साहित्य चक्र

19 March 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 20 मार्च 2026





*****





उम्रदराजी में खैरियत कौन पूछेगा
मुफ़लिसी में हमदर्द कौन बनेगा
दोस्ती भी हो 'नूर' रंजिश भी हमसे
भला इतनी हिम्मत कौन करेगा।

माँगता है मन्नतों में अक्सर वो मुझको
शायद मुद्दत से गले लगाने को बेताब है वो मुझको
और कभी ऐसे हक जताता है वो मुझपर 'नूर'
अपने घर की कोई चीज समझता है वो मुझको।

आज वहीं गुजरा दौर याद आया है मुझको
फिर वहीं ख्वाब आँखों में आया है मुझको
उस मकां की दहलीज को पार कर 'नूर'
आज फिर मेरा बचपन याद आया है मुझको।

अपने सारे रिश्ते मुझसे तोड़ दो
उस गली को मेरी तरफ मोड़ दो
अपनी झूठी हमदर्दी अपने पास ही रखो
जाओ मुझको तन्हा छोड़ दो।

अब और कितना सताओगे मुझको
बस भी करो,अब और कितना बचाओगे मुझको
मैं मायूसियों में भी मुस्कुरा देती हूँ
बस भी करो, अब और कितना रूलाओगे मुझको।

हमसे पूछो मोहब्बत में क्या अदब है
हमसे पूछो मोहब्बत में क्या गज़ब है
अब किसी और घर का 'नूर' है इश्क़ मेरा
हमसे पूछो मोहब्बत में क्या सबब है।

मैं सदियों का गुजरा सा एक जमाना हूँ
लोगों के बतियाने का बस एक बहाना हूँ
इशारे पर चलती है अब ये हवाएँ भी
मैं कागज़ से बनी कश्ती का एक फ़साना हूँ।

रूको! ठहरो तो जरा
हमें अपना हिसाब तो लेने दो
फुर्सत में खुद को भी सँवार लेंगे
पहले हमें किताब तो पढ़ने दो।


- नितेश पालीवाल नूर


*****





इच्छा मृत्यु

जीवन की राहों पर थका सा मन,
कभी-कभी मौन से संवाद करता है।
पीड़ा की लंबी रातों में,
आत्मा भी विश्राम चाहता है।

जब साँसों का बोझ बढ़ जाए,
और दर्द ही साथी बन जाए,
तब मन के आँगन में कहीं
शांत विदा का विचार आए।

न कोई शोर, न कोई आह,
बस शांत दीपक सा बुझ जाना,
जैसे संध्या की कोमल छाया में
दिन का धीरे से ढल जाना।

पर जीवन तो ईश्वर का उपहार,
हर पल में उसकी छवि बसती है,
इसलिए आशा का दीप जलाकर
आत्मा फिर उजियारा रचती है।

इच्छा मृत्यु नहीं केवल अंत,
यह पीड़ा से मुक्ति की चाह है,
पर जीवन की हर साँस में भी
नई सुबह की एक राह है।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


*****




मुॅंह चिढ़ाती हुई धूप

क्या ख़ूब चेहरा है ऑंधियों का
माफ़ी भी माॅंग लें तो कहलाऍं विनम्र
लेकिन वे टहनियाॅं जाऍं तो जाऍं कहाॅं
जो अक़्सर ही टूट जाती हैं टकराते हुए
छूट जाता है सभी कुछ छूट जाता है पीछे
और एक दिन भस्म हो जाता है सभी कुछ
उड़ती रह जाती है सिर्फ़ राख, मिट्टी,धूल
और मुॅंह चिढ़ाती हुई धूप


*****


कितना कमतर हूॅं मैं

कटिबद्ध हूॅं,प्रतिबद्ध हूॅं मैं
अपने ही दु:ख की ओर लौटने के लिए
दु:ख और-और,औरों के सभी भूलते हुए
कौन लिखेगा,कौन समझाएगा मुझे
कितना कायर,कितना कमतर हूॅं मैं
फिर भी लिपिबद्ध हूॅं मैं ?


*****

आभास और स्मरण

याचना में बदल जाती हैं प्रार्थनाऍं
कायरता में बदल जाती हैं विनम्रताऍं
नक़्क़ारख़ानों में क़ैद हो जाती हैं लालटेनें
एक दिन जॅंगल निगल ही लेता है हर गूॅंज
रह जाता है क्षणभर के लिए रह जाता है
समूचे दृश्य-पटल पर झिलझिल- झिलझिल
सिर्फ़ आभास और स्मरण

*****

मुश्किल हैं कविताऍं

मुश्किल हैं कविताऍं
मुश्किल कविताओं का मुश्किल वक़्त है ये
मुश्किल में प्राण हैं,मुश्किल में प्रतिरोध
अन्न-कण दबे हैं अर्से से गरुण के मुॅंह में
भूखे हैं घरों में चिड़िया के बच्चे


- राजकुमार कुम्भज


*****






उपेक्षित-नारी

जन्म जन्म से रही उपेक्षित,
सदा रही स्नेह से दूर,
जननी रही हमेशा से जो,
बनी रही चरणों की धूल,
दया ,प्रेम ,करूणा का सागर,
है क्षमाशील अमृत की गागर,
मिला जिसे सम्मान कभी न,
बनी रही अपमाानित झांझर।
धिक्कार मिला अपमान मिला,
सब कुछ सहती रहती बस मौन,
पर अपने कर्तव्यों से न हटती,
बढती सदा अपने पथ की ओर,
चाहे हो घनघोर अँधेरा,
चाहे हो तानो का जोर।
हर पडा़व को पार करे वो,
जैसे गूंजे मृदंग का शोर।

बनी रही दासी जो सदा से,
अब क्रान्तिउसमेंआनी थी,
बँधी रही बेड़ियो से जो सदा,
आजादी उसे अब पानी थी,
पर सत्य यही था ध्धेय नहीं था,
इकबार उसे फिर पछताना था,
युगो - युगो से थी जो उपेक्षित,
संघर्षो की ज्वाला में जल जाना था।

"दमन करती इच्छाओं के
ज्वालामुखी को भड़काना है,
सम्मान विजयनाद का
शंख बजाकर जीना है या
लड़कर वीरगति को पाना है।"


- दिव्या


*****




उसको कितना गम है सताता

हंसता है कोई दीवारों के बाहर भी
कोई अंदर ही अंदर सुलगता है जाता
किसी के अंदर झांक कर कोई कैसे देखे
कि उसको कितना गम है सताता

बाहर से जो दिखता है वह अंदर नहीं है
अंदर वही है जो किसी को नज़र नहीं आता
वही जान सकता है जिस पर है बीत रही
ज़िंदा वही है इंसान जो दुखों से नहीं है घबराता

शांत है बाहर अंदर चल रहा भयंकर तूफान
डरता नहीं खड़ा है फिर भी सीना तान
जीतेगा वही जो करेगा डटकर मुकाबला
जिंदगी में देने पड़ते हैं कई इम्तहान

सुख दुख का तो जीवन मे लगा रहेगा आना जाना
यहाँ कोई नहीं स्थाई यह जग है एक मुसाफिर खाना
खुशियां मिलेगी किसी को किसी को मिलेगा ग़म
बीत गया जो वक्त वह फिर लौट कर नहीं है आना

आदमी जब मुसीबतों से है घिर जाता
दूर दूर तक घोर तम कुछ नज़र नहीं आता
तब दूर नज़र आती है रोशनी की एक किरण
छुप जाता है अंधेरा एक नई राह है दिखाता


- रवींद्र कुमार शर्मा


*****




हरीश राणा तू ज़िंदाबाद रहेगा
हरीश राणा तू मरा नहीं तू मर ही नहीं सकता,
तू हमेशा जिंदाबाद था और ज़िंदाबाद ही रहेगा।

तू जाते जाते भी कई नेक काम कर गया,
अपनी जान देकर कई घरों के चिराग रोशन कर गया।
जो काम लोग ज़िंदा रहकर भी नहीं कर सकते,
वह काम तू मरकर भी कर गया।
अब तू किसी के दिल में जिंदगी बनकर धड़केगा,
कोई तेरी आँखों से यह सारा जहां देखेगा।

हरीश राणा तू मरा नहीं तू मर ही नहीं सकता,
तू हमेशा जिंदाबाद था और ज़िंदाबाद ही रहेगा।
तेरह साल तक तूने अकेले ही ज़िंदगी से एक मौन लड़ाई लड़ी,
जिसमें तेरे साथ आई हर पल कई विपदाएं बड़ी।

फिर भी तूने कभी हौसला न खोया,
उसका परिणाम देख आज सारा देश तेरे लिए रोया।
हरीश राणा तू मरा नहीं तू मर ही नहीं सकता,
तू हमेशा जिंदाबाद था और हमेशा जिंदाबाद रहेगा।

कई सालों के बाद तेरे माता पिता का हौसला भी टूट गया,
लगता है रब जैसे उनसे रूठ गया।
वरना तेरी मौत पर वे कभी हस्ताक्षर नहीं करते,
अपने कलेजे के टुकड़े को मौत की तरफ धकेलने से डरते।

पर उनकी भी अपनी मजबूरी थी,
क्योंकि जिंदगी ने भी बना ली तुझसे दूरी थी।
हरीश राणा तू मरा नहीं तू मर ही नहीं सकता,
तू हमेशा ज़िंदाबाद था और ज़िंदाबाद ही रहेगा।


- भुवनेश मालव


*****




कर्ण-युवा प्रतिज्ञा

उठो हिंद के ओजस्वियों, अब रणभेरी बजने दो,
शौर्य-शिखर पर युवा शक्ति का, विजय-केतु सजने दो।
तुम वंशज हो उस महाबली के, जिसने काल को ललकारा,
सूतपुत्र की पदवी तजकर, भाग्य स्वयं अपना संवारा।

सुनो युवाओं! मित्रता का, अर्थ नहीं व्यापार है,
यह प्राणों की आहुति है, यह जीवन का आधार है।
कर्ण खड़ा था दुर्योधन संग, जब जग ने दुत्कारा था,
बिना लाभ की परवाह किए, उसने मित्र को संवारा था।

कवच दिया और कुंडल सौंपे, मृत्यु को भी दान किया,
केशव के मधु-प्रलोभनों का, हँसकर अपमान किया।
आज देश को चाहिए ऐसी, निस्वार्थ मित्रों की टोली,
जो राष्ट्र-धर्म की रक्षा में, हँसकर खा ले सीने पर गोली।

मिटा दो जाति-पाति के बंधन, संगठन की शक्ति बनो,
भ्रष्टाचार के सीने में, तुम जलती हुई उक्ति बनो।
क्या डरते हो बाधाओं से? तुम पर्वत के सर तोड़ो,
अन्याय खड़ा हो सम्मुख तो, तुम निर्भय होकर मुख मोड़ो।

यह देश नहीं केवल माटी, यह जागृत देव-स्वरूप है,
तुम हो इसके रक्षक वीर, तुम राष्ट्र-प्रेम का रूप हो।
स्वार्थ त्याग कर हाथ मिलाओ, कर्ण-सा अडिग विश्वास जगाओ,
भारत माँ के चरणों में, अपना सर्वस्व चढ़ाओ।

न पद की भूख, न यश का लोभ, बस विजय का विश्वास हो,
तुम्हारी रग-रग में बस, केवल हिंदुस्तान का वास हो।
उठो! कि तुम ही शक्ति हो, तुम ही कल का विधान हो,
तुम्हारे शौर्य से ही सुरक्षित, मेरा गौरवशाली महान हो।


- देवेश चतुर्वेदी 'ईशान'


*****





चिंता

चिंता चिता-सी जलाए मन, मुस्कानें राख बना देती है,
नींदों की कोमल डाली पर, आहट-आहट छा जाती है।
जो कल था ही नहीं अभी तक, उसका बोझ उठाए फिरती-
जीवन की खुली किताब में, बस डर की स्याही भर जाती है।

पर याद रखो ऐ मन मेरे, ये धुंध सदा न रह पाएगी,
आशा की पहली किरण ही, तम का ताला खोल जाएगी।
जिस क्षण वर्तमान को थामो, चिंता खुद बिखर जाएगी-
विश्वास की धीमी रोशनी, हर पीड़ा को धो जाएगी।

चिंता जब सीमा लाँघे तो, साहस को स्वर देना होगा,
मन के अँधेरे कोने में, दीप स्वयं ही बनना होगा।
हर आशंका की आंधी में, धैर्य की नाव उतारो तुम-
डर की सूखी धरती पर भी, विश्वास नया बोना होगा।

चिंता से संवाद करो, वह शत्रु नहीं संकेत है,
कहीं अधूरा श्रम है शायद, या सपनों में ही खोट है।
जिस दिन खुद को जानोगे तुम, डर का चेहरा टूटेगा
आत्मबल की एक ध्वनि से, संशय का वन छूटेगा।


- शशि धर कुमार


*****




इनकार

पुलिस जब आ ही जाये ऐन सिर पर
और उसकी लाठी नृत्य करने लगे
तुम्हारी पीठ पर
इनकार कर देना झुकने से।

बिच्छू जब आ ही जायें
और डंक मार दें चाहे
तुम्हारी आंखों और कानों पर
इनकार कर देना उनके वश में आने से।

दुनिया जब घूमती नज़र आये गोल-गोल
यातना-कक्ष के भीतर
साफ़ इनकार कर देना चाहिये
तुम्हारे दिल को मुरझाने से।

तुम सुनना बच्चों की आवाज़ों को
देखना रंगत हमारे संगीत की
और नाच उठना मन ही मन
समर्पण की मौत पर।

जिस क्षण शक्तिसम्पन्न लोग
लूटने में लगे हों तमगे
और अशक्त चुन रहे हों
किनके शासन के,
तुम इनकार कर देना घुटने टेकने से
फुटपाथ पर छल और कपट के।


*****


एक तानाशाह से

तुम्हारे दौर में
तुमने दूर कर दिया हमसे
हमारी स्वतंत्रता के सार को।

तुम्हारे दौर में
कमज़ोर लोगों ने हिफ़ाज़त की
तुम्हारी दुर्बलताओं की,
और धरती रोती रही लगातार,
चन्द्रमा तक स्याह पड़ गया था
तुम्हारे दौर में।


*****

हम


केवल हम ही नहीं थे
पीछे छूट जाने वालों में,
अंज़ीर का पेड़ भी खड़ा था
हमारे साथ ही।

केवल हम ही नहीं थे
पीछे छूट जाने वालों में
जब तक कि आसमान
इनकार करता रहा था
हमें वीज़ा देने में।

शुभ रात्रि, प्रिये
हम इन्तज़ार करेंगे यों ही
किसी और फूल के खिलने तक।


*****

सत्ता

इस तरह पहन लेते हैं हम
सत्ता को :
सीटियों और बन्दूकों और बारूद के साथ

सुरक्षा सैनिक
जगमगाती रोशनियां
कांच की धुंधली खिड़कियां
क़तारें मोटरगाड़ियों की
ख़िताबें, पदवियां
कम से कम हाथ मिलाना
कम से कम मुस्कुराना
कम से कम सन्ताप

हम पहन लिया करते हैं सत्ता को
बिल्कुल महामारी की तरह

- चेन्जेराई होव / हिंदी अनुवाद- राजेश चन्द्र


*****





संघर्ष ही जीवन है
जीवन एक रणक्षेत्र है
जीवन में विपत्ति से, आपदा से
निरंतर लड़ना होगा
कभी जीवन में कांटे होंगे
कभी रेगिस्तानों की तपिश होगी
कभी मुसीबतों की आंधियाँ होंगी
कभी आफतों के तूफान होंगे
संघर्ष ही जीवन है
कभी तन सुलगाती उष्णता होगी
तो कभी तन जमाती सर्दी होगी
मौसम की हर प्रतिकूलता से लड़ना होगा
जीवन की हर परिस्थिति से भिड़ना होगा
संघर्ष ही जीवन है
समय जैसा भी होगा
हमें संघर्षों से लड़ते -लड़ते
निरंतर आगे बढ़ना होगा
संघर्षों से लड़े बगैर
उच्च लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं होती
बिना काटे चट्टानों को
जल धारा नहीं मिलती
यहाँ हारने पर मिलती है सीख
तो जीतने पर मिलता है आनंद
कोई भी लड़ाई बेकार नहीं जाती
अतः संघर्ष से मत घबराना
निरंतर कर संघर्ष
आगे बढ़ते जाना
आखिर संघर्ष ही जीवन है
संघर्ष ही जीवन है


- प्रवीण कुमार


*****





नव संवत्सर

नव संवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएँ,
आओ सब मिल जुलकर खुशियाँ मनाएं ,
गीत एक नया गाएँ, भाईचारा का संदेश फैलाएं,
यहाँ सब अपने है, यही बातें दोहराएं।

ये नववर्ष, हर्षोउल्लास की है,
अपनों को, अपने में जुड़ने की अहसास की है,
चैत शुक्ल प्रतिपदा की प्रथम दिवस की है,
निज इष्ट देव देवी में, भक्ति निवेश की है।

नव संवत्सर के सुअवसर पर,
प्रकृति भी है तैयार, सज-धज कर,
हरियाली छाई है धरा मे चहुंओर,
भंवरे, मधुमक्खियाँ पुष्पों में करे शोर।

आमों में लगे है मंजर, महुआ मे फूल,
तरू, लता में नये पत्ते, तो काँटो में शूल,
पलाश, टेसू से खिल उठे है जंगल,
रामनवमी, चैती दुर्गा की गाते गीत मंगल।

मधुरम, मधुमय हो रहा है, वातावरण,
ग्रीष्म ऋतु का होने लगा है,आगमन,
मन है फिर भी सबो का प्रसन्न,
नव संवत्सर का करेते है सुस्वागतम।


- चुनू साहा


*****




मैं सिर्फ मैं हूं...
सुकून की सांस लेता...
चल पड़ता हूं रोज की तरह...
अपने काम पर।

काम से काम...
बस करता रहता हूं...
ख़ामोशी के साथ चेहरे पर मुस्कान...
अकेले ही विखेरता रहता हूँ।

अपने में ही मस्त हूँ...
अल्हड़ की तरह अल्हड़पन लिए...
खोया क्या पाया क्या पता ही नहीं...
गुमसुम और व्यस्त हूं।

मैं अपनी जीत हूँ...
ना बड़ी खुशियों की उम्मीद...
ना बड़ी गम में गमजादा...
जो मिला बस जी लिया।

हार का पता नहीं...
कभी देखा ही नहीं...
मिलेगा तो गुफ़्तगू कर लेंगें...
जीत मे बदल लेंगें या
समझौता टाई पर कर लेंगे।

होगा क्या फलसफा...
कौन सोचे, देख लेंगें जो होगा...
अच्छा होगा या फ़िर बुरा होगा...
तमीज़ है बत्तमीज थोड़ा।

मैं अपनी ही शिकस्त हूँ...
खुद का खुद से सिनाख्त भी...
तो करना होगा मुझें ही तो क्या...
ओ हाँ मैं तो मैं हूं।


- राघवेन्द्र प्रकाश 'रघु'


*****




ऐ ज़िन्दगी बता कहाँ कहाँ कमी कोई यहाँ निकली।

मैं उससे प्यार करता था मगर वो बेवफ़ा निकली,
ऐ ज़िन्दगी बता कहाँ कहाँ कमी कोई यहाँ निकली।

न शिकवा था निगारों से, न गैरों से बुराई थी,
लिखी जो हाथ की लकीरों में, बस वो बद-गुमां निकली।

सदाक़त (सच्चाई) की वकालत में, गवाही कौन देता अब,
अदालत वक्त की थी और मुंसिफ़ की ही खता निकली।

सँवारा था जिसे मैंने अपनी रातों को जला कर के,
वो क़िस्मत की लकीरें ही दुश्मने जां यहाँ निकलीं।

बहुत मसरूफ़ थे वो अपनी दुनिया को सजाने में,
हमारी बेबसी ही वक्त का बेसबहा तोहफ़ा निकली।

जिन्हें मल्लाह समझा था, वही लहरों के साथी थे,
किनारे पर पहुँचते ही जो कश्ती थी वो फना निकली।

मुश्ताक! यूँ ही नहीं टूटा है शीशा मेरी चाहत का,
मेरे हक़ में मुक़द्दर की बड़ी गहरी सज़ा निकली।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह


*****




इबादत

सिर्फ़ सज्दों में नहीं है इबादत,
हर नेक काम में भी है इबादत।

मीठे लहजों की नरम गुफ्तगुं में,
शफ़्फ़ाफ़ बातों में भी है इबादत।

दिल न दुखे किसी का तुमसे,
इस एहतियात में भी है इबादत।

अच्छे अल्फ़ाज़, साफ़ निय्यत,
इन आदाबों में भी है इबादत।

रुख़ पे मुस्काँ, हो दिल पाक,
ऐसे रवैयों में भी है इबादत।

नाराज़गी मिटाना, हाथ बढ़ाना,
इस हिकमत में भी है इबादत।

नफ़रत के बदले मोहब्बत देना,
इस हिकमत में भी है इबादत।

ज़िंदगी को गर ख़ुलूस से जीना,
हर उस सा'अत में भी है इबादत।

तौसीफ़ ख़िदमत-ए-खल्क भी कर,
इस ख़िदमत में भी है इबादत।


- तौसीफ़ अहमद


*****




हो गये

लोग अपने फन मे इतने माहिर हो गये,
कि हमारे किस्से भी जग ज़ाहिर हो गये!

हमें तो रहना था महज़ दिल में उनके,
पर ना जाने कब - कैसे बाहिर हो गये!

भरोसा मेरा टूट गया ज़ालिम दुनिया से,
अब इंसान जो इतने शातिर हो गये!

लोग तो हमें भी बुरा ही कहा करते थे,
हम तो शरीफ़ तुम्हारी ख़ातिर हो गये!

हुआ करता था हक जिन रास्तों पर कभी,
आज उन्हीं रास्तों पर मुसाफ़िर हो गये!

मत करो नफ़रत एक - दूसरे से तुम,
कौन कहता है कि हम काफ़िर हो गये!

वो हमसे जुदा होकर भी खुश था बहुत,
और हम नादां मरने को हाज़िर हो गये।


- आनन्द कुमार


*****




मैं कह न पाया वह सुन न पाया।
जिस राग में चाहता था गुन न पाया।
कितने लय ताल तुक वो रोज गढ़ता ही रहा,
मगर चाहतों का ताना-बाना बुन न पाया।।

व्याधियों के व्याल रोज फुफकारते रहे।
कोई तो बचा ले रोज पुकारते रहे।
जिसे गुहारते यहाँ वही डसते रहे,
शोर है कि तेरी खातिर ही हाथ पाँव मारते रहे।

अब ये दिल तेरी वज्म में आएगा नहीं।
कैसे मान लूँ जालिम जुल्म ढ़ाएगा नहीं,
हार जीत कुछ भी नहीं मगर दो दो हाथ जरूरी है,
अदावत के सिवा मोहब्बत के गीत गाएगा नहीं।

इस जीभ को भला क्या भाता है लज्जत के सिवा ?
क्या होगा थोड़ी सी बेशर्मी और हुज्जत के सिवा।
अब हर सही गलत पर सिर्फ हें हें करता है,
यही करके सब बचा ले गया सिर्फ इज्जत के सिवा।


- राधेश विकास



*****





आँखों में आँसू, होंठों पर मुस्कान

सदियों की खामोशी, गहरा उसका दर्द,
अन्याय की हर लहर, सहती रही निडर।

पैरों में बेड़ियाँ, हाथों में कंगन की हथकड़ियाँ,
कुरीतियों की आग में, झुलसती रही वो कलियाँ।

कठपुतली की तरह, नाची वो मर्द के इशारे पर,
सपनों को मारकर, जली वो सती के अंगारे पर।

देवदासी के नाम पर, मंदिर में वो गुमनाम हुई,
दहेज की वेदी पर, हर रोज वो बदनाम हुई।

घूंघट के पीछे से, देखती थी दुनिया वो अधूरी,
अधिकारों से वंचित, हर खुशी रही उसकी अधूरी।

बहु-विवाह के दंश से, हृदय उसका तड़पता रहा,
प्रेम व करूणा के लिए वो, सदा तरसती रही।

पर अब वक़्त बदल गया, अब वो जाग गई है,
अन्याय के खिलाफ, आवाज़ उसने उठाई है।

ज़ंजीरों को तोड़कर, उड़ने को अब वो तैयार है,
नारी है वो शक्ति, जिसका हर रूप महान है।


- दीपक कोहली


*****




तजुर्बा देखना है
तो मेरे आंखों में देखिए
हरकतों से तो मैं आज भी बच्ची हूं
तजुर्बा तो मां-बाप से सीखा
और हरकतें बड़े भाई-बहनों से
हर पल जिओ और जीने दो
ज़िन्दगी क्या है पानी का बुलबुला
न जाने कब शाम हो जाए
रह न जाएँ अधूरी आशाएं
तो हर पल मस्ती से जिओ
उदासी में वो मज़ा कहां है
जो सपनों की उड़ान में है
बिन पंखों के उड़ना सीखा
बस यही तजुर्बा बरकरार है


- सुमन डोभाल काला


*****





विस्फोटों के बीच रोटी की पुकार

जब धरती की छाती पर
लोहे के दानव चलते हैं,
और आकाश की नीली आंखों में
धुएं के आंसू पलते हैं,
तब कहीं दूर किसी रसोई में
चूल्हा ठंडा पड़ जाता है,
और एक मासूम बच्चा
रोटी का अर्थ समझ जाता है।

तकनीक के चमकते पर्दों पर
हम युद्ध को लाइव देखते हैं,
पर स्क्रीन के उस पार
टूटते जीवन को कब लिखते हैं?
जहां एक क्लिक में मिसाइल छूटती है,
वहीं किसी मां की गोद उजड़ जाती है,
विज्ञान की यह प्रगति
मानवता पर प्रश्नचिह्न बन जाती है।

वर्चुअल दुनिया के रंगीन जाल में
हम यथार्थ से दूर हुए,
डिजिटल सपनों के पीछे भागते
अपने ही अस्तित्व से चूर हुए।
पर जब पेट में आग लगती है,
तो डेटा नहीं, दाना चाहिए,
तब समझ आता है,
जीवन को सिर्फ साधन नहीं,
ठिकाना चाहिए।

कभी किताबों में पढ़ा था हमने
राख से ढकी हुई वह दुनिया,
जहां सूरज भी बुझा-बुझा था,
और हवा में था केवल सन्नाटा गहरा।
आज वही कल्पनाएं
हकीकत की देहरी पर खड़ी हैं,
मानव के लालच की लपटें
भविष्य की सांसें जला रही हैं।

तेल की एक बूंद के पीछे
कितने शहर जल जाते हैं,
ऊर्जा की भूख में हम
अपने ही घर जला जाते हैं।
दूर कहीं युद्ध छिड़ता है,
और यहां महंगी हो जाती रोटी,
एक विस्फोट की गूंज में
सिमट जाती है जीवन की छोटी-सी ज्योति।

धरती की कोख से हम
उसकी सांसों से ज्यादा निकाल रहे हैं,
एक नहीं, डेढ़-डेढ़ पृथ्वी
हर साल हम निगल रहे हैं।
नदियां जहर से भरती हैं,
पेड़ों की छाया घटती जाती है,
और इस विनाश के मेले में
मानवता चुपचाप मरती जाती है।

तोप की गर्जना जब होती है,
चूल्हे की लौ बुझ जाती है,
एक ओर विजय का नारा उठता है,
दूसरी ओर भूख सिसक जाती है।
युद्ध का हर जयघोष
दरअसल पराजय का गीत है,
जहां जीतता कोई नहीं,
बस हारता मानव का मीत है।

सोचो, जब आखिरी पेड़ गिर जाएगा,
और आखिरी नदी भी रोएगी,
जब मछलियों की खामोशी
समंदर में गूंजेगी,
तब क्या तुम अपने सिक्कों को
आग में पका कर खाओगे?
या कृत्रिम बुद्धि से
जीवन का स्वाद पाओगे?

नहीं, उस दिन समझ आएगा
कि रोटी सिर्फ आटा नहीं होती,
वह धरती की गोद,
पानी की धड़कन,
और सूरज की तपन होती है।
अब भी समय है,
विनाश की राह से लौट चलें,
प्रकृति की गोद में फिर से
अपने सपनों को बोत चलें।

स्वनिर्भरता की लौ जलाएं,
शांति के बीज उगाएं,
ताकि आने वाली पीढ़ी
हमसे यह न पूछे,
जब दुनिया जल रही थी,
तब तुम क्या कर रहे थे ?
आओ, तोपों की जगह हल उठाएं,
और युद्ध की जगह
जीवन का गीत गाएं।
ताकि इस धरती पर
फिर से वह सुबह आए,
जहां हर हाथ में हथियार नहीं,
एक गर्म रोटी हो।


- स्नेहा सिंह


*****





कहाँ का इश्क़, कहाँ की मोहब्बतें मुरशिद
तमाम उम्र ही झेली हैं वहशतें मुरशिद,

हम ऐसे लोग कहाँ, रास आ सके मोहब्बत को
कि जिन पे बार हैं अपनी तबीयतें मुरशिद,

सरों की ख़ाक, हमें खींच लाई वरना
कहाँ का हिज्र, कहाँ की ये हिजरतें मुरशिद,

वो कौन लोग थे गुमनामियों से नालाँ थे
हमें तो मार गई हैं ये शोहरतें मुरशिद,

किसी को टूट के चाहें, किसी को याद करें
हमारे पास कहाँ इतनी फुरसतें मुरशिद,

कोई तो होता, जो चुनता वजूद के रीज़े
तमाम उम्र रही हैं ये हसरतें मुरशिद....

'अज़ीम' पढ़ कोई वज़ीफ़ा, कोई विर्द, कोई इस्म
कि खत्म होने लगी हैं अज़ीयतें मुरशिद...


- अब्दुल अज़ीम अलीग


*****





कड्ड दिल्ला रे बट्ट

सट सट्टा रो सट्ट
कड्ड दिल्ला रे बट्ट
आई गई म्यां देख अप्पू ई
बिलासपुरा री नलवाड़ी
कजो खड़िया करदा खाट्ट
सट सट्टा रो सट्ट
कड्ड दिल्ला रे बट्ट...

तां जे मत्थे री आंऊदी क्याड़िया
फेरी बाट्ट नी दिसदी त्याड़िया
छड्ड पगडंडियां रे फेर
चल पधरिया रिया बाटा
बदली गया ज़माना हुण
कोई निया किसी ते कट्ट
छड्डी दे गुस्सा, खोली दे जिऊये री गठ्ठ
सट सट्टा रो सट्ट
कड्ड दिल्ला रे बट्ट...

सच गलांदे थे सयाणे,
गल्ल हुंदी थी सोलह अन्ने सच
"हसदेया रे बसदे थे घर"
कईया जो पची जांदी थी ये गल्ल
कईया जो रहन्दी थी अणपच ,
कोई नी हूँदा था फ़िक्र फ़ाका
डर त्रास गया हुण सारा, बणी गए निडर
छड्ड गल्ला पुरणियां, खोली दे दिल्ला रे बट्ट
सट सट्टा रो सट्ट
कड्ड दिल्ला रे बट्ट...



- बाबू राम धीमान


*****

No comments:

Post a Comment