साहित्य चक्र
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04 September 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 04 सितम्बर 2026





कैसे भूल जाऊँ अपनी गाँव की पावन मिट्टी।
जेहन में कौंध रहा जिनकी यादें खट्टी मिठी॥
बचपन से सिखाया ना रोना सदा मस्कुराना।
शहर में आकर मैं बन गया सबका बेगाना॥

शुद्ध हवा शुद्ध पानी की नदी थी हमें प्यारी।
अमुवा के बगीचे में बीतता था वक्त हमारी॥
पहाड़ों से आती थी जब शेर की दहाड़।
सीने में धड़कता था बैरी जन का भी प्यार॥

बाग बगीचे हरी भरी वन व घर की गुलशन।
मेहमानों का भी मोह लेते थे उनके चित्तमन॥
कोयलिया काली काली की करूण पुकार।
याद आती है नित्य हमें घर व गाँव जवार॥

माता पिता का था घर में एकलौता  दुलारा।
उनके लिये मैं था एक अनमोल ही सितारा॥
ये पत्थर के महल ये कंकरीट पथ अनजाना।
मजबूरी में भी नहीं होता इस शहर में जमाना॥

काश ! ये पापी पेट, जीवन में ना हमें रूलाता।
रोटी कमाने शहर हमें, कभी ना बुलाता॥
गाँव की पर्णकुटी था, स्वर्ग सा अपन नजारा।
सुकून देता था घर का टूटी खाट पे सारा॥

- उदय किशोर साह


*****


साथ सच का

जीवन में हमेशा सही के साथ चले हैं,
शायद तभी आज अकेले खड़े हैं।
हमें चाहिए ही नहीं
गलत लोगों का साथ,
क्योंकि कुछ रिश्ते सिर्फ़ दिखावे के होते हैं,
सामने अपनापन जताते हैं,
और पीछे से
आपकी जड़ें खोद जाते हैं।
हमने तो सच को ही अपना साथी माना है,
सच की राह को ही अपना रास्ता जाना है।
फिर भला दुनिया की भीड़ से
क्यों डरें हम,
जब सिर पर रब का हाथ है,
तो किस बात का संशय,
किस बात का डर है?
मन को उम्मीद के धागे से बाँध रखा है,
विश्वास की लौ को अब भी जला रखा है।
कर्म के पथ पर
निर्भय होकर कदम बढ़ाते हैं,
जो होगा, अच्छा ही होगा-
बस इसी विश्वास के साथ
यूँ ही चलते जाते हैं।
न किसी से शिकायत,
न किसी से होड़,
सच का साथ हो
तो अकेलापन भी
ईश्वर का दिया हुआ एक सुकून है।
क्योंकि भीड़ में खड़े होने से बेहतर है,
सच के साथ अकेले खड़ा होना।

- पूनम गूंजा


*****


क्या है मेरिट ?
मैं पूछता हूं!
एक व्यक्ति,
अपनी पीढ़ी का
पहला साक्षर है।
यानी उसके माता-पिता,
दादा-दादी अनपढ़ थे।
तथाकथित मेरिट के अनुसार!
जबकि वे कुशल कारीगर थे।
जिन्हें तुम आज!
सिविल इंजीनियर...
फैशन डिजाइनर...
हेयर डिजाइनर...
और वैज्ञानिक कहते हो।
जरा! अपने दादा-दादी से पूछो
कि तुम्हारा पुश्तैनी घर
किसने बनाया था ?
क्या घर बनाना,
मेरिट में नहीं आता ?
क्या विशाल मंदिर बनाना
मेरिट में नहीं आता ?
क्या चमड़ा उतार कर
जूते-चप्पल बनाना
मेरिट में नहीं आता ?
फिर! तुम्हारी मेरिट में
क्या आता है ? और
इस तथाकथित मेरिट का
आधार क्या है ?
ना बराबर संपत्ति...
ना बराबर व्यापार...
ना बराबर जमीन...
ना बराबर अधिकार...
कही तुम्हारी मेरिट,
जातिवादी तो नहीं है!

- दीपक कोहली


*****


हादसा हो जाऊं

तेरी नज़रों सी नज़र मैं कहां से लाऊं,
बेसबब क्यों मैं तुझ से ख़फ़ा हो जाऊं।

राबता मुझसे महफ़िल में नहीं था उसका,
बेहतर है खामोशी से अब मैं दफ़ा हो जाऊं।

मायूस जुस्तजू है दिल भी टूटने वाला,
सफ़ीना मेरा डूबे, मैं हादसा) हो जाऊं।

अफ़साना मेरा किसी अफ़साने में नहीं,
बहती रहे आंखें टूटा आइना हो जाऊं।

छेड़ते क्यों हैं बरसों पुराने मंज़र मुझको,
दीदार का यारब कोई तो बहाना हो जाऊं।

शर्मिंदा न कर तर्केतालुक़ करके मुश्ताक़,
मेरी तो यही तमन्ना के बस में तेरा हो जाऊं।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


*****


दरवाज़ा खुला रहने दो

दरवाज़ा खुला हो
तो ज़रूरी नहीं
आँधियाँ ही घर में आएँ,
कभी किसी सुबह की
सुनहरी धूप भी दस्तक देती है।
हर खुली खिड़की
खतरे का संकेत नहीं होती,
कभी कोई खूबसूरत पंख
उड़ता हुआ भीतर आता है,
और सूने आँगन में
उम्मीद के रंग भर जाता है।
हाँ, कुछ हवाएँ
घर अस्त-व्यस्त कर जाती हैं,
मगर हर हवा तूफ़ान नहीं होती,
कुछ हवाएँ तो
बंद कमरों में
जीने की खुशबू भर जाती हैं।
कभी-कभी
ज़िंदगी भी तो
पंख लगाकर आती है,
और बस इतना चाहती है
कि कोई दरवाज़ा खुला हो…!

- नरेंद्र मंघनानी


*****


जीवन का सार बस प्यार

जीवन का सार है, बस प्यार
प्यार बिना जीवन है बेकार
इस बात से क्यों करते है इंकार
जीवन है तो होगा ही प्यार।

प्यार का मतलब सब में है भिन्न-भिन्न
जितने भी रिश्ते है, सब में ये है अभिन्न
भाई का भाई के प्रति है प्यार
माता पिता का बच्चों से है प्यार।

दोस्ती में दोस्ती जैसा है प्यार
तो भाई-बहन का है अनोखा प्यार
पेड़-पौधों से भी होता है प्यार
तो जीव-जंतुओं में भी है आधार।

एक-दूसरे से करो सब प्यार
सुकून की जीवन का रहे हकदार
बनेगा बहुत सुन्दर सा संसार
जीवन का सार है, बस प्यार और प्यार।

- चुन्नू साहा


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काम नेकी का हरदम किया कीजिए।
मुफ़्लिसों का सदा तुम भला कीजिए।।

देख राहों में काँटे रुके ना कदम।
साथ अपनों के हरदम चला कीजिए।।

प्रेम तेरा कभी कम न हो साथिया।
चाँद-तारों की बातें किया कीजिए।।

हाथ में हाथ तेरा रहे हर जनम।
रब से मेरे लिए ये दुआ कीजिए।।

दिल की हसरत थी जो वो मिली ही नहीं।
ज़िंदगी से भला क्या गिला कीजिए।।

- रति सिंह 'रिंकी'


*****


वो सच को क्या समझेंगे
जो जीवित है सिर्फ अभिनय में।
नित लिपटे हैं रति से,
कब डुबोया खुद को प्रणय में।
देह की भूख मन की
कहाँ भरपाई करता है?
वासना-भावना ऐसे ही
खेलतीं हर सांस हर शय में।

- राधेश विकास


*****


युवा पीढ़ी क्यों गांवों को भूलती जा रही

एक दिन वह गांव का घर भी छूट जाएगा
वह शहर का घर भी नहीं बचा पायेगा
जाना तो पड़ेगा अकेले उस मंजिल की ओर
जहां से फिर कोई वापिस नहीं आएगा

घर का आंगन मिट्टी से भरा हुआ
वह कच्ची दीवारें भी मिट्टी में समा जाएंगी
एक एक ईंट पत्थर जोड़ कर बनाया था जिहोने
उनकी यादे भी धीरे धीरे धुंधली नज़र आएंगी

सब मस्त हैं सब की अपनी अपनी ज़िंदगी है
बचपन के यार दोस्त कोई अब नहीं बुलाते
कहाँ गए वह सुंदर लम्हें वह अनमोल समय
नाम लेकर दूर से अब कोई आवाज़ नहीं लगाते

सुनसान आंगन में लगे पत्थर अब भी करते हैं याद
एक दूसरे के पीछे दौड़ते कितना होता था वाद विवाद
ऐसा क्या हुआ वक्त ने कैसी यह करवट बदली
हर कोई क्यों चाह रहा गांव से होना आज़ाद

शहर की ज़िंदगी क्यों सभी को रास आ रही
एकदूसरे से अनजान ऐसी ज़िन्दगी क्यों भा रही
गांव अब वैसे नहीं रहे तेजी से हो रहा विकास
फिर भी युवा पीढ़ी क्यों गांवों को भूलती जा रही

शहर तो शहर है कभी किसी का अपना न हुआ
युवा पीढ़ी को चाहिए बना लो गांव में भी एक ठाँव
कोरोना जैसी महामारी से जो हो गया फिर सामना
तो फिर याद आएगा अपना वही छोटा सा गांव

- रवींद्र कुमार शर्मा



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मुझसे उसका नाम बड़ा है।
मुझको इससे लेना क्या है।

जीत हमेशा होगी उसकी,
अफ़वाहों से कौन डरा है।

वो कैसे बिल्ली पालेगा,
जिसने तोता पाल रखा है।

पहले ही तासीर है कड़वी,
और करेला नीम चढ़ा है।

भूख मिटेगी किससे किसकी,
दाने -दाने पर लिक्खा है।

उसको डर है खो जाने का,
जिसको ज़्यादा साथ मिला है।

साथ हमारे दूर सफ़र में,
कौन पराया कौन सगा है।

सबकी अपनी-अपनी हस्ती,
अपना-अपना फ़न, रुतबा है।

- नवीन माथुर पंचोली


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काया कंचन

आँखों से हिय में गया उतर,
अब मौन प्रीत हो गई मुखर।
वो छुवन दुपहरी धूप हुई,
काया कंचन-सी गई निखर।

नयनों में नूतन स्वप्न सजे,
साँसों में सुरमई साज़ बजे।
तपती दुपहरी शीतल हो,
जब संग प्रिये का रूप सजे।

धड़कन की गति पल-पल बढ़े,
चंदन-सी चाहत मन में चढ़े।
इस चंचल मन के आँगन में,
चाहत के मधुर चिराग जले।

चमकी चाहत की छाँव घनी,
हर साँस आज सर्वस्व बनी।
मीरा के मोहन मिल ही गए,
सुंदर-सी यह सांझ बनी।

                                - सविता सिंह मीरा


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31 August 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 31 अगस्त 2026




अगर ऐसा होता
अगर पुरुषों के पीरियड्स आते,
तो यक़ीनन दुनिया बड़ी संवेदनशील होती
हर महीने चार दिन
ऑफिस में “Menstrual Leave” होती,
और दर्द को “मूड स्विंग” कहकर
हँसी में नहीं उड़ाया जाता।
चाय की प्याली के साथ
दर्द की दवा भी मिलती,
और पत्नी बड़े प्यार से कहती यह बात
“आज आराम कर लो,
घर का काम मैं कर लूँगी।”
टीवी पर विज्ञापन आते
“हर पुरुष का हक़ है,
इन दिनों खुलकर जीना!”
और विज्ञापन के अंत में
कोई सुंदर-सी मॉडल नहीं,
एक डॉक्टर समझाती
“यह प्राकृतिक है।”
स्कूलों में लड़कों को पढ़ाया जाता
“इन दिनों शरीर का विशेष ख़याल रखें,”
और कोई अध्यापक
उन्हें शर्मिंदा करने के बजाय
सहानुभूति सिखाता।
मंदिर के बाहर कोई बोर्ड न होता
“इन दिनों प्रवेश वर्जित।”
बल्कि शायद पुजारी कहते
“ईश्वर ने ही शरीर दिया है,
उसके नियमों पर
मनुष्य की पाबंदी कैसी?”
औरत तब मुस्कुराकर पूछती
“अब समझे साहब,
हर महीने दर्द में भी
रोटी क्यों बनती है?”
शायद तब
उसकी “ना” को आलस नहीं,
उसकी थकान को बहाना नहीं,
और उसके दर्द को
नखरा नहीं कहा जाता।
और सबसे मज़ेदार बात
जिस समाज ने सदियों तक
स्त्री के दर्द पर
चुप्पी की चादर डाल रखी है,
वही समाज शायद
पुरुषों के लिए
“पीरियड्स सेल्फ-केयर किट”
सरकारी योजना में बाँटता।
काश, पुरुषों के भी पीरियड्स आते…
तो शायद ...स्त्री को बराबरी माँगनी नहीं पड़ती
दुनिया खुद समझ जाती
कि दर्द का कोई लिंग नहीं होता,
बस समाज ने उसकी भी जाति बना रखी है।

- डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’


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संस्कार की जननी है बहन!

मां के बाद
सबसे निश्चल प्यार
करने वाली होती है
बहन
सुख दुःख की
सच्ची साथी है
बहन
बहन वो एहसास है
जो कभी भुलाया
नहीं जा सकती
किसी से भी
संस्कार की
जननी है बहन
रक्षा का सूत्र
उसके होने का
प्रतीक है
भाई के सही
रास्ते पर चलने
का दृढ़ निश्चय
प्रतिज्ञा है
जीवन तो
बिना भाई के भी
जिया जा सकता है
बिना बहन के भी
जिया जा सकता है
जीवन
बहन वो एहसास है
जो कभी
विस्मृत नहीं हो सकती।

- मनोज कौशल


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मुंहबोले रिश्तों की नदी

जिन भाइयों की सूनी है कलाई,
जिन बहनों का नहीं कोई भाई,
आज बहुत होती होगी ललक उनमें,
मन में होती होगी कुछ अधूरेपन की कसक।

अगर होते भैया, या होती बहना,
तो मनाते हम भी ये दिन खास।
हम भी कसमें खाते,
बहनों को डोली में बिठाते,
हँसते-खेलते करते उन्हें विदा,
लड़ते-झगड़ते, पर होते नहीं कभी जुदा।

बहना भी सोचती होगी-
गर भैया होते,
तो फिर न होती कोई कमी।
होते पिता जैसे,
या फिर लाड़ले बेटे से,
मिलता उनसे संबल,
जीवन में हर पल।

राह नहीं तकना होता,
की कोई बढ़ाए हाथ,
बस करते मन मानी अपनी,
कह देते दिल की हर बात।

यही तो भाग्य का खेल है-
कोई अपने रिश्ते को खोजे,
किसी के लिए रिश्ते बस खेल हैं।

फिर भी हार कहाँ मानी हमने,
मुंहबोला भाई है,
मुंहबोली बहना है।
रिश्ते खून से ही नहीं,
दिल से भी बनते हैं।

अब रिश्तों की इस नदी को
यूँ ही बहते रहना है,
स्नेह की धारा में
हर मन को कहते रहना है।

- रोशन कुमार झा


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कौड़ियों के मोल

जिन्दगी के लम्हे पहले से ही बहुत कम हैं,
इन्हें लापरवाही से और ख़र्च न कीजिए।

सड़कें हैं जीवन आधार इनका फायदा लीजिए ,
रफ्तार से इन्हें मौत के कुएं में न तब्दील कीजिए।

माना कि रफ्तार के शौकीन हो आप,
इस शौक से जिंदगी को शोक में न बदल दीजिए।

फिर कहां मिलेगी ये हसीन दुनिया,
लापरवाही में जन्नत को दोज़ख न कीजिए।

कोई पलकें बिछाकर करता हैं इंतजार,
उस इंतजार को न लौटने वाला न कीजिए।

खुद तो भुगते हैं की अपनी गलतियों की सज़ा,
अपने कर्मों की सज़ा गैरों को न भुगतने दीजिए।

राह पैमाई के कायदे कानून हैं, अपनाइए उन्हें ,
यूँ जिंदगी को कौड़ियों के भाव में खो न दीजिए।


- राज कुमार कौंडल


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प्रकृति की लीला

नेपाल में बाढ़ आई,
अश्रुओं का सैलाब लिए,
प्रकृति इतनी रूठी हुई,
कि अपने ही प्यारों को
काल के गाल में समा गई।

वक्त था खौफ़ से भरा,
कोई मरा यहाँ,
कोई पड़ा अधमरा।
चारों ओर पसरा था
मौत का सन्नाटा,
हर आँख में दर्द था,
हर दिल में था मातम गहरा।

यही तो लीला है
सृजन और विध्वंस की,
नियति के आगे भला
किसका बस चले?

अब धीरज धरो,
न शोक में डूबो,
जीवन का नाम ही है-
चलते रहना,
गिरकर फिर संभलना
और आगे बढ़ते रहना।

पर कैसी विडंबना है इस जीवन की-
कहीं बेगुनाहों को मिलती सज़ा,
तो कहीं गुनाहगार
पाते हैं इनाम।

यही जीवन की सच्चाई है,
यही नियति का विधान-
कभी आँसू, कभी मुस्कान,
कभी सृजन, कभी विध्वंस,
और फिर भी चलता रहता है
जीवन का कारवाँ।

- रोशन कुमार झा


*****

अंतिम मित्र

आखिरी दोस्त
आखिरी उम्मीद हो तुम।
जीवन के अंतिम अध्याय की
अंतिम कड़ी हो तुम।
मोह का पाश नहीं
स्नेह का अंतिम चरण हो तुम।
मेरे अंतिम जीवन की
अंतिम स्पष्ट किरण हो तुम।
मेरे अधूरे जीवन की
अंतिम मुस्कुराहट हो तुम।
सब कुछ खो जाने के बाद भी
मेरे अंतिम जीवन का
मधुर एहसास हो तुम।
थक सा गया था मैं
युगों के इंतजार के बाद
मेरे अंतिम जीवन के
अंतिम समय का
मोक्ष का आधार हो तुम।

                                  - डॉ. राजीव डोगरा


*****

फौजी की बहन

आ ना सकेगे बहना राखी में अभी घर
सरहद में तनाव है, गश्त है आठों पहर
तू उदास ना हो बहना, राखी भेज देना
एक नहीं अनेक राखी, भेजना तू बहना।

मेरे जैसा तेरे यहाँ बहना, है अनेक भाई
राखी त्यौहार में घर ना आने की उदासी है,
छाई कुछ भाईयों की तो, बहना नहीं है बहन
राखी में उन सबों का उदास रहता है मन।

तू सबके वास्ते बहना, राखी ढेर सारी भेजना
बाँध तेरे राखी को बहना, उमंग से है भरना
यहां सरहद किनारे तेरी जैसी है, अनेक बहना
उन्हीं सबों से ही हमसब को है, राखी बंधाना।

उन सबों में ही तेरी ही परछाई देख लेता हूं
बांधती है जब वो हमें राखी, भावुक होता हूं
और एक बात बहना कि राखी तू उसे बाँध देना
जो उदास बैठा है कोई भाई, जिसे ना है बहना।

- चुन्नू साहा


*****

प्रेम डोर

उपहार ही नहीं रक्षाबंधन प्यार की निशानी है,
राखी भाई बहन के प्रेम अमिट निशानी है।

निश्चल प्रेम तो परमात्मा की निशानी है,
राखी के कच्चे धागों में प्रेम प्रभु की निशानी है।

इस भाग दौड़ के वक्त में सुकून की निशानी है,
रक्षाबंधन तो भाई बहन के दिल की कहानी है।

दौलत की नहीं इसमें जज्बातों की खुश्बू लानी है,
हर तरफ इन कच्चे धागों की महक बिखरानी है।

दिखावा नहीं सादगी की थाल सजानी है,
भाई बहन की ये रस्म सदियों तक निभानी है।

बहनों की इस प्रेम डोर का कोई सानी नहीं है,
हर दुख दर्द जो बांट ले रक्षा बंधन वो कहानी है।

- राज कुमार कौंडल


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क्षणिका

गांव का सुनसान प्लेटफार्म,
बरसती बूँदों की छांव,
पटरी पर धीमे-धीमे
गुजरती ट्रेन की थरथर ध्वनि।
आज फिर वही जगह
जहाँ तुम छोड़ गए थे,
और अब भी प्रतीक्षा में हूँ,
कि लौट आओगे कभी...।

- सविता सिंह मीरा


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प्रेम की आँखें अलग होती हैं

प्रेम की आँखें
चेहरा नहीं देखतीं,
भाव पढ़ती हैं।
वे कमियाँ नहीं गिनतीं,
उनके पीछे छिपी मजबूरियाँ समझती हैं।

दुनिया जहाँ कहती है,
“इसमें क्या खास है?”
प्रेम वहाँ मुस्कुराकर कहता है,
“मेरे लिए तो यही सबसे खास है।”

जिसे प्रेम मिल जाता है,
उसे बदलने की नहीं,
समझे जाने की जरूरत होती है।

क्योंकि प्रेम की आँखें
व्यक्ति को उसकी अच्छाइयों से नहीं,
उसकी पूरी कहानी के साथ देखती हैं।
यही प्रेम है।

- नरेंद्र मंघनानी


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