साहित्य चक्र

20 August 2017

* खतरे में भविष्य *

सुमन जांगड़ा


हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है,
ये आज की बात नही सदियो से दुनियां कहती है,
पर क्या गंगा पवित्र हुई इस कलयुगी संसार में, 
जहाँ कचरे का ढेर लग जाता है जल के निर्मल धार में।

भारत जैसे महान देश में हम -सब अपनी मनमानी कर रहे है ,
हम क्यों नही समझते की ऐसा कर खुद की हानि कर रहे है,
अपने सपनों की चाह में हम देश से खिलवाड़ करने पर लगे है,
जिस भारत पर गर्व है हमे उसको ही बदनाम करने पर लगे है।

भारतवासी हो तो भारत के प्रति अपना फर्ज निभाओ ,
  यहाँ होने वाले हर जुल्म को राजनिति का मोहरा मत बनाओ,
कुछ भी हो देश में तो सरकार पर थोप देते है अपना गम
ईमानदारी से बताओ भारतीयो क्या अपनी जगह सही है हम।

सही होते तो देश का ये हाल नही होता आज के युग में,
दस साल की मासुम माँ नही बनती इस घोर कलयुग में,
इंसान ने इंसानियत को गिराया है कमीनापन दिखाया है,
इसमे मासुम का क्या दोष सब अपराध का काला साया है।

अगर इस मासुम को इंसाफ नही मिला तो इंसानियत मर जायेगी,
बड़ी शर्म की बात है हम सब के लिए अगर ये बेटी बोझ बन जायेगी,
जागो भारतीयों समय आया है सर्वनाश होने से बचालो हिन्द को,
वरना ऐसे तो बेटियां न बचेंगी, न पढेगी , और न आगे बढ़ पाएंगी।

अगर देश को बर्बादी से बचाना है तो नारी जाती का सम्मान करो,
जितनी इज्जत अपनी माँ-बहनो की करते हो उतनी ही सबकी करो,
जिस दिन समाज का हर एक नागरिक जिम्मेदार हो जायेगा,
उस दिन सच्चे अर्थो में मेरा देश सोने की चिड़ियां बन जायेगा।
                         
                                                                                                       
                                                                                                                     सुमन जांगड़ा

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