कई लोग अपने मित्रों अथवा परिचितों से बड़ी गर्मजोशी से मिलते हैं। अच्छी तरह
से हाथ मिलाते हैं अथवा गले मिलते हैं। कई लोग हाथ मिलाने की बजाय कुछ उँगलियाँ
आगे कर देते हैं और वो भी इस तरह से जैसे उनकी उँगलियाँ टूटी हुई हों या वे मनुष्य
न होकर रोबोट हों। अभिवादनस्वरूप जो शब्द बोलेंगे वो भी एकदम सपाट लहजे में व
बिना किसी स्नेह व आत्मीयता के। इससे रिश्तों में ताज़गी व स्थायित्व नहीं रह पाता
और संबंध मृतप्राय होने लगते हैं।
जब भी दोस्तों व परिचितों से मिलें गर्मजोशी से
मिलें। आयु के अनुसार प्यार व सम्मान के साथ अभिवादन के शब्द बोलें। समवयस्कों
से गले मिलें और बच्चों को गोद में ले लें इससे अच्छी तो कोई बात ही नहीं हो सकती
क्योंकि जादू की झप्पी देना अथवा आलिंगनबद्ध होना या किसी को अपनी बाँहों में भर
लेना अभिवादन का आत्मीय तरीक़ा ही नहीं अपितु एक अत्यंत सुखद अनुभूति व एक
अप्रतिम स्वास्थ्यवर्धक एवं उपचारक प्रक्रिया भी है। पाश्चात्य जगत में तो एक कहावत
ही प्रचलित है कि जो रोज़ आलिंगन करता है वह हमेशा तनावमुक्त व स्वस्थ रहता है।
हम किसी को अपनी बाँहों में तभी अच्छी प्रकार से लेते हैं जब हम अतिशय
प्रेममय होते हैं और जब हम किसी को आलिंगनबद्ध करते हैं अथवा हमें कोई अपने
आगोश में लेता है तो भी हम प्रेममय होने लगते है। हमारी बॉडी कैमिस्ट्री परिवर्तित होने
लगती है। यदि वह आलिंगन अर्थपूर्ण है और उससे हमें प्रसन्नता मिल रही है तो हमारे
शरीर में लाभदायक हॉर्मोंस का उत्सर्जन प्रारंभ हो जाता है। इसका विपरीत भी उतना ही
सही है। यदि कोई व्यक्ति द्वेष अथवा कपट के वशीभूत होकर किसी का आलिंगन
करता है तो सामनेवाले का रोम-रोम सुलग उठता है जिससे उसके शरीर में लाभदायक के
बजाय तनाव उत्पन्न करने वाले हॉर्मोंस का उत्सर्जन प्रारंभ हो जाता है जिससे वो बेचैनी
का अनुभव करने लगता है और फ़ौरन प्रतिरक्षात्मक स्थिति में आ जाता है।
एक माँ अपने बच्चे को विशेष रूप से छोटे बच्चे को दिन में न जाने कितनी बार
अपनी बाँहों में भरती है, कितनी बार उसे अपनी छाती से लगाकर थपथपाती है। इस
आलिंगन का आनंद एक माँ ही अनुभव कर सकती है दूसरा कोई नहीं। बच्चा भी माँ की
गोद में, उसके आलिंगन में न केवल सुरक्षित अपितु आनंदित भी अनुभव करता है। जो
बच्चे चलना सीख जाते हैं और सरपट दौड़ते हैं वे भी अपनी माँ की गोद अथवा उसके
आलिंगन में आने के लिए मचलते रहते हैं। इसका एक ही कारण है और वो ये कि वे
आलिंगनबद्ध होकर प्रसन्नता के सागर में ग़ोते लगाने लगते हैं। बच्चा चोट, भूख, दर्द
अथवा अन्य किसी कारण से कितना भी क्यों न रो रहा हो बस एक बार उसे अपने
आलिंगन में ले लीजिए वो सब कुछ भूलकर सामान्य हो जाएगा और जल्दी ही हँसने-
मुस्कुराने लगेगा। ये आलिंगन का ही प्रभाव होता है।
आलिंगन की प्रक्रिया माँ और बच्चे दोनों को न केवल प्रसन्नता व बच्चे को
भावनात्मक सुरक्षा व सबलता प्रदान करने में सहायक होती है अपितु दोनों को अच्छा
स्वास्थ्य व रोगमुक्ति प्रदान करने में भी सक्षम होती है। इन क्षणों में दोनों के शरीरों की
अतःस्रावी ग्रंथियों में जो रासायनिक परिवर्तन होता है वो उनके शरीर की रोगावरोधक
प्रणाली को सुदृढ़ करता है जिससे दोनों ही स्वस्थ रहते हैं और किसी भी रोग की स्थिति
में शीघ्र रोगमुक्त हो जाते हैं।
जो माँ या बच्चे आलिंगन के विभिन्न रूपों के इन अद्भुत
प्रसन्नतादायक व आरोग्यवर्धक अनुभवों से वंचित रह जाते हैं उनके जीवन में इन
अभावों की पूर्ति अन्यत्र संभव ही नहीं। माँ की कोमल मसृण बाँहें हों अथवा पिता की
मज़बूत भुजाएँ या फिर दादा-दादी व नाना-नानी के आत्मीयतापूर्ण नाज़ुक हाथों का स्पर्श
इन सभी में निहित होता है पूर्ण सुरक्षा का एहसास व आनंद का परस्पर आदान-प्रदान।
इन क्षणों की उपेक्षा करना ही अस्वास्थ्यकर है।
विभिन्न आधुनिक शोधों से भी ज्ञात होता है कि आलिंगन का हमारे हृदय,
मस्तिष्क व दूसरे अंगों पर दीर्घकालीन आरोग्यकारी प्रभाव पड़ता है। प्रतिदिन बीस सेकेंड
का आलिंगन व्यक्ति को मानसिक रूप से सक्रिय व चुस्त-दुरुस्त रखने और हृदय की
बीमारियों से बचाने में काफ़ी हद तक कारगर होता है।
आलिंगन से व्यक्ति में इंफेक्शन
का मुक़ाबला करने की शक्ति बढ़ती है। विभिन्न प्रकार के तनावों के स्तर को संतुलित
रखने व अवसाद को रोकने में आलिंगन बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है।
परोक्ष रूप से आलिंगन व्यक्ति की स्मरण शक्ति को अक्षुण्ण बनाए रखने में भी
मददगार होता है। प्रश्न उठता है कि आलिंगन तनाव को कैसे कम करता है और इससे
उसकी स्मरण शक्ति कैसे ठीक रहती है?
वास्तव में आलिंगन के दौरान जो आनंदानुभूति होती है उससे हमारी पीयूष ग्रंथि
से ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन पर्याप्त मात्रा में निकलकर हमारे रक्त में मिल जाता है
जो शरीर में तनाव उत्पन्न करने वाले दूसरे हार्मोंस के दुष्प्रभाव को निष्क्रिय बना देता
है। इस प्रकार हम न केवल तनाव से बचे रहते हैं अपितु निरंतर तनावमुक्त व शांत
रहने के कारण अपनी याददाश्त को भी ठीक रख पाते हैं।
आलिंगन करने से न केवल
हृदय की धड़कनों व रक्तदाब को कम करने में सहायता मिलती है अपितु सर्दी-ज़ुकाम
जैसी व्याधियों में भी आराम मिलता है। हमारे शरीर की एड्रिनल ग्रंथि से स्रावित होने
वाला हार्मोन कार्टिसोल एक तनावप्रदायक हार्मोन है जो उच्च रक्तचाप, अस्थिभंगुरता,
दुश्चिंता, अवसाद व स्थूलकायता तक के लिए उत्तरदायी होता है।
इन स्थितियों अथवा व्याधियों से बचने के लिए खानपान पर नियंत्रण, व्यवस्थित
जीवनशैली, व्यायाम व चिकित्सक द्वारा उपचार अपेक्षित है लेकिन जो व्यक्ति आलिंगन
से दूर नहीं भागते उन्हें उपरोक्त व्याधियों से अधिक नहीं जूझना पड़ता। तनाव उत्पन्न
करने वाले किसी भी हार्मोन के दुष्प्रभाव से मुक्ति पाने व अपने को स्वस्थ रखने के
लिए आलिंगन एक प्रभावशाली क्रिया है।
मनोवैज्ञानिक व पारिवारिक चिकित्सक
वर्जीनिया सैटिर कहती हैं कि हमें अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए प्रतिदिन चार
बार, अपने रख-रखाव के लिए प्रतिदिन आठ बार व अपनी वृद्धि के लिए प्रतिदिन बारह
बार आलिंगन करना चाहिए। इसका सीधा सा अर्थ है कि हम जितनी ज़्यादा बार
आलिंगन करते हैं वह हमारे हित में होता है। आलिंगन बहुत काम की चीज़ है लेकिन
आलिंगन से पूर्व हमें हर प्रकार की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए और पूर्णतः सात्त्विक
भाव के साथ किसी को अपने बाहुपाश में लेना चाहिए।
संबंधों के निर्माण व उनमें माधुर्य व विश्वसनीयता उत्पन्न करने में भी आलिंगन
का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। किसी के गले लगकर अथवा उसे अपनी बाँहों में भरकर
उसका अभिवादन करके हम अपरिचितों को भी अपने अधिक निकट आने के लिए तैयार
कर लेते हैं। कुछ व्यक्ति इस कला में निष्णात होते हैं और सबसे खुली बाँहों और खुले
दिल से मिलकर उनसे तत्क्षण आत्मीयता स्थापित कर लेते हैं। हम जब तक परस्पर
आलिंगन करने में संकोच करते रहते हैं हमारे संबंधों में औपचारिकता ही बनी रहती है
जिससे प्रगाढ़ता नहीं आ पाती। बच्चे हों या युवा, स्त्री हो या पुरुष आलिंगन अथवा जादू
की झप्पी सबको प्रसन्नता व आरोग्य प्रदान करने में सक्षम है। एक अत्यंत भयभीत
बच्चे अथवा किसी बड़े को आलिंगनबद्ध कर लीजिए और देखिए कि कैसे वो फ़ौरन
भयमुक्त व स्वस्थ हो जाता है। यदि हम स्वयं को किसी के आलिंगन के योग्य भी बना
लेते हैं तो ये भी जीवन की बहुत बड़ी उपलिब्ध ही है।
- सीताराम गुप्ता

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