साहित्य चक्र

05 December 2024

महादानव





जीवित नहीं 
मुर्दे हो तुम 
महानगर के महामानव नहीं
महादानव हो तुम।

अपने मतलब के लिए 
बनाते हो हर किसी को 
अपने ख्वाबों का परिंदा
फिर कहते हो 
अब भी मैं हुँ सब में जिंदा।

शर्म कर्म बेच कर अपनी 
दो टके के लोगों को
कहते हो सब को 
किरदार मेरा है
अब भी सबसे उम्दा।


                                           - डॉ.राजीव डोगरा



सासु माँ की बेज़ारी





इक बहु जो तुम्हारे घर आई थी, 
तुमने कहा उसे की मुझे अपनी मां मानो,
लेकिन इतिहास गवाह है की 
इक सास ना सिर्फ सास ही होती है, 
मां नहीं बन सकती, सासु मां ने सदा सिर्फ 
अपने बच्चों को ही अपनी धड़कन है माना।

बहु ने घर को सजाया, घर को समेटा, 
यहां तक की खुद को खो ही दिया, सबके हर फैसले में,
लेकिन फिर भी किसी के दिल में तनिक भी जगह ना पाई,
कभी भी इक बहु की खुशियाँ किसी को तनिक भी रास नहीं आई।

सासु मां ने अपने बेटा - बेटी को ही हमेशा अपनी ढ़ाल है माना,
हर कदम पर बस उनका ही बस पक्ष है लिया,
पर बहु के हक में कभी भी एक शब्द नहीं बोला,
क्या औरत होने के नाते ही सही कभी 
आपने उस बहु का दर्द समझा ?

सासु मां ने कभी देखा नहीं बहु को खुश होते हुए, 
ना देखा गया उसे आगे बढ़ते हुए,
इक बहु को वो प्यार, ममता की जो उम्मीद थी इक सास से,
वो कभी पूरी हुई ही नहीं,
बहु को पहले दिन से ही पराया समझा गया, 
कभी भी ना किसी बात पर सराहा गया।

सासु माँ, क्या ये सच है ?
जो बहु ने तुम्हारे घर को अपना समझा था,
वो घर कभी उसका बन ही नहीं पाया, 
क्यूंकि तुम उसे कभी दिल से अपना ही नहीं पाई, 
तुम्हारे दिल में हमेशा अपनो की ही तस्वीर बसी रही।

क्या कभी तुमने सोचा,
इक बहु भी कुछ है, कुछ महसूस करती होगी,
वो भी एक इंसान है, एक बेटी है किसी और की, 
और अब वो है इक माँ भी,
लेकिन तुम्हारी आँखों में तो लगी है पट्टी स्वार्थ की, अपनो की, 
बस खुद के बच्चें ही हैं आंखों में और दिल में समाए, 
और इक बहु का कोई आस्तित्व ही नहीं।

कभी तुमने सोच विचार किया की 
तुम भी तो इक बहु ही हो इस खानदान की, 
फिर क्यों बहु - बहु करती हो !
नहीं है ये अगर ये मेरा घर, 
तो आप भी क्यों मेरा घर-मेरा घर करती हो।


                                                               - रजनी उपाध्याय


03 December 2024

रंग-बिरंगे...

रास्ता दौड़ रहा है, किसी सरपट दौड़ती ट्रेन की तरह, और मैं ठहर गई हूँ। सब कुछ आगे बढ़ता जा रहा है। मैं भी जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाने लगी हूँ, पर रास्ते की रफ़्तार का साथ नहीं दे पा रही। बस गिरने ही वाली हूँ, लेकिन मैं गिरना नहीं चाहती। लड़खड़ाते हुए, भागने लगी हूँ।

मेरी धड़कनें तेज हो चुकी हैं। मन घबरा रहा है कि कहीं गिर न जाऊँ। दौड़ते-दौड़ते आसपास देखा तो पाया, और भी लोग दौड़ रहे हैं। कुछ मेरी ओर देखते हुए आगे निकल गए। मैं रोना चाहती हूँ ज़ोर से चीखना चाहती हू लेकिन वक़्त नहीं है। मैं रेस में हूँ। रेस छोड़ नहीं सकती।





क्या यह सच में रेस है ? मेरी शू-लेस ढीली हो चुकी है, खुलने को है। पर इसे बाँधने का भी वक़्त नहीं। क्या सच में वक़्त नहीं है ? आँखों के आँसू अब पसीने में बदल चुके हैं। मैं दौड़ रही हूँ। मेरा शरीर तरबतर हो गया है।

बाकी धावक उस रेस के अंत में, उस लाल झंडे पर निगाहें टिकाए हुए हैं। पर मैं... मैं दौड़ते हुए सोच रही हूँ—अगर वह झंडा मिल भी गया, तो उसके बाद क्या करना है ? अब मेरा ध्यान दौड़ पर नहीं, सोच पर है। मेरे पैर थके नहीं हैं, पर उनकी रफ़्तार धीमी हो गई है। सब कुछ अचानक और तेज़ हो गया है। जैसे कोई तीव्र गति से चलता पंखा हो, जिसकी पंखुड़ियों की गिनती करना मुश्किल हो।

मेरा सिर चकरा रहा है।
शोर है—बहुत तेज़ शोर। लोग चीख रहे हैं।
मेरी धड़कने अब मेरे कानों को ज़ोर ज़ोर से पुकार रही है।
मेरी दौड़ अब चाल में बदल रही है।

फिर अचानक, एक ज़ोर की आवाज़ आई-
"रुको!"
"रुक जाओ!"
"रुको!"
मैं रुक गई।
कहाँ जा रही हो?
वह लाल झंडा तुम्हारे लिए नहीं है।
यह रास्ता तुम्हारे लिए है।
तुम्हें इस पर चलना है, अपनी चुनी हुई गति से।

मैं ठहरते ठहरते वापस दौड़ने लगी, मैं रास्ते की ओर देख मुस्कुराई,रास्ता मुझे देखकर मुस्कुराया। अब कोई शोर सुनाई नहीं दे रहा है,अब कोई एक झंडा नहीं है। हज़ारों झंडे हैं।

रंग-बिरंगे।
मैं उन्हें पार करते हुए दौड़ रही हूँ।
हाँ, अब मैं दौड़ रही हूँ।
अपनी चुनी हुई गति से।


02 December 2024

आइंस्टीन एक नए नजरिए से


अल्बर्ट आइंस्टीन की पत्नी अक्सर उन्हें सलाह देती थीं कि वह काम पर जाते समय अधिक प्रोफेशनल तरीके से कपड़े पहनें। आइंस्टीन हमेशा कहते, "क्यों पहनूं? वहाँ सब मुझे जानते हैं।" लेकिन जब उन्हें पहली बार एक बड़े सम्मेलन में जाना था, तो उनकी पत्नी ने उनसे थोड़ा सज-धजकर जाने का अनुरोध किया। इस पर आइंस्टीन बोले, "क्यों पहनूं ? वहाँ तो मुझे कोई नहीं जानता!"

आइंस्टीन से अक्सर सापेक्षता के सिद्धांत को समझाने के लिए कहा जाता था। एक बार उन्होंने समझाया, "अपना हाथ एक गर्म चूल्हे पर एक मिनट के लिए रखो, तो वह एक घंटे जैसा महसूस होगा। एक खूबसूरत लड़की के साथ एक घंटे बैठो, तो वह एक मिनट जैसा लगेगा।





यही है सापेक्षता!"
जब अल्बर्ट आइंस्टीन प्रिंसटन विश्वविद्यालय में काम कर रहे थे, तो एक दिन घर जाते समय उन्हें अपना घर का पता भूल गया। टैक्सी ड्राइवर ने उन्हें पहचाना नहीं। आइंस्टीन ने ड्राइवर से पूछा कि क्या वह आइंस्टीन का घर जानता है। ड्राइवर ने कहा, "आइंस्टीन का पता कौन नहीं जानता? प्रिंसटन में हर कोई जानता है। क्या आप उनसे मिलना चाहते हैं?" आइंस्टीन ने उत्तर दिया, "मैं ही आइंस्टीन हूं। मैं अपना घर का पता भूल गया हूँ, क्या आप मुझे वहाँ पहुँचा सकते हैं?" ड्राइवर ने उन्हें उनके घर पहुँचा दिया और उनसे किराया भी नहीं लिया।

एक बार आइंस्टीन प्रिंसटन से ट्रेन में यात्रा कर रहे थे। जब टिकट चेक करने वाला कंडक्टर उनके पास आया, तो आइंस्टीन ने अपनी जैकेट की जेब में हाथ डाला, लेकिन टिकट नहीं मिला। फिर उन्होंने अपनी पैंट की जेबें देखीं, लेकिन वहाँ भी नहीं था। इसके बाद उन्होंने अपने ब्रीफकेस में देखा, लेकिन टिकट नहीं मिला। फिर उन्होंने अपनी सीट के पास देखा, लेकिन फिर भी टिकट नहीं मिला।

कंडक्टर ने कहा, "डॉ. आइंस्टीन, हम जानते हैं कि आप कौन हैं। मुझे यकीन है कि आपने टिकट खरीदा है। चिंता मत कीजिए।" आइंस्टीन ने प्रशंसा में सिर हिला दिया। कंडक्टर आगे बढ़ गया। जब उसने दूसरी तरफ देखा, तो उसने देखा कि महान वैज्ञानिक नीचे झुककर सीट के नीचे टिकट खोज रहे थे।

कंडक्टर तुरंत लौट आया और कहा, "डॉ. आइंस्टीन, चिंता मत कीजिए। मैं जानता हूँ कि आप कौन हैं। आपको टिकट की आवश्यकता नहीं है। मुझे यकीन है कि आपने टिकट खरीदा है।" आइंस्टीन ने जवाब दिया, "युवा आदमी, मैं भी जानता हूँ कि मैं कौन हूँ। पर मैं ये नहीं जानता कि मैं कहाँ जा रहा हूँ।"

जब आइंस्टीन की मुलाकात चार्ली चैपलिन से हुई-

आइंस्टीन ने कहा- "आपकी कला में जो मुझे सबसे अधिक प्रभावित करता है, वह उसकी सार्वभौमिकता है। आप एक शब्द नहीं कहते, फिर भी दुनिया आपको समझती है।"

इस पर चार्ली चैपलिन ने उत्तर दिया- "यह सच है, लेकिन आपकी प्रसिद्धि तो इससे भी बड़ी है।
दुनिया आपकी प्रशंसा करती है, जबकि कोई आपको समझता नहीं।"

01 December 2024

मोहब्बत की आबरू



अपने इस सफर को नया आयाम देंगे
किसी नूरानी रात को जरा कयाम देंगे

सांसें लिखेगी पल-पल वफ़ा के तज़किरे
हसीं लम्हों को जीकर एक मकाम देंगे

लबों की जुंबिश जुदा भले धड़कनों से
रख हाथों में हाथ रंग ए एहतराम देंगे

यकीं की जमीं बहुत ही खूबसूरत है
बिखरेगी खुशबू जितना ही इल्ज़ाम देंगे

हिज़्र है तो है पर वस्ल की चाह भी है
इस सुकून की खातिर हर इंतजाम देंगे

इश्क़ के नाम रहेगी पूरी जिंदगानी तो
एक-दूजे के लिए खुद को इकराम देंगे

मुहब्बत की आबरू रखना दिल वालों
लोग मुहब्बत में एक दिन इल्हाम देंगे

- सपना चन्द्रा