उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पला-बढ़ा मेरा बचपन प्रकृति की गोद में बीता है। गर्मियों के दिन आते ही हमें काफल के पकने का बेसब्री से इंतजार रहता था। खेतों के किनारे और जंगलों में लगे काफल के पेड़ हमारे लिए किसी खजाने से कम नहीं थे। स्कूल जाते समय, छुट्टियों में और खाली समय में हम अपने दोस्तों के साथ पेड़ों पर चढ़ जाते थे और घंटों काफल खाते रहते थे। उस समय न मोबाइल का आकर्षण था, न कंप्यूटर और न ही टीवी की दुनिया का प्रभाव। हमारा बचपन प्रकृति के साथ बीता और शायद यही कारण था कि हम शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और मजबूत रहे।
हम केवल पके हुए काफल का ही आनंद नहीं लेते थे, बल्कि कच्चे काफल का स्वाद भी हमारे लिए किसी विशेष व्यंजन से कम नहीं था। दोपहर के समय जब घर के बड़े-बुजुर्ग आराम कर रहे होते थे, तब हम सब दोस्त चुपके से कच्चे काफल इकट्ठा करते। फिर सिलबट्टे में पीसे हुए नमक में थोड़ा सरसों का तेल मिलाकर उसके साथ कच्चे काफल खाते थे। उसकी खट्टी-तीखी स्वादिष्टता आज भी याद आते ही मन को बचपन की गलियों में पहुँचा देती है।
जब हम अपने माता-पिता के साथ उत्तराखंड के जंगलों में जाते थे, तब भी पेड़ों पर चढ़कर काफल तोड़ना और वहीं बैठकर खाना हमारे लिए सबसे बड़ा आनंद होता था। हमने इस प्राकृतिक फल को खूब खाया, लेकिन कभी इससे हमारी तबीयत खराब नहीं हुई। स्थानीय लोगों के अनुभव और कई वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार काफल में अनेक लाभकारी गुण पाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माने जाते हैं।
आश्चर्य की बात यह है कि अनेक शोधों के बावजूद आज भी काफल की व्यावसायिक खेती करना आसान नहीं हो पाया है। यह फल विशेष प्रकार की मिट्टी, ठंडी जलवायु और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी वातावरण में ही अच्छी तरह पनपता है। शायद यही कारण है कि यह दुर्लभ होता जा रहा है और बड़े बाजारों में बहुत कम दिखाई देता है।
आज हम बड़े हो गए हैं। जीवन की भागदौड़ में वही काफल हमारे लिए एक दुर्लभ स्वाद बन गया है। आज भी जब स्कूल के पुराने मित्र मिलते हैं, तो बचपन की वही बातें छिड़ जाती हैं- पेड़ों पर चढ़ना, जंगलों में घूमना, कच्चे काफल को नमक और सरसों के तेल के साथ खाना और बिना किसी चिंता के प्रकृति के साथ जीना।
आज हम उसकी तस्वीरें देखते हैं और मन ही मन यही सोचते हैं- काश! उत्तराखंड के पहाड़ों में बिताए गए वे बचपन के दिन फिर लौट आते और हम एक बार फिर अपने दोस्तों के साथ पेड़ों पर चढ़कर उसी काफल का स्वाद ले पाते। मेरे लिए काफल केवल एक फल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की मिट्टी की खुशबू, पहाड़ों की संस्कृति, दोस्तों का साथ और बचपन की अनमोल यादों का एक जीवंत हिस्सा है।
- बीना सेमवाल


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