साहित्य चक्र

15 March 2017

ओ आमा - ओ बूबू


ओ आमा - ओ बूबू,
कस हैगो म्यर पहाड़।
पाथर छायी मकान हुछी,
अब हैगिना लैन्टरा।।

ओ ताई -ओ ताऊ,
कस हैगो म्यर पहाड़।
पैली बैटी देहे-दूध पीछी,
अब मस्त हैगो दारू मा।।

ओ काका- ओ काकी, 
कस हैगो म्यर पहाड़।
चूल कौ खाड़ खाछिया,
अब गैस बड़ूछ खाड़ा।।

ओ बैणी- ओ भूला,
कस हैगो म्यर पहाड़।
पैली सूट-शलवार पेरछी,
अब जींस में रैगो पहाड़।।

ओ भौजी- ओ दादा,
कस हैगो म्यर पहाड़।
पैली खरमी धोती धरछी,
अब हाथ पकड़ी घूमड़ी।।

कस हैगो म्यर पहाड़ा..।।

    कवि- दीपक कोहली
 

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