साहित्य चक्र

14 December 2025

आज की प्रमुख रचनाएँ- 15 दिसंबर 2025





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है कोशिश यही




मैं करता रहा कोशिशें
अपनी कोशिशों में होती रहीं हैं ग़लतियाॅं
कई-कई और कई-कई बार मुझसे
और मैं हारता रहा हूॅं युद्ध-मैदानों में
जय-पराजय की होती हैं नीतियाॅं और-और
कि वे जो होती नहीं हैं कभी भी, कहीं भी
किसी भी कोशिश की क़शीश में पक्षधर
हज़ारों हार बाद, हज़ारों कोशिशें क्यों नहीं,
बार-बार और हज़ारों-हज़ार बार क्यों नहीं,
गिरना, उठना, संभलना, समझना इत्यादि
समझता हूॅं ख़ूब-ख़ूब समझता हूॅं मैं
और समझता हूॅं फिर-फिर लड़ना बार-बार
हज़ारों-हज़ार बार लड़ना और लड़ते रहना
है कोशिश यही।


- राजकुमार कुम्भज



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कहां गया वो घर अब
जहां पीढ़ियों ने
बचपन बिताया था
नापना था मुझे भी
उस घर की चौखट को
जहां छोटे से आंगन में
वक्त गुजर जाया करते थे
संयुक्त परिवार का संगठन
भाई-बहन, दादी बाबा
ताई ताऊ, चाचा चाची
रिश्तों की मंडी खड़ी रहती
अपनेपन की चाशनी में डुबोती
खाटें जब बिछती थीं
जगह न बचा करती थी
फिर भी किस्से कहानियों में
दादी बाबा की बातों में
खुशियों की महक हुआ करती थी
चूल्हें की रोटियों के साथ
मां ममता परोसती थीं
चिड़ियां दाना पाकर जहां
उम्मीद का घर न छोड़ा करती थीं
गऊ मां को भी
प्यार से रोटी मिलती थी
घर में अन्नपूर्णा की बरक्कत हुआ करती थी
अगल-बगल की छतें
अपनी ही हुआ करती थी
पंतगें घर घर अरमानों की उड़ा करती थीं
तब न दीवारें थी, न बंटवारा था
फिर भी पानी रिसते छप्पर ही
असल घर हुआ करते थे
जहां हम रिश्तों को
खुलकर जिया करते थे।


- अंशिता त्रिपाठी


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उठ और अपनी उड़ान देख,
कदमों तले आसमान देख।

मुसाफिर नजर मंजिल पर रख,
मत कभी अपनी थकान देख।

उथल पुथल करते आँसू के बीच,
हँसते हुये अपनी मुस्कान देख।

यूँ ही मत बन नीर क्षीर विवेकी,
हमेशा ईमान देख, बेईमान देख।

निशाना हरहाल में अचूक होगा,
अपनी तीर अपना कमान देख।

दीदार ए दुनिया सबको नहीं होती,
विकास आम खास छोड़ इंसान देख।


- राधेश विकास


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गुड़िया

नन्हीं सी गुड़िया,
मिट्टी का घर बनाती हैं,
उसमें अपने
नए सपनों को सजाती हैं,
नए परिवार को सजाती हैं,
नई गुड़िया का,
ब्याह रचाती है,
बड़ी आशाएं रखती हैं,
जब वह बड़ी होती हैं,
तब उन्हीं अमूर्त
कल्पनाओं को
मूर्त रूप देने की
कोशिश करती है
उम्र भर में...


- सुनीता बिश्नोई


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ओ रे चंद्रमा

निर्मित जब से है, अद्भुत ब्रह्माण्ड
सुन्दर -सा प्यारा है तब से चांद।
कोई कहे इन्दु, बच्चों के तुम मामा,
सबके दुलारे न्यारे, ओ रे चंद्रमा।

धीरे -धीरे, हौले-हौले परिक्रमा करते,
रूकते नहीं,बेथक कलाएं दिखाते चलते।
कभी अदृश्य हो अमावस तो कभी करते पूर्णिमा,
कहलाते हो कलाधर तभी, ओ रे चंद्रमा।

शीतल प्रवृत्ति से अपनी जग को शांति सिखाए,
धीरज धरकर पूर्णता फिर कैसे पाई जाए।
हालात बदलते सभी के, करते जाओ कर्मा,
सुन्दरता पर करना न नाज़, बतलाते ओ रे चंद्रमा।

जीवन रहता एक सा न,आते उतार -चढ़ाव,
बदलना न मंजिल, रहना सदा समभाव।
तारों संग जब होआते, बदल जाता समां,
दिन से रात कर निशाकर कहाते ओ रे चंद्रमा।

सारे जहां को देते रोशनी तुम एकसमान,
करते न घृणा, द्वेष, सबसे प्रेम रख करते मान।
उत्थान से पतन, पतन से उत्थान को पहनाते अमलीजामा,
अविचल हो पथ पर रहते अग्रसर सदा ओ रे चंद्रमा।


- लता कुमारी धीमान


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हो तंग जनों की बातों से
रो रो कितनी काटी निशीथ
आगे सत्कार बुराई पीठपीछ
शायद यही है इनकी नीति
सदैव भले के संग बुरा
क्या यही इस जग की रीत
के प्राणी यहां सब ही हैं नीच
और हम ही बस लाचार क्लिष्ट

उस समय को याद करो( 2)
जब सब मार ठहाके
रहे थे उसको नीचे खींच
तब उस कृत्य में शामिल
क्या तुम नहीं थे उनके बीच?
लाचार तो तुम कभी थे ही नहीं
अगर ना ही कभी बन पाओगे
और सबको यूं निष्ठुर बता
कब तक सत्य ठुकराओगे
जब औरों की निंदा छोड़कर
खुद में सुधार लय लाओगे
जब त्याग काम की वासना
खुद में प्रेम का दीप जलाओगे
लेने में तो सब खुश हैं
तुम देने में हर्षाओगे
जब शुद्ध विचारों के जल से
अपने मन को तुम नहलाओगे
तब जाके शायद कहीं
सती के त्याग को समझ पाओगे
तब जाके पूरे मन से
तुम राधे राधे गाओगे
तब अपने मन में ही कहीं
तुम अपना मन बढ़ाओगे

मुझे क्रोध भयंकर आता था
पर क्रोध को मैने बांध लिया
बस रचनी धर्म की गाथा अब
यह मन में मैने ठान लिया
उन द्वेष,घृणा,और श्रापों को
कुछ इस भांति मैने साध लिया

है संभव न मैं वीर बनूं
पर कोशिश न किसीकी पीर बनूं
न बन पाया जो कुछ भी अगर
प्रेम से बहता नीर बनूं


- शुभी मिश्रा


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उपहास

यह कैसा उपहास बिधाता
यह कैसा उपहास।
भर भावों को उर में,
बॉध दिया उल्लास।
यह कैसा उपहास बिधाता,
यह कैसा उपहास।

स्वतंत्र लेखनी पर जैसे,
बधें हुए हो हाथ।
दो पल भी रह न पाती,
इन भावों के साथ।
यह कैसा-

कर्म खड़ा फुंफकारता
विवश है मेरी आश,
करना चाहूं कुछ पर
हो जाता व्यर्थ प्रयास।
यह कैसा उपहास बिधाता,
यह कैसा उपहास

साध्य साधन और मनन,
प्रयत्न भी है साथ,
पर समय की बेड़ी ने,
बॉधा मुझको नाथ
कुछ कर पाने की चाह,
अब न रही खास,
यह कैसा उपहास विधाता,
यह कैसा उपहास।


- रत्ना बापुली


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दूर रहकर भी निभा जाता है कोई,
साथ रहकर भी कोई दगा दे जाता है।

जुर्म करके भी बच जाता है कोई,
बिन किये ही जुर्म सजा कोई पा जाता है।

क्या खाऊँ सोच तड़पता है कोई,
क्या –क्या खाऊँ कोई समझ नहीं पाता है।

जताता नहीं बहुत कुछ करके भी कोई,
छोटे से उपकार को कोई बार-बार बतलाता है।

क्षमा कर देता है बड़े गुनाह भी कोई,
आग जलाकर बदले की कोई खुद भी जल मर जाता है।

रक्त का रिश्ता भी अपना नहीं लगता कोई,
पल भर में ही अजनबी कोई दिल को भा जाता है।

समझ सका न ये दुनियादारी, गुजार उम्र कोई,
चंद दिन यहाँ रह कर कोई खुद को सर्वज्ञ बता जाता है।

“धर्म “समझ ये आया नहीं अपना-पराया कोई,
मिल जाए जो खुद सा कोई, वही दिलों का नाता है।


- धरम चंद धीमान


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कोई शख्स दिल में उतर गया है
अब सारा ज़ख्म भर गया है

चराग बेखौफ जल रहा हैं अब
तूफानों का मंज़र गुजर गया है

गर्मी का मौसम है आने वाला
अब अश्क आंखों में ठहर गया है

भंवरा बसंत ऋतु में खूब झूम रहा है
यादों के पुराने पत्ते सब झर गया है

मेरे दयार पे खुर्शीद आए है मिलने
सदमे के रश्क से सब जुगनू मर गया है

दिलो को शेर से सवा शेर कर दिया
हर दश्त का शिकारी अब डर गया है

चमन वाले अब पैगाम भेज रहे हैं
स्वागत में सारे फूल बिखर गया है

हबीब का मुसलसन पयाम आया है
सदानंद इंद्रधनुष के जैसे संवर गया है


- सदानंद गाजीपुरी


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नारी के कदम, विजय की ओर

रन हो या राहें जीवन की सारी,
हर कदम में आगे बढ़ती नारी।

घर की डोर हो या कर्म की उड़ान,
संतुलन में रखती हर पहचान।

बिन नारी के अधूरा हर प्रयास,
उसके संग ही मिलता लक्ष्य का विश्वास।

देवों संग नारी बनी विजय की ढाल,
तभी हर युग में जीती हर चाल।

थकती नहीं, रुकती नहीं,
नारी है- जो हार मानती नहीं।


- बीना सेमवाल


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अब ख़ामोश हर मंज़र है...

ख्वाहिशें दम तोड़ती हुईं,
उमंगें भी मानो दफ़न हैं,
बेजुबां दिल का समंदर है,
अब ख़ामोश हर मंज़र है...

प्रतिस्पर्धा न है किसी से,
न हार-जीत का डर है,
थम चुका जोश का बवंडर है,
अब ख़ामोश हर मंज़र है...

बिछे हैं कांटे हर क़दम राहों पर,
चलना क्या रेंगना भी है दूभर,
लहुलुहान कर रहा मुझे यादों का खंजर है,
अब ख़ामोश हर मंज़र है...

जाले पड़े दिल की टूटी दीवारों पे,
कुछ दरारों में दीमकों के बसेरे,
मन का महल अब तो खंडहर है,
अब ख़ामोश हर मंज़र है...

सूखी हर डालियां कहती हैं अब,
कहां से फूटे नई कोपलें ?
उम्मीदों की जमीं भी तो हो चुकी बंजर है,
अब ख़ामोश हर मंज़र है...
अब ख़ामोश हर मंज़र है...


- कुणाल


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