साहित्य चक्र

11 October 2020

महिला अस्मिता तार-तार




जलना है हवस की ज्वलन्त जघन्य आग में
अब यही कृत्य लिखा है बिटिया तुम्हारे भाग्य में
दुःशासन से पटी पड़ी है धरा की अभागी फुलवरिया
कैसे बचोगी उनसे जो बैठे है फैला मन की मलिन चदरिया
बनकर ढाल खुद बनना पड़ेगा अब प्राणों का प्रहरी!

ये हवसी दरिंदे मिल ही जाते है हर गली में
नजरें बिभाजन कैसे करे असली व नकली में
धरा की मलिन बगिया में जीना हुआ दुश्वार
हैवानों की नजरों में नही आता कोई इतवार
बनकर ढाल खुद बनना पड़ेगा अब प्राणों का प्रहरी!

न्याय की उम्मीद करना भी हो गया है गुनाहगार
लोकतन्त्र में बिछिप्त मानसिकता वाली है सरकार
आचरणशून्य कृत्य से आदमियत सर झुका हुई नदामत
राक्षसी हैवानों की हैवानियत झेलने की व्यर्थ है इबादत
बनकर ढाल खुद बनना पड़ेगा अब प्राणों का प्रहरी!

गिरवी रख दी है राक्षसी हैवानों ने सलीकेदार तहजीब
इससे बड़ा आदमियत का भला कौन हो सकता है रक़ीब
लज्जाहीन समाज मे कोई नही तुम्हारी लाज बचाने वाला
गले से चीख निकलते देख सब है शांतिमुद्रा में जाने वाला
बनकर ढाल खुद बनना पड़ेगा अब प्राणों का प्रहरी!

                                                       आशुतोष यादव


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