साहित्य चक्र

15 July 2022

कविताः भरोसा



फोटो सोर्सः गूगल



इक भरोसा ही तो है जीवन में
जो किसी को आगे बढ़ाता है
धोखा ही धोखा है पग पग पर
ठोकर जिसने खाई वही समझ पाता है

भगवान पर भरोसा है तो
सब संकट दूर हो जाते हैं
मन के जो सच्चे होते हैं
हमेशा वही धोखा खाते हैं

भरोसा जो किया प्रह्लाद ने
बांध दिया था जलते खंभे से
दिखी जो चींटियां चलती हुई
आंखे खुली थी भक्त की अचंभे से

नन्हें बच्चे को जब पिता हवा में उछालता है
बच्चा खुश होता है जोर से खिलखिलाता है
पापा के मजबूत हाथ थाम लेंगे मुझे भरोसा ही तो है 
लौट कर पापा की बाहों में सुरक्षित आ जाता है

आज टूट रहा है भरोसा एक दूसरे पर
कौन किसकी पीठ में खंजर भोंक जाएगा
विश्वास करते थे अपना समझते थे जिसे
क्या मालूम वही भरोसा तोड़ जाएगा


                                              कविः रवींद्र कुमार शर्मा


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