साहित्य चक्र

17 October 2020

आदेश


शमशान की राख को

सीने से लिपटाए फिरता हूँ,

महाकाल का भगत हूँ

उनका नाम लिए फिरते हूँ,

मैं चुपचाप

सभी की सुनता हूं

किसी को कुछ बोलता नहीं।

आदेश है माँ महाकाली का

बेमतलब इसलिए

किसी को सताता नहीं।

गुर्राता है कोई तो

मैं चुप रहता हूँ

फिर भी बेमतलब किसी को

मौत की नींद सुलाता नहीं।

खामोशियां है बहुत दफन

मेरे इस सीने में

मगर अपनी मां काली के अलावा

किसी को सुनाता नहीं।

              

                     राजीव डोगरा 'विमल'


 

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