साहित्य चक्र

30 July 2017

*जल*

सुमन जांगड़ा


एक मछली यू ही तङप कर मर गई,
और ये खबर दूर दूर तक घर कर गई।

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न कोई कारण ना कोई बहाना था,
ये रहस्य सभी के लिए अनजाना था।

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तभी किसी ने यह माना था,
मछली की मौत केवल जल न बचा पाना था।

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जाने कहाँ की रीत है, करें कोई और भरे कोई,
न्याय नहीं अन्याय है यह दोषी जिए निर्दोष मरे।

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हे मानव तेरी एक गलती से हो गया सब वीरान,
तेरा यह रुप देखकर मैं भी हूँ हैरान।

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एक वक्त ऐसा आएगा सब तबाह हो जाएगा,
मछली की तरह इन्सान तू प्यासा ही मर जाएगा।

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आखों से भी तेरे अन्गारे बरसेंगें,
वो दिन दूर नहीं जब हम बून्द बून्द को तरसेगें।

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पानी का महत्व तुझे तब नजर आएगा,
जब आने वाली पीढीयों में संकट बन जाएगा।

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इसलिए बात मान अभी से कदर कर ले,
पानी को बचा कर जिन्दगी खुशनुमा करले।

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जीवन हमारा फूलों सा महकाएं,
जल बचाएं कल बचाएं।

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                                                                               *सुमन जांगड़ा*

                          

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