साहित्य चक्र

05 August 2017

* बचपन *



बचपन

लड़खड़ाते हुए क़दमों से चला जा रहा हूँ,
कभी गिरता-कभी उठता संभलता जा रहा हूँ।


खिल जाते है सबके चेहरे मेरी एक मुस्कान पर,

सारे गम मिट जाते है एक तुतलाती जुबान पर।


ख़ुशी आती है आँगन में जब-जब मस्ती में गा रहा हूँ,

  कभी गिरता कभी उठता सम्भलता जा रहा हूँ।


दादा-दादी का लाडला, नाना-नानी का अभिमान हूँ,

अंधेरे घर का दीपक मैं बड़ा ही उज्जवल नाम हूँ।


सबके दिलों में प्यार के दीये जला रहा हूँ,

कभी गिरता कभी सम्भलता जा रहा हूँ।


सब के जिगर का टुकड़ा मैं अपने परिवार में,

ऐसा मोती हूँ, जीवन में जैसे नौलखा हार में।


सबके गले में माला जैसे धागे में जुडवा रहा हूँ,

कभी गिरता कभी उठता सम्भलता जा रहा हूँ।


ऐसा मनमोहक चेहरा  जिस पर सब कुर्बान है,

सबका प्यारा सबसे न्यारा सबका यहीं विहान है,


रूकती नही हँसी जब मुँह में ऊँगली डलवा रहा हूँ,

कभी गिरता कभी उठता सम्भलता जा रहा हूँ।


पापा आपके जीवन में खुशहाली लेकर आया हूँ,

मम्मी क्या सोचती हो आपका ही तो साया हूँ।


आप दोनों का बचपन फिर से लहरा रहा हूँ,

कभी गिरता कभी उठता सम्भलता जा रहा हूँ।
                   
                                     
                                                           * सुमन जांगड़ा *                    

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