साहित्य चक्र

23 April 2026

कवि बाबू राम धीमान की रचनाएँ








काँगड़े रे गबरू

छैल बांके लगदे,काँगड़े रे गबरू
आलिशान ए बंगले,शैला रे टपरू
अंबा रे अम्बोटू, लीचिया रे डालू
ठंड-ठंडी हवा छैल बांकी बगदी
झुलदे चिल्ला रे डालू
दूरा ते दिखदे सोहणे बांके टपरू
छैल बांके लगदे, काँगड़े रे गबरू

मिठड़ा जेया गल्लान्दे, खेतरे कम्मान्दे
सौगी-सौगी अपणे घरां जो आऊंदे,
करही जांदा दिन, चूल्हे अग्ग बालदे
अम्मा रे हत्थां रिया रोटियाँ चावा कन्ने खांदे
टब्बरा ने गलाई कन्ने,अपणा दुखड़ा सुणान्दे
होई गई जालु रात, डूबी जांदे टपरू
छैल बांके लगदे, काँगड़े रे गबरू

गोरे,चिट्टे,निमले बड़े सोहणे लगदे
चटकीले कपड़े तुहांजो,बड़े भारी जचदे,
तन्ना बिच पाई कन्ने, देखो बड़े खरे लगदे
कांगड़े रिया घाटियां बिच घुमदे बी सजदे
गांह ,पचांह, त्वां,रवां करदे बी बड़े सोहणे लगदे
मिठड़िया जेया बोलिया बिच जालु गल्लान्दे,
ताल्लु छैल बांके लगदे, काँगड़े रे गबरू

*****



देखी चल मर्दान्या रंग करतार दे
आपे मर जाएंगे जेड़े दूजया नू मार दे ,
कौमा लई लोकी अपने पुत्ता नू बार दे
देके कुर्बानी अपणी, जिन्दगी नू संवार दे

बंदा क्या इस जग तों मिट्टी दा खिलौना है
नेकी कर दरिया बिच डाल दे ,
छड्ड दे नफ़रत,कर नेक कमाइयाँ बन्देया,
चुकी पाप दी गठड़ी नू सिर तों उतार दे,

हक़ दी खा रोटी बन्देया, संगता नू प्यार दे
वक्त दी चक्की भोलेया बारीक पिसदी है,
हर कर्म दा लेखा जोखा रखदा है करतार
कौण बच पाया है सोहण्या बिच संसार दे

धन दौलत जोड़ लई क्या मिलिया संसार ते
महल-चबारें,शानो-शौकत, इत्थे रह जाणे बन्देया,
खाली हत्थ जाणा पऊ इक दिन बिच संसार दे
कर बन्दगी रब्ब दी सोहण्या, गुण गा लै करतार दे

*****

तड़पती रही, चीत्कार करती रही
चीख न कोई सुन पाया,
बेरहमी से कत्ल करता रहा दरिंदा
सुनसान रास्ता भी छुड़ा न पाया ,

चीख न पाई वह अभागी लड़की
सर धड़ से अलग कर दिया था उसका
तड़पती रही बेचारी कोई देख न पाया
छुपता छुपाता भाग गया वह दरिंदा,

खून से लथपथ लाश पड़ी थी उसकी
पूछ रही थी हर किसी से एक सवाल
कब तक करोगे कत्ल मासूमों का ?
कब तक काटोगे मासूमों के हाथ ?

आख़िर पकड़ा गया वह मासूम का दरिंदा
एक शब्द न कह पाया लोगों के सामने,
उग्र थी भीड़ मांग रही थी, फांसी की सजा
काबू कर उसको ले गई पुलिस अपने साथ,

उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरी की चाहत
पूरा न कर सकी मासूम के अरमानों को,
हर कोई सन्न रह गया उस दृश्य को देख कर
कब तक होते रहेंगे कत्ल? पूछता रहा सवाल।।

*****

फ़िर भी खाली दिखते हैं

कुर्सीनामा किस-किस का ढूंढोगे ?
जिन्दगी की वसीहत किसी के नाम तो नहीं,
बहियों को खोलता हूँ, पन्नों को पलटता हूँ,
देखता हूँ बारम्बार,
चेहरे के धुंधले अक्स
फ़िर भी खाली दिखते हैं

न दिखती बड़ी-बड़ी कोठियां कहीं
न दिखती हवेलियां,
न दिखते आलिशान बंगलें कहीं,
खंडहरों में बदल गई मीनारें बड़ी-बड़ी
बजती थीं कभी मेंगल जहां
आज कबूतरों ने डाला है डेरा वहां,
देखता हूँ रोजनामचे की रपट
जब खंगालता हूँ इतिहास ,
चेहरे के धुंधले अक्स
फ़िर भी खाली दिखते हैं ,

न कोई पद मिला, न कोई प्रतिष्ठा मिली
न कोई धन मिला, ना कोई तमगा मिला,
बही खोली तो, कर्मों की लम्बी फेहरिस्त मिली
पढ़ा जब फेहरिस्त को,तो हाथ लगी मेरे उदासी,
आंसुओं की बूंदों की झड़ी
गालों से टपकने लगी,
चेहरे के धुंधले से अक्स
फ़िर भी खाली दिखाई देने लगे,
खोखला सा वही प्रश्न,मुझसे पूछने लगा -
कुर्सीनामा किस-किस का ढूंढोगे ?
और करोगे क्या उसका ?


*****

इन्सान हैं हम, गलतियों के पुतले
गलतियाँ आख़िर हो ही जाती हैं,
जानबूझ कर तो कोई करता नहीं
अनजाने में फ़िर भी हो ही जाती है,

गलती होना तो स्वाभाविक है साकी
इस तथ्य को आओ स्वीकार करें,
फूंक-फूंक रखते हैं हम कदम अपने
कम्बख़त फिर भी हो ही जाती है,

गलतियां हैं जीवन का अहम हिस्सा
हर पल नया अनुभव दे ही जाती है,
स्वीकार कर लेता है कोई-कोई इन्हें
तो कोई अकड़ फ़िर भी दिखा ही जाता है,

सीख लेता है जो इन गलतियों से
वही जीवन को समझ पाता है,
तानाशाही जैसी ज़िद्द पकड़ कर
भला क्या कोई इनसे बच पाया है,

छोड़ दो अपनी दकियानूसी सोच
सबक लें गलतियों से और सुधारे उन्हें,
तलाशा बहुत "धीमान" पर कौन ? मिला तुम्हें
न की हो गलती,कम्बख़त फिर भी हो ही जाती है।

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रली गऊरा पितरे

उम्र हुई जांदी चाली तां,
लगी जांदी छाल बताली
फूलणे लगदी तांज़े सांस
फेरी किन्यां चढ़णी कवाली,
सच गल्लान्दे थे सयाणे,
सुण ओ महाणूआं तेरियां तू ही जाणे
रली ग़ऊरा तांज़े पितरे,
फेरी वैद्दा बी क्या बचाणे,
लाख जतन करी लै चाये कोई,
सदा नी रहणी दियाली
उम्र हुई जांदी चाली
तां लगी जांदी छाल बताली...

साला जांदे बेर नी लगदी,
फेरी उम्र हुई जांदी तांज़े पचपन,
क्रिस्ता रे फसदे तांज़े चक्करा
फेरी आद आऊंदा बचपन,
वाले-दवाले कोई नी दिसदा
हुई गए तांज़े सयाणे,फेरी कुण पूछदा,
आऊंदे-जांदे सबणी जो देखदे
हाक्का पाई-पाई कन्ने,सबी जो सददे,
याद आऊंदी फेरी स्याण्या री गलाई
कजो कन्ना गिला किसी कन्ने,ये सब अपणी कमाई,
खुले रहन्दे थे दरवाज़े, करह री हुन्दी थीं रखवाली
उम्र हुई जांदी चाली
तां लगी जांदी छाल बताली...

उम्र हुई जांदी तांज़े सत्तर-बत्तर
कई हुंदे ईसा उमरा बिच खरे
कई जांदे सत्तरी-बत्तरी,
उठणे-बैठणे तांज़े सामर्थ्य नी रहन्दी
होर ई बदलदे कपड़े कन्नें बदली देंदे सदरी,
पच्छयाड़ी खोटी हुन्दी स्याण्या री
जे दुईं मंजा ते इक जाओ टिरकी,
सै बचपन हुंदा था खरा,
दौड़ी रहन्दे थे सारे, बणी रहन्दी थी फिरकी,
रली ग़ऊरा तांज़े पित्तरे,फेरी किस करनी रखवाली
उम्र हुई जांदी चाली
तां लगी जांदी छाल बताली...

कजो कन्ना गिला किसी रा,
कजो बोलणा माड़ा,
बाबे रा किरड़ू पुकरना पुत्तां जो,
आऊंणा भाईयों सै बी त्याड़ा,
सयाणे गलांदे थे राम सहाई
आ पाई तुसां साई,
खांदे क्या थे बल्या पिछली कमाई,
बल्या आगे,आगे फेरी तुसां साई,
रली ग़ऊरा तांज़े पितरे,
औखी वेले साथ देणे नी आऊंणा किसी मितरे
छड्डणा पऊंणा चोला, तांजे आऊंणी नीणे वाली
उम्र हुई जांदी चाली
तां लगी जांदी छाल बताली...


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छैल छबीलिया धारा म्हारिया

छैल छबीलिया धारा म्हारिया
बिच पर अ बसुरे गाँव,
पीपला रे रूख गाँवे-गाँवे
घणी-घणी देंदे छाँव,
तौऊंदिया रे त्याड़े,
तांजे कम्म कमाई कन्ने आऊंदे,
टोल दे पीपला री छाँव
छैल छबीलिया धारा म्हारिया
बिच पर ह बसुरे गाँव...

नरम-नरम हरे-हरे पत्ते पीपला रे
देखणे जो लगदे छैल बांके,
सबणी ते लगदे न्यारे,
ठंडी-ठंडी बाऊगरी तांजे चलदी
हिलदे लगदे प्यारे,
थके मांदे बाट-बटाऊ आऊंदे
टोल दे पीपला री छाँव,
छैल छबीलिया धारा म्हारिया
बिच पर अ बसुरे गाँव...

पधरे थे कईया गाँवा रे खेत,
खूब हुंन्दा था प्वाजा
कुदरती थे पाणिये रे पण्याँद
खूब बगदा था ख़्वाजा,
स्वांग,पख्यारिया मखौला रे साधन
गाँवे-गाँवे हुंन्दा था दहाजा,
सौंण महीने पिपले पौउँन्दिया थिया पिहंगा
फेरी कोई नी टोल दा था छाँव
छैल छबीलिया धारा म्हारिया
बिच पर अ बसुरे गाँव...

रीड़ीया-रीड़ीया डांगरे चरान्दे
सौऊगी गांदे थे गंगी,
बणे-फाटे पांदे थे भोज पट्टिया
किसी चीज़ा री नी हुंदी थी तंगी,
तीतर बोलदे थे अपणिया बोलिया बिच
मोर पांदे थे पायला,
पुनणे जो हुंदिया थिया तांजे छलिया
खेतरे-खेतरे घूम-घूमी कन्नें
ज्वाड़ करदिया थिया सायला,
हुण बदली गया माहणू ,बदली गया जमाना
खरा हुंन्दा था सै वक्त,
तांजे मर्दाओ देखी कन्ने,कुण्ड पाई लैंदी थी जनाना
ऐसी रे आई गए हुण,वक्त भाईयों,
हुण, कुण टोलदा पीपला री छाँव,
छैल छबीलिया धारा म्हारिया
बिच पर अ बसुरे गाँव...


- बाबू राम धीमान


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