साहित्य चक्र

15 December 2024

आज की पाठशाला-भविष्य का उजाला




पाठशाला है ज्ञान का दीपक,
जो जलता रहे सदा निर्भीक।

यहां सीख मिलती मेहनत की,
सपनों को सच करने की तकनीक।

आज जो पढ़ाई का दिया जलाओगे,
कल उसका प्रकाश पाओगे।

हर अक्षर बनता है सीढ़ी,
जो तुम्हें ऊंचाइयों तक ले जाएगा।

शिक्षा से मिलता है आधार,
हर मुश्किल का होता समाधान।

जो सीखोगे यहां, वही बनोगे कल,
ज्ञान है हर सफलता की कुंजी सरल।

संस्कार, विद्या, और अनुशासन,
इनका पाठ यही सिखाता है।


पढ़ाई से होता है चरित्र निर्माण,
जो जीवन को बेहतर बनाता है।

तो संजो लो ये अनमोल पल,
आज के बीज कल होंगे फल।

पाठशाला से जोड़े हर नाता,
भविष्य में उजियारा फैलाता।


                                                     - डॉ. सारिका ठाकुर “जागृति”


12 December 2024

कहानी- मित्र


राम एक बहुत अच्छा लड़का था, लेकिन शहर आकर कुसंग ने उसके जीवन को बर्बादी की तरफ धकेल दिया। ज़ब उसे इस बात का अहसास हुआ तब तक उसका सब कुछ लुट चुका था और वह जीवन में एकाकी हो गया था। परन्तु ऐसे समय में श्याम ने उसका हाथ थामा और राम से दोस्ती कर ली।



श्याम ने राम को हमेशा सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया और उसकी एक अच्छे मित्र की तरह सदैव सहायता की। परिणामस्वरूप राम ने अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सुधार किया। वह पढ़ाई, खेल, संगीत आदि सभी क्षेत्रों में बेहतरीन प्रदर्शन करने लगा।

नियमित और कठोर परिश्रम के कारण, वह अंततः एक श्रेष्ठ चिकित्सक बना। आज राम अपने जीवन में सफलता का पूरा श्रेय श्याम और श्याम की दोस्ती को देता है। श्याम ने वास्तव में 'दोस्ती ' शब्द को पूर्ण रूप से सार्थक किया था।

- प्रवीण कुमार


09 December 2024

लघुकथा- परछाई

बसंत का मौसम शुरू ही हुआ था। नीरा,परिवार और मित्रो के साथ पिकनिक पर गई है। मौसम का आनन्द लेते हुए, नीरा अकेले ही जंगल की ओर चल पड़ी। अचानक उसके पैर थम गए। 

वो जहां खड़ी है, वहां जंगल घना नहीं है। डूबते सूरज के रंग सा, फूलों से भरा एक पेड़, नीरा ठीक उसके पास जाकर झरे हुए फूलों कोहाथों में उठाकर नम आंखों से देख रही है। 





फागुन का माह, हल्की हवाएं चल रही हैं। पेड़ पर लगे फूल नीरा को छू कर जमीन पर गिर रहे है। शाम के चार ही बजे थे। ढलती धूप में, सुनहरी पीली मिट्टी पर पेड़ की तिरछी छांव ने नीरा को अपनी बाहों में भर लिया। नीरा सिसक कर रोने लगी। 

तीन चार साल की छोटी सी उम्र में नीरा और दादी का साथ छूट गया था। दादी बीमार थी पर दुलार में कभी कोई कमी नहीं थी। पलाश के फूल दादी को अति प्रिय थे। तब से हर फागुन नीरा की निगाहे पलाश ढूंढती हैं।





आज मानो इस पलाश की परछाई में उसकी तलाश पूरी हुई। उसे बड़ा सुकून मिला। जाने कब घंटों बीत गए। इतने में उसकी सहेलियों उसे पुकारते हुए वहां पहुंची। नीरा जमीन पर बैठी, पलाश की पेड़ पर सर टिकाए सोई हुई थी।


                            - सुतपा घोष, दुर्गापुर, पश्चिम बंगाल


08 December 2024

लघु कथा - चिट्ठी



जून महीने की तपती दोपहर थी। सूरज अपनी पूरी ताकत लिए आसमान में चमक रहा था और गली में सन्नाटा पसरा था। सब कुछ थमा-थमा सा लग रहा था, सिवाय डाकिए के जो अपनी साइकिल पर घंटी बजाता हुआ हर घर के सामने से गुज़र रहा था।





किसी को कुशल क्षेम जानने के लिए पत्र का इंतजार था, तो किसी को परीक्षा परिणाम का डर, किसी को बिल की चिंता खाए जा रही थी तो कोई विरहन परदेश में रह रहे पिया की प्रेम पाती को पाने के लिए आकुल थी। गली का प्रत्येक व्यक्ति बस डाकिए की घंटी से चौकन्ना हो जाता था। 

        आज शर्मा जी भी दरवाजे की चौखट तक दौड़े दौड़े आए कि शायद संजय का कोई पत्र आया हो। संजय उनका बेटा,, जो भारतीय सेना में दो साल से अपनी सेवाएं दे रहा था। पूरे गांव में शर्मा जी बड़ी शान से कहते थे, कि मैंने अपने बेटे को भारत मां की रखवाली के लिए भेजा है। संजय का पत्र कई दिनों से आया नहीं था इसलिए चिंतित भी थे, लेकिन डाकिए को देखकर आशा की किरण नज़र आ रही थी। 





डाकिया भी थोड़ी देर रुक कर शर्मा जी के हाथ पर चिट्ठी रखकर चला गया। शर्मा जी जल्दी-जल्दी चश्मा टटोल कर पत्र खोलने लगे। शुरू की चार पंक्तियां पढ़कर ही वे वहीं चौखट पर औंधे मुंह गिर गए। परिवार वाले भी घबरा गए कि आखिर चिट्ठी में ऐसा क्या लिखा था? पढ़ कर पता चला कि संजय अपनी धरती मां के लिए कुर्बान हो गया था। 


                                                                - वसुंधरा धर्माणी 


06 December 2024

कहानी- अल्हड़ लड़की



       पहाड़ियों के बीच में सुंदर सा गांव चारों तरफ हरियाली , पेड़ पौधे , सीढ़ीदार खेत , और लकड़ी के पत्थर के मजबूत घर जिनमें बड़े बड़े आंगन जिसको कि मिट्टी से लीपा हुआ था और उसमें चटाई पर धूप सेंकती हुई एक सोलह साल की लड़की जिसका नाम सोना है साफ सुथरा रंग और गुलाबी गाल और होंठ सबको अपनी तरह आकृषित करते सोना थी भी बला की खूबसूरत लड़की... वह हाथ में किताब लिए हुए शायद अपना पाठ याद करती हुई आंगन में बैठी है....





        तभी किचन से मां की आवाज आती है सोना बेटा आके नाश्ता कर ले... किचन में चली जाती सोना जहां पर उसकी दादी, दादा जी और उसके पिताजी और छोटा भाई भी रोटी और सब्जी खा रहे थे... मां ने सोना को भी सब्जी रोटी और दूध दिया... सभी नाश्ता खत्म कर चुके थे...

          सोना और उसका छोटा भाई स्कूल के लिए तैयार हो के स्कूल चले जाते है मां झट से बर्तन धो के और सफाई करके खेत को चली जाती ही है... दादी और दादा जी भी काम में लग जाते है... 

          धीरे धीरे सोना बारहवीं पास करके कॉलेज में चली जाती है जो भी सोना को देखता वही बहाने से उससे पूछताछ करने की कोशिश करते थे...
         
पर सोना इतनी भी नादान न थी वही सब समझती थी क्यों हर कोई उससे बात करते है सब उससे दोस्ती करना चाहते है... पर सोना अपनी पढ़ाई करती और अच्छे नंबरों से पास होती...

          इतने में एक दिन दूर का एक लड़का सोना को देखते ही आवक रह गया उसने पहले कभी इतनी सुंदर लड़की नि देखीं थी वह झट से सोना से प्यार कर बैठा और सोना थोड़ा कतराती और तिरछी नजर से देख कर उसको अपना दिल दे बैठी पर सोना डरती भी थी कि उसकी वजह से कहीं मैं बदनाम न हो जाऊं लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे मगर वह क्या करती वह भी अपने दिल के आगे मजबूर थी...

        अब वह कॉलेज जाती तो अनगिनत लोग उसको चाहते थे पर वह तो उस अंजान को अपना दिल दे बैठी थी अब वह और अजनबी धीरे धीरे कभी कभी मिलते तो थोड़ी देर की ही मुलाकात में हो जिंदगी भर के सपने देखती और वह उसको अपने प्रेमजाल में फंसा के खुश होता था और अनेक वादे करता उसको शादी का झांसा देता वह पागल भी उसका झूठ न पकड़ पाई और वह भी रंगीन दुनिया में खो जाती...

          अब सोना का ग्रेजुएशन पूरा होने को था इतने में सोना को एक बाज रूपी इंसान देखता है और वह उसको पाने के लिए सारे प्रयत्न करता है... उसका प्रेमी भी न जाने कहां चले गया सोना ने आखिर हार मान ली कि वह अब उसकी जिंदगी से जा चुका है और वह अब उस बाज रूपी इंसान की पत्नी बन गई...

       सोना की किस्मत में तो प्यार ही नहीं था वह बाज रूपी इंसान उसको शराब पीकर रोज मारता पीटता और गालियां देता वह बेचारी आसूं बहाती हुई उस भगवान को कोसती कि क्यों पैदा किया जब खुशियां ही नहीं लिखी तूने मेरी किस्मत में...

         पर अब हो भी क्या सकता था वह बस अब दिन काट रही थी इसी बीच उसके दो बच्चे हो गए अब वह उनका लालन पालन करने लगीं सोच कर कि कभी तो उसकी किस्मत पलटेगी... अब उसके बच्चे भी बड़े हो गए और अपनी मां को प्यार करते और उसका ख्याल रखते...

         अब सोना खुश थी और अब न उसके पास न वह इंसान था न बाज रूपी इंसान क्योंकि उसके पास था तो अपने बच्चों का प्यार और साथ...

         अब सोना खुले आसमान में गोते लगा रही थी अपने बच्चों के साथ अपने बच्चों के साथ जिन्होंने उसे प्यार दिया सम्मान दिया और आजादी दी अपने अतीत रूपी पिंजरे को तोड़ती हुई वह आजाद है... 

आज वह हंसती है, खिलखिलाती है, मुस्काती है, सपने देखती है, गुनगुनाती है, और खुले आसमान में तितली की तरह ऊंचाई भरती हुई, एक हिरनी की तरह कुलांचे मारती हुई हर दिन जीती है ...

        ये है सोना की कहानी और आज सोना बहुत खुश है अपनी छोटे से परिवार के साथ...!

        
                              - सुमन डोभाल काला,   देहरादून, उत्तराखंड