साहित्य चक्र

13 December 2025

आधुनिक विकास के लिए प्रकृति की बलि कब तक और क्यों ?

उत्तराखंड में ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट के लिए हजारों देवदार के वृक्ष काटे जा रहे हैं। इस घटना का लोकप्रिय रचनाकारों द्वारा अपनी पंक्तियाँ के माध्यम से कुछ इस प्रकार से विरोध किया गया है-




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मौन सिपाही

मौन सिपाही इस धरती के बिन बंदूक बिन तलवार,
रक्षा करे पहाड़ भूमि मिट्टी मकान ये घर परिवार।
प्राणवायु दिया वरदान फिर भी वृक्षों का ही बलिदान,
विकास नहीं ये पतन है, जाने कब समझेंगे इंसान।

- सुतपा घोष, दुर्गापुर, पश्चिम बंगाल


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अपने ही पैरों पर
क्यों कुल्हाड़ी मार रहा,
पेड़ों के साथ ही न क्यों
राह निकाल रहा।


- रत्ना बापुली, लखनऊ, यूपी


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क्या दोष हैं!
इन बेजुबान वृक्षों का
जो अपने लालच के लिए
काट रहे हो इनको..
धरा की ये शान हैं
हम सबके लिए
जीवन का वरदान हैं
फिर भी क्यों दंड
दे रहे हो इनको...

- रजनी उपाध्याय, अल्मोड़ा, उत्तराखंड


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काट रहे हैं वृक्ष देखो
क्या ये देना चाहते हैं संदेश
वृक्ष धरा के हैं श्रृंगार
प्रकृति के हैं निःशुल्क उपहार
ऑल वेदर रोड के लिए
क्यों कर रहे हैं संहार
विकास का स्वदेशी मॉडल अपनाओ,
विनाश को नजदीक न बुलाओ,
काट कर इन बेजुबान दरखतों को
चिपको आंदोलन की याद न ताज़ा करवाओ,
बहनों ने भाई बनाए थे दरख़्त
चिपक कर इन दरखतों से
कटने से बचाया था
कुर्बानी उन बहनों की
इनको भी याद करवाओ।

- बाबू राम धीमान, बिलासपुर, हिप्र


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विकास नहीं,
विनाश की अंधी दौड़ है,
इन नासमझो को कौन समझाए,
काट रहे पेड़ नहीं, कुल्हाड़ी मारी
अपनी पैर है।
घुट-घुट मरेंगे, सांसे बिन,
गर खत्म ना हुई ये जो,
बेलगाम, आधुनिकता
की लगी होड़ है।

- रोशन कुमार झा, जमशेदपुर, झारखंड


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विकास नहीं, विनाश की आहट लगती है।
उत्तरकाशी में ऑल वेदर रोड के लिए
हज़ारों देवदारों को काटा जाना विकास नहीं,
विनाश की आहट लगती है।

पहाड़ों का सच यही है कि
जब भी सड़कों के लिए जंगल काटे गए हैं,
भूस्खलन, बाढ़ और आपदाएँ और ज़्यादा बढ़ी हैं।
देवदार के ये पेड़ सदियों से गंगा की घाटी,
जलस्रोतों और पहाड़ी बस्तियों के रक्षक रहे हैं,
इन्हें काटना अपनी ही ढाल को तोड़ने जैसा है,

सच्चा विकास वही है जो सड़क भी दे,
सुरक्षा भी दे और जंगलों को भी ज़िंदा रखे,
न कि अदालतों और विशेषज्ञों की चेतावनियों को
नज़रअंदाज़ करके पहाड़ को और अस्थिर कर दे।
चिंता करना मानव जीवन के लिए बहुत ज़रूरी है,

- डॉ. मुश्ताक अहमद शाह, हरदा, मप्र


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कटता पेड़
तो खत्म होगा जंगल।
ये पहचान
भविष्य होग़ा अमंगल।
हम सबको
मिल कर बचाना होगा।
किसी न किसी को
तो आगे आना ही होग़ा।

- राघवेन्द्र प्रकाश रघु, बक्सर, बिहार


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