साहित्य चक्र
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19 December 2024

भारत का अंधकारमय भविष्य!




कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है कि भारत का भविष्य अंधकार में है। यह मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मुझे वर्तमान में भारत वैचारिक रूप से विकलांग नजर आ रहा है।  हम अपनी जनसंख्या वृद्धि नहीं रोक पा रहे हैं और लगातार कम होते जंगलों को नहीं रोक पा रहे हैं और इसके अलावा हमारे देश में लगातार खेती कम होती जा रही है।  इतना ही नहीं बल्कि धार्मिक वैचारिकता भी हमारे देश से गायब होती दिखाई दे रही है। आज हमारे तथाकथित साधु संतों ने धर्म को व्यापार बना दिया है। एक वक्त हुआ करता था जब भारतीय समाज आर्थिक, वैचारिक और धार्मिक रूप से काफी समृद्ध था। मगर वक्त की सुई ने भारत से ये सब छीन लिया है। भारतीय समाज से सुकून गायब हो गया है। हर व्यक्ति पैसे के पीछे पागल है और अंधाधुंध पैसा कमाने के बावजूद भी लोगों को शांति नहीं मिल पा रही है। क्या कारण है कि आज भारतीय समाज भटका, बंटा और अस्वस्थ नज़र आता है। शायद हमारे समाज ने मेहनत करना बंद कर दिया है या फिर इन आधुनिक तौर-तरीकों और संसाधनों ने हमें बिगाड़ दिया है। मैं दावे के साथ कहता हूं कि आज भारत का कोई भी घर ऐसा नहीं होगा जहां महीने में कम से कम 200-500 की दवाई नहीं आती होगी। अगर नहीं आती है तो वह सिर्फ मजदूर या गरीब होगा जो बीमारी का इलाज नहीं कर सकता है या फिर वह बीमारी को सीरियसली लेता ही नहीं है।

खैर! भारतीय समाज जिस दिशा की ओर आगे बढ़ रहा है उस दिशा को देखकर मुझे सामने सिर्फ अंधकार नज़र आता है। उस अंधकार को देखकर मुझे डर लगता है कि कहीं हम अपनी धार्मिक, पौराणिक और आर्थिक समृद्धि को ना खो दें। भारतीय समाज से सामाजिक चिंतन खत्म हो गया है। जातिवाद और पूंजीवाद की खाई गहरी हो गई है। कभी जो भारत प्रकृति का धनी था, वह लगातार प्रकृति‌ विनाश कर अपनी कब्र खोद रहा है। वह दिन दूर नहीं जब हिंदू समाज को अंतिम संस्कार करने के लिए लकड़ी तक उपलब्ध नहीं होगी क्योंकि जिस तेजी से भारत से जंगल खत्म हो रहे हैं उससे तो यही लगता है।

बाकी सोशल मीडिया के इस दौर ने लगभग हर भारतीय को आलसी, अय्याश और नचनिया बना दिया है। सामाजिक और सांस्कृतिक जागरूकता के नाम पर हम सिर्फ सोशल मीडिया पर सकारात्मक पोस्ट कर या स्टेटस लगाकर अपनी आत्मा को संतुष्टि दे रहे हैं। आगामी वर्ष में एक विशाल धार्मिक मेला लगने वाला है। इस मेले को कभी धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक चिंतन के रूप में देखा जाता था, मगर आज इसे सिर्फ नहाने का उत्सव बना दिया गया है। वैसे यह मेला पवित्र नदियों के संगम किनारे आयोजित होता है, पवित्रता तो दूर की बात संगम में नदियां नाले जैसी हो गई है। कभी जिन साधु संतों के ऊपर सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक चिंतन की जिम्मेदारी थी, आज वह साधु संत सिर्फ धर्म के नाम पर अपने एशो-आराम पूरे कर रहे हैं। भारत की इस विकट स्थिति को देखकर मैं गंभीर चिंता में हूं। मेरी यह चिंता आपको जायज लगती है या नहीं! मुझे नहीं पता, मगर आप एक भारतीय हैं तो मैं यह विश्वास के कह सकता हूं कि आप अपने सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक चीजों से संतुष्ट नहीं होंगे।

                          - दीपक कोहली



20 November 2024

भारतीय दर्शनशास्त्र का महत्वपूर्ण दर्शन!



चार्वाक दर्शन भारतीय दर्शनशास्त्र का एक महत्वपूर्ण और प्राचीन दर्शन माना जाता है। इसे लोकायत और भौतिकवाद भी कहा जाता है। यह दर्शन एक नास्तिक दृष्टिकोण को अपनाता है। हिंदू वेदों और धार्मिक मान्यताओं को नकारता है। चार्वाक दर्शन का नाम उसके प्रवर्तक चार्वाक से लिया गया है, हालांकि चार्वाक के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। इसलिए चार्वाक को लेकर विभिन्न मत सामने आते हैं। 

चार्वाक दर्शन पूर्ण रूप से भौतिकवादी माना जाता है। चार्वाक के अनुसार केवल भौतिक पदार्थ ही वास्तविक है और इस संसार का अस्तित्व भौतिक पदार्थों से ही जुड़ा हुआ है। आत्मा, परलोक और अलौकिक अस्तित्व यानी ईश्वर, अल्लाह, गॉड आदि नाम की कोई शक्ति नहीं है। चार्वाक दर्शन मानता है कि ज्ञान का मुख्य स्रोत केवल इंद्रियाँ हैं। हम जिन्हें देख, सुन और महसूस कर सकते हैं, वही सत्य है। बाकी अलौकिक अनुभव सिर्फ एक भ्रम या डर है। 

चार्वाक दर्शन कहता है कि धार्मिक अनुष्ठान और कर्मकांड केवल समाज में नियंत्रण और डर उत्पन्न करने के उपाय हैं। किसी भी धर्म या ईश्वर में विश्वास करने का कोई आधार नहीं है, क्योंकि धार्मिकता केवल अंधविश्वास और निरर्थकता पर टिकी हुई है। धार्मिक व्यक्ति गलत काम करने के बाद ईश्वर से क्षमा मांग कर दोबारा गलत काम करते हैं। 

अगर ईश्वर है तो फिर धार्मिक ग्रंथों में गलत चीजों से बचने के लिए क्यों कहा गया है, जबकि सही-गलत का नज़रिया सबके लिए अलग-अलग हो सकते है। इसके अलावा जब सब कुछ ईश्वर कर रहा है या ईश्वर के बिना पत्ता भी नहीं हिलता है तो फिर सही और गलत की परिभाषा ही खत्म हो जाती है। 

मनुष्य का जीवन और शरीर एक भौतिक संरचना है, जिसका मृत्यु के बाद कोई अस्तित्व नहीं रहता है। मृत्यु के बाद केवल शरीर का विघटन होता है और आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है। हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य सुखों का भोग करना है। सुख पाने के लिए धार्मिक और आत्मिक सिद्धांत की आवश्यकता नहीं होती है। चार्वाक का प्रमुख सिद्धांत है- “यावज्जीवेत सुखं जीवैत” यानी जब तक जीवित हो, आनंद का अनुभव करो। 

चार्वाक दर्शन भूतकाल और भविष्य काल को नकारता है और वर्तमान जीवन को सार्थक मानता है यानी जीवन यथार्थवादी है। मानव समाज में हमेशा से व्यक्तिगत सुख और भौतिक समृद्धि को महत्व दिया जाता रहा है। आज हर इंसान व्यक्तिगत सुख और भौतिक समृद्धि के लिए मेहनत कर रहा है। यही नहीं बल्कि धर्म से जुड़े लोग भी भौतिक समृद्धि से अछूते नहीं रहे हैं। 

चार्वाक दर्शन भारत के अन्य दर्शनों से अलग है। यह दर्शन भौतिकवाद, नास्तिकता और तात्कालिक सुखों पर आधारित है। इस दर्शन की खूब आलोचना होती है, मगर यह दर्शन भारतीय दर्शन में एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इसलिए अन्य दर्शनों के मुकाबले चार्वाक दर्शन की चर्चा ज्यादा होती है। हमारा आज का जीवन चक्र अन्य दर्शनों के मुकाबले चार्वाक दर्शन की ओर अधिक झुका दिखाई देता है।


                                               - दीपक कोहली



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