साहित्य चक्र
Showing posts with label आज की प्रमुख रचनाएँ. Show all posts
Showing posts with label आज की प्रमुख रचनाएँ. Show all posts

26 August 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 27 अगस्त 2026






अंतिम हस्ताक्षर

जब तुम बैठा करते थे मेरे दिल के करीब
उन दिनों मेरे दिल के हुस्न का रुतबा ही कुछ और हुआ करता था
जब से तुम गए हो मेरी जिंदगी से अलविदा कह कर,
अपने लहू से मेरे दिल की जमीन पर अपने अंतिम हस्ताक्षर करके हमारी मोहब्बत के अंत पर,
तब से मेरा दिल अनाथ होकर, बंजर के साथ-साथ शमशान सा हो गया है
अपनी ही ख्वाहिशों में खोई रही मैं
मैंने अपने इस मोहब्बत के रिश्ते में तुम्हारे दिल के एहसासों को कोई अहमियत न दी
सुनो... अब मैं यह जान चुकी हूं कि यह मेरे दिल की खता है
आ जाओ ना मेरी सांसों में वापस, तुम कहीं न जाओ मेरे दिल को छोड़कर
तुम्हें मेरे साथ मोहब्बत में बीते हुए लम्हों की सौगंध है
बहुत बड़ी खुदगर्ज हो तुम
मुझे तुम आज मेरे एक सवाल का जवाब दो
तुम ये कौन से मोहब्बत में बीते हुए लम्हों की बात कर रही हो?
क्योंकि तुम्हारी कहानी के किसी भी लम्हे में, तुम्हारे मुताबिक मैं कभी था ही नहीं
तुम्हारी कहानी में तुम्हारे साथ अगर कोई था,
तो वह थे तुम्हारी ख्वाहिशें, तुम्हारे ख्वाब, तुम्हारा गुरूर, तुम्हारी जिद
और हां, सुनो यह कि मोहब्बत की सौगंध के खेल के लिए तुम कोई दूसरा दिल तलाश कर लेना
मेरे दिल को बख्श दो, तुम मेरा दिल बाजार में बिकने वाला कोई खिलौना नहीं
मैं जानता हूं तुम्हारे दिल में एक छोटी सी उम्मीद जगी होगी
कई सवाल उठे होंगे इतने वर्षों बाद मुझे अपने दिल के द्वार पर देखकर
इससे पहले कि तुम झूठी उम्मीद पालो अपने दिल में मेरी जिंदगी में वापस आने की,
मुझे अपनी ख्वाहिशों का फिर से गुलाम बनाने की,
तो यह बता दूं मैं तुम्हें, मैं तुम्हारे दिल के साथ कोई मोहब्बत के तराने गाने नहीं आया
तुम किसी की मोहब्बत की लायक हो ही नहीं
मैं तो अपने आधे-अधूरे ख्वाब, जो तुम्हारे पास रह गए थे, बाकी उन्हें वापस ले जाने आया हूं
इस कहानी को उसका आखिरी अंजाम देने आया हूं
जाओ, मुझे मेरे ख्वाबों का वह लाल जोड़ा वापस लाकर दो
जो मेरी आंखों ने तुम्हें अपनी दुल्हन के रूप में देखने के लिए दिया था अपने हाथों से
वह मेरी मां की अंतिम निशानी थी
उसमें मेरे पिता की प्रेम कहानी थी
अब मैं तुम्हें अंतिम प्रणाम करता हूं
तुमने तो मोहब्बत नहीं की मेरे दिल से कभी,
पर मेरे दिल में तो तुमसे बेपनाह प्यार किया था
आज मैं अपने उस बेपनाह प्यार के अंत का ऐलान करता हूं।

- आकाश शर्मा 'आज़ाद'



*****


पराया

समझकर भी साथ सदा
देते तो भी समझता तुम मेरे हो ?
हरदम न देते न सही यदा कदा
देते तो भी समझता तुम मेरे हो ?
अगर तुम जिन्दा हो तो
जिन्दा भी नजर आओ जरा बेजमीर!
जनाजा भी समझकर कंधा
देते तो भी समझता तुम मेरे हो।


*****


जहाँ चाह वहाँ राह में
हर दूरियाँ हार गई।
जब निकल पड़े बाँधकर
कफन हर मजबूरियाँ हार गई।
तेरी हर चाल पर हमने
हँस कर गर्दन बिछा दी,
तेरे मुख का राम,
तेरे बगल की छूरियाँ हार गई।

- राधेश विकास


*****


बंद दरवाज़ों में
क्या भावना, भाईचारा,
आदर्श और परंपरा
अब मिलेंगे सिर्फ़ किताबों में ?
कहाँ बची है वह आत्मीयता,
वह मानवीय स्पर्श-
जो कभी रिश्तों की भाषा था,
अब सिमटकर रह गया
कुछ अल्फ़ाज़ों में।
हमने ख़ुद को कैद कर लिया,
अपने ही बनाए कमरों में;
रह गए अकेले,
बनकर अपने ही कैदी
बंद दरवाज़ों में।
ख़ुद ही कहेंगे,
ख़ुद ही सुनेंगे-
दूसरी आवाज़ों के लिए
कहाँ बची जगह?
भूल गए पहचानना
कोयल और कौवे की आवाज़ों में।
कौन खोलेगा फिर
यादों की पोटली,
जो जाने कब से
बंद पड़े हैं
मेज़ की उन दराज़ों में ?

- रोशन कुमार झा


*****


खामोश है होंठ

होंठ खामाेश है पर दो नयन हैं चंचल
मन की भाषा पढ़ लेता है मंजर
आँखों-आँखों में जब होती है मुलाकात
कर लेता है मन की अन्दर की ये बात

हाेठ रहा मौन पर मन जाता है। डोल
दिल की पैगाम पढ़ खोल देता है पोल
आँखों की चमक जब होता है हलचल
बहने लगती है जैसे सरिता बहे कल कल

प्रेम की भाषा को लिपि नहीं बाँध पाया
दिल की चाहत दिल में जा कर  समाया
चुपके चुपके लिख देता है प्रेम जजबात
हो जाता है दिल को दिल से पूरी बात

मन की अल्हड़पन किसी की ना गुलाम
जग वाले को दिखाता अपनी ये पैगाम
मन की उड़ान का ना कोई है बंधन
चंचल मन की गुलशन लागे चितमन

रब ने लिख डाला जब तकदीर की मूरत
पर् मन में बसता है मनचाही एक सूरत
कहाँ ले जायेगा मन ना इसका ठिकाना
डरता नहीं है ये सोंचता क्या करेगा जमाना

- उदय किशोर साह


*****


न के आकर्षण से चला, मन का पहला ज्ञान।
मोह-जाल में उलझता, भटका मेरा ध्यान॥

रूप-सौंदर्य की चाह में, बीता जीवन-काल।
इच्छाओं के फेर में, मन भी था बेहाल॥

नारी केवल देह नहीं, नारी जीवन-धार।
उसमें ममता, प्रेम है, बसता स्नेह अपार॥

माँ के आँचल में मिला, जीवन का उपहार।
ममता के उस दूध में, पाया सच्चा प्यार॥

जिसको केवल रूप ले, मन ने माना खास।
माँ की ममता देखकर, मिटे सभी भ्रम-पाश॥

तन से मन की ओर फिर, बढ़ने लगा विचार।
प्रेम हुआ जब मातृमय, बदला ये संसार॥

काम-कुहासा छँट गया, जागा निर्मल ज्ञान।
नारी के सम्मान में, देखा सच्चा मान॥

मीरा, सूर, कबीर से, सीखा प्रेम-विवेक।
देह नहीं आधार है, निर्मल भाव है नेक॥

नारी को सम्मान दो, मत बाँटो आकार।
उसकी चेतन आत्मतव, समझो सदा उदार॥

माँ, बहना या प्रेमिका, सभी रूप अनमोल।
इनके पावन प्रेम का, जग में कहाँ है मोल॥

मोह ने मुझे बाँधकर, रखा बहुत दिन दूर।
ममता ने तब खोल दी, अंतर की हर डोर॥

अब नारी को देखता, केवल देह न मान।
उसमें जीवन, प्रेम है, उसमें पूरा प्राण॥

क्षमा करो हे मातृरूप, मेरे मन के रोष।
पावन ममत्व रूप ने, हर ली मन की दोष॥

कभी स्तनों ने बाँधकर, उलझाया था ध्यान।
मातृत्व ने मुक्त कर, बदली सब पहचान॥

- डॉ. सत्यवान ‘सौरभ’


*****


चिट्ठी लाई गाँव से, जब राखी उपहार।
आँसू छलके आँख से, देख बहन का प्यार।।
रेशम की डोरी सजी, लेकर नेह अपार।
बहना के विश्वास का, भाई है आधार।।
रक्षा बंधन प्रेम का, हृदय का त्योहार।
इसमें बसती द्रौपदी, है कान्हा का प्यार।।
कहती हमसे राखियाँ, तुच्छ सभी स्वार्थ।
बहनों की शुभकामना, जीवन करे सिधार्थ।।
भाई-बहना नेह के, रिश्तों के आधार।
इस धागे के सामने, सब कुछ है बेकार।।
बहना मूरत प्यार की, माँगे ये वरदान।
भाई को यश-बल मिले, बढ़े सदा सम्मान।।
दूर देश में हो भले, भाई अपना यार।
राखी लेकर लौटती, बचपन की झंकार।।
बचपन जुड़ी शरारतें, आँगन की मुस्कान।
राखी आते ही जगे, भूली हर पहचान।।
थाली में रोली सजी, दीपक ज्योति अपार।
बहना तिलक लगा कहे, रहना तुम खुशहाल।।
माँ की ममता-सी लगे, बहना का व्यवहार।
उसके मन की कामना, भाई का संसार।।
राखी बंधन बस नहीं, इसमें स्नेह महान।
जोड़ रही है आज भी, रिश्तों की पहचान।।
सुख में हँसना साथ में, दुख में बनना ढाल।
भाई-बहना का यही, रिश्ता है खुशहाल।।
धन-दौलत सब क्षणिक हैं, रिश्ते हैं अनमोल।
राखी बाँधे प्रेम से, खुल जाए मन मोल।।
मन में यदि हो प्रेम तो, दूरी हो निस्प्रभाव।
राखी के इस पर्व मिट, जाए सभी दुराव।।
बहना के आशीष से, खिल उठता परिवार।
उसकी हँसी में बसे, खुशियों का संसार।।
रिश्तों में सम्मान हो, मन में निर्मल भाव।
रक्षा बंधन दे सदा, प्रेम-स्नेह का चाव।।
सब बहनों पर यदि करें, मन से सच्चा गर्व।
होता तब ही मानिए, रक्षा बंधन पर्व।।

- डॉ. प्रियंका 'सौरभ'


*****


धागों का यह बंधन न टूटे अटल रहे

राखी भाई बहन के प्यार का अनूठा है बंधन
जो बड़ी धूमधाम से हर वर्ष मनाया है जाता
बहुत दूर भी रहते हो भाई बहन
मगर धागे से बंधा प्यार एक संदेश है लाता

बचपन में खेलते खेलते किसी
बात पर हो जाती थी तकरार
इक दूजे के बिना नहीं रह पाते थे
आपस में था बहुत प्यार

बचपन के राक्षबन्धन के होते थे अजब नज़ारे
उस दिन भाई ही लगते हैं सब बहनों को प्यारे
कितने भी पिटे हों या पीटे हों बच्चपन में
गले लगती हैं बहनें भूल कर शिकवे सारे

झूठ बोल कर जब बहन पापा से पिटवाती थी
जब रोते थे तो चुप करवाने खुद ही आ जाती थी
लेकिन राखी वाले दिन बड़े प्यार से बुलाती थी
कुमकुम अक्षत और फूल का टीका माथे पर लगाती थी

कलाई पर राखी बांध कर हमको मिठाई खिलाती थी
शादी के बाद अब कभी कभी ही है आ पाती
याद बहुत करती है अपने भाई को
हर वर्ष रक्षा बंधन पर राखी जरूर है भिजवाती

राखी को देख कर वो बचपन है याद आता
जब भाई रक्षाबंधन को बहन को था बुलाता
भाई और बहिन का आज का नहीं
यह तो जन्मों जन्मों का है नाता

ज़माने के साथ बदल गया इसको मनाने का ढंग
अब तो राखियों के आ गए हैं बाजार में कई रंग
जहां राखी पहले होती थी कच्चा धागा हाथ से बनाया
अब तो राखियों की कीमतें देख कर रह जाते सब दंग

अब राखियां कई रंगों की कई डिजाइनों में है मिलती
कोई दस कोई बीस की कोई हज़ारों की है बिकती
राखी की कीमत से क्या लेना खुश रहे सारा संसार
धागों का यह बंधन टूटे न अटल रहे भाई बहन का प्यार

- रविंद्र कुमार शर्मा


*****


राखी का बंधन

राखी का त्योहार है प्यारा,
भाई-बहन का रिश्ता न्यारा।
स्नेह-सुधा से बंधता बंधन,
पावन होता प्रेम का आँगन।
भाई देता बहना को रक्षा का विश्वास,
बहना के चेहरे पर खिलती खुशियों की आस।
हर वर्ष ये पर्व नई खुशियाँ लाता,
रिश्तों में प्रेम का दीप जलाता।
सरहद पर जब वीर जवान,
रखते हैं भारत की आन-बान।
बहनों की राखी याद दिलाती,
मातृभूमि की शान बढ़ाती।
राखी केवल धागा नहीं,
यह प्रेम, त्याग की गाथा सही।
आओ आज संकल्प उठाएँ,
हर बहना की लाज बचाएँ।
देश की धरती, देश का मान,
रहे सदा ऊँचा तिरंगा महान।
रक्षा का यह पावन बंधन,
जग में सबसे सुंदर बंधन।

                                      - गरिमा लखनवी


*****


ग़ज़ल

वो निगाहों को रोज़ छलता है।
चाँद छुप -छुप के जो निकलता है।

राह तकता हूँ मैं वहाँ उसकी,
वो वहाँ रास्ता बदलता है।

रोज़ सूरज सा मैं दहकता हूँ,
वो किसी बर्फ़ सा पिघलता है।

चाहता हूँ मैं देखकर उसको,
वो किसी और पर मचलता है।

है मुझे उसपे तो यकीं सारा,
वो मेरे हाल पर संभलता है।

किस तरह मान लूँ सदा उसकी,
जो कही बात से फिसलता है।

- नवीन माथुर पंचोली


*****


निज विधु की चाँदनी

एक ढलती संध्या, दर्पण किया साफ़,
उसने कहा, "देर से ही सही, आ गई पास।
आई हो अब, जब घिर आई है यामिनी,
फिर भी तू दीप्त है, जैसे चपल दामिनी।

क्यों इतना आकुल-व्याकुल है तेरा मन ?
आ बैठ समीप मेरे, क्षण दो क्षण।
कह दे कुछ, सुन ले कुछ मन की बात,
अब मत छिपा अंतस के जज्बात।

परिधि से निकल अब तू बाहर,
तृषा बुझा अपनी, भर-भर गागर।
लगाती थी कभी तुम कजरारे काजल,
स्मरण है, कितने थे तेरे ही कायल!

अब क्या हुआ जो तू हुई गामिनी ?
निज विधु की तो तू ही है चांदनी!
कितने भी हों ये तिमिर घनेरे,
चांदनी तू ही तो जग में बिखेरे।

बरस जा तू तृषित धरा पे सावन की तरह,
बिखर जा तू वसुधा में मुक्ता की तरह।
टप-टप बिखरेंगे जब ये मुक्ता-कण,
मानो हँस पड़ा हो तेरा अंतर्मन।

आरसी में देखा जब पुनः खुद को,
ढूंढ लिया मैंने अपने वजूद को।
लौट आई फिर वही मंद मुस्कान,
जिससे अब तक थी मैं अनजान।

मृण्मय नयनों में डाला फिर काजल,
लहरा उठा पुनः मेरा आँचल,
जैसे किसी बंदी खग को,
मिल गया हो उन्मुक्त नभ-मंडल।

- सविता सिंह मीरा


*****


यूपीआई: जेब से दुनिया तक

न जेब में सिक्कों की खनक, न नोटों की कोई कतार,
मोबाइल उठाया, पिन लगाया, पल में हुआ कारोबार।
दस वर्ष पहले जो सपना था, आज वही पहचान बना,
छोटे चायवाले तक पहुँचा, "डिजिटल" हिंदुस्तान बना।

न बैंक की लंबी लाइन रही, न ही छुट्टे का झंझट भारी,
एक क्लिक में भुगतान हुआ, आसाँ हुई दुनिया सारी।
कभी पैसे भेजना मुश्किल था,अब पल में पहुँच जाता,
दूर खड़ा अपना इंसान भी मोबाइल से पास हो जाता।

बाजारों से लेकर गलियों तक, इसकी गूँज सुनाई देती,
भारत की डिजिटल ताकत, दुनिया को "राह" दिखाती।
तकनीक तब ही महान है, जब जन-जन के काम आए,
यूपीआई की यह छोटी-सी धारा देश को आगे ले जाए।

नोट से डिजिटल सफर तक, बदला भुगतान का संसार,
दस साल की यात्रा ने बढ़ाया भारत का "गौरव" अपार।
कल जो थी कल्पना कभी, आज हकीकत बनकर आई,
मोबाइल की लघु स्क्रीन ने भारत की तस्वीर बदलवाई।

- संजय एम तराणेकर


*****


औरत कांच की सतह की तरह पारदर्शी है
इसमें आप देख सकते हैं, अपना प्रतिबिम्ब।
जितना अधिक प्यार से इसे पोंछेंगे,
उतना अधिक चमकदार आपका प्रतिबिम्ब होगा।
एक औरत के अंदर आप छुपे होते हैं विभिन्न रूपों में।
आपकी छवि उसकी लज्जा के अंदर है,
अगर आप ज़िद्द से इसे एक दिन तोड़ते हैं,
तो आपकी छवि हजार टुकड़ों में बिखर जाएगी।
और फिर लाख कोशिश के बाद भी,
उस मोहक प्रतिबिम्ब के लिए तरस जाओगे।
जब भी तुम हाथ फेरोगे, इन टूटे-जुड़े टुकड़ों पर
हमेशा एक जख्म पाओगे अपने हाथों में।
स्त्री सबके लिए बहुत ही अनमोल है
और वे सबसे अच्छी उपहार हैं।
जो ईश्वर ने सभी मर्दों को दिया है,
एक मां, एक बहन, बेटी, एक पत्नी और
बहुत सच्ची दोस्त के रूप में।

औरत होना इतना आसान नहीं,
आधे से ज्यादा अरमान दिल में ही दफ़न होते हैं।

- सुमन डोभाल काला


*****


फ़र्ज़ वतन का, दुआ बहन की

तिरंगे की आन हो तुम, इस वतन की शान हो तुम,
दूर रहकर भी भाई, हमारी धड़कन और जान हो तुम।
ना कहना ऐसा कभी कि तिरंगा ओढ़ कर आओगे,
सलामती की दुआ है मेरी, तुम जीतकर घर आओगे।

कलाई सूनी रहे तो रहे, पर तुम्हारा सर सलामत रहे,
सरहद पर खड़ा मेरा वीर भाई, हर पल खुशहाल रहे।
राखी का धागा मेरा, तेरी हिफाज़त का आस बनेगा,
तू लौट कर आएगा वापस, यह बहन का विश्वास रहेगा।

बूढ़ी माँ की आँखों में, तेरे लिए बस प्यार और दुआएँ हैं,
तेरी सलामती के लिए उठीं,घर के हर कोने से सदाएँ हैं।
फर्ज़ निभाओ तुम वतन का, हम घर का फर्ज़ निभाएंगे,
अगली राखी पर भैया, हम मिलकर खुशियाँ मनाएंगे।

-सूरजमल AkS


*****


रक्षाबंधन

बहन की थैली में
हर साल एक नया सपना होता है,
राखी से कहीं अधिक उसमें
भाई की मुस्कान का अपना होता है।

दुकान-दुकान नहीं,
वो जैसे दिल-दिल भटकती है,
हर रंग, हर धागे में
भाई की कलाई ढूँढ़ती है।

रंग गहरा हो या हल्का,
कीमत कहाँ उसे भाती है,
बस एक ही बात देखती है...
“ये राखी मेरे भाई पर कितनी सजती है।”

राखी चुनते-चुनते
कभी बचपन लौट आता है,
वो छोटी-सी जिद, वो रूठना,
फिर चुपके से मान जाना याद आता है।

कभी उन मीठे झगड़ों की
हँसी कानों में गूँजती है,
और आँखों के किसी कोने में
बचपन की तस्वीर झिलमिलाती है।

भाई चाहे कितनी दूर हो,
बहन का मन वहीं ठहर जाता है,
कलाई पर बँधता है धागा,
पर रिश्ता दिल में उतर जाता है।

कुछ रिश्ते दूरी से नहीं,
दुआओं से जुड़े रहते हैं..
बहन की राखी के धागे में
भाई के लिए पूरे संसार की
ममता, दुआ और प्रेम बँधे रहते हैं।

- नरेंद्र मंघनानी


*****


ढल गई शाम

दिन भर का थका हारा वो सूरज
अस्ताचल में छुप करता है विश्राम
तपती धूप से जलती ये धरती
सुकुन पाया जब ढल गई शाम

चरवाहे संग गौधन जंगल से लौटा
कलरव करती खगवृन्द ली आराम
उठ रही चहुँ ओर धुल की गुबार
आती है नित्य जब ढल गई शाम

पूरब में चन्दा पूनम की है आई
अवनि अंबर में तम का काम तमाम
आसमान पे टिमटिमाते वो सितारे
नजारे दिखलाती जब ढ्ल गई शाम

कल कल ध्वनि की नदी की रवानी
निरंतर चलने की देती है पैगाम
गिरना व संभल कर उठ चल पड़ना
ये है इस जीवन की कटु एक पयाम

आना है जग में चले जाना जग से
शाश्वत इस प्रकृति की है ये नाम
अवनति और प्रगति उतार चढ़ाव
इस जीवन की है सबका अंजाम

- उदय किशोर साह


*****


07 February 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 08 फरवरी 2026




*****

सियासतों में फ़रेब छुपकर, अमन की बातें भी हो रही है,
लहू से भीगी है ज़मीं पर, वफ़ा की कसमें बड़ी नई हैं।

ग़रीब बस्ती में भूख गहरी, महल में दावतें हो रही है,
कफ़न भी मुश्किल हुआ है लेना, मगर इमारत बड़ी नई है।

कहीं पे बच्चा किताब ढूँढे, कहीं पे हथियार बाँटे जा रहे,
ग़ुलाम क़ौमें बता रही हैं, ये सल्तनत भी बड़ी नई हैं।

जो सच कहेगा, वो रद्द होगा, जो झूठ बोले, सर बिठाया जाए
जहाँ की रीतें बता रही हैं, रवायतें सब बड़ी नई हैं।

यहां हर इंसा लहू से रंजित, मगर तिजारत बड़ी हँसी है,
जहाँ के सौदागर अब दिखाएँ, अमन की क़ीमत बड़ी नई है।


- मधु शुभम पाण्डे


*****


थकी हुई सी ज़िंदगी

थकी हुई सी ज़िंदगी
हर मोड़ पर ठहर जाती है,
चलना चाहो भी तो अक्सर
ख़ामोशी साथ आ जाती है।

दिन उजाले में कट जाते हैं
रात सवालों में ढलती है,
किसने छीना अपने सपने
ये बात समझ न पलती है।

कंधों पर लदे फ़र्ज़ों ने
मन को धीरे झुका दिया,
खुद के लिए जो पल थे कभी
वक़्त ने सब चुरा लिया।

फिर भी दिल के किसी कोने में
एक सिसकी सी पलती है,
कहती है - “मैं ज़िंदा हूँ”
बस हालात से जलती है।

जिस दिन इस सिसकी को
आवाज़ मिल जाएगी,
थकी हुई सी ये ज़िंदगी
फिर से मुस्कुराएगी।


- रेखा चंदेल

*****


चलते रहना

जीवन की उलझी पहेलियाँ
धैर्य से सुलझाते रहना,
उत्तर न भी मिलें तुरंत
तो प्रश्न सँजोते रहना।

पथ यदि काँटों से भरा हो
तो भी पग न ठहराना,
राह कठिन हो-
बस चलते रहना।

बाहर के शोर में न खोकर
अंतर में दीप जलाते रहना,
ओठ चुप हों यदि कभी
मन से मुस्कराते रहना।

जब मन अपने ही बोझ से
थककर बैठना चाहे,
तब कुछ आदतें, कुछ सोचें
धीरे-धीरे बदलते रहना।

यदि भीतर कहीं
रिक्तता, अभाव,
सूनापन दिखे-
तो शिकायत नहीं
सृजन से भरते रहना।

हार, विराम नहीं होती
यह याद रखते रहना,
जीवन साधना है मित्र-
राह कठिन हो
तुम चलते रहना।


- नरेंद्र मंघनानी


*****


मां भारती की शान

गीत वह महान है मां भारती की शान है
रोम- रोम में वसा हिंदोस्ता की जान है।
गा-गा के जिसको चल पड़े फिरंगियों से लड़ पड़े।
देखी थी शक्ति गीत की उम्मीद फिर थी जीत की।
गीत की इस शक्ति ने चूल को हिला दिया,
वस कुछ समय के और हो उनको सही बता दिया।
वृत्तांत सुन उनके मस्तिष्क में अवसान था।
गीत वह महान है मां भारती की था।

जिसने बनाया हिंद की आजादी का था रास्ता,
मिलकर हुए सभी खड़े दे स्वाधीनता का वास्ता।
कोशिश करी थी तोड़नें की एकता निज हिन्द की
वैरियों की चाल जिसमें न सफल है हो सकी।
भंग हुआ विच्छेद फिर बंगालियों की भक्ति से
हो गये सफल तभी इस गीत की शक्ति से,
एकीकृत बंगाल का त्याग निज महान था।
गीत वह महान है मां भारती की शान था।

बंगाल के जुड़ाव से ये यात्रा बढ़ने लगी
जन- जन के मुख पर गीत से वह शक्तियां हिलनें लगी।
भानू न अस्त होता था जिसके शासनकाल में,
वो फिरंगी फंस गये थे मातरम् के जाल में।
गीत ये जाल जो आजादी की मशाल था
गीत वह महान है मां भारती की शान था।

आजादी के संघर्ष में वस गीत ही आस था
हर श्वास में ऐसा लगा मां भारती का साथ था।
मां की ममता पाने को सब लामबंद हो गये,
हो गया आजाद हिंद आजाद सब हैं हो गये।
आजाद हिंद हो गया यह गीत स्वाभिमान है
गीत वह महान है मां भारती की शान है।


- करन सिंह "करुण"


*****


हरारत नहीं रही

कभी भी सच कहने से हमें डर नहीं लगता।
जी हुज़ूरी इल्म का मेरे हिस्सा नहीं रही।

ज़मीं-आसमां से कभी मिलती ही नहीं है।
जुगनूओं की शोलों से कभी यारी नहीं रही।

हिन्दू-मुसलमां के बीच अब दीवार आ गई।
अलगू और जुम्मन में पहली सी यारी नहीं रही।

तारीफें हुस्न-इश्क की अब तब्दील हो गईं।
बाज़ार-ए-हुस्न में कोई चीज़ महंगी नहीं रही।

मंज़िल पर निगाह तो कोई रोक नहीं सकता।
कहता हूँ तुझमें जोश व हिम्मत नहीं रही।

चाँद भी वही चांदनी भी वो ही है मुश्ताक।
रिश्तों में मगर वो पहली सी हरारत नहीं रही।
​

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह


*****


बात ख़त्म

तुम बोलो या ना बोलो,
हमको सुनना है बात ख़त्म।

हो चाहे जिसके भी तुम ,
तुम बस मेरे बात ख़त्म।

चाहा बहुत, न चाहे तुमको,
पर ये हो गया बात ख़त्म।

बिना छुए ही छुए हृदय को,
दिल में बस तुम हो बात ख़त्म।

दूरी, उम्र, बचकानी बातें
भर दिए बचपना बात ख़त्म।

जो कहना था, कह चुका मन,
अब क्या कहना बात ख़त्म।


- सविता सिंह मीरा


*****


अगर मेरे हिस्से भी कभी
ज़माने की रंगतें आई होतीं,
जवानी के शौक़,
खुलकर हँसने की इजाज़त,
और सपनों को जीने की
आज़ादी मिली होती…
तो इस रंगीन दुनिया में
यूँ ख़ामोश, बेरंग रहना
मुझे कभी रास न आता।
मैं भी चाहती
हवा के साथ उड़ना,
भीड़ में खोकर खुद को पाना,
हर रंग को बिना डर के अपनाना।
पर हालातों ने मेरे हाथों में
ज़िम्मेदारियों की स्याही थमा दी,
और मैंने
ख़्वाहिशों के रंग दिल में ही सहेज लिए।
लोग कहते हैं,
तुम सादा सी रहती हो,
पर क्या किसी ने पूछा कि ये सादगी
चुनाव थीया मजबूरी?
मैं बेरंग नहीं हूँ,
बस वो रंग जो मुझे मिलने थे,
किसी और के हिस्से चले गए…


- आरती कुमारी


*****


संख्याओं का मेला

आओ बच्चों तुम्हें सुनाएँ, एक अनोखी बात,
संख्याओं की दुनिया से, करवाएँ मुलाक़ात।
रेखा पर जो सजती हैं, सबको साथ बुलाती हैं,
"वास्तविक संख्याएँ" वो, जग में जानी जाती हैं।
एक, दो, तीन से गिनती शुरू, "प्राकृतिक" इनका नाम,
शून्य (0) को जब जोड़ लिया, तो बना "पूर्ण" का धाम।
सीधी-सादी, प्यारी-प्यारी, गिनती में ये आती हैं,
वास्तविक संख्याओं का, ये आधार बनाती हैं।

प्लस (+) की दुनिया दाईं ओर, माइनस (-) बाईं ओर जाए,
शून्य खड़ा है बीच में, सबको राह दिखाए।
ये सब मिलकर कहलाते, "पूर्णांक" प्यारे भाई,
घटने और बढ़ने की, इन्होंने रीत बनाई।

बटे (p/q) में जो लिख जाएँ, "परिमेय" नाम कमाएँ,
जैसे आधा (1/2) या हो पूरा, सब इसमें मिल जाएँ।
लेकिन जो न रुक पाएँ, जैसे पाई (π) या रूट (√2),
"अपरिमेय" हैं वे संख्याएँ, जो चलतीं बेछूट।

चाहे दशमलव शांत हो, या हो वो अशांत,
वास्तविक संख्या के घर में, सब रहते हैं शांत।
संख्या रेखा इनका घर है, यही इनकी पहचान,
गणित की इस दुनिया का, ये ही हैं सम्मान!


- देवेश चतुर्वेदी


*****


इज़हार-ए-मोहब्बत

​खामोशियाँ बेइंतहा हुईं, अब कुछ कहना जरूरी है,
दिल में दफन है जो अफसानें अब बताना जरूरी है।

यूँ तो हर दिन उनकी यादों की महक साथ रहती है,
मगर आज इस महक को हकीकत बनाना जरूरी है।

मोहब्बत में फिजूल के वादे-दांवे नहीं किया करते है,
प्रेम को सिर्फ मर्यादाओं के साथ निभाना जरूरी है।

इश्क में इरादा बस इतना कि उम्र भर चलना है,
​छोटी-छोटी खुशियों में प्रेम में रंग भरना जरूरी है।

इश्क में साथ चलने से मंजिलें आसां हो जाती है,
इस मोहब्बत की यादों का कारवां बनाना जरूरी है।

मोहब्बत के सफर में बिना कहे हाथ थमते हैं,
​सब रास्ते मुकम्मल होंगे, बस साथ देना जरूरी है।


- दीपक कोहली


*****


खिड़की खुली है

क्यों अब भी कुछ बचा है
सब कुछ कहने के बाद भी,
खिड़की खुली है,
दरवाजा बंद होने के बाद भी।

भौरों को फूलों से मिलना है
चकोर को भी राह चांद का तकना है।
कौन खींच रहा किसको_
ये मुश्किल समझना है।

नदियां खल खल लांघती,
सागर की आगोश
में सामने को।
मोर नाच रहा पंखे फैला,
बता रहा वो भी दीवाना है।

लहरें उछले पूनम की रात,
प्यारे चांद को पाने को,
परवाने भी पीछे कहां,
समा की एक झलक काफी है,
जान लुटाने को।

अधूरेपन को पूरा करने की,
अभिलाषा सबमें जागे।
सब अपने चहेतो के पीछे,
शायद इसी लिए भागे।

इस अधूरापन से ही मन बाऔराए ,
कोई अपने होश में न रह पाए।

ये अधूरापन ही प्यार है,
नहीं तो क्यों फूल खिले,
चकोर चांद को ताके
और नन्ही बुलबुल गीत गाए।


- रोशन कुमार झा


*****


परदे के पीछे

सिंहासन दिखता, राजा दिखता,
पर सूत्र कहीं और हिलते हैं,
जनता सोचती- हम चुनते हैं,
पर फैसले और ही बनते हैं।

काग़ज़ पर चलता लोकतंत्र,
मन में चलता व्यापार बड़ा,
सच बोलने वाला अकेला,
झूठ का मेला फैला पड़ा।

परदे के पीछे जो हाथ हिलाए,
वह दीपक नहीं- छाया बनता,
डर से चलता शासन सारा,
न्याय कहीं खोया रहता।

लेकिन सुन लो, हे मानव प्यारे,
यह अंधकार स्थायी नहीं,
जब मन सत्य से जुड़ जाता है,
भय खुद ही हार मान जाता है,
Deep State हो या झूठी सत्ता,
सब मिट जाता है।

राज न टिके, षड्यंत्र न टिके,
न टिके अहं का भारी भार,
वही सच्चा शासक, वही सरकार।


- नरेंद्र मंघनानी


*****


इश्क के इस दौर में
हम भी दिल दे बैठे
ज़माने की फितरत में
मन परवाज़ उड़ा बैठे
वन वीक सीरीज के दौर में
कमबख्त! हम किताबों से
जिगर लगा बैठे...
वाट्सअप यूनिवर्सिटी के भ्रमजाल में
हम नासमझ
रेफ्रेंस बुकों में माथा खफा बैठे
जंगल की आग में
बर्फ का गोला बन बैठे
यह जिगर है मानता नहीं
हम मानवता को गले लगा बैठे
बचपन में जिस कागज़ से
नाव बनाते रहे
आज उसी कागज़ पर
पेन की पतवार खै रहे
कमबख्त पेन से स्याही
क्या खलक गई
मैं लिखता मोहब्बत रहा
वो इंकलाब लिख गई


- जितेंद्र बोयल


*****