साहित्य चक्र

15 December 2024

रेत का महल




आज मैं एक 
क़िला फतेह कर
आया हूं,

आज मैं एक,
रेत का महल,
ढहा आया हूं,

आज मैंने,
नदी में,
कागज़ की नाव,
मझधार में छोड़ आया हूं,
यह अलग बात है,
वह मेरे सामने ही,
डूब गई,

मैंने डूबती नाव को,
बचाने की,
कोशिश भी 
नहीं की,
जबकि नाव नई थी,
उसके तल में छेद भी नहीं था,

इस वर्ष मैंने,
अपनी हथेली पर,
सरसों उगाई,
अब उसे बेचूं?
किसको,? 
अब मैं बाज़ार हो,
गया हूं,
हथेली की सरसों,
बहुत बिकेंगी।

आज मैं बहुत बड़ी,
भीड़ का हिस्सा भी,
बन आया हूं,
नेता ब़ड़ा नहीं था,
पांच सौ का नोट
लेकर अपना ईमान,
बेच आया हूं,

मैं अब आंदोलनकारी,
हो गया हूं,
अपने सिद्धांत,
ताक पर रख आया हूं,
अब मैं लोकतंत्र बचा लूंगा,

रात को मैंने,
बड़े ऊंचे ऊंचे,
ख्वाब देखे,
मैंने एक अंडे से,
मुर्गीखाना बना लिया है,
अब मैं जल्दी ही,
अंबानी बन जाउंगा।

आज मैं हवा में लाठियां लहरा आया हूं,
मैं लड़ाई को तैयार हूं,
पर मैं अपने आप से नहीं लड़ पाया हूं।
हार जाता हूं,
हर बार,
वक्त की लाठी से की बार पिटा हूं।
अभी थका नहीं हूं,
खुद से जीतने की कोशिश जारी है,
जीतूंगा तो बताउंगा।


                                                          - राजेश 'ललित' शर्मा




कहानी- मोहलत

बिरजू चारपाई पर बैठा गहन चिंता में डूबा था। तभी लालाजी का मुंशी ज़ोर से किवाड़ की कुंडी बजाता है- बिरजू ओ बिरजू दरवाज़ा खोल। बिरजू काँपते हाथों से दरवाज़ा खोलकर- "राम-राम" मुंशी जी, आइए बैठिये।





मुंशी- बैठने का टाइम नहीं है, लालाजी ने पैसे के लिए बोला है।
बिरजू- हुज़ूर, थोड़े दिन की 'मोहलत' और दिला दीजिये! मैं जल्द ही कुछ ना कुछ इंतज़ाम कर लूंगा।

मुंशी- लालाजी अब और मोहलत नहीं दे सकते! तेरे पास सिर्फ़ कल तक का समय है, या तो लालाजी के पूरे पैसे लौटा दे; नहीं तो तेरे गिरवी रखे खेतों को बेचकर सूद सहित सारा पैसा वसूला जाएगा।

जब तुम्हारी पैसे चुकाने की औकात नहीं है तो उधार लेते क्यों हो? यह कहकर मुंशी बुदबुदाता हुआ चला गया। उसके जाते ही बिरजू वापस निराशा के सागर में खो गया।

कुछ देर बाद बिरजू की पत्नी अपने पुराने ज़ेवर बिरजू के हाथ में रखते हुए बोली- इन्हें बेचकर लालाजी का कर्ज़ा चुका दीजिये। मैं और ज़्यादा आपकी बेइज़्ज़ती बर्दाश्त नहीं कर सकती। जब हमारे बच्चे किसी लायक बनेंगे तब फिर से बनवा लूँगी। अपनी पत्नी के त्याग और समर्पण को देखकर बिरजू की मायूस आँखें छलछला उठी।

- आनन्द कुमार


कहानी- अनजानी


इंटरमीडिएट(विज्ञान) की फाइनल परीक्षा चल रही थी। उस दिन मेरा फिजिक्स का पेपर था। परीक्षा दो बजे से थी लेकिन मैं सवा एक बजे ही पहुंच गया था। परीक्षा केंद्र के बाहर एक दुकान पर कोल्ड ड्रिंक पी रहा था। अचानक मेरी नज़र नीली सूट पहनी बला की खूबसूरत एक लड़की पर पड़ी।





अगले करीब पंद्रह-बीस मिनट तक एक-दूसरे से निगाहों में बातें होती रहीं। स्वभाव से मैं हमेशा शर्मीला रहा हूं इसलिए बात तो करना चाहा लेकिन हिम्मत नहीं हुई। मैं सोच में खोया हुआ ही था कि उसने अचानक से मेरे पास आकर पूछा-आपका भी एग्जाम है क्या ? मैं सकपका कर अपनी झेंप छिपाते हुए धीरे से हां कहा। उसके बाद फिर हल्की-फुल्की बातचीत और परिचय हुआ।

उसने बताया कि वो भी पीपीके कॉलेज बुंडू में ही पढ़ती है। इसके बाद दोनों एग्जाम लिखने चले गए।दो साल बुंडू कॉलेज में पढ़ा लेकिन पहली दफे किसी लड़की को देखकर दिल के सारे तार झनझना उठे थे। पूरे पेपर के दौरान मैं उसी के बारे सोचता रहा। बेताबी ऐसी थी कि कितनी जल्दी पेपर खत्म हो और बाहर निकल कर उसका नाम और पता पूछूंगा।

उन दिनों मोबाइल सबके पास नहीं हुआ करते थे। मैं पेपर खत्म होते ही भागा-भागा सीधे गेट पर आकर खड़ा हो गया। आंखें भीड़ में बस उसी को ढूंढ रही थी। अचानक जब गेट से निकली तो मैं बदहवास हो गया। उसने मुझे नहीं देखा था। मैं पूछने के लिए आगे क़दम बढ़ाया ही था कि ठीक गेट के सामने बाइक लेकर एक लड़का खड़ा था। शाय़द उसका भाई ही था।

मैं सोचने लगा कम से कम नजरें तो एक बार मिल जाए।वो बाइक पर बैठी और इधर मेरा दिल बैठ गया कि अब आंखों में भी बात नहीं होगी। अगले ही पल मानो चमत्कार हो गया और एक बार फिर हमारी नजरें मिलीं। एक कातिलाना मुस्कुराहट के साथ बाय की और बाइक आगे बढ़ गई। मैं ख़ुमारी में खोया एकटक तबतक उसे निहारता रहा जबतक कि वो आंखों से ओझल नहीं हो गई।

यूं तो मैं कॉलेज नहीं के बराबर जाता था क्योंकि ट्यूशन सर मना किए थे कि सरकारी कॉलेज है, सुविधा अच्छी नहीं है। इसलिए मटरगश्ती करने कॉलेज नहीं जाना है। लेकिन एग्जाम खत्म होने के बाद करीब एक महीने तक लगातार प्रतिदिन कॉलेज गया।

जाकर नजरें बस उसी को ढूंढती। दोपहर तक छान मारने के बाद मायूस होकर लौट आता। धीरे-धीरे यह सिलसिला बंद कर दिया क्योंकि वो फ़िर कभी नहीं मिली। आज़ भी वो मुस्कुराहट याद कर अनायास ही मेरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ जाती है। सोचता हूं कि काश वो अनजानी फिर कभी मिल जाती दो पल ही सही।

- कुणाल



कहानी- दोस्ती




सचिन के फोन पर किसी का फोन आया और सचिन जल्दी से कहीं जाने के लिए घर से निकल ही रहा था कि विश्वास जो उसके बचपन का दोस्त था उसके पास आया और उसने सचिन से पूछा कि क्या हुआ, लेकिन सचिन ने उसे टाल दिया और हड़बड़ी में वहां से चला गया। विश्वास हैरत से उसे देखता रहा और किसी अनिष्ट की आशंका में उसने सचिन का पीछा करने का निश्चय किया। 

कुछ देर ढूंढने के बाद सचिन उसे मिल गया लेकिन घायल अवस्था में एक सुनसान जगह पर जहां लोगों की आवाजाही कम थी। विश्वास ने तुरंत एम्बुलेंस बुला कर सचिन को अस्पताल पहुंचाया और पुलिस एवं उसके घरवालों को सूचित किया। कुछ ही दिनों में सचिन ठीक हो गया और बोला कि कुछ लोग कई दिनों से उसे काम करने के लिए अपने साथ मिलाना चाहते थे, उन्होंने अपने उच्च अधिकारी से मिलने के लिए उसे तुरंत बुलवाया था लेकिन उनका काम नशीले पदार्थ सप्लाई करना था, जिसे सुनकर सचिन के पैरों तले से जमीन निकल गई और उसने उस काम को करने से साफ इंकार कर दिया।उन लोगों को यह डर था कि कहीं सचिन उनका राज न खोल दे इस लिए उसे खत्म करने के लिए एकाएक उस पर हमला कर दिया और उसे मरने के लिए छोड़ कर चले गए। 




सचिन अपने माता-पिता को साथ लेकर विश्वास के घर गया और विश्वास का शुक्रिया अदा करते हुए बोला कि दोस्त अभी तो काफ़ी दिनों से हमारा कोई सम्पर्क भी नहीं है तो भी तुम ने मेरे बारे में इतना सोचा और मेरी जान बचाई, ये सुनकर विश्वास बोला, दोस्त हम बचपन के दोस्त हैं और दोस्ती कभी इस बात की मोहताज नहीं होती कि हम आपस में कितना मिलते  हैं और साथ में कितना वक्त  बिताते हैं। अच्छे और सच्चे दोस्त दिल से जुड़े होते हैं और चेहरे से ही एक-दूसरे की जरूरत समझ लेते हैं। 

ये सुनकर सचिन विश्वास के गले लग गया, दोनों दोस्तों की आंखों में ख़ुशी के आंसू थे। ये देख कर सचिन के माता-पिता की आंखें भी नम हो गई और वे खुशी से एक साथ बोले,"और हमें तुम्हारी दोस्ती पर नाज़ है!"


                                                                       - कंचन चौहान, बीकानेर


कविता- प्रतीक्षा




घर की देहरी पर, 
मन में उम्मीद का दीपक जला बैठी हूंँ। 
दिल में एक तडप-सी उठे ,
तुझे मैं बिन देर के हृदय से लगा लूंँ। 
तेरे आने की खुशी में, 
इन बूढ़ी आंँखों में एक चमक है।
हाथों में तेरी तस्वीर लिए ,
निष्पलक मैं उस पथ को देखूंँ। 

माँ की ममता आतुर है , 
बुढ़ापे में काया कमजोर है। 
तेरा संदेश सुन, रग-रग में स्फूर्ति आई है। 
मुरझाई अलसाई वीरान-सी जीवन में, 
बाल रूप  की  छवि,  स्मृति बनकर छाई है।

तेरी मीठी-मीठी मक्खन सी बातें, 
मुझको  सींच कर जीवित रखा  है। 
अनगिनत नामों से पुकारती थी तेरी मैया, 
तू मेरा कान्हा, तू मेरा लड्डू,  तू मेरा सोना है। 
तेरी एक मुस्कुराहट पर  मैं बलिहारी, 
तू है मेरा  पार्थ, तू मेरा चीकू, तू मेरा प्रख्यात है। 

तेरी प्रतीक्षा में चल रही साँसे मेरी, 
अब थक गई हूँ, देख लूंँ सूरत तेरी, 
आजा मेरा  बच्चा! तू मेरा  लल्ला है,
तुझसे मैं तर  जाऊंँ, इच्छा है मेरी। 


                                                             - चेतना प्रकाश चितेरी