साहित्य चक्र
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30 January 2025

प्रेम स्वीकारना



प्रेम कई बार हमें उलझा देता है, क्योंकि हमें पता नहीं होता है कि प्रेम को कैसे स्वीकार करना है। हम डरने लगते हैं और हमारा मस्तिष्क विभिन्न कल्पनाओं की उलझन में फंस जाता है। 





इससे बाहर निकलना हमारे लिए युद्ध से बाहर निकलने जैसा होता है, क्योंकि हमने कभी महसूस ही नहीं किया होता है कि हम कौन हैं। हम सभी प्रेम से बने होते हैं, मगर प्रेम का ‘प’ तक नहीं जाते हैं। 

प्रेम हमें खुद से जोड़ता है यानी खुद से प्रेम करना सीखता है। इसलिए प्रेम स्वीकार करने से पहले हमें खुद से प्रेम करना होता है। तभी हम दूसरों के प्रेम को स्वीकार कर पाते हैं।

                                                                - दीपक कोहली

19 December 2024

भारत का अंधकारमय भविष्य!




कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है कि भारत का भविष्य अंधकार में है। यह मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मुझे वर्तमान में भारत वैचारिक रूप से विकलांग नजर आ रहा है।  हम अपनी जनसंख्या वृद्धि नहीं रोक पा रहे हैं और लगातार कम होते जंगलों को नहीं रोक पा रहे हैं और इसके अलावा हमारे देश में लगातार खेती कम होती जा रही है।  इतना ही नहीं बल्कि धार्मिक वैचारिकता भी हमारे देश से गायब होती दिखाई दे रही है। आज हमारे तथाकथित साधु संतों ने धर्म को व्यापार बना दिया है। एक वक्त हुआ करता था जब भारतीय समाज आर्थिक, वैचारिक और धार्मिक रूप से काफी समृद्ध था। मगर वक्त की सुई ने भारत से ये सब छीन लिया है। भारतीय समाज से सुकून गायब हो गया है। हर व्यक्ति पैसे के पीछे पागल है और अंधाधुंध पैसा कमाने के बावजूद भी लोगों को शांति नहीं मिल पा रही है। क्या कारण है कि आज भारतीय समाज भटका, बंटा और अस्वस्थ नज़र आता है। शायद हमारे समाज ने मेहनत करना बंद कर दिया है या फिर इन आधुनिक तौर-तरीकों और संसाधनों ने हमें बिगाड़ दिया है। मैं दावे के साथ कहता हूं कि आज भारत का कोई भी घर ऐसा नहीं होगा जहां महीने में कम से कम 200-500 की दवाई नहीं आती होगी। अगर नहीं आती है तो वह सिर्फ मजदूर या गरीब होगा जो बीमारी का इलाज नहीं कर सकता है या फिर वह बीमारी को सीरियसली लेता ही नहीं है।

खैर! भारतीय समाज जिस दिशा की ओर आगे बढ़ रहा है उस दिशा को देखकर मुझे सामने सिर्फ अंधकार नज़र आता है। उस अंधकार को देखकर मुझे डर लगता है कि कहीं हम अपनी धार्मिक, पौराणिक और आर्थिक समृद्धि को ना खो दें। भारतीय समाज से सामाजिक चिंतन खत्म हो गया है। जातिवाद और पूंजीवाद की खाई गहरी हो गई है। कभी जो भारत प्रकृति का धनी था, वह लगातार प्रकृति‌ विनाश कर अपनी कब्र खोद रहा है। वह दिन दूर नहीं जब हिंदू समाज को अंतिम संस्कार करने के लिए लकड़ी तक उपलब्ध नहीं होगी क्योंकि जिस तेजी से भारत से जंगल खत्म हो रहे हैं उससे तो यही लगता है।

बाकी सोशल मीडिया के इस दौर ने लगभग हर भारतीय को आलसी, अय्याश और नचनिया बना दिया है। सामाजिक और सांस्कृतिक जागरूकता के नाम पर हम सिर्फ सोशल मीडिया पर सकारात्मक पोस्ट कर या स्टेटस लगाकर अपनी आत्मा को संतुष्टि दे रहे हैं। आगामी वर्ष में एक विशाल धार्मिक मेला लगने वाला है। इस मेले को कभी धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक चिंतन के रूप में देखा जाता था, मगर आज इसे सिर्फ नहाने का उत्सव बना दिया गया है। वैसे यह मेला पवित्र नदियों के संगम किनारे आयोजित होता है, पवित्रता तो दूर की बात संगम में नदियां नाले जैसी हो गई है। कभी जिन साधु संतों के ऊपर सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक चिंतन की जिम्मेदारी थी, आज वह साधु संत सिर्फ धर्म के नाम पर अपने एशो-आराम पूरे कर रहे हैं। भारत की इस विकट स्थिति को देखकर मैं गंभीर चिंता में हूं। मेरी यह चिंता आपको जायज लगती है या नहीं! मुझे नहीं पता, मगर आप एक भारतीय हैं तो मैं यह विश्वास के कह सकता हूं कि आप अपने सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक चीजों से संतुष्ट नहीं होंगे।

                          - दीपक कोहली



15 December 2024

कविता- भारत के लोगों




महान बने ये भारत अपना 
भारत के लोगों तुम सुन लो,
ताँता एक इस तरह बुन लो।

न  हिन्दू कहलाए कोई, न कोई मुसलमान,
भारतीय कहलाने में ही समझें सब अपनी शान।

               सभ्य हों, शिष्ट हों  सब जन,
               गंगा की तरह निर्मल हो सबके मन।

               अविरल वहे सबके हृदय में स्नेह बयार,
               शांति और समृधि की आये नित नई बहार।

जवान रहें सीमा पर सजग और सतर्क,
दंगे-फसादों से न बने देश अपना, नरक।

हर कोई निष्ठा से करे अपना-अपना काम,
आलस्य खाली हाथ रहे ,मेहनत को ही मिले इनाम।

                निस्वार्थ भाव से सेवा करें नेता, क्या अभिनेता,
                हृदय में बसे सबके बस पूजनीय भारत माता।

                हर भारत बासी की हो स्वच्छ ,सुन्दर छवि,
                है दमकता ज्यूँ  नील गगन में बेदाग रवि।

बार-बार इस धरा पर महापुरषों के हो अवतार,
आदर्श बन मानव जाति के लिए जो करें सबका उद्धार।

चारों ओर छाई रहे हरी-भरी हरियाली,
हर दिन हर घर में मनाई जाए रोज दिवाली।

                 बच्चा-बच्चा पाए रोटी ,स्वास्थ्य और शिक्षा ,
                 मजबूर रहे न कोई ,न माँगे कोई भिक्षा।

                 साकार हो जाए फिर शहीदों का वो चिरसंचित सपना,
                 पर्याय स्वर्ग का बन , महान बनें ये भारत देश अपना।


                                                          - लता कुमारी धीमान



25 February 2017

  विलुप्त होती, हमारी बोली..।

मारा देश विभिन्न संस्कृतियों और भाषाओं का देश माना जाता हैं। यहां हर राज्य की अपनी - अपनी संस्कृति और अपनी - अपनी बोलियां हैं। जिसमें हमारा उत्तराखंड ( देवभूमि ) भी है। जो अपनी संस्कृति के लिए पूरे भारतवर्ष में जाना जाता है। वहीं आज हमारे देश की कई भाषाएं विलुप्त होती दिख रही हैं। जिसमें हमारी उत्तराखंड की भी कई भाषाएं शामिल हैं। आइये आपको बताते है। हमारे उत्तराखंड में कितनी बोलियां (भाषाएं) बोली जाती हैं। सन् 1906 से लेकर 1927 तक चले 'जार्ज गियर्सन'  की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में कुल 13 भाषाएं बोली जाती हैं। जिसमें गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी, जौनपुरी, जौहारी, रवाल्टी, बांगडी, माच्छार, राज़ी, जाड़, रंग ल्वू, बुकसाणी, थाल हैं। जो उत्तराखंड की कई स्थानों में बोली जाती हैं। जिसमें कुमांऊनी  और गढ़वाली उत्तराखंड की प्रमुख भाषा हैं। कुमांऊनी भाषा कुमांऊ मंडल तो गढ़वाली भाषा गढ़नवाल मंडल में ज्यादा बोली जाती हैं।  

आज उत्तराखंड में हिंदी और अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव से कुमांऊनी और गढ़वाली भाषा विलुप्त होती जा रही हैं। जो वहां की संस्कृति के लिए एक विशाल खतरा है। वैसे कुमांऊनी और गढ़वाली भाषा हिंदी की सहायक भाषा है। वैसे आपको बता दूं, कि कुमांऊनी भाषा देश की   325 मान्यता प्राप्त भाषा हैं। जो आज विलुप्त होने की कगार पर है। कुमांऊनी भाषा देवनागरी लिपि की भाषा है। जो देवनागरी में लिखी जाती है। वहीं यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार इन भाषाओं को संरक्षण की जरूरत है। जिसका मुख्य कारण लोगों में सोशल मीडिया और आधुनिक होना है। वहीं कुछ विशेषज्ञ का कहना है, कि जिसका एक कारण पलायन भी है। क्योंकि रोजगार की कमी के कारण यहां के युवा बड़े शहरों की ओर भाग रहे है। जिससे उन्हें अपनी भाषा छोड़ अंग्रेजी, हिंदी आदि भाषा अपनानी पड़ती हैं। जो यह दर्शाती है, मजबूर होकर लोग अपनी भाषा छोड़ रहे हैं। अगर उत्तराखंड को अपनी ये भाषाएं बचाई रखनी है, तो यहाँ के युवाओं को आगे आना होगा। जिससे यहां के युवाओं को एक नया जोश मिलेगा। वैसे केंद्र सरकार को भी इस विषय में सोच-विचार करने की जरूरत है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो, ये सब भाषाएं विलुप्त हो जाएंगी। जिससे हमारी संस्कृति में असर पड़ेगा। हम आधुनिकता के चलते अपनी संस्कृति होते जा रहे है। जो हमारे समाज के लिए कलंक साबित हो रहा है। क्यों हम अपनी संस्कृति छोड़े या खोए..?

                                       संपादक- दीपक कोहली