रसिद्ध मित्रता को आधार बनाकर सच्ची दोस्ती के मूल्यों को उजागर करती है। यह कविता बाल साहित्य में मित्रता की सर्वोत्तम मिसाल में से एक है। इसमें न केवल भावनात्मक जुड़ाव है, बल्कि नैतिक शिक्षा और आदर्श प्रस्तुत करने की शक्ति भी है।


"सुदामा पर थी जब गरीबी छाई  भारी,
मुश्किल समय में काम आती है यारी, 
कृष्ण ने देखा मित्र सुदामा है लाचार,
घर, गहने ,वस्त्र और दिए ढेरों उपहार।


बाल काव्य संग्रह का आवरण बाल सुलभ चित्रों से सजा हुआ है जो पढ़ने के लिए आकर्षण उत्पन्न करता है। अक्षरों को गाते हुए दर्शाना एक रचनात्मक सोच का परिचायक है। भाषा सरल, सहज और बाल  रूचि के अनुसार है। कविताओं में छंद मुक्त और तुकांत दोनों शैलियों की झलक मिलती है। भाषा की शैली गीतात्मक, संवादात्मक और बोधप्रद्ध है। कविताओं के भाव उत्साह, जिज्ञासा, देश प्रेम, प्रकृति प्रेम, वैज्ञानिक सोच और नैतिक मूल्यों को उजागर करते हैं।

"गीत गाते अक्षर" एक सरस, शिक्षाप्रद और बालमन के अनुकूल कविताओं का संग्रह है, जो न केवल बच्चों के मनोरंजन के उद्देश्य से रचा गया है, बल्कि उनका बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक विकास भी सुनिश्चित करता है। मनोज कुमार शिव द्वारा रचित "गीत गाते अक्षर" हिंदी साहित्य को एक समर्पित एक ऐसा प्रयास है जो बाल साहित्य को केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे ज्ञान, संवेदना, संस्कार और सृजनात्मकता से भी जोड़ता है। इस पुस्तक की 66 कविताएं बच्चों को न सिर्फ कविता का आनंद देती हैं बल्कि उन्हें सोचने, समझने और जीवन के विविध पक्षों से परिचित होने का अवसर भी देती है। यह संग्रह अक्षरों के माध्यम से भाषा की सुंदरता, प्रकृति की मधुरता, देश प्रेम की भावना, स्वास्थ्य और विज्ञान की उपयोगिता तथा मूल्य और नैतिकता की सीख को बड़ी सरलता और सहजता से प्रस्तुत करता है।






कवि मनोज कुमार शिव वह कुशल शिल्पी हैं, जिन्होंने इन मोतियों की माला को पिरोकर बाल सुलभ बचपन को काव्य का सबसे मधुर उपहार दिया है। उनकी यह अनुपम कृति मात्र एक कविता संग्रह नहीं,बल्कि बचपन की बोली में बोया गया शब्दों का बगीचा है जिसे कवि ने अपने स्नेह, संवेदना और सृजनशीलता से सींचा है। आशा करते हैं भविष्य में भी मनोज कुमार शिव जी का ऐसा अनुपम साहित्य निरंतर पाठकों को पढ़ने के लिए मिलता रहेगा। भविष्य के लिए अनंत शुभकामनाएं एवं साधुवाद।


                                          समीक्षक- वसुंधरा धर्माणी




04 August 2025

लोगों को उतना ही महत्व दें, जिससे आपके आत्मविकास में बांधा न पहुंचे!


आपने देखा होगा किसी मजबूत पेड़ के आसपास कुछ अस्तित्वहीन,असमर्थ, कमजोर मानों खरपतवार जैसी बेले पनपती है जो धीरे-धीरे अपने पांव पसारते हुए पेड़ की तरफ बढ़ती है ताकि पेड़ का सहारा पाकर खड़ा हुआ जा सके। ये बेले इतनी कमजोर होती है कि अपने बलबूते पर खड़ी भी नहीं हो सकती, पेड़ भी बड़प्पन दिखाते हुए कमजोर, निर्बल, समझकर बेलों को सहारा देने के लिए राजी हो जाता है। 




पेड़ अपनी शाखाओं को जमीन पर झुकाकर उन असहाय बेलों की मदद करता है, जैसे ही बेले पेड़ को स्पर्श करती है तुरंत दोगुनी रफ़्तार के साथ बढ़ने लगती है। देखते ही देखते पेड़ की चोटी तक पहुंच जाती है। पेड़ गौरवान्वित महसूस करता हैं और अपनी महानता पर खुशी से झूम उठता है कि उसने किसी निर्बल को सहारा देकर बहुत बड़ा पुण्य का काम किया है। लेकिन असली खेल तो इसके बाद शुरू होगा पेड़ की खुशी के ये आखिरी दिन है क्योंकि बेलों ने पेड़ को चारों तरह से जकड़ लिया है और अपनी जबरदस्त पैंठ बना ली है। 

बेलों ने पेड़ को इस कदर घेर लिया है कि उसका अस्तित्व ही मिटा दिया। यहां तक कि पेड़ को मिलने वाली सारी प्राकृतिक सुविधाएं भी खा गयी, पेड़ का पोषण खाकर भी इन खरपतवार जैसी बेलो का मन नहीं भरता उसके बाद पेड़ पर  हावी होकर उसका विकास रोक लिया और बड़े गरूर से दावा करने लगी कि हमने पेड़ को सरंक्षण दिया हुआ है हमारी वजह से पेड़ हर मुसीबत से बचा हुआ है।




इसी तरह मनुष्य के जीवन में भी कई बेलों सरीखे लोग होते हैं जो शुरुआत में मायूस,असहाय, मजबूर, दुःखी दिखते हैं धिरे धिरे अपनी जगह मजबूत करने लगते हैं और मौका पाकर अपना असली रंग दिखाना शुरू करते हैं। 




ऐसे लोगों से जितना हो सके खुद को दूर ही रखना, ये लोग आपकी अच्छाई का ग़लत फायदा उठाते हैं, पहले आपका हक खाएंगे बाद में आपको ही खा जाएंगे और दुनिया के सामने ये प्रर्दशित करेंगे जैसे आप उनका इस्तेमाल कर रहे हैं वो नहीं, वो तो मासूम है।


अच्छा नागरिक बनकर लोगो की मदद जरूर करिए लेकिन उतना ही जितने में आपकी अपने आत्मविकास को कोई बाधा न पहुंचे।




                                            - बिशना गाजटा, शिमला, हिप्र



29 April 2025

एक अविस्मरणीय यात्रा का सफर


अपनी उम्र के कई साल स्कूल, कॉलेज, नौकरी, गृहस्थी में बिताने के बाद मुझे अहसास हुआ है कि जीवन में अब भी कुछ अधूरा-सा हैं। मृत्यु सहज सी लगने लगी जैसे कुछ ही पलों में मृत्यु आ जायेगी, मैं बस यही सोच रही हूँ कि जीवन में आखिर खालीपन है कहाँ ? 





आखिर में समझ आया कि मैं कई सालों से जीवन की भाग-दौड़ और बहदवासी भरी ज़िन्दगी के चलते एक अकेलेपन भरे कमरे में बन्द थी, उस संसार रूपी कमरे में इतनी शक्ति है कि मैं चाहकर भी अपने अनुभवों और कहानियों से उसे तोड़ नहीं सकती थी। मैं जीवन भर चलती रहीं, फिर भी एक सुकून का कोना नहीं मिला।

23 अगस्त 2019 में मेरी मुलाकात होती है रमेश जी से जिन्होंने मुझे मिलवाया, एक नये सफर से और मेरा वो सफर शुरू हुआ "ॐ शिव शंकर तीर्थ यात्रा"  के साथ, जिस ने मेरे जीवन के जीने के वास्तविक मायने बदल दिये। इसके संचालक है श्याम चतुर्वेदी जी जब से मैंने इनके साथ यात्राएँ करनी शुरू कि ऐसा लगा मानो, मेरे जीवन में नये अध्याय का प्रारम्भ हुआ हो। मैंने हिमालय से कन्याकुमारी, द्वारिका से पुरी तक का सफर तय किया और सच कहूँ तो बहुत खुबसूरत रहा मेरा हर सफर। 





मैंने उड़ती बर्फ, ठण्डी हवा, बहता पानी, पहाड़, चलती गाड़ियों की खिड़की से बहार देखना, हवाओं को मेरे बालों के साथ खेलना सच में मेरे लिए वो दृश्य काल्पनिक सा लग रहा था। मगर यह सच था, इतनी उम्र बिताने के बाद अब ऐसा लग रहा है कि जीवन तो यात्रा ही है।

वो सारी यात्राएँ जो मैंने की श्रीलंका, भूटान, नेपाल, दार्जिलिंग, कश्मीर, केरल द्वारिका, कैलाश मानसरोवर, दुबई, तीन धाम ग्यारह ज्योतिर्लिंग, मनाली आदि वो मुझे मेरे जीवन के सबसे खूबसूरत पलों में से एक हैं। बहुत ही आरामदायक सफर रहा मेरा इन बीते सालों में और  मैं यही सलाह दूंगी कि अगर शान्तिपूर्ण और सहज यात्राएं करनी है तो ॐ शिव शंकर तीर्थ यात्रा सेक्टर-9, मालवीय नगर, जयपुर के साथ कीजिए। 





जीवन को जीने का आपका नज़रिया बदल जाएगा। मैं किसी विशेष या किसी कंपनी के प्रचार के लिए नहीं बोल रही हूँ। मैंने वास्तविकता में अपने जीवन में बहुत यात्राएं की हैं, लेकिन ऐसी यात्राएँ जिसमें सभी यात्री पारिवारिक माहौल बनाएं, शुद्ध सात्विक वचन और भोजन रखें यात्रा करें, मैंने कभी नहीं देखा था। मगर वो मैंने यहाँ देखा और महसूस किया।


मैं अपनी यात्रा के कुछ अनुभवों को आपके साथ साझा करती हूँ-

भारत की विविधता को करीब से देखने की चाह ने मुझे एक लंबी यात्रा पर निकलने के लिए प्रेरित किया। यह कोई साधारण यात्रा नहीं थी। यह आत्म की खोज, संस्कृति-साक्षात्कार और सौंदर्य-प्रेम की एक जीवंत यात्रा थी। मैंने उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक भारत के प्रमुख शहरों, गाँवों, पहाड़ों, सागरों और रेगिस्तानों की यात्रा की।


उत्तराखंड में ऋषिकेश की गंगा आरती और हरिद्वार की धार्मिकता ने मेरी आत्मा को छू लिया। मनाली और शिमला की बर्फीली वादियाँ और हिमालय की ऊँचाई किसी स्वप्नलोक से कम नहीं थीं।

पश्चिम भारत- रंग, रेगिस्तान और शौर्य राजस्थान में जयपुर, उदयपुर और जैसलमेर के किलों और हवेलियों ने राजसी संस्कृति से परिचय कराया। जबकि गुजरात में कच्छ का रण सफेद नमक से ढका था। सूरज डूबने के बाद का दृश्य आज भी आँखों में बसा है। महाराष्ट्र में मुंबई की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी और गेटवे ऑफ़ इंडिया की शाम साथ ही अजंता-एलोरा की गुफाओं ने प्राचीन कला से अवगत कराया।





दक्षिण भारत- प्रकृति, मंदिर और आत्मिक शांति केरल में हाउसबोट पर बिताई गई रातें, मुन्नार की चाय बगान और कोवलम का समुंदर शांतिदायक थे। तमिलनाडु के मदुरै और रामेश्वरम के मंदिरों ने भक्ति से भर दिया।कर्नाटक में मैसूर पैलेस और हम्पी के खंडहरों की कहानी अनसुनी और अद्भुत थी। आंध्र प्रदेश में तिरुपति बालाजी के दर्शन कर मेरी इस यात्रा को एक आध्यात्मिक ऊँचाई मिली।

पूर्व भारत- संस्कृति, प्राकृतिक सुंदरता और जनमानस कोलकाता में साहित्य, दुर्गा पूजा और रसगुल्ले ने मन मोह लिया। ओडिशा में कोणार्क सूर्य मंदिर और पुरी का समंदर जीवन में एक शांत ठहराव लेकर आया। उत्तर-पूर्व भारत में असम के चाय बगान, मेघालय के जीवित जड़ों के पुल और सिक्किम की बर्फीली चोटियाँ मानो प्रकृति की गोद में समय थम गया हो।




 

श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में उतरते ही भारतीय संस्कृति की झलक मिलती है। यहां से रामायण यात्रा की शुरुआत होती है।

मुन्नेश्वरम मंदिर (चिलाव)- यहीं वह स्थान है जहाँ भगवान राम ने रावण वध के बाद ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति के लिए भगवान शिव की पूजा की थी। इसके अलावा मांनावर मंदिर जहाँ राम ने शिवलिंग स्थापित कर पूजा की थी। यह स्थान भी चिलाव के पास है।

सीता एलिया (नुवारा एलिया)- यह वह स्थान माना जाता है, जहाँ रावण ने सीता माता को अशोक वाटिका में रखा था। यहाँ सीता अम्मन मंदिर भी स्थित है, जो माता सीता को समर्पित है।





भारत की यात्रा सिर्फ एक देश घूमने की नहीं, बल्कि आत्मा के हर कोने को छूने की प्रक्रिया है। यहाँ की विविधता, रंग-बिरंगी संस्कृति, स्वादिष्ट व्यंजन और अतिथि सत्कार मुझे आज भी बार-बार याद आते हैं। मेरी यह यात्रा केवल स्थानों की नहीं, भावनाओं और अनुभवों की थी। एक ऐसा अनुभव जिसे मेरे लिए शब्दों में समेटना बहुत ही मुश्किल है।


अनिता रोहलन 'आराध्यापरी'
निवासी- लाछड़ी, डीडवाना, राजस्थान