साहित्य चक्र

15 December 2024

कविता- कोरे पन्ने किताब के




जिंदगी ने आज कोरे पन्नों को पढ़ा है,
 जिस पर ना कुछ लिखा था।
बस चारों तरफ सफेद ही सफेद नजर आता था।

जिंदगी में जब धीरे-धीरे से पढ़ना शुरू किया,
 तब बहुत कुछ समझ में आया।
जब कलम हाथ में पकड़ी ,
बहुत कुछ हकीकत लिख डाली।

कुछ सच्ची कुछ झूठी ,
न जाने कितना कुछ,
इसमें लिख डाला।
कुछ सच्ची जीवन की घटना है ,
इसमें लिख डाली हैं।

कुछ झूठी खबरों के इसमें आरोप लगा डाले,
 एक ओर कागज का पन्ना,
 हर एक की जिंदगी में कुछ ना कुछ मोड़ लेकर आता है।

कभी तो किसी को कुछ बनाकर छोड़ देता है,
 कभी उसको उसमें ही उलझा कर रखता है।
 यही तो जीवन की सच्चाई है ,
जो हर एक को समझ नहीं आती है।
 जिंदगी ऐसे ही कोरे पन्ने की तरह खाली है ।

जब जिंदगी की हकीकत ,
हर एक इंसान को समझ आती है।
तब वह जिंदगी में कुछ तो अच्छा कर पता है,
 कुछ मुसीबत से लड़ पता है।
उसका हल खोज पता है ,
तब वह धीरे-धीरे सफल हो पता है।


                                                   - रामदेवी करौठिया



कविता- भारत के लोगों




महान बने ये भारत अपना 
भारत के लोगों तुम सुन लो,
ताँता एक इस तरह बुन लो।

न  हिन्दू कहलाए कोई, न कोई मुसलमान,
भारतीय कहलाने में ही समझें सब अपनी शान।

               सभ्य हों, शिष्ट हों  सब जन,
               गंगा की तरह निर्मल हो सबके मन।

               अविरल वहे सबके हृदय में स्नेह बयार,
               शांति और समृधि की आये नित नई बहार।

जवान रहें सीमा पर सजग और सतर्क,
दंगे-फसादों से न बने देश अपना, नरक।

हर कोई निष्ठा से करे अपना-अपना काम,
आलस्य खाली हाथ रहे ,मेहनत को ही मिले इनाम।

                निस्वार्थ भाव से सेवा करें नेता, क्या अभिनेता,
                हृदय में बसे सबके बस पूजनीय भारत माता।

                हर भारत बासी की हो स्वच्छ ,सुन्दर छवि,
                है दमकता ज्यूँ  नील गगन में बेदाग रवि।

बार-बार इस धरा पर महापुरषों के हो अवतार,
आदर्श बन मानव जाति के लिए जो करें सबका उद्धार।

चारों ओर छाई रहे हरी-भरी हरियाली,
हर दिन हर घर में मनाई जाए रोज दिवाली।

                 बच्चा-बच्चा पाए रोटी ,स्वास्थ्य और शिक्षा ,
                 मजबूर रहे न कोई ,न माँगे कोई भिक्षा।

                 साकार हो जाए फिर शहीदों का वो चिरसंचित सपना,
                 पर्याय स्वर्ग का बन , महान बनें ये भारत देश अपना।


                                                          - लता कुमारी धीमान



संबंधों से संबंधित एक दृष्टिकोण यह भी




किसी भी संबंध का आधार आवश्यकता,प्रेम, सामाजिक या इनका मिलाजुला रूप कुछ भी हो सकता है। हमारे परिवार, दोस्त, रिश्तेदार, कार्यालय, स्कूल या व्यापार इत्यादि हर जगह आपसी संबंधों की समझबूझ से ही जीवन चलता है। रिलेशनशिप या संबंध किन्हीं दो व्यक्तियों या किसी एक समूह का दूसरे समूह के साथ भी हो सकता है। संबंध प्रायः वहीं बनते हैं जहां वैचारिक समानताएं हों, एक दूसरे के उद्देश्यों की पूर्ति हो। ये संबंध आजीवन चलें आवश्यक नहीं,ये उद्देश्य पूर्ति के साथ समाप्त भी हो सकते हैं। इन संबंधों को कोई नाम नहीं दिया जा सकता। लेकिन परिवार, रिश्तेदार या दोस्त से बने संबंधों को नाम दे सकते हैं। 


एक संबंध प्रेम का है जो स्त्री और पुरुष के बीच हो सकता है, और वह शारीरिक आकर्षण के कारण भी हो सकता है और आत्मिक स्तर पर भी हो सकता है। इस तरह के संबंधों को कोई विशेष नाम नहीं दे सकते।लेकिन फिर भी इसमें लोग एक दूसरे से जुड़ सकते हैं और निभा सकते हैं। शारीरिक आकर्षण से बना संबंध शरीर से शुरू होकर शरीर पर ही खत्म हो जाता है इसे प्रेम की पूर्णता नहीं कह सकते और न ऐसे संबंध ज्यादा समय तक टिकते हैं।

आत्मिक स्तर पर बना संबंध स्थाई होता है, जो हृदय से बनता है,वैचारिक समानता, समर्पण से बनता है। ऐसे सम्बन्धों में कोई सामाजिक बंधन नहीं होता और निस्वार्थ संबंध बनता है।अपनी अपनी जिंदगी में ऐसे व्यक्ति स्वतंत्र हैं और उन्हें संबंध में बंधे होते हुए भी कोई बंधन महसूस नहीं होता। यह संबंध प्रेम की मजबूत नींव पर आधारित होता है, और आम संबंधों से बहुत ऊपर उठ जाता है, आत्मिक स्तर को छूता है। वहां शरीर प्राथमिक नहीं रहता, अपितु आत्मा प्राथमिक रहती है, एक जैसी विचारधारा और आत्मिक संबंध में प्रेम परिपक्व होता है और शारीरिक स्तर पर भी फलता फूलता है। प्रेम पूर्ण संबंध आजीवन चलता है जहां तर्क वितर्क तो हो सकते हैं, लेकिन कुतर्क के लिए कोई जगह नहीं। वैचारिक आदान प्रदान एक दूसरे की कमी को पूरा कर देते हैं,क्योंकि प्रेम एक दूसरे के प्रति समर्पण की भावना के बिना नहीं हो पाता।

हालांकि कुछ लोगों का कहना यह भी है कि प्रेम में बंधन नहीं, मुक्ति होती है।किंतु ,वास्तव में देखा जाए तो प्रेम का बंधन तो होता ही है अन्यथा एक दूसरे से कोई कैसे जुड़ सकता है। लेकिन ये बंधन आत्मिक स्वीकृति के साथ होता है,समर्पण के साथ होता है ,एक दूसरे की भावनाओं को सम्मान देने से होता है तो आनंद की अनुभूति इतनी अधिक होती है कि वह बंधन का नहीं अपितु, मुक्ति का बोध कराता है।


जिस जगह संबंध आत्मिक नहीं बनता,समर्पण नहीं रहता उसे प्रेम संबंध तो नहीं कह सकते। वैचारिक मतभेद हों और एक दूसरे से अपनी बात मनवाने पर ऊर्जा लग रही हो, तो अच्छे से अच्छे संबंध टूट जाते हैं। तब इस बंधन में किसी को लग सकता है कि उसकी आज़ादी छिन रही है, या उस पर अनावश्यक अधिकार जताया जा रहा है। ऐसे में यदि दोनों में से किसी एक को भी बाध्यता महसूस होती हो, तब ये सोच आपसी द्वेष को जन्म देती है। जबकि आत्मिक रूप से जुड़े रिश्तों में कुछ मांगा नहीं जाता बल्कि आत्मिक दृष्टि से विचार करके एक दूसरे की भावनाओं की कद्र की जाती है और उनको समझा जाता है। आत्मिक प्रेम संबंधों में असली आज़ादी उन विचारों से मुक्ति है जो आत्मिक रूप से रिलेशनशिप में जुड़े लोगों को अलग करने की क्षमता रखते हैं। 

एक दूसरे की भावना को समझना और एक दूसरे की आत्मा आहत न हो, उसका ध्यान रखना ही प्रेम है। ऐसे में आप स्वयं को कभी अकेला महसूस नहीं करते।आपको अपने ही समान किसी अन्य के ,जो आपको समझता है,आपके सुख दुःख का साथी है,हमेशा साथ होने का सुखद एहसास बना रहता है। ऐसे संबंध में वादे कसमें भले ही न खाई जाएं लेकिन उस रिलेशनशिप अथवा संबंध का क्या अर्थ है जिसमें ये एहसास भी न हो कि साथी के जज़्बात क्या हैं, एक दूसरे से मन की बात खुल कर स्पष्ट तौर से न कि जा सके न समझी जा सके, तो फिर कौन सा ऐसा एहसास है जो दो लोगों को आपस में एक रिश्ते में जोड़े रखेगा ? 

क्योंकि रिलेशनशिप में जुड़ाव होने पर दोनों व्यक्ति एक दूसरे से उम्मीद रखते ही हैं कि उनके प्रेम में ऐसा कोई नकारात्मक विचार उत्पन्न न हो जो उन्हें जुदा कर दे। शारीरिक रूप से साथ रहना जरूरी नहीं लेकिन आत्मिक और वैचारिक रूप से साथ रहना आवश्यक है। आज़ादी शब्द का अर्थ भी प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है। देखना यह है कि उसमें सकारात्मकता उभर के आए जिसमें ये एहसास खो जाए कि वे किसी विवशतावश जुड़े हैं।


                                                        - जितेंदर पाल सिंह 'दीप'



हिमालय के सान्निध्य में




तुम्हारे मौन में वह गुंजन है
जो समय के पार कहीं ठहर जाती है,
और मैं, अपनी विह्वलता लिए
तुम्हारी परछाईयों के वृत्त में घूमती हूँ
तुम कितने असीम, कितने अपरिचित
पर फिर भी, मेरे हर शब्द, हर आहट के स्रोत
मेरे अस्तित्व पर तुम्हारे हस्ताक्षर 

तुम्हारी चुप्पी में
कोई कथा ठहरी है 
जिसे किसी प्राचीन ऋषि ने अधूरा छोड़ दिया था 
किसी प्रतीक्षा का अंत
या शायद आरंभ

मैं तुमसे प्रश्न करती हूं 
और तुम उत्तर नहीं,
बस एक दिशा देते हो

यदि मैं इस प्रश्न-पथ पर भटक जाऊं 
यदि मेरी व्यथा के बिंदु मुझे बांध लें
तब तुम्हारी शांत श्वास मुझे पुकारेगी 

तुम्हारे सर्द पत्थरों की ऊष्मा
मुझे मेरे भीतर का ताप भुला देगी

हे हिमालय,
तुम्हारे सानिध्य में
वह अनवरत हलचल है
जिसमें अनंत स्थिरता है 
मैं वहां सब कुछ खोकर
स्वयं को पुनः रच लूंगी 

                                                  - अनुजीत इकबाल


पांच रचनाकार और पांच कविताएं




जिसे आसमां तक  उठा कर चले।
नज़र वो  मुझी  से  बचा कर चले।

नहीं  छोड़िए  साथ उसका  कभी,
सभीसे जोमिलकरमिलाकर चले।

वफ़ा जिन से करते  रहे रात दिन,
वही  दिल  हमारा  दुखा कर चले।

सदा  कीजिए  बात उसकी  मियाँ,
जोसहरा में भीगुल खिलाकर चले।

मिला कर चलो उस से काँधा सदा,
जो परचम को ऊँचा उठा कर चले।

                           - हमीद कानपुरी

*****


मैं लिखूं ग़ज़ल तेरी शबनमी आंखों में डूबकर।

याद करके ज़ालिम और मुझको सज़ा न दे।
तेरे वादों का ऐतबार नहीं मुझको दग़ा न दे।

पुरानी मुहब्बतों के चिराग़ फ़िर से न जल उठें।
वो मस्त आंखों से शराब मुझको पिला न दे ।

मेरी आंखों में तेरी तस्वीर अब भी है बनी हुई।
मेरी कोई हरकत राज़ ए दिल सबको बता न दे।

ख़्वाब तेरे ही बसा रखे हैं,इन बहती आंखों में।
लहरें हक़ीक़त की आंखों में कंकर छुपा न दे।

तस्वीर तेरी बना रहा हूं, ख़ुद से बेख़बर हो कर।
डर है ज़माना आकर मुझसे तुझको छुड़ा न ले।

मैं लिखुं ग़ज़ल तेरी शबनमी आंखों में डूबकर।
ग़ज़लों के मेरी, शेर कोई "मुश्ताक़" चुरा न ले।

                                   - डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

*****

मेरा मुर्शिद

मेरी महफिल में अगर
तुम आओ तो
सारे शहर के गम ले आओ
उन गमों को
मेरे मुर्शद की एक मुस्कुराहट से
घायल कर जाओ।

मेरी महफिल में अगर
तुम आओ तो
सारे शहर के दर्द भरे अश्क़ ले आओ
उन अश्कों को
मेरे मुर्शद की एक निगाह से
कायल कर जाओ।

मेरी महफिल में अगर
तुम आओ तो
सारे शहर के जख़्म ले आओ
उन जख्मों को
मेरे मुर्शद के एक नाम से
भरकर  चले जाओ।


                           - डॉ.राजीव डोगरा


*****


यह चार लोग

यह चार लोग ही हैं दुनिया में
चलती है जिन की सरदारी
झूठे बेईमान चुगलबाज और लालची
इनसे डरती है दुनियां सारी

जब भी करना होता है शुरू कोई काम
सब यही कहते हैं चार लोग क्या कहेंगे
इन चार लोगों के किस्से हैं हर जुबान पर
रहना पड़ेगा इनके साथ चाहे यह कुछ भी करेंगे

झूठा झूठ फैलाएगा
छोटी छोटी बातों को बड़ा बताएगा
रिश्तों में पैदा कर देगा दरार
अपना काम करके निकल जायेगा

बेईमान बेईमानी से बाज नहीं आएगा
मेहनत से कभी नहीं कमाएगा
हेराफेरी से कर लेगा दौलत इक्कठी
पर उसको साथ नहीं ले जा पायेगा

चुगलबाज भी कम नहीं किसी से
इधर की बात उधर मिर्च लगाकर बताएगा
दूर से तमाशा देखेगा घर जलाकर
भाई को भाई से लड़ायेगा

लालची लालच में आ जायेगा
राज की बात भी दूसरों को बताएगा
बदनाम करेगा ज़माने में
इज़्ज़त ख़ाक में मिलाएगा

हम सब के अंदर ही हैं यह चार लोग
अपने अंदर झांक कर देखो जरा
मन को बहुत सकूँ मिलेगा छोड़ दो बुराई
दूसरों का भला कभी करके देखो जरा


                            - रवींद्र कुमार शर्मा

*****


क्यों ? यूँ जताते हो अपनी नाराजगी

क्यों? यूँ जताते हो अपनी नाराजगी,
जब लौटकर महायुती में ही आना है।
क्या? ये बीमारी भी एक बहाना है,
फिर लौटकर इसी घर ही आना है!
अपरिपक्व कह रहा यह जमाना है।

क्यों? यूँ जताते हो अपनी नाराजगी,
जब लौटकर महायुती में ही आना है।
अब न जाना सतारा नेटवर्क है खटारा,
वे दिल्लीवाले हैं अब न खोलेंगे पिटारा!
मुश्किल में पाओगे अजब ही है नज़ारा।

क्यों? यूँ जताते हो अपनी नाराजगी,
जब लौटकर महायुती में ही आना है।
छोड़ दो जिद अब नहीं रही है वह बात,
उनका प्रचंड है बहुमत छूट जाएगा साथ!
ऐसा ना हो कहीं मलते रह जाओ हाथ।

क्यों? यूँ जताते हो अपनी नाराजगी,
जब लौटकर महायुती में ही आना है।
सोच लो, अगर यही रवैया रखना है,
नेता बनकर खुद को भी परखना है!
हा रिक्त है नेता प्रतिपक्ष का भी स्थान,
उस पर हो जाओ एकनाथ विराजमान।

                            - संजय एम. तराणेकर

*****